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भारत का पर्यावरणीय न्यायशास्त्र

Lokesh Pal February 11, 2026 03:35 4 0

संदर्भ

भारत में औद्योगिक विकास और संवैधानिक पर्यावरण संरक्षण के बीच बढ़ता संघर्ष देखा जा रहा है, क्योंकि नीतिगत और न्यायिक परिवर्तन कार्बन सिंक और जल सुरक्षा की तुलना में अल्पकालिक आर्थिक लाभों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे पारिस्थितिकी संवैधानिकवाद की माँग उठ रही है, जो पर्यावरण अधिकारों को पर्यावरण कानून के शासन के मूल में रखता है।

पर्यावरण संबंधी कानून के शासन के बारे में

  • पर्यावरण प्रशासन के लिए केवल कानूनों की आवश्यकता नहीं है; इसके लिए पर्यावरणीय कानून के शासन की आवश्यकता है।
  • इसमें चार स्तंभ शामिल हैं:-
    • निष्पक्ष और स्पष्ट कानून
    • प्रभावी कार्यान्वयन
    • निर्णय लेने में जनभागीदारी
    • पारिस्थितिकी क्षति के लिए जवाबदेही।
  • इनके बिना, पर्यावरणीय अधिकार आर्थिक दबाव के विरुद्ध ‘प्रक्रियात्मक अवरोध’ ही बने रहते हैं।

पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के बारे में

  • परिभाषा: कानूनी दर्शन, सिद्धांतों और न्यायिक मतों का एक ढाँचा, जिसके माध्यम से न्यायालय विकासात्मक आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण तथा प्रकृति के अंतर्निहित मूल्य के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।

  • मुख्य सिद्धांत
    • निवारक सिद्धांत: पर्यावरण को संभावित नुकसान की स्थिति में, पूर्ण वैज्ञानिक निश्चितता की कमी निवारक कार्रवाई में देरी नहीं कर सकती है; साक्ष्यों का भार विकासकर्ता पर होता है।
    • प्रदूषक भुगतान’ सिद्धांत: प्रदूषण फैलाने वाली संस्था को उपचार और मुआवजे का खर्च वहन करना होगा।
    • सार्वजनिक न्यास सिद्धांत: वायु, जल, वन और तटीय राज्य द्वारा जनता के लिए न्यास के रूप में रखे जाते हैं, न कि निजी उपयोग के लिए।
    • सतत् विकास: आर्थिक विकास पारिस्थितिकी असंतुलन किए बिना होना चाहिए।
    • अंतर-पीढ़ीगत समानता: वर्तमान पीढ़ियों को भावी पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए।
  • महत्त्व: कार्यकारी और आर्थिक गतिविधियों पर संवैधानिक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विकास पारिस्थितिकी स्थिरता के अनुरूप हो।

संबंधित न्यायिक निर्णय

  • सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991): अनुच्छेद-21 की व्याख्या करते हुए इसमें जीवन के पूर्ण आनंद के लिए प्रदूषण मुक्त वायु और जल के अधिकार को शामिल किया गया।
  • वेल्लोर नागरिक कल्याण मंच बनाम भारत संघ (1996): सतत् विकास के एक भाग के रूप में निवारक सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को औपचारिक रूप से भारतीय कानूनी ढाँचे में एकीकृत किया गया।
  • एम.सी. मेहता (ओलियम गैस रिसाव मामला, 1987): पारंपरिक “कठोर दायित्व” नियम से आगे बढ़ते हुए, खतरनाक उद्योगों के लिए पूर्ण दायित्व का सिद्धांत स्थापित किया गया।
  • टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद मामला (1996-वर्तमान): वन प्रशासन में “सतत् परमादेश” की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्वामित्व की परवाह किए बिना “वन” की परिभाषा को उसके शब्दकोश अर्थ तक विस्तारित किया गया।
  • आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाम प्रो. एम.वी. नायडू (1999): पर्यावरण संबंधी मामलों में साक्ष्य का भार स्पष्ट किया, और परियोजना को पर्यावरण के अनुकूल सिद्ध करने का दायित्व विकासकर्ता पर डाला।
  • नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000): इस बात पर जोर दिया कि विकास आवश्यक है, लेकिन इसे विस्थापित समुदायों के अधिकारों और पारिस्थितिकी प्रभाव के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।

भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा

  • अनुच्छेद-21 (मौलिक अधिकार): यद्यपि वर्ष 1950 में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था, सर्वोच्च न्यायालय ने “जीवन के अधिकार” की व्याख्या स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को समाहित करते हुए की, जिससे पारिस्थितिक संरक्षण न्यायिक रूप से लागू करने योग्य मौलिक अधिकार बन गया।
  • अनुच्छेद-48A (निर्देशात्मक सिद्धांत): यह संवैधानिक आदेश राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों तथा वन्यजीवों की सुरक्षा करने के लिए बाध्य करता है।
  • अनुच्छेद-51A(g) (मौलिक कर्तव्य): यह प्रत्येक नागरिक पर जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखने और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने का नैतिक और कानूनी कर्तव्य डालता है।
  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) अधिनियम, 2010: पर्यावरणीय विवादों को शीघ्रता से निपटाने की विशेषज्ञता से संबद्ध एक विशेष निकाय के रूप में स्थापित किया गया, जिससे पारंपरिक न्यायालयों पर भार कम होता है।

पर्यावरण नियमों में छूट के हालिया मामले

हालिया कानूनी और विधायी परिवर्तन ‘नियामक छूट’ की ओर एक प्रवृत्ति का संकेत देते हैं, जहाँ पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को ठोस सुरक्षा के बजाय प्रक्रियात्मक बाधाओं के रूप में माना जा रहा है।

  • प्राकृतिक भूदृश्यों की पुनर्परिभाषा: संरक्षित क्षेत्र की परिभाषा तय करने वाले कानूनी मानदंडों को संकुचित करके, राज्य ने विशाल पारिस्थितिकी क्षेत्रों को कठोर निगरानी से बाहर कर दिया है।
    • अरावली पर्वतमाला की ऊँचाई सीमा (2025): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहाड़ियों के लिए 100 मीटर की ऊँचाई पर आधारित परिभाषा को स्वीकार किया।
      • इस संकुचित रणनीति ने निचली पर्वतमालाओं और तलहटी को कानूनी संरक्षण से वंचित कर दिया, जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में भूजल पुनर्भरण और मरुस्थलीकरण को रोकने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी हुई।
    • वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम (FCAA), 2023: इन संशोधनों ने “वनों” की परिभाषा को पुनर्परिभाषित किया और इसमें केवल सरकारी रजिस्टरों में आधिकारिक रूप से दर्ज भूमि को ही शामिल किया।
      • इससे प्रभावी रूप से “मानित वनों” के बड़े भू-भागों का विनियमन समाप्त हो गया, जिससे बुनियादी ढाँचे और सुरक्षा परियोजनाओं, विशेष रूप से संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में, भूमि का हस्तांतरण आसान हो गया।
  • पश्चात् स्वीकृति (एक्स-पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस) शासन का सामान्यीकरण: “पूर्व अनुमति” से “पूर्वव्यापी क्षमा” की ओर परिवर्तन ने कानून के निवारक प्रभाव को काफी कमजोर कर दिया है।
    • वनशक्ति बनाम भारत संघ पुनर्विचार (2025): न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण न्यायिक उलटफेर करते हुए पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी (मंजूरी माँगे बिना निर्माण शुरू करने की प्रथा) पर अपने पूर्व प्रतिबंध को वापस ले लिया।
      • न्यायपालिका ने तर्क दिया कि पूर्ण प्रतिबंध से चल रहे सार्वजनिक निवेशों पर “विनाशकारी आर्थिक परिणाम” होंगे।
    • उल्लंघनों का मुद्रीकरण: इससे परियोजनाओं को अवैध निर्माण शुरू करने और बाद में केवल जुर्माना अदा करके पूर्वव्यापी मंजूरी प्राप्त करने की अनुमति मिल जाती है, जिससे पर्यावरण क्षति को व्यवसाय की एक लेन-देन लागत के रूप में माना जाता है।
  • प्रभाव आकलन की संस्थागत कमजोरी: परियोजनाओं की जाँच-पड़ताल का प्राथमिक साधन, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रिया, नई अधिसूचनाओं के कारण अप्रभावी हो गई है।
    • पर्यावरण प्रभाव आकलन नीति में छूट (18 दिसंबर, 2025): नई नीतियों के तहत अब विशिष्ट स्थान और क्षेत्र विवरण दिए बिना भी आकलन किए जा सकते हैं।
      • इससे पर्यावरण प्रभाव आकलन एक सैद्धांतिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है, जिसमें स्थल-विशिष्ट पारिस्थितिकी संवेदनशीलता का ध्यान नहीं रखा जाता है।
    • अनुपालन में छूट: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचनाओं में परिवर्तनों से परियोजना छूटों का दायरा बढ़ा है, स्व-प्रमाणीकरण पर निर्भरता बढ़ी है और सार्वजनिक परामर्शों की आवृत्ति कम हुई है।
  • रणनीतिक अवसंरचना बनाम भू-गर्भीय स्थिरता: राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संपर्क का उपयोग संवेदनशील क्षेत्रों में निवारक सिद्धांत को दरकिनार करने के लिए तेजी से किया जा रहा है।
    • चार धाम राजमार्ग परियोजना: जून 2025 में किए गए अध्ययनों में 811 से अधिक भूस्खलन क्षेत्रों की पहचान किए जाने के बावजूद, परियोजना का विस्तार जारी है।
      • हिमालयी भू-गर्भीय संरचना की तुलना में रणनीतिक संपर्क को प्राथमिकता देने के कारण विनाशकारी बाढ़ और मिट्टी की गंभीर अस्थिरता उत्पन्न हुई है।
    • सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून’ बनाम भारत संघ (2021): क्षेत्र के पारिस्थितिकी महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी, न्यायालय ने रणनीतिक रक्षा आवश्यकताओं के आधार पर चौड़ी सड़कों के निर्माण की अनुमति दी।
      • इस “संतुलन” को उत्तराखंड में बाद में हुए पारिस्थितिकी व्यवधान और बाढ़ से जोड़ा गया है।
  • तटीय पारिस्थितिकी और ‘क्षतिपूर्ति’ संबंधी भ्रांति: औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए  अवैध प्रक्रियाएँ अपनाकर तटीय संरक्षण के साथ समझौता किया जा रहा है।
    • मैंग्रोव विनाश: महाराष्ट्र के रायगढ़ में मैंग्रोव के विनाश के लिए न्यायिक स्वीकृति, क्षतिपूर्ति वनीकरण पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाती है।
      • यह पारिस्थितिकी विज्ञान की अनदेखी है, क्योंकि पौधे परिपक्व मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली समुद्री लहरों से सुरक्षा और जैव विविधता का स्थान नहीं ले सकते।
    • तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना, 2019: हालिया अद्यतनों ने तटीय क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों और पर्यटन अवसंरचना को बढ़ावा दिया है, जिससे बढ़ते समुद्री जल स्तर के कारण इन पारिस्थितिकी तंत्रों की आपदा संवेदनशीलता बढ़ गई है।
    • जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023: इस अधिनियम ने विशिष्ट उद्योगों के लिए अनुपालन आवश्यकताओं में छूट दी और स्थानीय समुदायों के साथ लाभ-साझाकरण प्रावधानों को कमजोर किया, जिससे जैव विविधता संसाधनों के व्यावसायीकरण पर निगरानी कम हो गई।

