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भारत और ईरान के द्विपक्षीय संबंधों की 75वीं वर्षगांठ

Lokesh Pal January 10, 2026 02:54 52 0

संदर्भ

भारत-ईरान संबंध, जो 15 मार्च 1950 को एक मैत्री संधि के माध्यम से स्थापित हुए थे, वर्ष 2026 में अपने 75वें वर्ष में प्रवेश करेंगे।

  • जनवरी 2026 में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के भारत दौरे के साथ वर्षभर चलने वाले वर्षगांठ समारोह की शुरुआत हुई।

भारत-ईरान संबंधों की पृष्ठभूमि

  • सभ्यता का आधार- वर्ष 1947 से पहले का समय: भारत-ईरान संबंध गहन सभ्यतागत संबंधों में निहित हैं, जिनकी पहचान साझा भारत-ईरानी विरासत, लगातार सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच संपर्कों से होती है, जो आधुनिक राष्ट्र-राज्यों से सदियों पहले से उपस्थित हैं।
    • इंडो-ईरानी विरासत: दोनों समाज स्वयं को आर्य सभ्यता से संबंधित मानते हैं। ऋग्वेद (भारत) और अवेस्ता (ईरान) के बीच समानताएँ साझा भाषाई और धार्मिक आधार को दर्शाती हैं।
    • भारत में फारसी सांस्कृतिक प्रभाव: लगभग 800 वर्षों तक, फारसी भारत में प्रशासन, अदालतों और संस्कृति की भाषा थी। इसनेसबक-ए-हिंदी’ जैसे साहित्य को आकार दिया और उर्दू, हिंदी और पंजाबी को प्रभावित किया।
    • वास्तुकला और कलात्मक आदान-प्रदान: मुगल काल के दौरान, फारसी और भारतीय शैलियाँ आपस में संयुक्त हो गईं, जो ताजमहल जैसे स्मारकों में देखी जा सकती हैं, जो सांस्कृतिक एकीकरण का प्रतीक है।
    • पारसी संबंध: पारसी (पारसी धर्म) समुदाय, जो फारस से भारत आया था, दोनों देशों के बीच एक सांस्कृतिक और सामाजिक समेकन का कार्य करता है।
  • औपचारिक राजनयिक चरण- 1950–1979: इस चरण में आधुनिक देशों के बीच संबंधों की शुरुआत हुई, जो शीत युद्ध की राजनीति से प्रभावित थे।
    • मैत्री संधि (1950): भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को एक मैत्री संधि के माध्यम से औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध स्थापित किए।
    • शीत युद्ध के दौरान मतभेद: ईरान अमेरिका के नेतृत्व वाले सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) में शामिल हो गया, जबकि भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई और सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे, जिससे राजनयिक अंतराल उत्पन्न हुआ।
      • सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO): यह एक शीत युद्ध संबंधी सुरक्षा गठबंधन जिसे वर्ष 1955 में (बगदाद समझौते के रूप में) पश्चिम और दक्षिण एशिया में सोवियत विस्तार को रोकने के लिए बनाया गया था।
        • इसमें तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और यू. के शामिल थे, और अमेरिका एक मुख्य समर्थक था। मजबूत सैन्य संरचना न होने के कारण, इराक के बाहर निकलने (1959) के बाद यह कमजोर हो गया और ईरान के अलग होने के बाद वर्ष 1979 में समाप्त हो गया।
    • पाकिस्तान एक कारक के रूप में: इस दौरान पाकिस्तान के साथ ईरान के करीबी रिश्तों की वजह से कभी-कभी भारत के साथ तनाव उत्पन्न हुआ।
    • शुरुआती आर्थिक सहयोग: राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की वर्ष 1974 की ईरान यात्रा से ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग शुरू करने में मदद मिली।
  • क्रांति के बाद का पुनर्स्थापन-:
    • 1979-2000 का दशक: ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति ने द्विपक्षीय संबंधों की प्रकृति को बदल दिया।
    • भारत द्वारा प्रारंभिक मान्यता: भारत उन पहले देशों में से था जिन्होंने नई ईरानी सरकार को मान्यता दी, जिससे संबंधों में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिली।
    • अफगानिस्तान पर सहमति: 1990 के दशक में, दोनों देशों ने पाकिस्तान समर्थित तालिबान का विरोध किया और उत्तरी गठबंधन का समर्थन किया, जिससे रणनीतिक सहयोग में और अधिक घनिष्ठता आई।

