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IISc अध्ययन: भारतीय मानसूनी वर्षा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

Lokesh Pal March 26, 2025 02:19 37 0

संदर्भ

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के एक हालिया अध्ययन में मानसून वर्षा पैटर्न पर पूर्व सिद्धांतों को चुनौती दी गई है।

  • इस अध्ययन से पता चलता है कि भारत की मानसून ऋतु में बादलों की गहनता, उनकी गति और वर्षा की तीव्रता दोनों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय मानसूनी वर्षा पैटर्न को समझना

  • पेयजल और कृषि के लिए आवश्यक वार्षिक वर्षा का लगभग 80% जल भारतीय मानसूनी वर्षा द्वारा प्राप्त होता है।
    • भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर बढ़ने वाले बादलों के कारण जून और सितंबर के बीच वर्षा होती है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून एक मौसमी वायु पैटर्न है, जो जून से सितंबर तक दक्षिण एशिया, विशेष रूप से भारत में भारी वर्षा की स्थिति उत्पन्न करता है।
  • यह स्थल एवं समुद्र के तापमान भिन्नता के कारण होता है, जिससे हिंद महासागर से आर्द्र पवनें भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ती हैं।
  • मानसून का आगमन: आमतौर पर 1 जून के आसपास केरल (भारत) में शुरू होता है और उत्तर की ओर बढ़ता है।
  • वर्षा वितरण: पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत और तटीय क्षेत्रों में सबसे अधिक वर्षा होती है।
  • मानसून का निवर्तन: यह सितंबर में उत्तर-पश्चिम भारत से शुरू होता है और अक्टूबर तक समाप्त हो जाता है।

क्लाउड बैंड (Cloud Bands

  • ‘क्लाउड बैंड’ बादलों के सतत् निर्माण की प्रक्रिया है, जो मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है।
  • भारतीय मानसून के संदर्भ में, ‘क्लाउड बैंड’ भूमध्य रेखा से भारत की ओर बढ़ता है, जिससे वर्षा होती है।

मानसूनी वर्षा में ‘बोरियल समर इंट्रासीजनल ऑसिलेशन’ (BSISO) की भूमिका

  • बोरियल समर इंट्रासीजनल ऑसिलेशन (Boreal Summer Intraseasonal Oscillation-BSISO) एक प्रमुख मौसमी घटना है, जो मानसून के दौरान आर्द्र और शुष्क मौसम को नियंत्रित करती है।
  • यह बादलों के समूह को भूमध्य रेखा से भारतीय उपमहाद्वीप तक ले जाता है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • क्लाउड बैंड की क्षमता प्रभावकारी होती है: प्रारंभिक सिद्धांतों के अनुसार, क्लाउड बैंड सदैव उत्तर की ओर बढ़ता है, चाहे उनकी प्रारंभिक शक्ति कुछ भी हो।
    • IISc के अध्ययन में पाया गया कि कमजोर ‘क्लाउड बैंड’ उत्तर की ओर बढ़ने में विफल रहते हैं, जिससे वर्षा पैटर्न प्रभावित होता है।
  • मजबूत ‘क्लाउड बैंड’ अधिक वर्षा की स्थिति उत्पन्न करते हैं: जब भूमध्य रेखा पर क्लाउड बैंड मजबूत होता है, तो यह वायुमंडलीय नमी को बढ़ाता है।
    • यह तीव्र पवनों को उत्प्रेरित करता है, जो ‘क्लाउड बैंड’ को उत्तर की ओर धकेलने में मदद करते हैं, जिससे भारी वर्षा होती है।
  • महासागर-वायुमंडलीय अंतःक्रिया का प्रभाव: हिंद महासागर और वायुमंडल के बीच की अंतर्क्रिया मानसूनी वर्षा में प्रमुख भूमिका निभाती है।
    • भविष्य में गर्म वायुमंडलीय परिस्थितियों से नमी के स्तर में वृद्धि होने की संभावना है, जिससे अधिक वर्षा की संभावना जताई गई है।

भविष्य के परिणाम: अधिक तीव्र वर्षा

  • अध्ययन में भविष्यवाणी की गई है कि वायुमंडलीय नमी के स्तर में वृद्धि के कारण वर्षा में 42% से 63% तक की वृद्धि हो सकती है।
  • इससे भारत में जल की उपलब्धता, कृषि एवं बाढ़ के जोखिम पर प्रभाव पड़ सकता है।

नए अध्ययन का महत्त्व

  • इन निष्कर्षों से जलवायु मॉडल को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी, जिससे मानसून और मौसमी वर्षा के बेहतर पूर्वानुमान लगाए जा सकेंगे।
  • इससे कृषि, जल प्रबंधन और आपदा की तैयारी के लिए योजना बनाने में सहायता मिल सकती है।

प्रमुख शब्दावली 

  • क्लाउड बैंड: बादलों का सतत् प्रसरण वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करता है।
  • बोरियल समर इंट्रासीजनल ऑसिलेशन (BSISO): यह मानसून की आर्द्र एवं शुष्क अवधि को नियंत्रित करने वाला जलवायु पैटर्न है। 
  • मानसून: एक मौसमी पवन प्रणाली, जो विशेष रूप से दक्षिण एशिया में भारी वर्षा लाती है।
  • वायु-समुद्र संपर्क: महासागर और वायुमंडल के बीच ऊर्जा एवं नमी का आदान-प्रदान, मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है।

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