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Lokesh Pal
February 11, 2026 03:35
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भारत में औद्योगिक विकास और संवैधानिक पर्यावरण संरक्षण के बीच बढ़ता संघर्ष देखा जा रहा है, क्योंकि नीतिगत और न्यायिक परिवर्तन कार्बन सिंक और जल सुरक्षा की तुलना में अल्पकालिक आर्थिक लाभों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे पारिस्थितिकी संवैधानिकवाद की माँग उठ रही है, जो पर्यावरण अधिकारों को पर्यावरण कानून के शासन के मूल में रखता है।

हालिया कानूनी और विधायी परिवर्तन ‘नियामक छूट’ की ओर एक प्रवृत्ति का संकेत देते हैं, जहाँ पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को ठोस सुरक्षा के बजाय प्रक्रियात्मक बाधाओं के रूप में माना जा रहा है।
कठोर नियमन विकास में बाधा नहीं है; बल्कि यह सतत् समृद्धि का आधारभूत ढाँचा है। यह “साझा संसाधनों के दुरुपयोग” को रोकता है, जहाँ स्वच्छ हवा और जल जैसे साझा संसाधनों का अल्पकालिक व्यक्तिगत लाभ के लिए दोहन हो जाता है, और इसके परिणामस्वरूप राज्य और आने वाली पीढ़ियों को पुनर्स्थापन का बोझ उठाना पड़ता है।
वर्ष 2026 में भारत की पर्यावरणीय यात्रा ‘आर्थिक सुविधा’ से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी संवैधानिकता की ओर परिवर्तन की माँग करती है। AI-आधारित निगरानी और प्रकृति-आधारित वित्त को एकीकृत करके राज्य विकास को पर्यावरणीय क्षरण से अलग कर सकता है, ताकि विकासात्मक प्रगति कभी भी नागरिकों की अंतर-पीढ़ीगत समानता से समझौता न करे।
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