रणनीतिक समझौते

  • तेहरान घोषणा (2001): प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित इस घोषणापत्र में संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के रूप में वर्णित किया गया था।
  • नई दिल्ली घोषणा (2003): ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी की गणतंत्र दिवस यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित इस घोषणापत्र में ऊर्जा, व्यापार और संपर्क क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार किया गया, जिसमें चाबहार बंदरगाह की प्रारंभिक परिकल्पना भी शामिल थी।

CPEC को संतुलित करने में चाबहार बंदरगाह की भूमिका

  • चाबहार बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक कारगर विकल्प है। CPEC भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण परियोजना है, जिसके माध्यम से पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच सुनिश्चित की जा सकती है।
  • इससे पाकिस्तान से होकर गुजरने वाले भूमि मार्गों पर भारत की निर्भरता कम होती है और एक विश्वसनीय एवं सुरक्षित व्यापार मार्ग उपलब्ध होता है।

  • समकालीन चरण – 21वीं सदी में रणनीतिक व्यावहारिकता: हाल के संबंध वैश्विक चुनौतियों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग को दर्शाते हैं।
    • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का प्रबंधन: भारत ने तेल आयात, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और राजनयिक संतुलन के माध्यम से अपना जुड़ाव जारी रखा।
    • संपर्क और व्यापार: भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच वर्ष 2016 के त्रिपक्षीय समझौते ने पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए चाबहार बंदरगाह को मध्य एशिया और यूरेशिया के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित किया।
    • बहुपक्षीय सहयोग: भारत ने अपनी एक्ट वेस्ट पॉलिसी के अनुरूप, वर्ष 2023-24 के दौरान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) में ईरान के प्रवेश का समर्थन किया।

भारत–ईरान द्विपक्षीय संबंधों का महत्त्व

  • भूरणीय महत्त्व – भारत का यूरेशिया का प्रवेश द्वार: ईरान की अवस्थिति विशेषकर पाकिस्तान के रास्ते भूमि मार्ग की कमी के कारण भारत की महाद्वीपीय और संपर्क रणनीति के लिए केंद्रीय महत्त्व रखता है।
    • चाबहार बंदरगाह: मई 2024 में हस्ताक्षरित 10 वर्षीय संचालन समझौते के बाद चाबहार बंदरगाह चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के एक प्रभावी और कार्यात्मक विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है।
      • वर्ष 2026 तक यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए भारतीय निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है, जिससे क्षेत्र में भारत की उपस्थिति और प्रभाव सुदृढ़ हुए हैं।

    • अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): ईरान 7,200 किलोमीटर लंबे बहु-माध्यमीय अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का प्रमुख केंद्र है, जो मुंबई (भारत) को मॉस्को (रूस) से जोड़ता है।
      • INSTC के माध्यम से भारत की यूरेशियाई बाजारों में प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता बढ़ती है। यह स्वेज नहर मार्ग की तुलना में माल परिवहन समय को लगभग 40% तक कम करता है तथा यूरोप और रूस के साथ भारत की संपर्क सुविधा को सुदृढ़ करता है।

