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भारत का मत्स्य क्षेत्र

Lokesh Pal April 06, 2026 02:45 10 0

संदर्भ

सरकार ने रेखांकित किया कि भारत का मत्स्य क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, रोजगार और निर्यात आय में एक महत्त्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में विकसित हुआ है, जिसे वर्ष 2015 से अब तक ₹39,272 करोड़ के रिकॉर्ड निवेश का समर्थन प्राप्त है।

संबंधित तथ्य

  • अगले पाँच वर्षों में, सरकार का लक्ष्य मूल्य-वर्द्धित निर्यात का विस्तार करना, अंतर्देशीय निर्यात केंद्रों का निर्माण करना और यू.के., यूरोपीय संघ, आसियान और पश्चिम एशिया सहित बाजारों में भारत की उपस्थिति को बढ़ाना है।

भारत के मत्स्य क्षेत्र के बारे में

  • प्रवृत्तियाँ
    • मत्स्य उत्पादन: भारत अब वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा जल कृषि उत्पादक है, जो विश्व के कुल मत्स्य उत्पादन का लगभग 8 प्रतिशत योगदान करता है।
      • घरेलू मत्स्य उत्पादन वित्त वर्ष 2019-20 में 141.64 लाख टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 197.75 लाख टन हो गया, जो लगभग 7 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है।
    • समुद्री खाद्य निर्यात: पिछले एक दशक में समुद्री खाद्य निर्यात दोगुने से अधिक हो गए हैं, जो वित्त वर्ष 2013-14 में ₹30,213 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में ₹62,408 करोड़ हो गए, जिसका मुख्य कारण ₹43,334 करोड़ मूल्य के झींगा निर्यात हैं।
      • प्रमुख गंतव्य: भारत अब लगभग 130 वैश्विक बाजारों में 350 से अधिक प्रकार के समुद्री खाद्य उत्पाद का निर्यात करता है, जिसमें वित्त वर्ष 2024-25 में कुल निर्यात मूल्य का 36.42 प्रतिशत संयुक्त राज्य अमेरिका का है, इसके बाद चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और मध्य पूर्व आते हैं।

स्वच्छता आयात परमिट (SIP)

  • स्वच्छता आयात परमिट (SIP) एक आधिकारिक अनुमति है, जो पशुधन एवं उनसे संबंधित उत्पादों और जैविक सामग्री के भारत में आयात के लिए आवश्यक होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे रोगमुक्त हैं और घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित हैं।
  • विधिक ढाँचा: SIP प्रणाली का संचालन पशुधन आयात अधिनियम, 1898 के अंतर्गत होता है, जो भारत में संक्रामक रोगों के प्रवेश को रोकने के लिए पशुओं और पशु उत्पादों के आयात को विनियमित करता है।
  • नोडल प्राधिकरण: यह परमिट मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत पशुपालन और डेयरी विभाग द्वारा जारी किया जाता है।

सरकारी पहलें

  • टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइसेस (TEDs) का बड़े पैमाने पर उपयोग: सरकार ने तटीय राज्यों में झींगा ट्रॉलरों पर टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइसेस (TEDs) का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू किया है।
  • स्वच्छता आयात परमिट प्रणाली: नियामक स्तर पर, स्वच्छता आयात परमिट (SIP) प्रणाली को पूर्णतः डिजिटाइज किया गया है और राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे अनुमोदन समय 30 दिनों से घटकर 72 घंटे हो गया है।
  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): सितंबर 2020 में ₹20,050 करोड़ के कुल निवेश व्यय के साथ शुरू की गई।
    • उद्देश्य: मत्स्य उत्पादन, उत्पादकता, गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी और पोस्ट हार्वेस्ट’ अवसंरचना में महत्त्वपूर्ण अंतरालों को समाप्त कर मत्स्य क्षेत्र का रूपांतरण करना।
  • प्रौद्योगिकी और डेटा-आधारित समाधान: ओएनडीसी (डिजिटल वाणिज्य के लिए मुक्त नेटवर्क) के साथ सहयोग कर 63 मत्स्य स्टार्ट-अप्स और मत्स्य किसान उत्पादक संगठन (FFPO) को डिजिटल बाजार तक पहुँच के लिए जोड़ा गया।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) सतत् उपयोग नियम, 2025: सहकारी समितियों को प्राथमिक मत्स्यन पहुँच प्रदान करता है, डिजिटल रियलक्राफ्ट एक्सेस-पास प्रस्तुत करता है और समुद्री जैव विविधता की रक्षा के लिए विनाशकारी मत्स्यन प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाता है।

