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भारत की खनिज कूटनीति

Lokesh Pal January 20, 2026 03:53 24 0

संदर्भ

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्वच्छ ऊर्जा की ओर परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है, जो बड़े पैमाने पर महत्त्वपूर्ण खनिजों (CM) और दुर्लभ मृदा तत्त्वों (REE) की उपलब्धता तथा उपयोग पर निर्भर करता है।

महत्त्वपूर्ण खनिजों के बारे में

  • परिभाषा: ये वे खनिज हैं, जो आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, लेकिन इनकी सीमित उपलब्धता और भौगोलिक संकेंद्रण के कारण आपूर्ति शृंखला में अस्थिरता तथा व्यवधान की स्थिति उत्पन्न होती है, जो इनके रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
  • प्रमुख महत्त्वपूर्ण खनिज: खनन मंत्रालय द्वारा गठित महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान समिति की रिपोर्ट में 30 महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान की गई है:-
    • एंटीमनी, बेरिलियम, बिस्मथ, कोबाल्ट, कॉपर, गैलियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट, हैफनियम, इंडियम, लीथियम, मॉलिब्डेनम, निओबियम, निकेल, PGE, फास्फोरस, पोटाश, REE, रेनियम, सिलिकॉन, स्ट्रोंटियम, टैंटलम, टेल्यूरियम, टिन, टाइटेनियम, टंगस्टन, वैनेडियम, जिरकोनियम, सेलेनियम और कैडमियम।
  • प्रमुख उत्पादक: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रमुख उत्पादक निम्नलिखित हैं:
    • चीन (दुर्लभ खनिज, ग्रेफाइट और शोधन)
    • कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (कोबाल्ट)
    • चिली (ताँबा और लीथियम)
    • इंडोनेशिया (निकल)
    • दक्षिण अफ्रीका (प्लैटिनम और मैंगनीज)
    • ऑस्ट्रेलिया (लीथियम)
  • उपयोग
    • उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स: सेमीकंडक्टर और उच्च स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण के लिए ये खनिज अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी: ये खनिज टरबाइन, सौर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसी कई स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का एक आवश्यक घटक हैं।
    • परिवहन और संचार: इनका उपयोग लड़ाकू विमानों, ड्रोन, रेडियो सेट और विमानों के निर्माण में भी किया जाता है और मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर परिवर्तन में इनका योगदान है।
    • विविध क्षेत्र: मोबाइल फोन, टैबलेट, फाइबर ऑप्टिक केबल और रक्षा एवं चिकित्सा अनुप्रयोगों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकियों के निर्माण के लिए इनका उपयोग किया जाता है।
    • बैटरी और भंडारण प्रौद्योगिकी: लीथियम-आयन जैसी बैटरी प्रौद्योगिकी में प्रगति के संदर्भ में भंडारण प्रौद्योगिकी के विकास के लिए ये खनिज अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • मूल्य शृंखला के घटक
    • भूविज्ञान और अन्वेषण
    • अपस्ट्रीम: खनन और निष्कर्षण
    • मिडस्ट्रीम: प्रसंस्करण, शोधन और धातु विज्ञान
    • डाउनस्ट्रीम: घटक निर्माण और स्वच्छ डिजिटल उन्नत प्रौद्योगिकी उत्पादन
      • उदाहरण: शून्य उत्सर्जन वाहन (Zero-Emission Vehicles-ZEV) निर्माण, सेमीकंडक्टर, चिप्स आदि।
    • सामग्री पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण।