    • अफगानिस्तान में रणनीतिक गहनता: ईरान के माध्यम से प्राप्त पहुँच भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करने, मानवीय सहायता पहुँचाने तथा उग्रवाद और अस्थिरता का मुकाबला करने के लिए अफगानिस्तान में रणनीतिक जुड़ाव बनाए रखने में सक्षम बनाती है।
  • ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता: संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिबंधों से विशेषकर संबंधों के 75वें वर्ष (2025–26) के दौरान उत्पन्न सीमाओं के बावजूद भारत–ईरान संबंधों ने दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में स्वयं को अनुकूलित किया है।
    • विविधीकृत व्यापार संरचना: भारत ईरान के शीर्ष पाँच व्यापारिक साझेदारों में उभर कर सामने आया है। भारत से ईरान को होने वाले निर्यात में बासमती चावल, चाय, चीनी और औषधियाँ शामिल हैं, जबकि आयात में रसायन, उर्वरक और सूखे मेवे प्रमुख हैं।
    • वैकल्पिक वित्तीय तंत्र: अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए दोनों देशों ने रुपया–रियाल व्यापार को सुदृढ़ किया है और स्थानीय भुगतान प्रणालियों की संभावनाओं का अन्वेषण किया है, जिनमें प्रस्तावित यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI)–शेताब लिंक शामिल है। इससे प्रतिबंध-प्रतिरोधी व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
    • प्राकृतिक गैस की संभावनाएँ: ईरान के पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है। भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण रणनीति के तहत ईरान को महत्त्वपूर्ण मानता है, तथा फरजाद-बी गैस क्षेत्र में पुनः रुचि देखी जा रही है।
  • बहुपक्षीय सहयोग और ग्लोबल साउथ में नेतृत्व: भारत–ईरान सहभागिता पश्चिम-नेतृत्व वाली व्यवस्था से परे साझा बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से विस्तारित हुई है।
    • ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO): भारत के समर्थन से ईरान ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का पूर्ण सदस्य बना। ये मंच दोनों देशों को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ग्लोबल साउथ के हितों और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की वकालत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
    • आतंकवाद-रोधी सहयोग: SCO की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS) के माध्यम से भारत और ईरान इस्लामिक स्टेट–खुरासान प्रांत (ISIS-K) और अल-कायदा जैसे समूहों से उत्पन्न खतरों के विरुद्ध समन्वय करते हैं।
  • रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक संतुलन: भारत–ईरान संबंधों का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू भारत की जटिल भू-राजनीति को संतुलित करने की क्षमता में निहित है
    • स्वतंत्र विदेश नीति: ईरान के साथ संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव, संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल के साथ घनिष्ठ साझेदारियों के बावजूद, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और मुद्दा-आधारित कूटनीति के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
    • क्षेत्रीय स्थिरीकरण की भूमिका: भारत प्रायः ईरान और पश्चिमी शक्तियों के बीच सेतु की भूमिका निभाता है तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा का लगातार समर्थन करता है, जो भारत के ऊर्जा आयात के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामरिक मार्ग (चोकपॉइंट) के रूप में जाना जाता है।
      • साथ ही, भारत ईरान, इजराइल, सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखता है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना रणनीतिक सहयोग सुनिश्चित किया जा सके।