नियामक छूट’ का संरचित ढाँचा

श्रेणी

विशिष्ट बदलाव

कानून के शासन पर प्रभाव

परिभाषा का ह्रास ‘वन’ की पुनर्वर्गीकरण (वन संरक्षण एवं संवर्द्धन अधिनियम, 2023) तथा ‘पहाड़ियों’ का पुनर्वर्गीकरण (अरावली 100 मीटर नियम)। ‘मानचित्रण संबंधी खामियाँ’ उत्पन्न करता है, जिससे पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का कानूनी दोहन संभव हो जाता है।
प्रक्रिया का ह्रास पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना का कमजोर होना; रणनीतिक सीमा सड़कों को दी गई छूट। स्थल-विशिष्ट प्रभावों के कठोर आकलन को दरकिनार कर निवारक सिद्धांत को कमजोर करता है।
अनुपालन का ह्रास पश्चात् स्वीकृतियों (एक्स-पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस) का नियमितीकरण (वनशक्ति रिकॉल, 2026)। ‘प्रदूषण के बदले भुगतान’ की संस्कृति को सामान्य बनाता है; पर्यावरणीय क्षति एक लेन-देन लागत बन जाती है।
संस्थागत ह्रास राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (SPCBs) में 40% से अधिक रिक्त पद तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की विशेषज्ञ पीठों में भी उच्च स्तर की रिक्तियाँ। वास्तविक क्षेत्रीय निगरानी के बजाय ‘चेक-बॉक्स अनुपालन’ को बढ़ावा देता है।

पर्यावरण विनियमन का महत्त्व

कठोर नियमन विकास में बाधा नहीं है; बल्कि यह सतत् समृद्धि का आधारभूत ढाँचा है। यह “साझा संसाधनों के दुरुपयोग” को रोकता है, जहाँ स्वच्छ हवा और जल जैसे साझा संसाधनों का अल्पकालिक व्यक्तिगत लाभ के लिए दोहन हो जाता है, और इसके परिणामस्वरूप राज्य और आने वाली पीढ़ियों को पुनर्स्थापन का बोझ उठाना पड़ता है।

