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भारत के लिए अंडरसी केबलों का बढ़ता महत्त्व

Lokesh Pal April 05, 2025 02:36 9 0

संदर्भ

भारत में नए अंडरसी केबल लैंडिंग सिस्टम की शुरुआत हो रही है, जिसमें एयरटेल के 2अफ्रीका पर्ल्स (2Africa Pearls) और SEA-ME-WE-6 शामिल हैं, जिससे इंटरनेशनल इंटरनेट बैंडविड्थ को बढ़ावा मिलेगा।

  • इस प्रगति के बावजूद, भारत का अंडरसी केबल बुनियादी ढाँचा अभी भी सिंगापुर जैसे छोटे देशों से पीछे है, जिससे इसमें व्यवधान की संभावना बनी रहती है।

अंडरसी केबल क्या हैं?

  • अंडरसी केबल, समुद्र तल पर बिछाई गई फाइबर ऑप्टिक केबल हैं, जो देशों के बीच इंटरनेट नेटवर्क को जोड़ती हैं।
  • उद्देश्य: ये केबल वैश्विक इंटरनेट डेटा का अधिकांश हिस्सा हैं, जिससे सीमाओं के पार संचार और वित्तीय लेन-देन संभव हो पाते हैं।
  • संरचना एवं लैंडिंग: ये केबल अत्यधिक इन्सुलेटेड होती हैं और इनमें डेटा संचारित करने के लिए फाइबर ऑप्टिक स्ट्रैंड होते हैं।
    • ये केबल लैंडिंग पॉइंट पर सतह पर आती हैं, जो अंतर्देशीय लैंडिंग स्टेशनों और फिर व्यापक स्थलीय नेटवर्क से जुड़ती हैं।
  • वैश्विक नेटवर्क: वैश्विक स्तर पर लगभग 600 अंडरसी केबल मौजूद हैं।
  • आर्थिक महत्त्व: वे 90% डेटा, 80% वैश्विक व्यापार और $10 ट्रिलियन के वित्तीय लेन-देन को सँभालती हैं।

भारत का वर्तमान अंडरसी केबल पारिस्थितिकी तंत्र

  • केबल लैंडिंग साइट: भारत में सबसी केबल के लिए दो मुख्य केंद्र मुंबई और चेन्नई हैं।
    • भारत में लगभग 17 अंतरराष्ट्रीय केबल हैं, जिनमें से 95% सबसी केबल मुंबई के वर्सोवा में 6 किलोमीटर के क्षेत्र में केंद्रित हैं।
  • घरेलू संपर्क: भारत में दो घरेलू केबल सिस्टम हैं:
    • चेन्नई-अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (CANI)
    • कोच्चि–लक्षद्वीप द्वीप समूह।
  • क्षमता संबंधी चिंताएँ: हालाँकि वर्तमान बैंडविड्थ को पर्याप्त माना जाता है, लेकिन बढ़ता डेटा ट्रैफिक जल्द ही उपलब्ध क्षमता से आगे निकल सकता है।
    • विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि निकट भविष्य में भारत की क्षमता अपर्याप्त हो सकती है।
  • वैश्विक तुलना: भारत वैश्विक केबल लैंडिंग स्टेशनों में केवल 1% और सबसी केबल सिस्टम में 3% का योगदान देता है, जो वैश्विक नेटवर्क में कम प्रतिनिधित्व को दर्शाता है।

भारत में अंडरसी केबल बिछाने की चुनौतियाँ

  • व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता: भारत को समुद्र तल पर केबल के क्षतिग्रस्त होने का बहुत अधिक जोखिम है, मुख्य  तौर पर लाल सागर में बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य जैसे चोकपॉइंट पर।
    • वर्ष 2024 में हूती हमलों जैसे क्षेत्रीय संघर्षों के कारण होने वाले पिछले व्यवधानों ने इस संकीर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाली कई केबलों को प्रभावित किया।
  • कुछ मार्गों पर अत्यधिक निर्भरता: कई समुद्र के नीचे केबल पारंपरिक शिपिंग/व्यापार मार्गों का अनुसरण करते हैं, जिससे अतिरेक सीमित हो जाता है और बड़े पैमाने पर आउटेज का जोखिम बढ़ जाता है।
    • उद्योग के अनुमानों के अनुसार, इन मार्गों में व्यवधान के कारण भारत का 25% इंटरनेट बंद हो सकता है।
  • विनियामक समस्याएँ: भारत में समुद्र तल पर केबल बिछाने के लिए विभिन्न विभागों से लगभग 51 अनुमतियों की आवश्यकता होती है, जिनमें दूरसंचार विभाग, गृह मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, मत्स्य विभाग, स्थानीय प्राधिकरण और नगर पालिकाएँ आदि शामिल हैं।
  • समय लेने वाली प्रक्रियाएँ: मेटा जैसी कंपनियाँ इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि परियोजना का 80% समय केबल के दोनों सिरों पर प्रादेशिक जल में विनियमों से निपटने में व्यतीत होता है।
  • बुनियादी ढाँचा और रखरखाव के मुद्दे: भारत में घरेलू मरम्मत क्षमताओं की कमी के कारण, यह वर्तमान में क्षतिग्रस्त सबसी केबल की मरम्मत के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भर है, जिसके लिए कई अनुमतियों और देरी की आवश्यकता होती है।
    • घरेलू मरम्मत जहाजों और केबल भंडारण डिपो की अनुपस्थिति के कारण सिस्टम लंबे समय तक आउटेज के प्रति संवेदनशील है।
  • ट्रॉलर से केबल क्षति: मछली पालन की गतिविधियाँ, विशेष रूप से ट्रॉलर, अक्सर समुद्र के नीचे केबल को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे रखरखाव के प्रयास और भी जटिल हो जाते हैं।

भारत के अंडरसी केबल अवसंरचना में सुधार के लिए सिफारिशें

  • विनियामक अनुमोदन को सरल बनाना: कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए केबल परिनियोजन के लिए आवश्यक अनुमतियों की संख्या कम करना।
  • घरेलू केबल मरम्मत अवसंरचना का विकास करना: क्षति के लिए त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी मरम्मत जहाजों और केबल भंडारण डिपो में निवेश करना।
  • केबल रूट में विविधता लाना: वैकल्पिक और सुरक्षित सबसी रूट की खोज करना, जो केवल पारंपरिक व्यापार गलियारों का अनुसरण न करना।
  • लैंडिंग स्टेशन और केबल सिस्टम बढ़ाना: जोखिम को कम करने और लचीलापन बढ़ाने के लिए मुंबई तथा चेन्नई से परे लैंडिंग साइटों की संख्या का विस्तार करना।
  • अतिरिक्त क्षमता का निर्माण करना: आउटेज का प्रबंधन के लिए अतिरिक्त क्षमता तथा बैकअप मार्गों में योजना बनाना और निवेश करना।

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