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आईआईटी रुड़की ने समग्र मानसिक स्वास्थ्य नीति का प्रारूप तैयार किया

Lokesh Pal February 17, 2026 02:55 6 0

संदर्भ

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की एक समग्र मानसिक स्वास्थ्य नीति का प्रारूप तैयार कर रहा है, जिसका उद्देश्य छात्र सहायता तंत्र को सुदृढ़ करना तथा अन्य IITs के लिए एक आदर्श मॉडल स्थापित करना है।

SAHYOG 1.0

पहला अंतर-IIT परामर्श था, जिसका उद्देश्य IIT परिसरों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों और कल्याण ढाँचों को सुदृढ़ करने हेतु संवाद तथा सहयोग की शुरुआत करना था।

SAHYOG 2.0

एक अंतर-IIT संवाद पहल है, जिसका लक्ष्य विभिन्न IITs में प्रचलित मानसिक स्वास्थ्य प्रशासनिक संरचनाओं से श्रेष्ठ प्रथाओं का आदान-प्रदान और उनसे सीख प्राप्त करना है।

संबंधित तथ्य

  • अंतर-IIT परामर्श – SAHYOG 2.0: इस प्रयास को “SAHYOG 2.0” के माध्यम से और सुदृढ़ किया गया।
  • संस्थान के कल्याण केंद्र द्वारा छात्र कल्याण अधिष्ठाताओं, मनोवैज्ञानिकों, बाहरी विशेषज्ञों तथा संकाय सदस्यों से परामर्श के पश्चात् तैयार प्रथम मसौदा संतुलित एवं पेशेवर दृष्टिकोण पर आधारित है।

मानसिक स्वास्थ्य क्या है?

  • मानसिक स्वास्थ्य मानसिक कुशलता (Mental well-being) की वह अवस्था है, जो व्यक्ति को जीवन के तनावों से निपटने, अपनी क्षमताओं को साकार करने, प्रभावी ढंग से सीखने और कार्य करने तथा समुदाय में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।
  • यह स्वास्थ्य और कल्याण का अभिन्न घटक है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से निर्णय लेने, संबंध बनाने और अपने परिवेश को आकार देने की हमारी क्षमताओं का आधार है।
  • मानसिक स्वास्थ्य एक मौलिक मानव अधिकार है।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख आयाम

  • भावनात्मक कल्याण: भावनाओं को समझने, नियंत्रित करने और प्रभावी रूप से व्यक्त करने की क्षमता। इसमें तनाव प्रबंधन, विभिन्न भावनाओं का अनुभव और जीवन की चुनौतियों का सामना करना शामिल है।
  • मनोवैज्ञानिक कल्याण: आत्म-मूल्यबोध, आत्म-समझ और विचारों व भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता से संबंधित है।
  • सामाजिक कल्याण: स्वस्थ संबंध स्थापित करना, दूसरों के साथ प्रभावी संवाद करना और समाज में सकारात्मक योगदान देना।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित प्रमुख आँकड़े

  • मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का प्रसार: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) 2015-16 के अनुसार, भारत में लगभग 15 करोड़ वयस्क किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रस्त हैं और उन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है।
    • भारत में 13–17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 7.3% किशोर गंभीर मानसिक रोग से प्रभावित हैं।
  • आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य: वर्ष 2018 से 2022 के बीच मानसिक स्वास्थ्य संबंधी आत्महत्याओं में 44% की वृद्धि दर्ज की गई है।
    • वर्ष 2022 में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कारणों से 10,365 पुरुष (लगभग 72%) और 4,234 महिलाएँ (लगभग 28%) आत्महत्या का शिकार हुईं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य हेतु सरकारी पहलें एवं नीतियाँ

  • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP, 1982)
    • उद्देश्य: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से सुलभ एवं किफायती मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना।
    • मुख्य घटक
      • जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP): 743 जिलों में परामर्श, संकट-हस्तक्षेप (Crisis intervention) तथा सामुदायिक पहुँच सेवाएँ प्रदान करना।
      • मानव संसाधन विकास: सामान्य चिकित्सकों को मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्रदान करना।
  • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति, 2014
    • लक्ष्य: मानसिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करना, मानसिक रोगों की रोकथाम करना तथा उपचार तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करना।
    • प्राथमिकता क्षेत्र: संवेदनशील एवं वंचित समूह, सामुदायिक सहभागिता, उपेक्षा में कमी, मानवाधिकारों का संरक्षण करना।
    • यह नीति विश्व स्वास्थ्य संगठ की व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना 2013–2030 के अनुरूप है।
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 
    • आत्महत्या का अपराधमुक्तीकरण: आत्महत्या का प्रयास अब दंडनीय अपराध नहीं है।
    • अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को एक मौलिक अधिकार के रूप में सुनिश्चित किया गया है।
    • बीमा समानता (Insurance Parity): मानसिक रोगों के उपचार को शारीरिक रोगों के समकक्ष बीमा कवरेज प्रदान करना अनिवार्य किया गया है।
    • पूर्व-निर्देश (Advance Directives): व्यक्तियों को अपने उपचार संबंधी प्राथमिकताओं को पूर्व-निर्धारित करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

  • उपचार में अंतराल: भारत में मानसिक विकारों के उपचार में गंभीर अंतराल विद्यमान है। शराब सेवन विकार (Alcohol use disorders) के मामले में उपचार अंतराल लगभग 86% तक है, जबकि अन्य मानसिक विकारों के लिए यह 60% से अधिक है (मिर्गी को छोड़कर)।
    • केवल 29% मनोविकृति (psychosis) से ग्रस्त व्यक्तियों तथा लगभग एक-तिहाई अवसाद से प्रभावित लोगों को औपचारिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त होती हैं।
  • मनोचिकित्सकों की उपलब्धता एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच: भारत में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर मात्र 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित मानक (प्रति 1 लाख पर 3 मनोचिकित्सक) से काफी कम है।
    • मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी कमी एक गंभीर चुनौती है। जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अनुमानतः 30,000 मनोचिकित्सक, 37,000 मनोरोग नर्सें तथा 38,000 नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की आवश्यकता है।
  • कोविड-19 महामारी का प्रभाव: कोविड-19 महामारी ने मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया। वर्ष 2020 में आत्महत्या से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य मृत्यु के मामलों में वर्ष 2019 की तुलना में 25% की वृद्धि दर्ज की गई।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित चुनौतियाँ

  • मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी उपेक्षा: भारत के अनेक क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य अब भी वर्जित विषय माना जाता है। मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, जिससे वे सहायता लेने से हिचकिचाते हैं।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन की व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना (2013-2030) में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में उपेक्षा को वैश्विक स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण बाधा के रूप में उजागर किया गया है। भारत में, यह मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की कम रिपोर्टिंग का कारण बनता है और उपचार में देरी में योगदान देता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच: WHO के मेंटल हेल्थ एटलस के अनुसार, निम्न-आय वाले देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, में गंभीर मानसिक समस्याओं से ग्रस्त 85% लोग आवश्यक उपचार प्राप्त नहीं कर पाते।
  • सीमित मानसिक स्वास्थ्य कार्यबल: भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की गंभीर कमी है। प्रति 1 लाख जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो WHO के अनुशंसित मानक से बहुत कम है।

आगे की राह

  • मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की संख्या बढ़ाएँ और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत करने पर विशेष ध्यान देना।
    • सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की स्थापना करें ताकि पहुँच सुनिश्चित हो सके और बड़े संस्थानों पर निर्भरता कम हो सके।
  • वित्तपोषण और संसाधनों में वृद्धि करना: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वित्त को प्राथमिकता देना और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति के कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त संसाधन सुनिश्चित करना।
    • मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं जैसे मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रशिक्षण के लिए धन आवंटित करें, विशेष रूप से ग्रामीण और कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में।
  • रोकथाम और प्रारंभिक हस्तक्षेप पर ध्यान केंद्रित करना: मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े उपेक्षा को कम करने और लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करने के लिए राष्ट्रव्यापी मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान संचालित करना और समस्याओं की शीघ्र पहचान पर विशेष ध्यान देना।
    • व्यक्तियों को समस्याओं से निपटने के कौशल और उपलब्ध संसाधनों के ज्ञान से लैस करने के लिए स्कूलों और कार्यस्थलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम लागू करना।

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