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किसान उत्पादक संगठन (FPOs): प्रगति एवं चुनौतियाँ

Lokesh Pal March 22, 2025 02:46 43 0

संदर्भ

वर्ष 2020 में ₹6,865 करोड़ के परिव्यय के साथ शुरू की गई 10,000 किसान उत्पादक संगठन (FPOs) स्थापित करने की भारत सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना ने हाल ही में अपना संख्यात्मक लक्ष्य हासिल कर लिया है।

  • अमी-ग्रामविकास FPO (खगड़िया, बिहार) फरवरी 2025 में इस पहल के तहत 10,000वाँ FPO बन गया।

किसान उत्पादक संगठन (FPOs) के बारे में

  • किसान उत्पादक संगठन (FPO) या किसान उत्पादक कंपनियाँ (FPC) सामूहिक इकाइयाँ हैं, जिनका गठन किसानों द्वारा पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं के माध्यम से अपनी सौदेबाजी की शक्ति, आय और लाभप्रदता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
  • उत्पत्ति: भारत में किसानों के सामूहिक संगठन की अवधारणा का स्रोत वर्ष 1904 के सहकारी आंदोलन को माना जाता है।
  • कानूनी आधार: कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत निगमित, वे पारंपरिक सहकारी समितियों की तुलना में निजी कंपनियों की तरह कार्य करते हैं, जिससे पेशेवर प्रबंधन, कम राजनीतिक हस्तक्षेप और बेहतर वित्तीय दक्षता की अनुमति मिलती है।

FPOs की वर्तमान स्थिति

  • कुल FPOs: 44,400 से अधिक (पहले की योजनाओं और राज्य पहलों सहित)।
  • सफल FPOs: कुछ ने ₹1 करोड़ से अधिक वार्षिक टर्नओवर की रिपोर्ट की है, जिसे कृषि स्टार्टअप क्षेत्र में ‘यूनिकॉर्न’ के समान माना जाता है।
  • किसानों की भागीदारी: लगभग 3 मिलियन किसान, जिनमें से लगभग 40% महिला सदस्य हैं।

FPOs के उद्देश्य और लाभ

  • थोक खरीद और विपणन के माध्यम से बेहतर आय।
  • इनपुट (बीज, उर्वरक) और आउटपुट (उत्पाद बाजार) के लिए बढ़ी हुई सौदेबाजी शक्ति।
  • तकनीकी और वित्तीय सहायता
    • पहले तीन वर्षों के लिए ₹18 लाख तक की वित्तीय सहायता।
    • प्रति किसान सदस्य ₹2,000 तक का इक्विटी अनुदान।
    • चुनिंदा संस्थानों से ऋण गारंटी।
  • आगे और पीछे लिंकेज
    • इनपुट आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं के साथ सीधे संबंध।
    • लॉजिस्टिक्स और परिवहन लागत में कमी।
  • संसाधन साझाकरण
    • ज्ञान का आदान-प्रदान, उपकरण साझा करना, और सहकारी उत्पादन प्रथाएँ।

FPOs के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • सीमित इक्विटी और पूँजी
    • किसानों, जिनमें से अधिकांश छोटे किसान या भूमिहीन हैं, की वित्तीय क्षमता सीमित है, जिससे इक्विटी जुटाना कठिन हो जाता है।
  • ऋण तक खराब पहुँच
    • बैंक और वित्तीय संस्थाएँ कम परिसंपत्ति आधार के कारण उच्च जोखिम महसूस करती हैं, जिससे उधार देने की उनकी इच्छा सीमित हो जाती है।
  • पेशेवर प्रबंधन का अभाव
    • वित्तीय बाधाओं के कारण कुशल प्रबंधकों को नियुक्त करने और उन्हें बनाए रखने में कठिनाई के कारण विपणन, रणनीति, कानूनी अनुपालन और लेखा जैसे कार्य प्रभावित होते हैं।
  • जोखिम प्रबंधन रणनीतियों का अभाव
    • उत्पादन और बाजार जोखिमों को कम करने के सीमित साधन होने के कारण FPO असुरक्षित हो गए हैं।

सफल कार्यान्वयन और स्थिरता के लिए कदम

  • मजबूत व्यापार मॉडल
    • प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और गुणवत्ता सुधार जैसे स्पष्ट रूप से परिभाषित मूल्य संवर्द्धन मार्ग।
  • क्षमता निर्माण
    • किसानों को नेतृत्व, प्रशासन, वित्तीय साक्षरता और प्रबंधकीय कौशल का प्रशिक्षण देना।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण
    • बेहतर बाजार संपर्क, गुणवत्ता आश्वासन और कुशल संचालन के लिए डिजिटल उपकरण।
  • जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियाँ
    • खाद्य पदार्थों को बाजार की अस्थिरता से बचाने के लिए बीमा तंत्र और वित्तीय सुरक्षा उपाय स्थापित करना।

आगे की राह

  • निरंतर प्रोत्साहन: FPOs बनाने की गति 10,000 पर नहीं रुकनी चाहिए; बल्कि विस्तार जारी रहना चाहिए।
  • सरकार की भूमिका: क्षमता निर्माण और डिजिटल एकीकरण के लिए लक्षित योजनाओं के साथ-साथ निरंतर नीति समर्थन और वित्तीय सहायता आवश्यक है।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: बाजार पहुँच, कौशल प्रशिक्षण और निवेश के लिए निजी संस्थाओं के साथ सहयोग स्थिरता एवं लाभप्रदता सुनिश्चित कर सकता है।

निष्कर्ष

यद्यपि 10,000 FPOs का संख्यात्मक लक्ष्य प्राप्त करना सराहनीय है, परंतु कार्यान्वयन चुनौतियों, विशेषकर वित्तपोषण, क्षमता निर्माण और पेशेवर प्रबंधन का समाधान करना भी आवश्यक है।

  • FPOs के सतत् विकास और विस्तार के लिए निरंतर सरकारी समर्थन, प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग और ग्रामीण समुदायों को आर्थिक तथा सामाजिक रूप से सशक्त बनाने के लिए अच्छी तरह से तैयार किए गए व्यवसाय मॉडल की आवश्यकता है।

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