100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

गंगा नदी का प्रदूषण

Lokesh Pal February 27, 2025 03:00 19 0

संदर्भ

महाकुंभ 2025 ने गंगा और उसकी सहायक नदियों के समक्ष उपस्थित गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों को संदर्भित किया  है।

संबंधित तथ्य

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की एक रिपोर्ट से पता चला है कि फेकल कोलीफॉर्म और बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड का स्तर स्नान के मानकों को पूरा नहीं करता है।
  • इसके अलावा NGT ने महाकुंभ मेले के दौरान गंगा नदी के जल की गुणवत्ता के बारे में पर्याप्त विवरण उपलब्ध कराने में विफल रहने के लिए यू.पी. सरकार की आलोचना की है।

महाकुंभ मेले का गंगा जल की गुणवत्ता पर प्रभाव

  • जनवरी के मध्य से अब तक प्रयागराज में महाकुंभ मेले में लगभग 45 करोड़ आगंतुक आ चुके हैं।
    • कई प्रतिभागी अनुष्ठानिक स्नान करते हैं और नदी के जल का सेवन करते हैं।
  • मकर संक्रांति (14 जनवरी) पर फेकल कोलीफॉर्म का स्तर
    • संगम घाट पर 11,000 यूनिट (2,500 यूनिट की सुरक्षित सीमा से 4 गुना अधिक)।
    • पुराने नैनी ब्रिज घाट पर 33,000 यूनिट।
  • अन्य दिनों में फेकल कोलीफॉर्म का स्तर
    • 200 और 780 यूनिट तक गिर गया, जो उतार-चढ़ाव को दर्शाता है।
  • CPCB ने बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (Biochemical Oxygen Demand- BOD) और घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen-DO) के स्तर में भी भिन्नता देखी।

फेकल कोलीफॉर्म (Faecal Coliform)

  • फेकल कोलीफॉर्म स्तर जल में फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की सांद्रता को संदर्भित करता है, जिसे आमतौर पर प्रति 100 मिलीलीटर (CFU/100mL) कॉलोनी बनाने वाली इकाइयों में मापा जाता है।
  • ये बैक्टीरिया, मुख्य रूप से एस्चेरिचिया कोलाई (E. coli), जल स्रोतों में फेकल संदूषण और संभावित रोगजनकों के संकेतक हैं।

जल गुणवत्ता के मानक

  • पेयजल: 0 CFU/100mL (WHO और EPA मानकों के अनुसार)।
  • मनोरंजन हेतु जल (तैराकी): आमतौर पर 200 CFU/100mL से कम।
  • अपशिष्ट निर्वहन (उपचारित अपशिष्ट जल): स्थानीय नियमों के आधार पर प्रायः 1,000 CFU/100mL से कम होना चाहिए।

गंगा नदी प्रदूषण के प्रमुख स्रोत

  • सीवेज: नदी के किनारे बसे शहरों और कस्बों से आने वाला अनुपचारित सीवेज प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है।
    • सीवेज में कार्बनिक पदार्थ, पोषक तत्व, विषैले रसायन और रोगाणु होते हैं।
  • औद्योगिक अपशिष्ट: कारखानों, चमड़े के कारखानों और अन्य उद्योगों से निकलने वाला औद्योगिक अपशिष्ट नदी को प्रदूषित करता है।
    • औद्योगिक अपशिष्ट में भारी धातुएँ और कीटनाशक जैसे विषैले रसायन शामिल होते हैं।
  • कृषि अपवाह: कृषि से अतिरिक्त जल नदी में प्रवाहित हो जाता है।
  • धार्मिक गतिविधियाँ: लकड़ी की चिताओं पर शवों को जलाने से प्रदूषण बढ़ता है।
  • अन्य स्रोत: शहरों और कस्बों से निकलने वाला ठोस अपशिष्ट, जिसे एकत्र नहीं किया जाता।
    • बैराज और बाँध, जो नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करते हैं।

बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD)

  • बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) जल में कार्बनिक पदार्थों को विघटित करते समय सूक्ष्मजीवों द्वारा खपत की गई ऑक्सीजन की मात्रा को मापता है।
  • BOD जल की गुणवत्ता और प्रदूषण के स्तर का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक है।
  • उच्च BOD उच्च कार्बनिक प्रदूषण को इंगित करता है, जो प्रायः अपशिष्ट जल, सीवेज या औद्योगिक निर्वहन से होता है।

गंगा नदी प्रणाली प्रदूषण का प्रभाव

  • जल गुणवत्ता में गिरावट: बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD), फेकल कोलीफॉर्म और औद्योगिक अपशिष्टों के उच्च स्तर जल की शुद्धता को कम करते हैं।
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि गंगा नदी के कई हिस्सों में BOD का स्तर सुरक्षित सीमा (3 मिलीग्राम/लीटर) से अधिक है, जो जैविक प्रदूषण को दर्शाता है।
  • जलीय जैव विविधता का नुकसान: ऑक्सीजन की कमी और विषाक्त प्रदूषकों के कारण मछली की आबादी, डॉल्फिन और अन्य जलीय प्रजातियों में गिरावट।
    • गंगा नदी डॉल्फ़िन, एक संकेतक प्रजाति, खतरे का सामना कर रही है और गंगा नदी पर उच्च प्रदूषण एवं बांध निर्माण के कारण गंभीर रूप से संकटग्रस्त है।
  • जल जनित रोग: फेकल संदूषण के कारण हैजा, पेचिश, टाइफाइड और हेपेटाइटिस रोग फैलता है।
    • गंगा जैसी प्रदूषित नदियाँ भारत में जलजनित रोगों का एक प्रमुख कारण हैं।
  • मृदा प्रदूषण: प्रदूषित गंगा जल से सिंचाई करने से फसलों में विषाक्त पदार्थों का संचयन हो जाता है।
    • IIT कानपुर द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कानपुर के पास गंगा के जल से सिंचित कृषि भूमि में कैडमियम तथा सीसा जैसे भारी धातुओं का स्तर बढ़ गया था, जिससे लंबे समय तक मिट्टी का क्षरण हो रहा था।
  • फसल की पैदावार में कमी: उच्च लवणता और औद्योगिक अपशिष्ट कृषि भूमि की उर्वरता और उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
    • औद्योगिक अपशिष्ट मृदा की लवणता को बढ़ाते हैं, जिससे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में फसल उत्पादकता कम हो जाती है।
  • पवित्र परंपराओं को खतरा: गंगा स्नान (पवित्र स्नान) जैसे अनुष्ठान खराब जल की गुणवत्ता के कारण खतरनाक हो जाते हैं।
    • कुछ स्थानों पर खतरनाक रूप से उच्च जीवाणु संदूषण के कारण गंगा में स्नान करना असुरक्षित है।
  • नदी की पवित्रता में विश्वास की कमी: प्रदूषण हिंदू परंपराओं में गंगा के आध्यात्मिक महत्व को कम करता है।

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत प्रमुख हस्तक्षेप

  • निगरानी और प्रशासन: ऑनलाइन डैशबोर्ड ‘प्रयाग’ नदी के जल की गुणवत्ता और एसटीपी प्रदर्शन की निगरानी करता है।
  • सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता: गंगा टास्क फोर्स (GTF), गंगा दूत, गंगा प्रहरी और गंगा मित्रों के माध्यम से सार्वजनिक जुड़ाव।
  • जैव विविधता संरक्षण: जैव विविधता के संरक्षण और मछुआरों की आजीविका का समर्थन करने के लिए 105 लाख इंडियन मेजर कार्प (IMC) मछलियों को छोड़ा गया।