दुर्लभ मृदा तत्त्वों के बारे में

  • परिभाषा: दुर्लभ मृदा तत्त्व 17 तत्त्वों का एक समूह है, जिसमें 15 लैंथेनाइड्स के साथ-साथ स्कैंडियम और यट्रियम शामिल हैं। ये तत्त्व अपने अद्वितीय चुंबकीय उत्प्रेरक और प्रकाशीय गुणों के कारण आधुनिक औद्योगिक तथा रणनीतिक प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं।
  • दुर्लभता का स्वरूप: दुर्लभ मृदा तत्त्व वास्तव में पृथ्वी की परत में दुर्लभ नहीं हैं, बल्कि इन्हें दुर्लभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये सांद्रित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भंडारों में कम ही पाए जाते हैं और इनके पृथक्करण और शोधन की प्रक्रियाएँ जटिल और प्रौद्योगिकी-गहन होती हैं।
  • महत्त्व: दुर्लभ मृदा तत्त्वों को उनके उच्च आर्थिक और रणनीतिक महत्त्व के साथ-साथ खनन तथा प्रसंस्करण की सीमित भौगोलिक सांद्रता के कारण महत्त्वपूर्ण खनिजों की श्रेणी में रखा गया है, जिससे आपूर्ति शृंखला में भारी असुरक्षा और व्यवधान का खतरा उत्पन्न होता है।
  • प्रमुख अनुप्रयोग: दुर्लभ मृदा तत्त्वों का व्यापक रूप से उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और रक्षा उपकरणों के लिए स्थायी चुंबकों में, प्रकाश उत्सर्जक डायोड और डिस्प्ले पैनलों के लिए फॉस्फोरस में और पेट्रोलियम शोधन और उत्सर्जन नियंत्रण के लिए उत्प्रेरकों में किया जाता है।
  • उपलब्धता: दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व मोनाजाइट, बैस्टनेसाइट और जेनोटाइम जैसे खनिजों में पाए जाते हैं और ये समुद्र तट की रेत, कठोर चट्टान संरचनाओं और कार्बोनेटाइट परिसरों में मिलते हैं।
  • भारत का परिप्रेक्ष्य: भारत में दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों के संभावित संसाधन मौजूद हैं, विशेष रूप से मोनाजाइट युक्त समुद्री रेत में, लेकिन सीमित प्रसंस्करण और शोधन क्षमता, पर्यावरणीय चिंताओं तथा एक संपूर्ण घरेलू मूल्य शृंखला के विकास से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भारत के खनिज पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति

  • आयात पर अत्यधिक निर्भरता: खनन मंत्रालय के अनुसार, भारत लीथियम, कोबाल्ट, निकेल सल्फेट और दुर्लभ मृदा चुंबकीय पदार्थों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जो बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं।
  • वैश्विक स्तर पर असंतुलित स्थिति: भारत लौह अयस्क और एल्युमीनियम के शीर्ष वैश्विक उत्पादकों में से एक है, फिर भी महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के मामले में इसकी स्थिति सीमित है, जो संरचनात्मक असंतुलन को उजागर करता है।
  • अन्वेषण विस्तार: भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने महत्त्वपूर्ण खनिज अन्वेषण का अत्यधिक विस्तार किया है, जम्मू और कश्मीर में लीथियम संसाधनों की पहचान की है और वर्ष 2021 से सैकड़ों लक्षित अन्वेषण ब्लॉकों का शुभारंभ किया है।
  • प्रसंस्करण की कमी: नीति आयोग और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्टों में कहा गया है कि भारत की प्रमुख कमजोरी सीमित शोधन और पृथक्करण क्षमता में निहित है, विशेष रूप से बैटरी-ग्रेड और दुर्लभ मृदा पदार्थों के लिए।
  • सार्वजनिक निवेश प्रोत्साहन: वर्ष 2025 में स्वीकृत राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन, अन्वेषण, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए दीर्घकालिक सार्वजनिक वित्तपोषण प्रदान करता है।

भारत में महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ खनिजों के प्रमुख भंडार