भारत–ईरान द्विपक्षीय संबंधों में चुनौतियाँ

  • भू-आर्थिक बाधाएँ: मुख्य चुनौती अब भी अमेरिका की “अधिकतम दबाव” नीति (2025) का बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव बना हुआ है।
    • अधिकतम दबाव” नीति से तात्पर्य अमेरिका की उस रणनीति से है, जिसे वर्ष 2025 में पुनः लागू किया गया, जिसके अंतर्गत ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने और उसकी नीतियों में बदलाव के लिए कड़े बाह्य-क्षेत्रीय प्रतिबंध लगाए गए।
      • बैंकिंग, ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क को लक्षित करके यह नीति तृतीय देशों की भागीदारी को बाधित करती है, जिससे सीमित छूटों के बावजूद भारत–ईरान आर्थिक सहयोग सीमित हो जाता है।
    • ऊर्जा व्यापार में कमी: भारत के तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी वर्ष 2018–19 में 11% से घटकर लगभग शून्य रह गई है। इससे वह आर्थिक पारस्परिकता कमजोर हुई है, जो पहले इस संबंध की आधारशिला थी।
    • बैंकिंग और भुगतान संबंधी अवरोध: मजबूत रुपया–रियाल तंत्र के अभाव में भारतीय निर्यातकों (विशेषकर बासमती चावल और दवाइयों) को 6–8 महीनों तक भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी हतोत्साहित होती है।
    • चाबहार की अनिश्चितता: मई 2024 में हस्ताक्षरित 10 वर्षीय संचालन अनुबंध के बावजूद, चाबहार बंदरगाह अब भी अल्पकालिक प्रतिबंध छूटों (अप्रैल 2026 तक वैध) पर निर्भर है। इससे वैश्विक शिपिंग कंपनियों और बीमा संस्थाओं में प्रतिबंध शिथिलता” (Sanction Fatigue) की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
  • रणनीतिक दुविधा: भारत अपने रणनीतिक साझेदारों के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती में लगातार संलग्न है।
    • इज़राइल–ईरान तनाव (2025–26): बढ़ते तनाव भारत को इजराइल के साथ अपनी रक्षा-प्रौद्योगिकी साझेदारी और ईरान में अपने संपर्क तथा ऊर्जा हितों के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
    • होर्मुज जलडमरूमध्य की संवेदनशीलता: भारत के लगभग 80% कच्चे तेल का परिवहन इस समुद्री संकीर्ण मार्ग से होता है, इसलिए भारत की ऊर्जा सुरक्षा क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी है।
      • भारत का ऑपरेशन ‘संकल्प’, जो होर्मुज जलडमरूमध्य में तैनात है, महत्त्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा के लिए अहम है।
      • यह नौसैनिक उपस्थिति फारस की खाड़ी में स्थिरता सुनिश्चित करते हुए भारत की क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा नेतृत्व क्षमता को दर्शाती है।
    • नाभिकीय कूटनीति: जहाँ भारत ईरान की शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को समर्थन देता है, वहीं यह वैश्विक गैर-विस्तारवाद के प्रति भी प्रतिबद्ध है, जो भारत–अमेरिका रणनीतिक साझेदारी बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • चीन कारक’: इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत की विस्तारित पड़ोसी नीति” के लिए चुनौती बनती जा रही है।
    • रणनीतिक असमानता: चीन–ईरान 25 वर्षीय रणनीतिक समझौता (400 अरब डॉलर) ईरान को एक वित्तीय समर्थन प्रदान करता है, जिसे भारत, प्रतिबंधों से सीमित होकर, संतुलित नहीं कर सकता है।
    • ग्वादर बनाम चाबहार: ईरान द्वारा अपने बुनियादी ढांचे को चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जोड़ने की इच्छा, भारत के पाकिस्तान को दरकिनार करने वाले रणनीतिक लाभ को कमजोर कर सकती है।
  • कार्यान्वयन अंतराल: भारत की क्षेत्रीय विश्वसनीयता को प्रायः परियोजनाओं के धीमे क्रियान्वयन से परखा जाता है।
  • रेल परियोजना में अवरोध: ‘प्रतिबंध जोखिम’ के कारण भारत का चाबहार–जाहेदान रेलवे परियोजना से बाहर होना रणनीतिक जोखिम लेने में कमी को दर्शाता है।
    • प्रशासनिक शिथिलता: भारतीय एजेंसियों द्वारा निधियों के धीमे वितरण और उपकरणों की आपूर्ति में देरी के कारण समय-समय पर तनाव उत्पन्न होता रहा है, जिसके चलते ईरान को कभी-कभी चीन जैसे वैकल्पिक साझेदारों की तलाश करनी पड़ती है।
  • घरेलू अस्थिरता: ईरान की आंतरिक स्थिति एक प्रमुख संचालन संबंधी जोखिम के रूप में उभर रही है।
    • आर्थिक संकट: रियाल के पतन और 40% से अधिक मुद्रास्फीति के कारण व्यापक प्रदर्शन ईरान क्षेत्रीय परियोजनाओं के बजाय आंतरिक सुरक्षा की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।
    • संचालन में व्यवधान: सुरक्षा संबंधी प्रतिबंधों और इंटरनेट बंद होने के कारण शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल पर कार्य भौतिक रूप से धीमा हो गया है, जिससे व्यापारिक व्यवस्था प्रभावित हुई है।

