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वन्यजीव अभयारण्यों के अंदर धार्मिक संरचनाओं पर दिशा-निर्देश

Lokesh Pal January 19, 2026 04:43 39 0

संदर्भ

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति (SCNBWL) ने वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के भीतर उपस्थित धार्मिक संरचनाओं हेतु के माध्यम से वन्य भूमि के अतिक्रमण को चिह्नित करने के लिए मसौदा दिशा-निर्देश तैयार किए हैं।

पृष्ठभूमि

  • यह मुद्दा गुजरात के बालाराम अंबाजी वन्यजीव अभयारण्य से संबंधित एक प्रस्ताव के बाद सामने आया, जहाँ एक धार्मिक संरचना के लिए वन भूमि के हस्तांतरण की माँग की गई थी।
  • यद्यपि प्रारंभिक स्वीकृति दी गई थी, परंतु बाद में इसे निम्नलिखित कारणों से वापस ले लिया गया-
    • वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत दर्ज वन अधिकारों का अभाव, और
    • संरक्षित क्षेत्रों में समान माँगों के लिए देशव्यापी उदाहरण स्थापित होने का जोखिम।

दिशा-निर्देशों की आवश्यकता

  • खंडित स्वीकृतियों का नियंत्रण: संरक्षण कानूनों को कमजोर करने वाली तदर्थ स्वीकृतियों से बचाव।
  • कानूनी एकरूपता: धार्मिक संस्थानों के प्रस्तावों के मूल्यांकन हेतु स्पष्ट एवं विधिसम्मत ढाँचा प्रदान करना।
  • हितों का संतुलन: पारिस्थितिकी अखंडता की रक्षा करते हुए सांस्कृतिक/धार्मिक भावनाओं का समाधान।
    • उदाहरण पर नियंत्रण: संरक्षित क्षेत्रों में धार्मिक संरचनाओं के प्रसार को रोकना, जो जैव-विविधता से समझौता कर सकती हैं।

मसौदा दिशा-निर्देशों की प्रमुख विशेषताएँ

  • निर्माण पर सामान्य सिद्धांत: वर्ष 1980 (जब वन संरक्षण अधिनियम लागू हुआ) के बाद वन भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण/विस्तार अतिक्रमण माना जाएगा।
  • अपवादस्वरूप नियमितीकरण: असाधारण मामलों में, जहाँ राज्य सरकार नियमितीकरण को उचित ठहराते हुए कारणयुक्त एवं प्रलेखित आदेश जारी करती है, प्रस्ताव को प्रकरण-दर-प्रकरण विचार हेतु मंत्रालय को संदर्भित किया जा सकता है।
  • मौजूदा संरचनाओं का विस्तार: “क्षेत्रफल या मौजूदा संरचनाओं के विस्तार” से संबंधित प्रस्तावों पर सामान्यतः विचार नहीं किया जाएगा।
  • सीमित विस्तार प्रावधान
    • पारिस्थितिकी संघर्ष को कम करने के लिए, या
    • मौजूदा दबावों के प्रबंधन हेतु सार्वजनिक उपयोगिताएँ सृजित करने के लिए।

संरक्षित क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाला विधिक ढाँचा

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों को नियंत्रित करता है; आवास संरक्षण को प्राथमिकता देता है और मानव गतिविधियों को सीमित करता है।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980: गैर-वन प्रयोजनों हेतु वन भूमि के विचलन को केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रतिबंधित करता है, जिससे विकास पर पारिस्थितिकी प्रधानता सुदृढ़ होती है।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006
    • व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है; भूमि पर किसी भी दावे (जिसमें धार्मिक या सांस्कृतिक संरचनाएँ शामिल हैं) के लिए वन अधिकारों की औपचारिक मान्यता आवश्यक है।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL)

  • प्रकृति: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में वर्ष 2002 के संशोधन के पश्चात् वर्ष 2003 में गठित एक वैधानिक सर्वोच्च निकाय।
  • भूमिका: भारत में वन्यजीव संरक्षण हेतु सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय के रूप में कार्य करता है।
  • मंत्रालय: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • विकासक्रम
    • वर्ष 1952: भारतीय वन्यजीव बोर्ड (IBWL) की स्थापना।
    • प्रथम अध्यक्ष: श्री जयचामराजा वाडियार, मैसूर के महाराजा।
    • वर्ष 2003: IBWL का पुनर्गठन कर NBWL बनाया गया।
  • NBWL की संरचना
    • अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री
    • उपाध्यक्ष: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री
    • सदस्य-सचिव: अतिरिक्त महानिदेशक (वन) (वन्यजीव) एवं निदेशक, वन्यजीव संरक्षण
    • अन्य सदस्य
      • 5 गैर-सरकारी संगठन (NGO) प्रतिनिधि
      • 10 प्रतिष्ठित संरक्षणविद्/पारिस्थितिकीविद्/पर्यावरणविद्।
  • NBWL की स्थायी समिति: स्थायी समिति NBWL के अंतर्गत एक विशिष्ट निकाय के रूप में कार्य करती है।
    • अध्यक्ष: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री
    • संरचना: NBWL के सदस्यों में से मंत्री द्वारा नामित, अधिकतम दस सदस्य
    • स्थायी समिति संरक्षित क्षेत्रों में गतिविधियों से संबंधित प्रस्तावों की जाँच में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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