खनिज/श्रेणी अनुमानित भंडारण  भारत के प्रमुख स्थान
दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व (REE)
  • लगभग 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट रेत (जिसमें थोरियम और दुर्लभ मृदा ऑक्साइड खनिज शामिल हैं) में लगभग 7.23 मिलियन टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड (REO) अंतर्निहित हैं।
  • भारत के पास वैश्विक स्तर पर दुर्लभ ऑक्साइड का लगभग पाँचवाँ सबसे बड़ा भंडार है।
आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, गुजरात, झारखंड और महाराष्ट्र के तटीय रेतीले क्षेत्र; गुजरात और राजस्थान में पाई जाने वाली कठोर चट्टानें।
लीथियम (अनुमानित) लीथियम के भंडार को अनुमानित श्रेणी में रखा गया है; सटीक राष्ट्रीय भंडार के आँकड़ों का अभी भी मूल्यांकन किया जा रहा है। रियासी जिला, जम्मू और कश्मीर (सालार-हैमाना क्षेत्र)।
ग्रेफाइट ग्रेफाइट सहित महत्त्वपूर्ण खनिज भंडारों की नीलामी की गई, हालाँकि सटीक मात्रा का संकलन नहीं किया गया है।

  • नीलामी के भंडार कई राज्यों में फैले हुए हैं।
बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़।
कोबाल्ट और निकेल कोबाल्ट के कुछ भंडार पाए गए हैं, लेकिन अभी तक लीथियम/कोबाल्ट के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से प्रमाणित खनन उत्पादन प्रारंभ नहीं हुआ है।

  • व्यावसायिक निष्कर्षण नहीं हो रहा है; अन्वेषण जारी है।
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GIS) द्वारा विभिन्न भू-भागों में सर्वेक्षण जारी है; सटीक भंडार अनुमान अभी लंबित हैं।
टाइटेनियम युक्त खनिज (जैसे- रूटाइल, इल्मेनाइट, जिरकॉन)
  • प्लेसर रेत में पर्याप्त भंडार मौजूद हैं।
  • भारत समुद्र तट की रेत में पाए जाने वाले टाइटेनियम खनिजों का एक प्रमुख वैश्विक स्रोत है।
दक्षिण और पूर्वी तटीय क्षेत्र (तमिलनाडु, केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, गुजरात)।
अन्य महत्त्वपूर्ण खनिज (प्लैटिनम समूह तत्त्व, वैनेडियम आदि)
  • प्लैटिनम समूह धातुओं (PGM), वैनेडियम, निकेल, क्रोमियम, फॉस्फोराइट आदि के ब्लॉकों की नीलामी और अन्वेषण किया जा चुका है, जो इनकी उपस्थिति का संकेत देते हैं।
  • व्यापक राष्ट्रीय आँकड़ों के आने तक सटीक केंद्रीय भंडार उपलब्ध नहीं हैं।
यह बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और अन्य राज्यों में विस्तृत है।

महत्त्वपूर्ण खनिजों पर भारत की आयात निर्भरता

खनिज निर्भरता प्राथमिक स्रोत और संदर्भ
लीथियम 100%
  • मुख्यतः चिली, रूस और चीन।
  • हाल ही में भारत ने पाँच लीथियम ब्लॉक प्राप्त करने के लिए अर्जेंटीना के साथ 200 करोड़ रुपये का समझौता किया है।
कोबाल्ट 100%
  • चीन, बेल्जियम, नीदरलैंड और डी. आर. कांगो से प्राप्त। NCM (निकल-कोबाल्ट-मैंगनीज) प्रकार की इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों में कैथोड के लिए महत्त्वपूर्ण।
निकेल 100%
  • मुख्यतः इंडोनेशिया, स्वीडन और चीन से।
  • भारत में ओडिशा में अयस्क के कुछ भंडार हैं, लेकिन शोधन क्षमता सीमित है।
वैनेडियम 100%
  • कुवैत, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका से प्राप्त होता है।
  • स्टील मिश्र धातुओं और नई पीढ़ी की वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरियों के लिए आवश्यक है।
जर्मेनियम 100%
  • पूरी तरह से चीन, दक्षिण अफ्रीका और फ्राँस पर निर्भर।
  • फाइबर ऑप्टिक्स और नाइट-विजन उपकरणों का एक महत्त्वपूर्ण घटक।
रेनियम 100%
  • रूस, ब्रिटेन और चीन से प्राप्त।
  • जेट इंजनों के लिए उच्च तापमान वाले सुपरअलॉय में उपयोग किया जाता है।
बेरिलियम और टैंटलम 100%
  • पूरी तरह से आयातित; घरेलू खनन की कोई रिपोर्ट नहीं है।
  • टैंटलम स्मार्टफोन और एयरोस्पेस में उपयोग होने वाले कैपेसिटर के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सिलिकॉन उच्च
  • भारत कुछ मात्रा में कच्चा सिलिकॉन उत्पादित करता है, लेकिन उच्च शुद्धता वाले पॉलीसिलिकॉन (सौर फोटोवोल्टिक ग्रेड) के लिए चीन, मलेशिया और नॉर्वे पर अत्यधिक निर्भर है।

