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हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956

Lokesh Pal January 19, 2026 04:35 24 0

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 के अंतर्गत विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा करने की अधिकार रखती है।

विवाद की पृष्ठभूमि

  • मामले की उत्पत्ति: यह मामला डॉ. महेंद्र प्रसाद की संपत्ति से जुड़े एक पारिवारिक विवाद से उत्पन्न हुआ, जिनका निधन दिसंबर 2021 में हुआ था।
    • उनके पुत्र रंजीत शर्मा का निधन मार्च 2023 में हुआ, जिसके बाद उनकी पत्नी गीता शर्मा ने अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की माँग की।
  • परिवार न्यायालय का निर्णय: न्यायालय ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि गीता शर्मा अपने ससुर की मृत्यु के समय विधवा नहीं थीं और इसलिए अधिनियम के अंतर्गत आश्रित (Dependant) नहीं मानी जा सकती हैं।
  • उच्च न्यायालय का निर्णय: इस निर्णय को पलटते हुए कहा गया कि पुत्र की विधवा HAMA के अंतर्गत आश्रित के रूप में योग्य है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का पक्ष: उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा और संपत्ति-आधारित दायित्व को स्पष्ट किया।

हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956

  • यह अधिनियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिखों के बीच दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण से संबंधित कानून को संहिताबद्ध करता है।
  • इसे वर्ष 1956 में विविध प्रथागत नियमों के स्थान पर एक समान कानूनी ढाँचे के रूप में अधिनियमित किया गया था।
  • HAMA, 1956 भारत में हिंदू कानून के अंतर्गत बच्चों के दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण को नियंत्रित करता है।
    • धारा 21: “आश्रितों” को मृतक के निकट संबंधियों के रूप में परिभाषित करती है, जिनमें माता-पिता, बच्चे, अविवाहित पुत्रियाँ, विधवाएँ और अवयस्क अवैध संतानें शामिल हैं।
    • धारा 22: मृत हिंदू के उत्तराधिकारियों पर यह दायित्व डालती है कि वे अपनी हिस्सेदारी के अनुपात में संपत्ति से आश्रितों का भरण-पोषण करें।

न्यायिक पूर्व दृष्टांत

  • राज किशोर मिश्रा बनाम मीना मिश्रा (1994): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि ससुर का अपनी बहू का भरण-पोषण करने का दायित्व तब लागू नहीं किया जा सकता जब उसके पास सहदायिक संपत्ति से उसका भरण-पोषण करने का कोई साधन न हो, जिसमें से बहू को कोई हिस्सा प्राप्त न हुआ हो।
  • अमर कांता सेन बनाम सोवना सेन (1960): कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि पत्नी, भले ही व्यभिचार या असंयमित जीवन जी रही हो, भरण-पोषण की हकदार है, बशर्ते वह स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम न हो। यदि वह स्वयं अपना भरण-पोषण कर सकती है, तो भरण-पोषण आवश्यक नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय का विधिक तर्क

  • आश्रितों की व्याख्या: सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम की धारा 21(vii) की जाँच की और माना कि “उसके पुत्र की कोई भी विधवा” वाक्यांश स्पष्ट और निरपेक्ष है तथा उसके विधवा होने के समय पर निर्भर नहीं करता है।
  • समय अप्रासंगिक: न्यायालय ने निर्णय दिया कि बहू, ससुर की मृत्यु से पूर्व या पश्चात् विधवा बनी, यह भरण-पोषण के दावे के लिए अप्रासंगिक है।
  • धारा 22 का दायरा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 22 मृत हिंदू की संपत्ति के उत्तराधिकारी सभी व्यक्तियों को उस संपत्ति से आश्रितों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य करती है।
  • संपत्ति-केंद्रित दायित्व: भरण-पोषण का दायित्व व्यक्ति-केंद्रित नहीं, बल्कि संपत्ति-केंद्रित माना गया, जो सभी कानूनी उत्तराधिकारियों पर आनुपातिक रूप से लागू होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का मनुस्मृति का संदर्भ: उद्धृत श्लोक: मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 389 के अनुसार, “न माता, न पिता, न पत्नी और न पुत्र त्यागे जाने योग्य हैं, जो व्यक्ति इन निर्दोष संबंधियों का परित्याग करता है, उसे राजा द्वारा छह सौ बार दंड दिया जाना चाहिए।”
    • न्यायालय की व्याख्या: यह श्लोक परिवार के मुखिया के आश्रितों, विशेष रूप से महिला पारिवारिक सदस्यों, के प्रति सहायता के दायित्व को रेखांकित करता है।

मनुस्मृति एक प्राचीन हिंदू विधिक ग्रंथ है, जिसने प्रारंभिक भारतीय समाज में सामाजिक, नैतिक और कानूनी नियम निर्धारित किए।

संवैधानिक और सामाजिक महत्त्व

  • अनुच्छेद-14 का दृष्टिकोण: न्यायालय ने माना कि केवल पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवाओं के बीच भेद करना मनमाना है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
  • अनुच्छेद-21 का दृष्टिकोण: तकनीकी आधारों पर भरण-पोषण से इनकार करना गरिमा के साथ जीवन के अधिकार को कमजोर करता है और सामाजिक बहिष्करण का जोखिम उत्पन्न करता है।
  • भरण-पोषण की सशर्त प्रकृति: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण स्वतः नहीं मिलता और यह इस बात पर निर्भर करता है कि विधवा अन्य वैध स्रोतों से स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।

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