  • जन स्वास्थ्य की रक्षा (राष्ट्रीय स्वास्थ्य लाभांश): पर्यावरण विनियमन का सबसे तात्कालिक लाभ बीमारियों और असमय मृत्यु की रोकथाम है।
    • वायु गुणवत्ता मानक: वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 जैसे नियम पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) को सीमित करते हैं, जिससे अस्थमा, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर की घटनाओं में प्रत्यक्ष कमी आती है।
    • जल सुरक्षा: सीसा, PFAS (‘फाॅरएवर केमिकल्स’) और औद्योगिक अपवाह के मानक यह सुनिश्चित करते हैं कि पीने का पानी विषाक्त पदार्थों का स्रोत न बने।
    • आर्थिक लाभ: अध्ययनों में अक्सर स्वच्छ वायु मानकों के लिए 30:1 का लाभ-लागत अनुपात बताया गया है; अर्थात विनियमन पर खर्च किया गया प्रत्येक ₹1 स्वास्थ्य देखभाल लागत और उत्पादकता हानि में ₹30 की बचत करता है।
  • निःशुल्क’ पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का संरक्षण: प्रकृति वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर की सेवाएँ प्रदान करती है। नियमन यह सुनिश्चित करता है कि ये प्रणालियाँ ध्वस्त न हों।
    • बाढ़ नियंत्रण (जैविक सुरक्षा कवच): मैंग्रोव और आर्द्रभूमि प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करते हैं।
      • उदाहरण के लिए, भितरकनिका मैंग्रोव (ओडिशा) ने चक्रवात दाना (2024) के दौरान अंतर्देशीय गाँवों को बाढ़ से बचाया, जबकि पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमि प्राकृतिक रूप से सीवेज का उपचार करके शहर को सालाना लगभग ₹4,680 मिलियन की बचत कराती है।
    • जल सुरक्षा: जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के माध्यम से जलक्षेत्रों और जलभंडारों की सुरक्षा सिंचाई और पीने के पानी दोनों के लिए दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करती है।
    • कार्बन पृथक्करण: वन संरक्षण पृथ्वी की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की प्राकृतिक क्षमता को बनाए रखता है।
      • मिष्टी (MISHTI) योजना (2023) जैसी पहलों का उद्देश्य 540 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव को पुनर्स्थापित करना है, जिससे एक विशाल कार्बन सिंक का निर्माण होगा।
  • आर्थिक स्थिरता और नवाचार: स्मार्ट नियम औद्योगिक आधुनिकीकरण को बढ़ावा देकर और लागतों को आंतरिक बनाकर विकास को गति प्रदान करते हैं।
    • नवाचार को बढ़ावा देना: जब राज्य उत्सर्जन कम करने का आदेश देता है, तो इससे ऑटोमोटिव और ऊर्जा क्षेत्रों को नवाचार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे नए बाजार विकसित होते हैं।
      • भारत के पर्यावरण प्रौद्योगिकी बाजार का वर्तमान मूल्य लगभग 23 अरब डॉलर है।
    • बाहरी लागतों को रोकना: नियमन के अभाव में, कारखाने अपने अपशिष्ट की लागत करदाताओं पर डाल देते हैं।
      • नियमन कंपनियों को इन लागतों को आंतरिक करने के लिए बाध्य करता है, जिससे अधिक कुशल और चक्रीय व्यापार मॉडल विकसित होते हैं।
  • संसाधनों की दीर्घकालिक सुरक्षा और आपदा जोखिम न्यूनीकरण: नियम संसाधनों के दोहन के उन उतार-चढ़ावों को रोकते हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के पूर्ण पतन का कारण बनते हैं।
    • मृदा संरक्षण: कृषि और खनन नियम ऊपरी मृदा के अपरदन और भूमि क्षरण को रोकते हैं जो खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
    • जलवायु अनुकूलन: एक सुदृढ़ पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) यह सुनिश्चित करता है कि चार धाम राजमार्ग जैसी बुनियादी संरचनाएँ जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित हों।
      • इन सुरक्षा उपायों की अनदेखी करने से विनाशकारी भूस्खलन होते हैं, जिनसे भारी आर्थिक नुकसान और बुनियादी ढाँचे का विनाश होता है।