खनिज कूटनीति से तात्पर्य महत्त्वपूर्ण खनिजों (जैसे लीथियम, कोबाल्ट, निकेल, दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व) तक विश्वसनीय पहुँच सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, गठबंधन और बहुपक्षीय खनिज संघों के रणनीतिक उपयोग से है।

यह संपूर्ण मूल्य शृंखला को कवर करता है:

  • अपस्ट्रीम: खनन और अन्वेषण।
  • मिडस्ट्रीम: प्रसंस्करण और शोधन।
  • डाउनस्ट्रीम: विनिर्माण (बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स)।

भारत को खनिज कूटनीति की आवश्यकता क्यों है?

  • ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकताएँ: भारत का वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य लीथियम, दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व, ताँबा और निकेल की माँग में भारी वृद्धि करेगा।
    • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि स्वच्छ ऊर्जा खनिजों की माँग वर्ष 2030 तक तीन गुना हो जाएगी।
  • आपूर्ति शृंखला एकाग्रता का जोखिम: कई महत्त्वपूर्ण खनिजों का वैश्विक प्रसंस्करण कुछ ही देशों में केंद्रित है, जिससे भारत, निर्यात नियंत्रण और भू-राजनीतिक दबाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है, जैसा कि हाल ही में खनिज व्यापार पर वैश्विक प्रतिबंधों में देखा गया है।
  • तकनीकी क्षमता में अंतर: उन्नत शोधन, बैटरी पुनर्चक्रण और दुर्लभ मृदा तत्व पृथक्करण प्रौद्योगिकियाँ पूँजी-गहन हैं और कुछ ही देशों के प्रभुत्व में हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक हो जाता है।
  • आर्थिक स्थिरता: दीर्घकालिक खनिज साझेदारियाँ मूल्य अस्थिरता और आपूर्ति में अचानक आने वाली समस्याओं को कम करने में मदद करती हैं, जिससे इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण जैसे घरेलू उद्योगों की रक्षा होती है।
  • सामरिक स्वायत्तता: खनिज कूटनीति भारत के आत्मनिर्भर लक्ष्यों और सामरिक स्वायत्तता का समर्थन करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भविष्य की प्रौद्योगिकियाँ बाहरी आपूर्ति बाधाओं से प्रभावित न हों।
    • 21वीं सदी के नए तेल’ कहे जाने वाले ये खनिज हरित प्रौद्योगिकियों, अर्द्धचालकों और रक्षा अंतरिक्ष के आधारभूत घटक हैं।
  • वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: भारत खनिज-समृद्ध विकासशील देशों के लिए एक संयोजक और भागीदार के रूप में उभर रहा है, जो केवल दोहन के बजाय साझा मूल्य सृजन को बढ़ावा दे रहा है।
    • हाल ही में, नामीबिया के साथ हुए लीथियम समझौते में स्थानीय प्रसंस्करण, कौशल हस्तांतरण और औद्योगिक विकास पर जोर दिया गया है, जो शोषणकारी संसाधन मॉडलों के लिए विकास-केंद्रित विकल्प प्रदान करता है।

महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा पर भारत की प्रमुख पहलें

  • संस्थागत शासन और रणनीतिक वित्तपोषण
    • राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): जनवरी 2025 में ₹34,300 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ शुरू किया गया एक प्रमुख मिशन।
      • यह पूरे भारत में अन्वेषण, खनन और पुनर्चक्रण के समन्वय के लिए “मुख्य केंद्र” के रूप में कार्य करता है।
    • रणनीतिक भंडार संचय: यह मिशन लीथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा धातुओं जैसे आवश्यक खनिजों के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला में संभावित बाधाओं से निपटने के उद्देश्य से रणनीतिक खनिज भंडार बनाने का निर्देश देता है।
    • वित्तीय प्रोत्साहन: घरेलू उत्पादन की लागत कम करने के लिए, सरकार ने 25 महत्त्वपूर्ण खनिजों पर सीमा शुल्क हटा दिया है और नई प्रसंस्करण इकाइयों के लिए 20% पूँजीगत व्यय सब्सिडी प्रदान करती है।
  • घरेलू अन्वेषण और विधायी सुधार
    • खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम में संशोधन: हालिया सुधारों के तहत केंद्र सरकार को 24 रणनीतिक खनिजों की नीलामी का विशेष अधिकार प्राप्त हुआ है।
      • इस अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण एवं विकास ट्रस्ट (NMEDT) की स्थापना की गई है, जिससे अपतटीय और विदेशी अन्वेषण को भी इसमें शामिल किया गया है।
    • अन्वेषण लाइसेंस (EL): यह एक नई व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य उन गहरे खनिजों (जैसे- निकेल और ताँबा) के लिए निजी निवेश आकर्षित करना है, जिनका खनन तकनीकी रूप से कठिन है, लेकिन उच्च तकनीक क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • त्वरित GSI रोडमैप: भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) वित्त वर्ष 2025-26 में 227 परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है, जिसके तहत प्रारंभिक सर्वेक्षणों से आगे बढ़कर जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में प्रामाणिक भंडार स्थापित किए जा रहे हैं।
  • विदेशी खनिज कूटनीति और साझेदारी
    • काबिल (KABIL) की वैश्विक संपत्तियाँ: भारत के संयुक्त उद्यम, खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड ने अर्जेंटीना में पाँच लीथियम ब्लॉकों (15,703 हेक्टेयर) के लिए एकाधिकार अधिकार प्राप्त कर लिए हैं और ऑस्ट्रेलिया में लीथियम तथा कोबाल्ट परियोजनाओं के लिए उचित जाँच प्रक्रिया को अंतिम रूप दे रहा है।

काबिल (KABIL) के बारे में

  • KABIL का पूरा नाम खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड है, जो भारत को महत्त्वपूर्ण खनिजों की विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गठित एक संयुक्त उद्यम कंपनी है।
  • KABIL को वर्ष 2019 में कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत निगमित किया गया था।
  • यह तीन सरकारी उद्यमों का संयुक्त उद्यम है:
    • नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (NALCO), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) और मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड (MECL)।

    • खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP): भारत इस अमेरिकी नेतृत्व वाले विशिष्ट समूह में शामिल एकमात्र विकासशील देश है, जो इसे पर्यावरण, पारिस्थितिकी और कल्याण (ESG) के अनुरूप आपूर्ति शृंखलाओं पर सहयोग करने और 13 अन्य भागीदार देशों से उन्नत निष्कर्षण प्रौद्योगिकियों तक पहुँच प्राप्त करने की अनुमति देता है।
    • TRUST पहल: खनिज प्रसंस्करण के सह-वित्तपोषण और भौगोलिक रूप से केंद्रित आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता को कम करने के लिए अमेरिका तथा जापान के साथ एक रणनीतिक ढाँचा विकसित करना।

खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) के बारे में

  • यह महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने की एक वैश्विक पहल है, जिसे महत्त्वपूर्ण खनिज गठबंधन के नाम से भी जाना जाता है।
  • स्थापना: खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) की आधिकारिक घोषणा जून 2022 में टोरंटो, कनाडा में आयोजित प्रॉस्पेक्टर्स एंड डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ कनाडा (PDAC) के वार्षिक सम्मेलन में की गई थी।
    • यह विश्व का सबसे बड़ा खनन कार्यक्रम है।
  • संस्थापक सदस्य: संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फिनलैंड, फ्राँस, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय आयोग।
    • भारत जून 2023 में इस पहल में शामिल हुआ।
  • उद्देश्य: मूल्य शृंखला के साथ रणनीतिक परियोजनाओं के लिए लक्षित वित्तीय और राजनयिक सहायता प्रदान करने हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से टिकाऊ महत्त्वपूर्ण ऊर्जा खनिज आपूर्ति शृंखलाओं के विकास में तेजी लाना।

भारत की खनिज कूटनीति का क्षेत्रीय फोकस

  • ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका: अपस्ट्रीम निष्कर्षण के लिए प्रमुख भागीदार के रूप में कार्य करते हैं, जो खनिज प्रचुरता और दीर्घकालिक अनुबंधों की संभावना प्रदान करते हैं।
  • जापान और पश्चिम एशिया: तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय क्षमता के समर्थन से, ये मध्य-चरण प्रसंस्करण, शोधन और भंडारण के लिए संभावित केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं।
  • यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका: उन्नत बैटरी प्रौद्योगिकियों, पुनर्चक्रण प्रणालियों और स्वच्छ प्रसंस्करण विधियों सहित डाउनस्ट्रीम नवाचार के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
  • लैटिन अमेरिका: लीथियम, ताँबा और निकेल तक पहुँच के लिए भविष्य के स्तंभ के रूप में पहचाना गया है, हालाँकि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा उच्च बनी हुई है।
  • रूस: प्रतिबंधों और रसद संबंधी अनिश्चितताओं से बाधित होने के बावजूद, विविधीकरण विकल्प के रूप में कार्य करता है।

भारत की खनिज कूटनीति में चुनौतियाँ

  • परिष्करण अंतराल
    • बुनियादी ढाँचे का अभाव: भारत अयस्क की खोज में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त कर चुका है। लेकिन कच्चे खनिजों को “बैटरी-ग्रेड” सामग्री में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक उच्च-शुद्धता शोधन और पृथक्करण सुविधाओं का अभाव है।
    • शोधन का जाल: उदाहरण के लिए, हालाँकि KABIL ने अर्जेंटीना में लीथियम ब्लॉक प्राप्त कर लिए हैं, लेकिन राष्ट्रीय जल-धातु प्रौद्योगिकी क्षमता के अभाव के कारण खारे पानी के प्रसंस्करण के लिए अभी भी विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे भारत, विदेशी मूल्य शृंखलाओं पर निर्भर बना हुआ है।
  • असममित भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा
    • शोषणकारी अर्थव्यवस्था: भारत को मुख्य रूप से चीन से एकाधिकारवादी वर्चस्व का सामना करना पड़ता है, जो वैश्विक दुर्लभ-मृदा तत्व शोधन के 90% से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखता है।
    • वित्तपोषण संबंधी बाधाएँ: भारतीय कंपनियाँ राज्य समर्थित वैश्विक दिग्गजों के सामने संघर्ष कर रही हैं, जो “खनिजों के बदले अवसंरचना” के सौदे पेश करते हैं। जांबिया जैसे क्षेत्रों में, प्रतिद्वंद्वी शक्तियों द्वारा अपनाई गई अधिक आक्रामक, समन्वित वित्तीय रणनीति के कारण भारतीय बोलियों को अक्सर अस्वीकार कर दिया जाता है।
  • संसाधन राष्ट्रवाद और व्यापार विखंडन
    • नीतिगत संरक्षणवाद: साझेदार राष्ट्र तेजी से संसाधन राष्ट्रवाद को अपना रहे हैं, जिसमें घरेलू आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
    • मित्र देशों के साथ साझेदारी की चुनौतियाँ: अमेरिकी मुद्रास्फीति निवारण अधिनियम (IRA) जैसे रणनीतिक प्रोत्साहन अक्सर ‘एकाधिकारवादी समूह’ को जन्म देते हैं, जिससे उत्तरी अमेरिकी उत्पादन को बढ़ावा मिलता है तथा अनजाने में वैश्विक हरित प्रौद्योगिकी बाजार में भारतीय निर्यात हाशिए पर चला जाता है।
  • भौगोलिक एवं पर्यावरणीय बाधाएँ
    • कम अन्वेषण तीव्रता: भारत की स्पष्ट भू-वैज्ञानिक क्षमता (OGP) का केवल 10% ही अन्वेषित किया गया है। त्रिविमीय भू-भौतिकीय डेटा की ऐतिहासिक कमी और उच्च जोखिम वाली पूँजी के कारण गहरे भंडार में मौजूद खनिज अभी तक अन्वेषित नहीं हुए हैं।
    • ईएसजी दृष्टिकोण: घरेलू खनन को सख्त वैश्विक ESG (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) मानकों के अनुरूप ढालना कठिन है।
      • नायक्करपट्टी टंगस्टन साइट जैसी परियोजनाएँ विलंब का सामना कर रही हैं क्योंकि भारत आदिवासी अधिकारों (PESA अधिनियम) और जैव विविधता संबंधी चिंताओं को औद्योगिक तात्कालिकता के साथ संतुलित करने का प्रयास कर रहा है।