भारत और ईरान के बीच सहयोग के क्षेत्र

  • भारत और ईरान के बीच सहयोग के क्षेत्र
    • कच्चा तेल और गैस: ईरान ऐतिहासिक रूप से भारत के लिए एक प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। भारत दीर्घकालिक ऊर्जा साझेदारी की संभावनाओं का अन्वेषण जारी रखता है, जिसमें फरजाद-बी गैस क्षेत्र (21 ट्रिलियन घन फीट से अधिक भंडार) से जुड़े अवसर शामिल हैं। यह भारत की ऊर्जा विविधीकरण और स्वच्छ ईंधन संक्रमण रणनीति के अनुरूप है।
    • उर्वरक और खनिज: ईरान उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स, रसायन और खनिज प्रदान करता है, जो विशेष रूप से वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के बीच भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
    • पेट्रोकेमिकल्स में संयुक्त उद्यम: यूरिया और पेट्रोकेमिकल संयंत्रों में सहयोग ईरान की प्रचुर प्राकृतिक गैस का लाभ उठाता है, जिससे भारत को किफायती उर्वरक सुनिश्चित करने और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।
  • व्यापार और आर्थिक सहयोग
    • द्विपक्षीय व्यापार प्रोफाइल: भारत ईरान के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में बना हुआ है। भारत से ईरान को बासमती चावल, दवाइयाँ, चाय, चीनी और कृषि उत्पाद निर्यात किए जाते हैं, जबकि आवश्यक कच्चे माल का आयात किया जाता है।
    • गैर-तेल व्यापार की ओर प्रवृत्ति: हाल के वर्षों में गैर-तेल और आवश्यक वस्तुओं के व्यापार में वृद्धि देखी गई है, जो हाइड्रोकार्बन पर निर्भरता से धीरे-धीरे विविधीकरण को दर्शाती है।
    • वैकल्पिक भुगतान तंत्र: प्रतिबंध-प्रतिरोधी व्यापार सुनिश्चित करने के लिए दोनों पक्षों ने रुपया–रियाल तंत्र को मजबूत किया है और UPI–Shetab एकीकरण की संभावनाओं का अन्वेषण कर रहे हैं, जिससे डॉलर आधारित प्रणालियों पर निर्भरता कम होती है।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी: भारतीय निजी कंपनियाँ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, बुनियादी ढाँचे का विकास, दवाइयाँ, IT सेवाएँ और उपभोक्ता वस्तुओं में योगदान देती हैं, जिससे बाहरी प्रतिबंधों के बावजूद आर्थिक संबंध बनाए रखे जा रहे हैं।
  • संपर्क और रणनीतिक अवसंरचना
    • चाबहार बंदरगाह: सहयोग की आधारशिला के रूप में चाबहार भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया तक सीधे पहुँच प्रदान करता है, जिससे पाकिस्तान को दरकिनार किया जा सकता है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) में इसके एकीकरण से भारतीय विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स निवेश को आकर्षित करने की संभावना है।
    • अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): ईरान के माध्यम से पूर्वी मार्ग भारतीय बंदरगाहों को रूस और यूरोप से जोड़ता है, जिससे स्वेज मार्ग की तुलना में परिवहन समय लगभग 40% कम हो जाता है और भारत की महाद्वीपीय संपर्क रणनीति सुदृढ़ होती है।
    • रेल और सड़क संपर्क: चाबहार–जाहेदान रेलवे और संबंधित सड़क नेटवर्क जैसी परियोजनाएँ व्यापार दक्षता, क्षेत्रीय एकीकरण और आंतरिक क्षेत्र की पहुँच को बढ़ाती हैं।
    • त्रिपक्षीय और वैकल्पिक गलियारे: भारत–ईरान–आर्मेनिया गलियारा जैसी पहलें काला सागर के माध्यम से यूरोप तक पहुँच की संभावना तलाशती हैं, जिससे भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को दरकिनार किया जा सके।
  • रणनीतिक और रक्षा सहयोग
