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पोषण के रूप में आयरन

Lokesh Pal January 17, 2026 01:56 6 0

संदर्भ

भारत में आयरन की कमी (एनीमिया) सबसे बड़ी निरंतर बनी रहने वाली पोषण संबंधी चुनौतियों में से एक है, जो कार्य क्षमता, बच्चों के विकास को बाधित करती है और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर बोझ डालती है।

आयरन (Fe) के बारे में 

  • आयरन एक महत्त्वपूर्ण रासायनिक तत्त्व (फेरम) है और पृथ्वी पर द्रव्यमान के अनुसार प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली धातु है, जो औद्योगिक विकास और जैविक अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
  • गुणधर्म: आयरन एक मजबूत, लचीला और चुंबकीय धातु है, जिसकी विद्युत चालकता उच्च होती है और कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होती हैं, जो इसे रासायनिक अभिक्रियाओं में अत्यधिक उपयोगी बनाती हैं।

उपयोग

  • औद्योगिक उपयोग: आयरन आधुनिक उद्योग की रीढ़ है, जिसका उपयोग निर्माण, परिवहन, मशीनरी और अवसंरचना विकास के लिए इस्पात उत्पादन में किया जाता है।
  • जैविक उपयोग: जीवित जीवों में, आयरन हीमोग्लोबिन और एंजाइम्स का एक प्रमुख घटक है, जो ऑक्सीजन के परिवहन, ऊर्जा चयापचय और कोशिकीय वृद्धि को सक्षम बनाता है।

पोषण के रूप में आयरन का महत्त्व 

  • आयरन ऑक्सीजन के परिवहन, ऊर्जा चयापचय और सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक एक महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्त्व है।
  • यह हीमोग्लोबिन का एक मुख्य घटक है और मानव जीवन के लिए आवश्यक कई कोशिकीय कार्यों में सहायक होता है।
  • एक सामान्य वयस्क पुरुष में 50 मिलीग्राम/किलोग्राम आयरन होता है, जबकि महिलाओं में 40 मिलीग्राम/किलोग्राम।
  • मानव शरीर में आयरन की भूमिका
    • ऑक्सीजन का परिवहन: आयरन हीमोग्लोबिन का एक प्रमुख घटक है, जो लाल रक्त कोशिकाओं को फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन ले जाने में सक्षम बनाता है।
    • ऊर्जा चयापचय: यह कोशिकीय श्वसन और ऊर्जा उत्पादन में शामिल एंजाइमों का समर्थन करता है।
    • वृद्धि और प्रतिरक्षा: कोशिकीय प्रसार, मस्तिष्क विकास और प्रतिरक्षा क्षमता के लिए पर्याप्त आयरन आवश्यक है।

मानव शरीर में अतिरिक्त आयरन और इसका प्रभाव

  • सीमित आयरन उत्सर्जन: शरीर में अतिरिक्त आयरन को बाहर निकालने का कोई सक्रिय तंत्र नहीं होता, जिसके कारण अत्यधिक सेवन या रक्त आधान होने पर यह शरीर में जमा हो जाता है।
  • अंगों में जमाव और क्षति: अतिरिक्त लौह यकृत, हृदय और अंतःस्रावी ग्रंथियों में जमा हो जाता है, जिससे सिरोसिस, कार्डियोमायोपैथी और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
  • आयरन अधिभार के कारण: बार-बार रक्त आधान और आनुवंशिक हीमोक्रोमैटोसिस आयरन अधिभार के प्रमुख कारण हैं।
  • कीलेशन थेरेपी: कीलेशन थेरेपी में ऐसे एजेंटों का उपयोग किया जाता है, जो अतिरिक्त लौह से अभिक्रिया करके स्थिर यौगिक बनाते हैं, जो मुख्य रूप से मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं, जिससे ऊतकों को अपरिवर्तनीय क्षति से बचाया जा सकता है।

न्यूनतम आवश्यकता (विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार)

  • वयस्क पुरुष: लगभग 8-10 मिलीग्राम/दिन।
  • वयस्क महिलाएँ (गर्भवती नहीं): लगभग 18-20 मिलीग्राम/दिन (मासिक धर्म के दौरान रक्तस्राव के कारण अधिक मात्रा)।
  • गर्भवती महिलाएँ: भ्रूण के विकास और रक्त की मात्रा बढ़ाने के लिए लगभग 27 मिलीग्राम/दिन।

आयरन की कमी के कारण

  • पोषण संबंधी: आहार में आयरन की अपर्याप्त मात्रा (दुर्लभ मामलों में मौखिक रूप से लिए गए आयरन का अवशोषण न होना)।
  • रक्तस्राव: मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव वाली महिलाओं में आयरन की कमी हो सकती है।
    • बुजुर्गों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रक्तस्राव भी आयरन की कमी का कारण बन सकता है।
      • बुजुर्ग मरीजों की पेट या बृहदान्त्र के कैंसर की जांच अवश्य कराई जानी चाहिए।

आयरन की कमी का प्रभाव

  • एनीमिया और थकान: एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें रक्त में स्वस्थ हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम होती है।
    • हीमोग्लोबिन की कमी से कमजोरी, साँस फूलना और शारीरिक कार्यक्षमता में कमी आती है।
    • बाल विकास: दीर्घकालिक कमी से विकास में रुकावट, संज्ञानात्मक विकास में बाधा और शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट आती है।
  • आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: जनसंख्या स्तर पर, आयरन की कमी से कार्यबल की दक्षता और आर्थिक उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आती है।

आयरन के स्रोत

  • आहार स्रोत
    • हीम आयरन (बेहतर अवशोषण): मांस, मछली, मुर्गा।
    • नॉन-हीम आयरन: बाजरा, बिना पॉलिश किया चावल, दालें, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दूध और दही (विटामिन सी के साथ अवशोषण बढ़ता है)।
    • कम अवशोषण: आहार से प्राप्त आयरन का केवल एक छोटा-सा अंश (लगभग 10%) ही अवशोषित होता है, इसलिए पर्याप्त मात्रा में सेवन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • अनुपूरक
    • मौखिक आयरन: प्रारंभिक उपचार; कम-से-कम तीन महीने तक लेने पर सस्ता और प्रभावी उपाय।
    • अंतःशिरा आयरन: इसका उपयोग तब किया जाता है, जब मौखिक रूप से आयरन गृहण न किया जा सके या उसका अवशोषण कम हो।

आयरन की कमी को दूर करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप

  • एनीमिया मुक्त भारत (AMB): इसका उद्देश्य आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन, व्यवहार परिवर्तन संचार और परीक्षण-आधारित उपचार के माध्यम से एनीमिया की चुनौती को कम करना है।
    • इसका लक्ष्य बच्चों, किशोरों और प्रजनन आयु (15-49 वर्ष) की महिलाओं में एनीमिया में प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत अंकों की कमी लाना है।
  • पोषण अभियान: इसका उद्देश्य समन्वय, निगरानी और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करना है।
  • राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल (NIPI): यह पहल बच्चों, किशोरों और प्रजनन आयु की महिलाओं को उनकी आयु के अनुसार, आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन प्रदान करती है।

निष्कर्ष

आयरन की कमी चिकित्सीय और विकासात्मक दोनों ही दृष्टि से एक चुनौती है। इससे निपटने के लिए आहार में विविधता लाना, प्रभावी पूरक आहार और सार्वजनिक स्वास्थ्य वितरण प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है।

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