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भविष्य में समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी

Lokesh Pal January 17, 2026 02:01 8 0

संदर्भ

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी में गहरे महासागरों और बाह्य अंतरिक्ष जैसे चरम, अल्प अन्वेषित वातावरणों में घटित होने वाली जैविक प्रक्रियाओं और जीवों के संबंध में शोध करना जैसे प्रयास शामिल हैं।

समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (Marine Biotechnology)

  • समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (जिसे अक्सर “ब्लू बायोटेक्नोलॉजी” कहा जाता है) का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्मजीवों, शैवाल और गहरे समुद्र में रहने वाले जीवों का अध्ययन करके नए उत्पादों और प्रक्रियाओं की खोज और विकास करना है।
  • ये जीव कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए विशिष्ट रूप से अनुकूलित हो चुके हैं:
    • उच्च दाब
    • अत्यधिक खारापन
    • कम प्रकाश
    • पोषक तत्त्वों की कमी।

अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी

  • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी इस बात का अध्ययन करती है कि सूक्ष्मजीव, पौधे, मानव कोशिकाएँ और जैविक प्रणालियाँ सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण, ब्रह्मांडीय विकिरण तथा अन्य अंतरिक्ष परिस्थितियों पर कैसे प्रतिक्रिया करती हैं।
  • महत्त्व: दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों के दौरान मानव को स्वस्थ बनाए रखने और पृथ्वी पर चिकित्सा और प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण प्रगति लाने वाले ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी की आवश्यकता

  • प्राकृतिक लाभ: भारत की तटरेखा लंबी है (11,000 किमी. से अधिक) और इसका विशाल विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (20 लाख वर्ग किमी. से अधिक) समृद्ध समुद्री जैव विविधता प्रदान करता है।
  • वर्तमान उत्पादन: घरेलू उत्पादन कम है (उदाहरण के लिए, प्रति वर्ष लगभग 70,000 टन समुद्री शैवाल का उत्पादन)।
    • भारत अगर (Agar) और कैराजीनन (Carrageenan) जैसे कई समुद्री उत्पादों का आयात करता है।
  • अंतरिक्ष आवश्यकताएँ: दीर्घकालिक अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए महत्त्वपूर्ण → सुरक्षित भोजन, स्वास्थ्य प्रबंधन, जैव-विनिर्माण।
  • रणनीतिक महत्त्व: जैव-अर्थव्यवस्था, स्वायत्तता और वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करता है।

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी की स्थिति

  • सीमित समुद्री बायोमास उत्पादन: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 70,000 टन समुद्री शैवाल का उत्पादन होता है, जो इसकी क्षमता की तुलना में अपेक्षाकृत कम है।
  • आयात पर निर्भरता: भारत खाद्य, फार्मास्यूटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन और चिकित्सा क्षेत्रों में उपयोग के लिए अगर, कैराजीनन और एल्जिनेट का आयात करता है।
  • सरकारी पहल: ब्लू इकोनॉमी एजेंडा, डीप ओशन मिशन और Bio3 के तहत योजनाएँ खेती से लेकर मूल्यवर्द्धन तक एकीकृत समुद्री जैव-उत्पादन को बढ़ावा देती हैं।
  • उभरते निजी और अनुसंधान क्षेत्र के हितधारक: C6 एनर्जी और क्लाइमाक्रू जैसी कंपनियाँ, ICAR–CMFRI और राज्य की पहलों के साथ मिलकर, समुद्री बायोमास को उच्च-मूल्य वाले जैव-उत्पादों में परिवर्तित कर रही हैं।
  • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी में प्रगति: ISRO का सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण जीव विज्ञान कार्यक्रम अंतरिक्ष में खाद्य उत्पादन और जीवन-सहायक प्रणालियों के लिए सूक्ष्मजीवों और शैवाल पर प्रयोग करता है।
  • अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर ध्यान: सूक्ष्मजीवों के व्यवहार और अंतरिक्ष यात्रियों के माइक्रोबायोम पर शोध भविष्य के दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों में सहायक है।
  • निजी भागीदारी सीमित: प्रौद्योगिकी की प्रारंभिक अवस्था के कारण निजी क्षेत्र की भागीदारी अभी भी कम है।

वैश्विक विकास

  • यूरोपीय संघ: समुद्री जैव-अन्वेषण, शैवाल जैव-सामग्री, जैव-सक्रिय यौगिक; साझा अवसंरचना (EMBRC)।
  • चीन: समुद्री शैवाल मत्स्यपालन का विस्तार, समुद्री जैव-प्रसंस्करण, गहरे समुद्र का अन्वेषण।
  • अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया: समुद्री जैव प्रौद्योगिकी पहलों का समर्थन।
  • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी
    • अमेरिका/नासा: सूक्ष्मजीव व्यवहार, प्रोटीन क्रिस्टलीकरण, स्टेम कोशिकाएँ, बंद-लूप जीवन समर्थन।
    • ESA, चीन की तियांगोंग, जापान की JAXA: पादप वृद्धि, माइक्रोबायोम, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में जैव-सामग्री।

निष्कर्ष

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी अपार संभावनाओं वाले क्षेत्र हैं। प्रारंभिक और लक्षित निवेश से भारत को उभरती वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था में स्थायी रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

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