    • समुद्री सुरक्षा: होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में सहयोग महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों, ऊर्जा प्रवाह और भारतीय प्रवासी समुदाय के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
    • आतंकवाद विरोधी और क्षेत्रीय स्थिरता: दोनों देश आतंकवाद, उग्रवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता, विशेषकर अफगानिस्तान से उत्पन्न खतरों को लेकर समान चिंताओं को साझा करते हैं।
    • अफगानिस्तान समन्वय: भारत और ईरान अफगानिस्तान को स्थिर बनाने, इसे आतंकवाद का सुरक्षित ठिकाना बनने से रोकने और चाबहार–मिलक–जरांज गलियारे के माध्यम से मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए मिलकर कार्य करते हैं।
    • रणनीतिक संवाद: नियमित उच्चस्तरीय परामर्श पश्चिम एशियाई सुरक्षा संरचना और क्षेत्रीय संतुलन पर सहमति को मजबूत करता है।
  • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा सहयोग
    • क्षमता निर्माण: सहयोग फार्मास्यूटिकल्स, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान तक फैला हुआ है, जो ज्ञान हस्तांतरण और नवाचार को सशक्त बनाता है।
    • प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष सहयोग: सैटेलाइट लॉन्च, IT इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसी संभावित क्षेत्रों में सहयोग भारत की बढ़ती तकनीकी उपस्थिति के अनुरूप है।
    • शैक्षणिक आदान-प्रदान: छात्रवृत्तियाँ, संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएँ और विश्वविद्यालय साझेदारियाँ संस्थागत और जन-केंद्रित सहयोग को मजबूत करती हैं।
  • सांस्कृतिक और सभ्यात्मक कूटनीति
    • भाषाई और साहित्यिक संबंध: भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) के तहत फारसी को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता मिलने से नए फारसी अध्ययन केंद्र स्थापित हुए हैं, जिससे ऐतिहासिक बौद्धिक संबंधों का पुनरुद्धार हुआ है।
    • पारसी और ज़ोरोस्त्रियन विरासत: साझा जोरोस्त्रियन मूल पर आधारित सहभागिता सभ्यात्मक कूटनीति को मजबूत करती है और विरासत पर्यटन तथा अनुसंधान को बढ़ावा देती है।
    • नागरिक आदान-प्रदान: परस्पर वीजा सुविधा, सांस्कृतिक उत्सव और शैक्षणिक सहयोग जैसी पहलें सामाजिक संबंधों को गहरा करती हैं।
    • कूटनीतिक संबंधों का 75वाँ वार्षिक समारोह (2026): यह अवसर सॉफ्ट पॉवर कूटनीति, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और ऐतिहासिक निरंतरता पर जोर देता है।
  • मानवीय और शैक्षणिक सहयोग
    • मानवीय सहायता: प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकटों के दौरान भारत ईरान का समर्थन करता है, जिससे विश्वास और सद्भावना मजबूत होती है।
    • शिक्षा समर्थन: भारतीय संस्थानों में ईरानी छात्रों के लिए छात्रवृत्तियाँ और सुविधाएँ प्रदान करना दीर्घकालिक जन-केंद्रित संबंधों को सुदृढ़ करता है।
  • बहुपक्षीय और वैश्विक सहभागिता
    • ब्रिक्स और SCO सहयोग: भारत ने ईरान के ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने का समर्थन किया, जिससे ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं, बहुध्रुवीयता और डॉलर-मुक्तिकरण पर समन्वय बढ़ा।
    • क्षेत्रीय और वैश्विक मंच: दोनों देश ऐसे मंचों पर सक्रिय हैं जो ऊर्जा सुरक्षा, संपर्क, क्षेत्रीय शांति और आर्थिक स्थिरता से संबंधित मुद्दों को संबोधित करते हैं।
    • वैश्विक शासन सुधार: भारत और ईरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की वकालत करते हैं, जो विकासशील देशों के साझा हितों को दर्शाता है।