मत्स्य क्षेत्र की उपयोगिता

  • अर्थव्यवस्था में योगदान: मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अनुसार, यह क्षेत्र प्राथमिक स्तर पर लगभग 30 मिलियन मछुआरों और मछली पालकों को समर्थन देता है और मूल्य शृंखला में लगभग दोगुने लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
  • निर्यात आय में वृद्धि: यह क्षेत्र विदेशी मुद्रा अर्जित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें समुद्री उत्पाद निर्यात प्रतिवर्ष 7–8 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देते हैं, विशेषकर झींगा निर्यात के माध्यम से।
  • नीली अर्थव्यवस्था में योगदान: मत्स्य क्षेत्र भारत की नीली अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख घटक है, जो आर्थिक वृद्धि और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए समुद्री संसाधनों के सतत् उपयोग को सक्षम बनाता है।
  • क्षेत्रीय विकास और समावेशी वृद्धि: मत्स्य क्षेत्र का विकास तटीय और अंतर्देशीय क्षेत्रों में संतुलित क्षेत्रीय विकास में योगदान देता है, जिससे समावेशी वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।

भारत के मत्स्य क्षेत्र में चुनौतियाँ

  • अतिदोहन और संसाधन क्षय: अत्यधिक मत्स्यन से समुद्री मत्स्य भंडार में कमी आई है, जिससे मत्स्य क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता को खतरा है।
    • उदाहरण: केरल और तमिलनाडु के तटों के साथ अत्यधिक मत्स्यन से प्रति इकाई प्रयास में गिरावट आई है, जो समुद्री संसाधनों पर दबाव को दर्शाता है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: जलवायु परिवर्तन समुद्र के बढ़ते तापमान, महासागर अम्लीकरण और चक्रवातों की बढ़ती आवृत्ति के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है, जिससे मत्स्यन आवास और मत्स्यन गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।
    • उदाहरण: बंगाल की खाड़ी में बार-बार आने वाले चक्रवातों के कारण मत्स्यन में कमी और मत्स्य अवसंरचना की हानि हुई है।
  • अपर्याप्त अवसंरचना: इस क्षेत्र में शीत भंडारण, प्रसंस्करण इकाइयों और कुशल परिवहन सुविधाओं की कमी है, जिससे अक्षमताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • उच्च ‘पोस्ट-हार्वेस्ट’ हानि: लगभग 20–25% तक की महत्त्वपूर्ण पोस्ट-हार्वेस्ट’ हानियाँ इस क्षेत्र की समग्र उत्पादकता और लाभप्रदता को कम करती हैं।
    • उदाहरण: खराब प्रबंधन, भंडारण और परिवहन के कारण बाजार तक पहुँचने से पूर्व ही मछलियाँ सड़ जाती हैं, विशेषकर दूरस्थ अंतर्देशीय क्षेत्रों में।
  • ऋण और बीमा संबंधी बाधाएँ: मछुआरों को संस्थागत ऋण और बीमा तक सीमित पहुँच का सामना करना पड़ता है, जिससे वे वित्तीय संकट और जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
    • उदाहरण: छोटे स्तर के मछुआरे अक्सर अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भर रहते हैं, जिससे ऋण चक्र का निर्माण होता है, जबकि दुर्घटनाओं या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बीमा कवरेज अपर्याप्त रहता है।

आगे की राह

  • सतत् मत्स्यन प्रथाओं का प्रोत्साहन: समुद्री संसाधनों के अतिदोहन को रोकने और दीर्घकालिक पारिस्थितिकी संतुलन सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक और सतत् मत्स्यन प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता है।
    • उदाहरण: केरल जैसे तटीय क्षेत्रों में मौसमी मत्स्यन प्रतिबंध और विनियमित मत्स्यन क्षेत्र का कार्यान्वयन मत्स्य भंडार के पुनर्जनन में सहायक होता है।
  • अवसंरचना और शीत शृंखला का सुदृढ़ीकरण: हानियों को कम करने और मूल्य संवर्द्धन बढ़ाने के लिए शीत भंडारण, प्रसंस्करण सुविधाओं और परिवहन नेटवर्क में सुधार आवश्यक है।
    • उदाहरण: प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत आधुनिक ‘फिश लेंडिंग सेंटर’ का विकास मत्स्य उत्पादों के बेहतर भंडारण और विपणन को समर्थन देता है।
  • जल कृषि और समुद्री कृषि का विस्तार: अंतर्देशीय जल कृषि और तटीय समुद्री कृषि को बढ़ावा देने से समुद्री मत्स्यन पर दबाव कम किया जा सकता है और उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
    • उदाहरण: आंध्र प्रदेश जल कृषि में अग्रणी के रूप में उभरा है, जिससे मत्स्य उत्पादन और निर्यात में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है।
  • प्रौद्योगिकी और आधुनिक प्रथाओं का उपयोग: उपग्रह-आधारित मत्स्यन परामर्श, GPS ट्रैकिंग और फिश फाइंडर जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने से दक्षता और सुरक्षा में वृद्धि हो सकती है।
    • उदाहरण: संभावित मत्स्यन क्षेत्र (PFZ) परामर्श का उपयोग मछुआरों को मछलियों के समूहों का पता लगाने में सहायता करता है, जिससे ईंधन लागत और समय की बचत होती है।

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