भारत में पर्यावरण विनियमन के लिए चुनौतियाँ

  • विकास बनाम शासन का विरोधाभास: ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और निवारक सिद्धांत के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है।
    • तेजी से क्रियान्वयन का दबाव: पर्यावरणीय अनुपालन को अक्सर “लालफीताशाही” के रूप में देखा जाता है, जो महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में देरी करती है। 
    • पूर्वव्यापी स्वीकृतियों का सामान्यीकरण: जैसा कि वनशक्ति बनाम भारत संघ (2025) मामले में विचार-विमर्श से देखा गया, बिना परमिट के शुरू हुई परियोजनाओं को “नियमित” करने का भारी दबाव है।
      • जुर्माना अदा करने पर पूर्व तारीख से मंजूरी देने की न्यायिक नीति कानून के निवारक प्रभाव को कमजोर करती है, और पारिस्थितिकी क्षति को केवल एक लेन-देन लागत के रूप में देखती है।
    • मूल्यांकन प्रक्रियाओं का कमजोर होना: हालिया नीतिगत परिवर्तनों ने लघु खनन और रणनीतिक सीमा सड़कों जैसे उद्योगों के लिए छूटों का विस्तार किया है, जिससे अक्सर सार्वजनिक परामर्शों को दरकिनार कर दिया जाता है और स्थानीय समुदायों की अपनी भूमि और जल की रक्षा करने की शक्ति कम हो जाती है।
  • संस्थागत और प्रवर्तनीय कमियाँ: भारत में मजबूत कानून मौजूद होने के बावजूद, ‘कार्यान्वयन की कमी’ एक महत्त्वपूर्ण बाधा बनी हुई है।
    • नौकरशाही का हस्तक्षेप: पर्यावरण मंजूरी समितियों में अक्सर स्वतंत्र पारिस्थितिकी विशेषज्ञों की कमी होती है।
      • इससे हितों का टकराव उत्पन्न होता है, जहाँ परमिट वैज्ञानिक योग्यता के बजाय औद्योगिक प्रभाव के आधार पर दिए जा सकते हैं।
    • निगरानी में संसाधनों की कमी: राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) में हमेशा से ही धन और कर्मचारियों की कमी रहती है।
      • तकनीकी रिक्तियों की दर अक्सर 40% से अधिक होने के कारण, ये बोर्ड कठोर जमीनी निरीक्षण करने के बजाय निगरानी के लिए केवल खानापूर्ति करने पर विवश हैं।
    • प्रदूषक भुगतान करे’ की विडंबना: न्यायालय भारी जुर्माना लगा सकते हैं, लेकिन ये अक्सर वर्षों तक चलने वाले मुकदमों में उलझे रहते हैं। बड़ी कंपनियाँ अक्सर इन जुर्माने को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाने के बजाय “व्यापार करने की लागत” के रूप में देखती हैं।
  • पर्यावरण के प्रति संघर्ष: वर्ष 2026 में उभरने वाली एक आधुनिक चुनौती विभिन्न पर्यावरणीय लक्ष्यों के बीच टकराव है, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन को कम करना (नवीकरणीय ऊर्जा) और जैव विविधता संरक्षण।
    • नवीकरणीय ऊर्जा बनाम पर्यावास: राजस्थान और गुजरात में बड़े पैमाने पर चल रहे सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र अक्सर गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के पर्यावास को खंडित कर देते हैं।
    • नियामक दुविधा: नियामकों को “नेट जीरो” कार्बन लक्ष्यों को पूरा करने और एक प्रमुख प्रजाति के विलुप्त होने को रोकने के बीच चुनाव करना पड़ता है, जो दर्शाता है कि ‘हरित’ ऊर्जा परियोजनाएँ हमेशा पारिस्थितिकी रूप से तटस्थ नहीं होती हैं।
  • क्षतिपूर्ति’ संबंधी भ्रांति और आँकड़ों की कमी: औद्योगिक विस्तार को उचित ठहराने के लिए कानूनी व्यवस्था अक्सर त्रुटिपूर्ण पारिस्थितिक तर्क पर निर्भर करती है।
    • एकल कृषि बनाम जैव विविधता: क्षतिपूर्ति वनीकरण के तहत, कानून अक्सर प्राचीन, जैव विविधता से भरपूर जंगलों के ‘प्रतिस्थापन’ के रूप में एकल कृषि के अंतर्गत वृक्षारोपण को स्वीकार करता है।
      • हालाँकि, एक नया वृक्षारोपण 100 वर्ष पुराने पारिस्थितिकी तंत्र के जटिल पोषक तत्त्व चक्रण और कार्बन पृथक्करण की नकल नहीं कर सकता है।
    • निगरानी की कमी: वायु, जल और वन आवरण पर वास्तविक समय, पारदर्शी डेटा की महत्त्वपूर्ण कमी है।
      • उच्च-विश्वसनीयता वाले आधारभूत डेटा के बिना, न्यायपालिका के लिए वैज्ञानिक सटीकता के साथ उल्लंघनकर्ताओं को जवाबदेह ठहराना लगभग असंभव है।
        • उदाहरण: वर्ष 2024 की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार, 62% डेटा कम लागत वाले सेंसर (LCS) और शहरी-केंद्रित भारांक पर निर्भर करता है, जिसमें न्यायिक साक्ष्य के लिए आवश्यक ‘नियामक स्तर’ की सटीकता का अभाव है।
      • इस वैज्ञानिक अभाव के कारण विशिष्ट उल्लंघनकर्ताओं और स्वास्थ्य प्रभावों के बीच एक अनन्य संबंध स्थापित करना असंभव हो जाता है, जिससे प्रभावी रूप से प्रदूषकों को ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ से सुरक्षा मिलती है।