आगे की राह 

  • प्रतिबंध-प्रतिरोधी व्यापार तंत्र को लागू करना
    • वित्तीय अवसंरचना को सुदृढ़ बनाना: ‘UPI–शेताब’ लिंक जैसी नवोन्मेषी भुगतान व्यवस्थाओं को संस्थागत बनाना और विस्तारित करना तथा आवश्यक गैर-प्रतिबंधित वस्तुओं (जैसे दवाइयाँ, कृषि इनपुट) के लिए एक मजबूत रुपया–रियाल निपटान चैनल विकसित करना, जिससे अमेरिकी डॉलर प्रणाली पर निर्भरता कम हो।
    • अमेरिका से अप्रभावित संस्था: एक समर्पित व्यापार वाहन या वित्तीय इकाई की रूपरेखा तैयार करना, जो अमेरिकी न्याय क्षेत्र से अलग हो, द्विपक्षीय लेन-देन को सुगम बनाए और द्वितीयक प्रतिबंधों के जोखिम को कम करे।
  • रणनीतिक संपर्क को क्रियान्वित करना
    • प्राथमिक गलियारों को पूर्ण करना: चाबहार–जाहेदान रेलवे लिंक को शीघ्र पूरा करना और इसे ईरान की राष्ट्रीय रेलवे ग्रिड तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से पूरी तरह एकीकृत करना, जिससे भारत की मध्य एशिया और उससे आगे की स्थलीय पहुँच सुदृढ़ हो।
    • वैकल्पिक मार्गों का विस्तार: आर्मेनिया और अन्य साझेदारों के साथ सहयोग सहित बहुपक्षीय स्थलीय–समुद्री संपर्क को मजबूत करना, ताकि समुद्री मार्गों के बावजूद यूरोप और मध्य एशिया तक पहुँच के लिए विकल्पीय मार्ग उपलब्ध हों।
  • कूटनीतिक और क्षेत्रीय संतुलन
    • सक्रिय कूटनीति: क्षेत्रीय तनावों के समय उच्च स्तरीय संवाद और सूक्ष्म कूटनीति को बनाए रखना ताकि दीर्घकालिक अवसंरचना प्रतिबद्धताओं की रक्षा की जा सके, साथ ही बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील रहना।
    • बहुपक्षीय वकालत: BRICS+ और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत की अभिव्यक्ति का उपयोग करके यह संदेश देना कि संपर्क एक साझा वैश्विक लाभ है, जो एकतरफा आर्थिक दबाव से सुरक्षित है।
  • साझेदारी के दायरे का विस्तार करना
    • व्यापार विविधीकरण: परंपरागत वस्तु व्यापार से आगे बढ़कर फार्मास्यूटिकल अनुसंधान और विकास, बायोटेक्नोलॉजी और उच्च-मूल्य कृषि उत्पाद जैसे उन्नत क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करना, जिससे स्थिर और मजबूत निर्यात धारा उत्पन्न हो।
    • संयुक्त अनुसंधान और नवाचार: सहकारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी परियोजनाएँ, ज्ञान आदान-प्रदान मंच और उद्योग–विश्वविद्यालय कार्यक्रम शुरू करना, ताकि दीर्घकालिक आर्थिक परस्पर पूरकता विकसित की जा सके।
  • सांस्कृतिक सेतु और सॉफ्ट पावर
    • सभ्यात्मक सहभागिता: फारसी भाषा की पहलें, विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग और साझा डिजिटल अभिलेखागार परियोजनाओं का विस्तार करके सांस्कृतिक कूटनीति को लागू करना, जिससे दीर्घकालिक सामाजिक संबंध मजबूत हों।
    • जन–जन संबंधों को सुदृढ़ करना: सरल वीजा नियम या परस्पर यात्रा सुविधाओं की व्यवस्था करके दोनों समाजों के बीच शिक्षा, अनुसंधान और पर्यटन में सहभागिता बढ़ाना।
  • भू-राजनीतिक संतुलन और जोखिम प्रबंधन
    • प्रतिबंधों का प्रबंधन: रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका और अन्य शक्तियों के साथ मुक्त चैनल बनाए रखना ताकि चाबहार जैसी महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले स्थायी व्यवस्थाओं पर वार्ता की जा सके।
    • चीन और क्षेत्रीय संतुलन: बहुपक्षीय मंचों का उपयोग बाहरी प्रभावों को संतुलित करने के लिए करना, ताकि भारत के संपर्क और ऊर्जा हित भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताओं से प्रभावित न हों।
    • संचालन की निरंतरता की सुरक्षा: ईरान में सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रम की सक्रिय निगरानी करके भारत के हितों, कर्मियों और निवेशों को आंतरिक अस्थिरता के दौरान सुरक्षित रखना।
  • रणनीतिक सहयोग को संस्थागत बनाना
    • रणनीतिक परिषद: एक संयुक्त द्विपक्षीय रणनीतिक परिषद स्थापित करना, जिसका कार्य वार्षिक समीक्षा, प्रदर्शन निगरानी और व्यापार, परिवहन, ऊर्जा और सुरक्षा क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई करना हो।
    • नियमित उच्चस्तरीय सहभागिता: मंत्रिस्तरीय परामर्श और कार्य समूह बैठकें आयोजित करने के लिए तंत्र को संस्थागत बनाना, ताकि संचलन बनाए रखा जा सके और संचालन संबंधी अड़चनों का समाधान किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत–ईरान संबंध, जो सभ्यात्मक संबंधों में निहित हैं और रणनीतिक संपर्क, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय सहभागिता के माध्यम से मजबूत हुए हैं, प्रतिबंधों, क्षेत्रीय तनावों और आंतरिक अस्थिरता के बावजूद महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं। इन संबंधों के लिए व्यावहारिक कूटनीति और दीर्घकालिक रणनीतिक योजना की आवश्यकता है।