गंगा की सफाई के लिए सरकारी पहल

  • भारत सरकार ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के पुनरुद्धार के लिए वर्ष 2014-2015 में नमामि गंगे कार्यक्रम (NGP) शुरू किया था।
    • इस कार्यक्रम का आरंभिक बजट पाँच वर्षों (मार्च 2021 तक) के लिए 20,000 करोड़ रुपये था, जिसे बाद में 22,500 करोड़ रुपये के साथ मार्च 2026 तक बढ़ा दिया गया।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG): गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने और पारिस्थितिकी कायाकल्प सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2011 में NMCG की शुरुआत की गई थी।
  • गंगा एक्शन प्लान (GAP): गंगा नदी को साफ करने की यह पहली बड़ी पहल थी। इसे वर्ष 1986 में लॉन्च किया गया था।
  • गंगा ग्राम: गंगा नदी के किनारे बसे गाँवों को बेहतर स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन के साथ मॉडल गाँवों के रूप में विकसित करने के लिए वर्ष 2016 में लॉन्च किया गया।
  • गंगा वृक्षारोपण अभियान: यह गंगा नदी के किनारे हरित आवरण को बढ़ाने और नदी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए वृक्षारोपण अभियान है।

वैश्विक स्तर पर नदियों की सफाई से संबंधित सफलता की कहानियाँ

  • टेम्स नदी, यू.के.: सख्त प्रदूषण कानूनों, सीवेज उपचार और आर्द्रभूमि पुनर्स्थापन के माध्यम से पुनरुद्धार किया गया; अब  यह नदी 125 से अधिक मछली प्रजातियों का आवास है।
  • राइन नदी, यूरोप: अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अपशिष्ट जल उपचार के माध्यम से औद्योगिक प्रदूषण और रासायनिक रिसाव को रोका गया और स्वच्छता को सुनिश्चित किया गया।
  • शिकागो नदी, USA: आर्द्रभूमि, वातन प्रणाली और सार्वजनिक स्वच्छता के साथ सुधार हुआ; अब इसमें कयाकिंग और मनोरंजन गतिविधियाँ होती हैं।
  • चेओन्गगेचेओन स्ट्रीम, दक्षिण कोरिया: कंक्रीट कवरिंग को हटाकर और प्राकृतिक प्रवाह को पुनर्स्थापित करके पुनरुद्धार किया गया, जिससे शहरी जलवायु में भी सुधार हुआ है।

गंगा और उसकी सहायक नदियों की सफाई में प्रमुख चुनौतियाँ

  • औद्योगिक प्रदूषण: चमड़े के कारखानों, कपड़ा तथा रासायनिक उद्योगों से विषाक्त रसायनों, भारी धातुओं और रंगों का अनियमित निर्वहन।
    • उत्तर प्रदेश के कानपुर-उन्नाव क्षेत्र में चमड़े के अनेक कारखाने हैं, जो क्रोमियम जैसे भारी धातुओं से युक्त अनुपचारित अपशिष्टों को गंगा में निष्कासित करते हैं।
  • अनुपचारित सीवेज और अपशिष्ट जल: प्रतिदिन 3 बिलियन लीटर से अधिक सीवेज उत्पन्न होता है, लेकिन उपचार क्षमता अपर्याप्त है।
    • वाराणसी, सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक है, जहाँ प्रतिदिन 350 मिलियन लीटर से अधिक सीवेज उत्पन्न होता है, लेकिन इसके उपचार संयंत्र 50% से भी कम क्षमता पर कार्य करते हैं।
  • ठोस अपशिष्ट और प्लास्टिक प्रदूषण: बड़ी मात्रा में प्लास्टिक, धार्मिक प्रसाद और शहरी अपशिष्ट नदी में फेंके जाते हैं।
    • अकुशल नगरपालिका अपशिष्ट प्रबंधन के कारण सहायक नदियों में अपशिष्ट जमा हो जाता है।
  • कृषि अपवाह: उर्वरकों, कीटनाशकों और खाद के अत्यधिक उपयोग से नाइट्रेट और फॉस्फेट का स्तर बढ़ जाता है, जिससे यूट्रोफिकेशन होता है।
    • ‘एनवायरनमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च’ नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि अत्यधिक उर्वरक उपयोग के कारण गंगा बेसिन में नाइट्रेट का स्तर अनुमेय सीमा से 2-3 गुना अधिक है।
  • अतिक्रमण और रेत खनन: नदी के किनारों पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण प्राकृतिक प्रवाह को कम करते हैं और अवसाद को बढ़ाते हैं।
    • उत्तराखंड में अवैध रेत खनन ने नदी के तल को बाधित कर दिया है, जिससे जलीय जीवन प्रभावित हुआ है।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाएँ: मूर्तियों, फूलों और राख के विसर्जन से जहरीले रसायन और गैर-बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट निष्कासित होते हैं।
    • कुंभ मेले में 45 करोड़ से अधिक लोग एकत्रित हुए हैं, जिससे प्रदूषण के स्तर में अस्थायी वृद्धि हुई है।
  • एजेंसियों के बीच खराब समन्वय: कई एजेंसियाँ (NMCG, राज्य सरकारें, नगर निकाय) उचित समन्वय के बिना कार्य करती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन और कम जल प्रवाह: ग्लेशियर का पिघलना और अनियमित मानसून नदी की प्राकृतिक सफाई क्षमता को प्रभावित करते हैं।
    • गंगा को जल प्रदान करने वाला गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष 22 मीटर की दर से संकुचित हो रहा है, जिससे नदी का प्रवाह और प्रदूषकों को हटाने की इसकी प्राकृतिक क्षमता कम हो रही है।