वैश्विक स्तर पर की गई पहल

  • वित्तीय संरचना (ट्रिलियन-डॉलर का परिवर्तन): COP 29 (बाकू) और COP 30 (बेलेम, 2025) के बाद, दुनिया ने जलवायु कार्रवाई के वित्तपोषण के तरीके में आमूलचूल परिवर्तन किया है, और ‘स्वैच्छिक सहायता’ से हटकर ‘प्रणालीगत निवेश’ की ओर अग्रसर हुई है।
    • बाकू से बेलेम रोडमैप (1.3 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य): इस पहल का उद्देश्य वर्ष 2035 तक जलवायु वित्तपोषण को प्रति वर्ष कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाना है।
      • यह विकासशील देशों को ऊर्जा परिवर्तन का प्रबंधन करने और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करने में मदद करने के लिए पिछले 100 बिलियन डॉलर के लक्ष्य से आगे बढ़ता है।
    • नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य (NCQG): COP29 में, 1.3 ट्रिलियन डॉलर के बड़े लक्ष्य को गति देने के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण के आधार के रूप में वर्ष 2035 तक प्रति वर्ष 300 बिलियन डॉलर का एक नया आधारभूत लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
    • उष्णकटिबंधीय वन संरक्षण सुविधा (TFFF): COP30 में ब्राजील द्वारा शुरू किया गया, यह 125 बिलियन डॉलर का कोष स्थायी वनों को एक वित्तीय परिसंपत्ति के रूप में मानता है।
      • यह उष्णकटिबंधीय देशों (पर्यवेक्षक के रूप में भारत सहित) को वन आवरण बनाए रखने के लिए भुगतान करता है, जिसमें यह अनिवार्य है कि 20% धनराशि सीधे स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों (IPLCs) को दी जाए।
  • जैव विविधता और समुद्री शासन: विश्व वर्तमान में कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा (GBF) के “कार्यान्वयन चरण” में है।
    • 30×30 अधिदेश: विश्व के विभिन्न देश 2030 तक 30% भूमि और महासागरों की रक्षा के लिए अपने घरेलू कानूनों को संरेखित कर रहे हैं। भारत ने वर्ष 2025 के अंत में अपनी अद्यतन राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) प्रस्तुत की, जिसमें पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन के लिए 23 वैश्विक लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।
    • उच्च सागर’ (हाई सी) संधि का लागू होना: 17 जनवरी, 2026 को यह ऐतिहासिक संधि कानूनी रूप से बाध्यकारी हो गई। यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र (‘उच्च सागर’) में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPA) के निर्माण के लिए पहला ढाँचा प्रदान करती है, जो पृथ्वी की सतह के लगभग आधे हिस्से को कवर करता है।
    • रामसर सम्मेलन (COP15): वर्ष 2025 के विक्टोरिया फॉल्स शिखर सम्मेलन में मीठे जल के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि आर्द्रभूमि शहरी बाढ़ सुरक्षा के लिए आवश्यक “प्राकृतिक बुनियादी ढाँचा” हैं।
  • वैश्विक प्लास्टिक संधि (INC-5.3): यह सबसे महत्त्वाकाँक्षी पर्यावरणीय वार्ताओं में से एक है (फरवरी 2026)।
    • जीवनचक्र विनियमन: पूर्ववर्ती स्वैच्छिक प्रयासों के विपरीत, इस संधि का उद्देश्य कानूनी रूप से बाध्यकारी होना है, जो कच्चे माल के निष्कर्षण से लेकर ‘जीवन-समाप्ति’ प्रबंधन तक प्लास्टिक के संपूर्ण जीवनचक्र को कवर करती है।
    • वर्ष 2026 में गतिरोध का अंत: फरवरी 2026 की शुरुआत में राजदूत जूलियो कोरडानो (चिली) के अध्यक्ष चुने जाने के साथ, समिति एक मसौदा दस्तावेज’ (Chair’s Text) तैयार करने की दिशा में प्रयासरत है, जो वैश्विक स्तर पर विशिष्ट हानिकारक रासायनिक योजकों और एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाता है।
  • पारदर्शिता और बाजार-आधारित नियम: नए मानकों के चलते कंपनियों को अपने वित्तीय मामलों की तरह ही प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभाव (नेचर फुटप्रिंट) के बारे में भी उतनी ही पारदर्शिता प्रदर्शित करनी पड़ रही है।
    • प्रकृति संबंधी वित्तीय खुलासे पर कार्य बल (TNFD): वर्ष 2026 तक, कई वैश्विक कंपनियों ने प्रकृति से संबंधित अपनी निर्भरताओं और जोखिमों की रिपोर्टिंग शुरू कर दी है।
      • इससे जैव विविधता पर पड़ने वाला प्रभाव कॉरपोरेट ऑडिटिंग का एक मानक हिस्सा बन गया है, जिससे विज्ञान-आधारित डेटा की आवश्यकता के द्वारा ग्रीनवॉशिंग’ को रोका जा सकता है।
    • संयुक्त राष्ट्र वैश्विक कार्बन बाजार (अनुच्छेद-6): COP29 में अंतिम रूप दिए गए तकनीकी नियमों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रबंधित कार्बन व्यापार प्रणाली की शुरुआत की है।
      • यह कार्बन क्रेडिट के उच्च-स्तरीय व्यापार की अनुमति देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि विभिन्न देशों द्वारा उत्सर्जन कटौती की ‘दोहरी गणना’ न हो।
    • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और सतत् विकास लक्ष्य (SDG): विश्व 2030 के सतत् विकास लक्ष्यों (SDG), विशेष रूप से लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) और 15 (स्थल पर जीवन) को गति देते हुए सफलता के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को एक फ्रेमवर्क के रूप में उपयोग करना जारी रखता है।