PWOnlyIAS विशेष

ईरान के बारे में 

  • स्थान: ईरान एक पश्चिम एशियाई देश है, जो उत्तरी और पूर्वी गोलार्द्ध में स्थित है।
    • यह मध्य एशिया, काकेशस और मध्य पूर्व के संगम पर स्थित है, और इसके दक्षिण में फारस की खाड़ी तथा उत्तर में कैस्पियन सागर के साथ व्यापक तटरेखा है।

  • राजधानी: तेहरान
  • सीमाएँ

सीमाएँ

  • तुर्की – पश्चिम
  • इराक – पश्चिम
  • आर्मेनिया – उत्तर-पश्चिम
  • अजरबैजान – उत्तर-पश्चिम
  • तुर्कमेनिस्तान – उत्तर-पूर्व
  • अफगानिस्तान – पूर्व
  • पाकिस्तान – दक्षिण-पूर्व
  • भौतिक भूगोल
    • जाग्रोस पर्वत श्रृंखला देश के पश्चिमी किनारे पर स्थित एक प्रमुख पर्वत श्रृंखला है।
    • माउंट दमावंद ईरान की सबसे ऊँची चोटी और एशिया का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी है।
    • युफ्रेट्स नदी पश्चिमी क्षेत्रों से होकर बहती है, जबकि कारून नदी ईरान की सबसे लंबी नदी है।
    • ईरान में बड़े रेगिस्तानी क्षेत्र भी हैं, जिनमें दश्त-ए कवीर (ग्रेट साल्ट डेजर्ट) और दश्त-ए लूट (लूट रेगिस्तान) शामिल हैं, जो देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों में विस्तृत हुए हैं।
  • महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ
    • ईरान की रणनीतिक स्थिति इसे वैश्विक ऊर्जा व्यापार के केंद्र में रखती है, और यह महत्त्वपूर्ण समुद्री संकीर्ण मार्ग जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखता है, जिससे लगभग एक-तिहाई वैश्विक तेल शिपमेंट्स गुजरती हैं।
    • ऐतिहासिक विरासत में समृद्ध ईरान फारसी साम्राज्य में एक केंद्रीय भूमिका निभा चुका है और वर्तमान में भी क्षेत्र पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से प्रभाव डालता है।
    • ईरान क्षेत्रीय भू-राजनीति में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाता है, विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य प्रभाव और क्षेत्रीय स्थिरता से संबंधित मुद्दों में।

अभ्यास प्रश्न  वर्ष 1950 की मैत्री संधि के बाद से ईरान के साथ भारत की राजनयिक भागीदारी एक जटिल भू-राजनीतिक वातावरण में रणनीतिक स्वायत्तता की उसकी खोज को दर्शाती है। चर्चा कीजिए।

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