खनिज सुरक्षा के लिए जापान का आदर्श: चीन से आपूर्ति में आए संकटों का सामना करने के बाद विकसित की गई महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा के लिए व्यवस्थित, दीर्घकालिक और संस्थागत रणनीतियों का जापान एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

आगे की राह

  • एकीकृत, मूल्य-शृंखला उन्मुख साझेदारी विकसित करना: कच्चे अयस्क को सुरक्षित करना अब अंतिम लक्ष्य नहीं है; वास्तविक रणनीतिक लाभ मध्य-प्रक्रिया पर नियंत्रण रखने में निहित है।
    • अपस्ट्रीम (निष्कर्षण): दीर्घकालिक अयस्क निष्कर्षण और इक्विटी हिस्सेदारी के लिए अफ्रीका (जांबिया में ताँबा/कोबाल्ट, नामीबिया में लीथियम), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और लैटिन अमेरिका (लीथियम ट्रायंगल) पर ध्यान केंद्रित करना।
    • मिडस्ट्रीम (शोधन और पृथक्करण): उन्नत खनिज प्रसंस्करण के लिए जापान और पश्चिम एशिया (विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब) के साथ साझेदारी करना।
      • ये क्षेत्र कच्चे अयस्क को उच्च शुद्धता वाले पदार्थों में परिष्कृत करने के लिए पूँजी और औद्योगिक अवसंरचना प्रदान करते हैं।
    • डाउनस्ट्रीम (प्रौद्योगिकी और नवाचार): अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी निर्माण के लिए यूरोपीय संघ और अमेरिका (ट्रस्ट पहल के माध्यम से) के साथ सहयोग करें, जिसमें अगली पीढ़ी की बैटरी रसायन और उच्च दक्षता वाले स्थायी चुंबक शामिल हैं।
    • AI और सिलिकॉन का भविष्य: हालाँकि भारत अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल (दिसंबर 2025 में शुरू हुई) का संस्थापक सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिकी राजदूत द्वारा जनवरी 2026 में दिया गया निमंत्रण एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है।
      • इस गठबंधन में शामिल होने से भारत वैश्विक सिलिकॉन-टू-एआई आपूर्ति शृंखला में एकीकृत हो जाएगा, जिससे खनिज सीधे सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़ जाएँगे।
    • रणनीतिक विविधीकरण: रूस को एक महत्त्वपूर्ण बैक-अप भागीदार के रूप में बनाए रखें, उसके विशाल भंडार और दीर्घकालिक वैज्ञानिक संबंधों का उपयोग करके केंद्रित वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं से हटकर विविधीकरण पर ध्यान केंद्रित करना।
  • सरकारी सहायता और निजी क्षेत्र के लिए जोखिम कम करना: सरकार अब 34,300 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) का उपयोग दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए “स्थिर पूँजी” उपलब्ध कराने के लिए कर रही है।