आगे की राह 

  • न्यायिक एवं संरचनात्मक समर्थन: विधिक ढाँचे को ‘प्रक्रिया-आधारित’ निगरानी से आगे बढ़कर ‘परिणाम-आधारित’ निगरानी की ओर संक्रमण करना। 
    • ग्रीन बेंच का पुनरुद्धार: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक स्थायी और नियमित रूप से कार्यरत ग्रीन बेंच की स्थापना की तत्काल आवश्यकता है। 
      • इससे जटिल पर्यावरणीय मामलों का निपटारा सामान्य दीवानी या आपराधिक मामलों की तुलना में कम प्राथमिकता दिए बिना, विशेषीकृत न्यायविदों द्वारा किया जा सकेगा।
    • संस्थागत स्वायत्तता: स्वतंत्र पारिस्थितिकी विशेषज्ञों के एक स्वतंत्र पैनल को शामिल कर प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और स्वीकृति समितियों को ‘नौकरशाही अवरोधों’ से सुरक्षित करना।
    • परिदृश्यों की पारिस्थितिकी परिभाषा: ‘वन’ या ‘पहाड़ी’ की कानूनी परिभाषाओं को मनमाने मानकों (जैसे 100 मीटर ऊँचाई सीमा) से हटाकर वैज्ञानिक मापदंडों पर आधारित किया जाना चाहिए।
      • परिभाषाओं में जल विज्ञान, जैव विविधता मूल्य तथा भूजल पुनर्भरण क्षमता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
    • वहन क्षमता की ओर संक्रमण: परियोजना स्वीकृतियों को व्यक्तिगत प्रभाव आकलन से हटाकर क्षेत्रीय वहन क्षमता-आधारित मूल्यांकन की ओर स्थानांतरित करना, विशेष रूप से हिमालय और पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में।
    • संवैधानिक प्रधानता: परियोजना स्वीकृतियों को संविधान के अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद-48A (राज्य का कर्तव्य) के अनुरूप बनाकर पर्यावरणीय कानून के शासन को सुदृढ़ करना।
      • इसमें ‘पूर्वव्यापी’ स्वीकृतियों को असंवैधानिक घोषित करना शामिल है ताकि किसी परियोजना को केवल इसलिए मंजूरी न मिल जाए क्योंकि वह पहले ही बन चुकी है।
      • पर्यावरण कानून का शासन: पूर्व मंजूरी को संवैधानिक शर्त के रूप में प्राथमिकता देना। ‘पूर्वव्यापी’ स्वीकृतियाँ केवल आवश्यक सार्वजनिक उपयोगिताओं तक ही सीमित होनी चाहिए, औद्योगिक विस्तार के लिए नहीं।
  • डिजिटल एवं AI-संवर्द्धित प्रवर्तन: मैनुअल और आवधिक निरीक्षणों का युग अब सतत्, स्वचालित निगरानी द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
    • पर्यावरणीय ‘डिजिटल ट्विन्स’: वर्ष 2026 तक डिजिटल ट्विन्स (अर्थात् पारिस्थितिकी तंत्रों की वास्तविक-समय आभासी प्रतिकृतियों) का उपयोग योजनाकारों को किसी बाँध या राजमार्ग के प्रभाव का आकलन से पहले करने में सक्षम बनाता है।
      • इससे विनियमन की प्रकृति प्रतिक्रियात्मक से निवारक की ओर स्थानांतरित हो जाती है।
    • स्वचालित निगरानी: औद्योगिक अपशिष्टों और अवैध खनन की निगरानी हेतु इंटरनेट ऑफ थिंग्स सेंसरों तथा उपग्रह-आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग।
      • स्वचालित चेतावनी प्रणालियाँ अब तत्काल कानूनी नोटिस जारी कर सकती हैं, जिससे ‘ग्रीनवॉशिंग’ या डेटा में बदलाव करना काफी सीमा तक कठिन हो जाता है।
      • डिजिटल शासन: GIS और उपग्रह-आधारित निगरानी का उपयोग करते हुए वास्तविक-समय अनुपालन डैशबोर्ड को एकीकृत करना, ताकि भूमि-उपयोग परिवर्तनों का एक पारदर्शी सार्वजनिक अभिलेख तैयार किया जा सके।
    • एकीकृत डेटा संरचना: ‘खंडित’ शासन व्यवस्था से आगे बढ़ना।