आगे की राह

  • प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का सख्ती से पालन: गंगा कार्य योजना (GAP) और नमामि गंगे कार्यक्रम का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करना।
  • गंगा कार्य योजना (GAP): वर्ष 1986 में शुरू की गई GAP का उद्देश्य गंगा में प्रदूषण को कम करना था। हालाँकि, इसका क्रियान्वयन असंगत रहा है।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम: वर्ष 2014 में ₹20,000 करोड़ के बजट के साथ शुरू की गई इस योजना ने मिश्रित परिणाम हासिल किए हैं।
  • सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का विस्तार: नदी के किनारे एसटीपी की संख्या और दक्षता में वृद्धि।
    • राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक गंगा के आसपास 7,000 MLD की सीवेज उपचार क्षमता हासिल करना है।
  • चमड़े के कारखानों और कारखानों की सख्त निगरानी: विशेष रूप से कानपुर, वाराणसी और पटना में, जहाँ औद्योगिक प्रदूषण अधिक है।
    • वर्ष 2021 में, NGT ने अपशिष्ट उपचार मानदंडों का पालन न करने के लिए कानपुर में टेनरियों पर ₹10 करोड़ का जुर्माना लगाया।
    • ‘कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ (Common Effluent Treatment Plants-CETP) की मौजूदगी के बावजूद, कई टेनरी उपचार प्रक्रिया को दरकिनार कर देते हैं और अनुपचारित अपशिष्ट जल को नदी में बहा देते हैं।
  • प्लास्टिक कचरे पर प्रतिबंध और विनियमन: गंगा और उसकी सहायक नदियों के पास एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर सख्त प्रतिबंध लागू करना।
    • वर्ष 2021 में, उत्तराखंड सरकार ने एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन प्रवर्तन कमजोर रहा।
  • प्रदूषण निगरानी के लिए AI और IoT का उपयोग: वास्तविक समय में जल गुणवत्ता निगरानी के लिए स्मार्ट सेंसर तैनात करना।
    • NMCG ने गंगा और यमुना नदियों के किनारे नदी के जल की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी के लिए ‘PRAYAG’ नामक एक ऑनलाइन डैशबोर्ड चालू किया है।
  • हरित अवसंरचना परियोजनाएँ: सीवेज प्रबंधन और पर्यावरण के अनुकूल सुविधाओं के साथ सतत् ‘रिवरफ्रंट’ विकसित करना।
    • गुजरात में साबरमती रिवरफ्रंट, सतत् रिवरफ्रंट विकास का एक सफल मॉडल है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP): जल उपचार और अपशिष्ट प्रबंधन में निजी फर्मों को शामिल करना।

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.