    • जोखिम साझाकरण: सरकारी गारंटी प्रदान करके, भारत का उद्देश्य अस्थिर विदेशी बाजारों में निजी क्षेत्र के प्रवेश के जोखिम को कम करना है।
    • बाजार स्थिरता: मूल्य-सीमा तंत्र और सुनिश्चित घरेलू खरीद समझौतों को लागू करने से भारतीय रिफाइनर वैश्विक एकाधिकारों द्वारा “अत्यधिक अनुचित मूल्य निर्धारण” से सुरक्षित रहते हैं।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था के ‘तीसरे स्तंभ’ का विस्तार
    • शहरी खनन क्रांति: 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना के साथ, भारत का लक्ष्य 2030 तक प्रतिवर्ष 40,000 टन से अधिक खनिज पुनर्प्राप्त करना है।
    • द्वितीयक आपूर्ति आधार: ई-अपशिष्ट और बैटरी पुनर्चक्रण को औपचारिक रूप देकर, भारत एक मजबूत द्वितीयक खनिज आपूर्ति आधार तैयार कर सकता है, जिससे प्राथमिक खनन की पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक लागत कम हो जाएगी।
  • कूटनीतिक विस्तार और संस्थागत सक्रियता
    • खनिज परिचारक: भारत को विदेश मंत्रालय के अंतर्गत एक समर्पित खनिज कूटनीति प्रभाग स्थापित करना चाहिए और सैंटियागो और पर्थ जैसी खनन राजधानियों में विशेष खनिज परिचारकों को तैनात करना चाहिए, ताकि वे वास्तविक समय में बाजार की अस्थिरता पर नजर रख सकें।
    • रणनीतिक भंडार संचय: रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों की तरह, भारत को घरेलू उद्योगों को अनुचित मूल्य निर्धारण और निर्यात प्रतिबंधों से बचाने के लिए लीथियम और कोबाल्ट के संप्रभु खनिज बफर भंडार बनाने चाहिए।
  • अनुसंधान एवं विकास तथा सामग्री प्रतिस्थापन
    • नवाचार में अभूतपूर्व प्रगति: सोडियम-आयन या जिंक-वायु आधारित रसायन विज्ञान में निवेश से लीथियम पर पूर्ण निर्भरता कम हो सकती है।
    • भविष्य के पेटेंट: उत्कृष्टता केंद्रों को उद्योग से जोड़कर वर्ष 2030 तक 1,000 से अधिक पेटेंट प्राप्त करने से यह सुनिश्चित होगा कि इससे भारत अगली पीढ़ी के खनिज प्रसंस्करण के लिए आवश्यक बौद्धिक संपदा (IP) का स्वामी बनेगा।

निष्कर्ष

भारत की खनिज कूटनीति अब आकस्मिक आयात से हटकर रणनीतिक संसाधन नियोजन की ओर अग्रसर है, जिसके लिए दोहरी रणनीति (घरेलू क्षमताओं का निर्माण करना और साथ ही तत्काल अंतरराष्ट्रीय पहुँच सुनिश्चित करना) अपनाई जा रही है। सफलता केवल हस्ताक्षरित समझौतों पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि परिचालनशील खदानों, प्रसंस्करण क्षमता और सुदृढ़ मूल्य शृंखलाओं पर भी निर्भर करेगी।

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