      • सफल मॉडल अब जल, ऊर्जा और अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित डेटा को एकीकृत ढाँचे के अंतर्गत सम्मिलित करते हैं, ताकि किसी एक क्षेत्र (जैसे- सौर ऊर्जा) की समस्या का समाधान करते समय अनजाने में किसी अन्य क्षेत्र (जैसे- आवास विखंडन) को क्षति न पहुँचे।
  • पर्यावरणीय वित्त का मुख्यधारा में समावेशन: संरक्षण अब केवल ‘अनुपालन लागत’ नहीं रहा; बल्कि यह एक महत्त्वपूर्ण वित्तीय जोखिम बन चुका है।
    • अनिवार्य प्रकटीकरण (TNFD एवं ISSB): वर्ष 2026 तक भारत प्रकृति-संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण कार्यबल (TNFD) के अंतर्गत अनिवार्य रिपोर्टिंग की ओर अग्रसर है।
      • इससे कंपनियों को प्राकृतिक क्षति को वित्तीय ऋण के समान कानूनी और राजकोषीय महत्त्व के साथ देखने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
    • कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM): यूरोपीय संघ का CBAM अब लागू हो जाने के कारण, इस्पात और सीमेंट के भारतीय निर्यातकों को आधुनिकीकरण न करने की स्थिति में ‘कार्बन कर’ का सामना करना पड़ रहा है।
      • इससे वैश्विक स्तर पर समान प्रतिस्पर्द्धी वातावरण बनता है, जो घरेलू भारी उद्योगों को हरित प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
    • ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम (GCP): भारत की बाजार-आधारित व्यवस्था ‘पेड़ों की गिनती’ करने के बजाय पर्यावरण पुनर्स्थापन (झाड़ियाँ, घास और मृदा का स्वास्थ्य) को पुरस्कृत करने के लिए विकसित हो रही है।
      • ये क्रेडिट्स अब व्यापार योग्य वस्तुओं के रूप में विकसित हो रहे हैं, जिससे कंपनियाँ उच्च-विश्वसनीयता वाले पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन में निवेश कर अपने पर्यावरणीय पदचिह्न की भरपाई कर सकती हैं।
      • पुनर्स्थापन-आधारित दंड: पर्यावरणीय मुआवजे को मनमाने एकमुश्त जुर्मानों के बजाय वास्तविक पुनर्स्थापन परिणामों (जैव विविधता सूचकांकों द्वारा मापे गए) से जोड़ना।
  • न्यायसंगत संक्रमण मॉडल: पर्यावरणीय क्षरण से आर्थिक विकास को अलग करने के लिए नीति आयोग (2026) द्वारा उल्लिखित चार-स्तंभ रणनीति की आवश्यकता है:
    • विद्युतीकरण: औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों में ऊर्जा उपयोग को तीव्र गति से विद्युत आधारित बनाना।
    • ग्रिड का हरितीकरण: नवीकरणीय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन की ओर संक्रमण को तेज करना।
    • दक्षता एवं चक्रीयता: नए संसाधन दोहन की आवश्यकता को कम करने हेतु सामग्रियों के जीवन-चक्र का अधिकतम उपयोग।
    • व्यवहारगत परिवर्तन (मिशन LiFE): संसाधनों की समग्र राष्ट्रीय माँग को घटाने के लिए व्यक्तियों को प्रो-प्लैनेट पीपल (P3) जीवनशैली अपनाने हेतु प्रेरित करना।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 में भारत की पर्यावरणीय यात्रा ‘आर्थिक सुविधा’ से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी संवैधानिकता की ओर परिवर्तन की माँग करती है। AI-आधारित निगरानी और प्रकृति-आधारित वित्त को एकीकृत करके राज्य विकास को पर्यावरणीय क्षरण से अलग कर सकता है, ताकि विकासात्मक प्रगति कभी भी नागरिकों की अंतर-पीढ़ीगत समानता से समझौता न करे।

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