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माधव गाडगिल

Lokesh Pal January 10, 2026 03:04 21 0

संदर्भ

हाल ही में प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल का निधन हो गया, जिन्हें विशेष रूप से पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक संरक्षण के क्षेत्र में उनके गहन योगदान के लिए जाना जाता है।

माधव गाडगिल के बारे में

  • माधव धनंजय गाडगिल एक अग्रणी भारतीय पारिस्थितिकीविद् थे, जिन्हें प्रायः आधुनिक भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र के जनक’ के रूप में जाना जाता है।
  • पर्यावरण विज्ञान, सक्रियता और नीति निर्माण में उनके योगदान ने विशेष रूप से पश्चिमी घाट जैसे जैव-विविधता हॉटस्पॉट में एक अमिट छाप छोड़ी है।

गाडगिल के योगदान

  • पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP): गाडगिल इस पैनल के अध्यक्ष थे, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2011 की गाडगिल रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESAs) के गठन का प्रस्ताव रखा गया और सतत् विकास पर जोर दिया गया।
  • वे वर्ष 2002 के जैव विविधता अधिनियम के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे तथा उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में ‘सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज’ की स्थापना की।
  • शासन दर्शन: गाडगिलबॉटम-अप गवर्नेंस’ के प्रबल समर्थक थे। वे प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी की वकालत करते थे, ताकि संरक्षण प्रयास पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान के अनुरूप हों।

पुरस्कार एवं सम्मान

  • गाडगिल को पद्म भूषण और पर्यावरण उपलब्धि के लिए ‘टायलर पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए।
  • उनकी कृतियाँ, जैसे दिस फिसर्ड लैंड’ (This Fissured Land) और ‘इकोलोजी एंड इक्विटी’ (Ecology and Equity) पारिस्थितिकी के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।

पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) के बारे में 

  • स्थापना: पश्चिमी घाट की पारिस्थितिक संवेदनशीलता, जटिल भौगोलिक संरचना और जलवायु परिवर्तन व अनियंत्रित विकास से बढ़ते खतरों के कारण मार्च 2010 में WGEEP की स्थापना की गई।
  • दायित्व: पैनल को क्षेत्र की पारिस्थितिकी का आकलन करने, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) की सिफारिश करने और सतत् संरक्षण एवं विकास तंत्र के संबंध में अनुशंसा प्रदान करने का कार्य सौंपा गया।
  • गाडगिल पैनल की सिफारिशें
    • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र: पूरे पश्चिमी घाट (1,29,037 वर्ग किमी.) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की गई, जिससे क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को स्वीकार किया गया।
    • त्रि-स्तरीय वर्गीकरण: क्षेत्र को पारिस्थितिक संवेदनशीलता के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया:-
      • ESZ 1: सर्वाधिक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ सख्त प्रतिबंध हों।
      • ESZ 2: मध्यम संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ नियंत्रित विकास की अनुमति हो।
      • ESZ 3: कम संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित विकास संभव हो।
  • विकास पर प्रतिबंध: सिफारिशों में आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों, खनन, नए हिल स्टेशनों और पश्चिमी घाट में नए आर्थिक क्षेत्रों के निर्माण पर प्रतिबंध शामिल थे।
  • पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण (WGEA): पैनल ने घाटों के संवेदनशील क्षेत्रों के प्रबंधन की देखरेख के लिए एक वैधानिक बहु-राज्य निकाय WGEA की स्थापना का प्रस्ताव रखा।

चुनौतियाँ और विवाद

  • गाडगिल रिपोर्ट को स्थानीय उद्योगों, राजनेताओं और कुछ समुदायों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्होंने कड़े प्रतिबंधों को विकास के लिए हानिकारक माना।
  • कस्तूरीरंगन समिति (2013): गाडगिल रिपोर्ट को अस्वीकार किए जाने के बाद, के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में कस्तूरीरंगन पैनल का गठन किया गया।
  • भिन्न सिफारिशें: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने 56,825 वर्ग किमी के छोटे ESA का प्रस्ताव रखा और कुछ गाँवों को ESAs में शामिल किया, जबकि गाडगिल रिपोर्ट ने पूरे क्षेत्र को शामिल करने की सिफारिश की थी।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र वह संरक्षित क्षेत्र होता है जिसे जैव विविधता संरक्षण, सतत् विकास को बढ़ावा देने और अनुसंधान के लिए नामित किया जाता है। ये क्षेत्र यूनेस्को केमैन एंड द बायोस्फियर प्रोग्रामका हिस्सा होते हैं।

नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के बारे में

  • अवस्थिति: यह पश्चिमी घाट की नीलगिरि पर्वतमाला में अवस्थित है और तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में विस्तृत है।
    • कुल क्षेत्रफल: 5,520 वर्ग किमी. क्षेत्र, जो इसे भारत का सबसे बड़ा संरक्षित वन क्षेत्र बनाता है।
  • संरक्षित क्षेत्र: इसमें प्रसिद्ध अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं-
    • मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य
    • वायनाड वन्यजीव अभयारण्य
    • बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान
    • नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान
    • मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान
    • साइलेंट वैली
  • मुख्य क्षेत्र
    • केरल और तमिलनाडु: मुख्यतः सदाबहार, अर्द्ध-सदाबहार, आर्द्र पर्णपाती, पर्वतीय शोला वन और घास के मैदान।
    • कर्नाटक: मुख्यतः शुष्क पर्णपाती वन, जिनमें कहीं-कहीं आर्द्र पर्णपाती, अर्द्ध-सदाबहार और झाड़ीदार वन पाए जाते हैं।
  • वनस्पति
    • 3500 से अधिक पुष्पीय पौधों की प्रजातियाँ, जिनमें से 1500 पश्चिमी घाट के लिए स्थानिक हैं।
    • प्रमुख स्थानिक पौधे: रोडोडेंड्रोन आर्बोरेटम (Rhododendron Arboretum) नीलगिरिकम, एक्टिनोडाफेन मालाबारिका (Actinodaphne Malabarica), गार्सिनिया मोरेला (Garcinia Morella) , मिशेलिया नीलगिरिका (Michelia Nilgirica), गार्सिनिया गुम्मी-गुट्टा (Garcinia Gummi-gutta) आदि।
  • जीव-जंतु: इस आरक्षित क्षेत्र में 100 से अधिक स्तनधारी प्रजातियाँ, 550 पक्षी प्रजातियाँ, 30 सरीसृप एवं उभयचर प्रजातियाँ और 300 तितली प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
    • प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियाँ: बाघ (Panthera Tigris), हाथी (Elephas Maximus), गौर (Bos Gaurus), लायन-टेल मकाक (Macaca Silenus), नीलगिरि तहर, सांभर, जंगली सूअर और बार्किंग डियर (Muntiacus Muntjak)।
  • सांस्कृतिक विरासत: नीलगिरि’ नाम का अर्थ नीला पर्वत’ है, जो पर्वतों को ढकने वाले नीले रंग के फूलों के कारण पड़ा।
    • यह क्षेत्र टोडा, कोटा, इरुला, कुरुम्बा, पनिया, अडियान, एडनादन चेट्टी, चोलानायकेन, अल्लार, मलायन आदि कई आदिवासी समुदायों का क्षेत्र है, जिनकी विशिष्ट परंपराएँ और प्रकृति संरक्षण से जुड़ी जीवन पद्धतियाँ हैं।
  • महत्त्व: यूनेस्को के मैन एंड द बायोस्फियर प्रोग्राम ‘ के तहत नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र को जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया, जो इसके वैश्विक पारिस्थितिक महत्त्व को दर्शाता है।

नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र में गाडगिल की विरासत

  • माधव गाडगिल का कार्य, विशेष रूप से गाडगिल रिपोर्ट के माध्यम से, नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के संरक्ष्ण में मुख्य भूमिका निभाता है।
  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र की उनकी सिफारिशों ने नीलगिरि की जैव विविधता के संरक्षण में मदद की, साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सशक्त किया।
  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) का दर्जा: पूरे पश्चिमी घाट, जिसमें नीलगिरि भी शामिल हैं, को ESA घोषित करने के गाडगिल के प्रस्ताव ने इस क्षेत्र को बड़े पैमाने पर अनियंत्रित विकास से सुरक्षित रखने में योगदान दिया।

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