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भारत में विनिर्माण क्षेत्र

Lokesh Pal December 29, 2025 02:44 798 0

 संदर्भ

20वीं सदी की शुरुआत में चीन और दक्षिण कोरिया जैसी पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के समान परिस्थितियों के बावजूद, भारत का विनिर्माण क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 17% पर ही स्थिर रहा है और आर्थिक वृद्धि एवं रोजगार के प्रमुख इंजन के रूप में उभरने में विफल रहा है।

  • यह कम प्रदर्शन, नीतिगत उद्देश्य की कमी के बजाय गहन संरचनात्मक, संस्थागत और राजनीतिक-आर्थिक बाधाओं को दर्शाता है।

विनिर्माण क्षेत्र

  • विनिर्माण क्षेत्र, अर्थव्यवस्था का वह भाग है, जो श्रम, मशीनों, औजारों और रासायनिक या जैविक प्रक्रियाओं के उपयोग से कच्चे माल को तैयार या अर्द्ध-विकसित माल में परिवर्तित करता है।
  • विनिर्माण क्षेत्र द्वारा मूल्यवर्द्धन का हिस्सा वर्ष 2023-24 में 15.9% है, जबकि वर्ष 2013-14 में यह सकल घरेलू उत्पाद (स्थिर मूल्य पर) का 16.7% था।

भारतीय अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र की भूमिका

  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान: विनिर्माण क्षेत्र वर्तमान में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 17% का योगदान देता है, जो अर्थव्यवस्था में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
    • मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी प्रमुख पहलों के माध्यम से, भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक इस हिस्सेदारी को 25% तक बढ़ाना है।
  • विनिर्माण उत्पादन: भारत के विनिर्माण क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2024-25 में 4.26% की वृद्धि दर दर्ज करके मजबूत लचीलापन प्रदर्शित किया, जो स्थिर औद्योगिक सुधार को दर्शाता है।
    • औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) दर्शाता है कि विनिर्माण क्षेत्र कुल औद्योगिक उत्पादन में लगभग 77% का योगदान देता है, जिसमें बुनियादी धातुएँ, विद्युत उपकरण और मशीनरी आर्थिक वृद्धि के प्रमुख चालक के रूप में उभरे हैं।
  • रोजगार: भारत में विनिर्माण क्षेत्र लगभग 11.4% कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है, जबकि कृषि क्षेत्र लगभग 45% और सेवा क्षेत्र लगभग 29% रोजगार प्रदान करता है।
  • निर्यात प्रदर्शन: वित्त वर्ष 2024-25 के पहले पाँच महीनों के दौरान भारत के विनिर्माण निर्यात में वर्ष-दर-वर्ष 2.52% की वृद्धि हुई और यह 184.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश: भारत ने वर्ष 2014 से वर्ष 2025 के बीच 748.78 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया, जो पिछले दशक की तुलना में 143% की वृद्धि है।
    • वित्त वर्ष 2025 में, कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 81.04 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जबकि विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 18% बढ़कर 19.04 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।

विनिर्माण क्षेत्र में आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले नीतिगत कारक

  • राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (NMM): केंद्रीय बजट 2025-26 में शुरू किया गया राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन, राज्यों एवं मंत्रालयों में नीति, शासन और कार्यान्वयन को एकीकृत करता है।
    • यह भारत की वर्ष 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य प्रतिबद्धता के अनुरूप, सौर पीवी, EV बैटरी, ग्रीन हाइड्रोजन और पवन ऊर्जा सहित सतत् विनिर्माण पर जोर देता है।
  • GST सुधार और लागत दक्षता: सरलीकृत दो-स्लैब संरचना के साथ GST 2.0 की शुरुआत ने अनुपालन लागत को कम किया है और आपूर्ति शृंखला दक्षता को बढ़ाया है।
    • लॉजिस्टिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, MSME-प्रधान वस्तुओं और निर्यात पर कम GST दरों ने सामर्थ्य, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और उत्पादन को बढ़ावा दिया है।
  • उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना: ₹1.97 लाख करोड़ के परिव्यय वाली PLI योजना 14 रणनीतिक क्षेत्रों को कवर करती है और प्रोत्साहनों को उत्पादन और बिक्री में वृद्धि से जोड़ती है।
    • इससे इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र और उन्नत विनिर्माण में पैमाने, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा मिला है।
  • राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (NLP): वर्ष 2022 में शुरू की गई इस नीति का उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना और वर्ष 2030 तक लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन में शीर्ष 25 वैश्विक रैंकिंग हासिल करना है।
    • व्यापक रसद कार्य योजना (CLAP) के माध्यम से, यह डिजिटल एकीकरण, मल्टीमॉडल परिवहन और लॉजिस्टिक्स पार्कों को बढ़ावा देती है।
  • स्टार्टअप इंडिया और औद्योगिक गलियारे: स्टार्ट-अप इंडिया पहल ने भारत को तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम बनने में मदद की है, जिससे 17.69 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं।
  • समर्थ उद्योग भारत 4.0: वर्ष 2017 में शुरू की गई समर्थ उद्योग भारत 4.0 पहल, विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के बीच IoT, रोबोटिक्स और AI जैसी उद्योग 4.0 प्रौद्योगिकियों को अपनाने में सुविधा प्रदान करके स्मार्ट विनिर्माण को बढ़ावा देती है।
  • अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन: भारत सरकार का लक्ष्य पेटेंट नियम 2024 के तहत बौद्धिक संपदा अधिकार सरलीकरण और डिजिटल नवाचार प्लेटफॉर्मों के समर्थन से अनुसंधान एवं विकास पर खर्च को GDP के 2% तक बढ़ाना है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र की गति के प्रमुख कारक

  • इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण 
    • भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन पिछले 11 वर्षों में छह गुना बढ़ गया है, जबकि निर्यात आठ गुना बढ़ गया है, जो इस क्षेत्र में तीव्र परिवर्तन का संकेत देता है।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स में मूल्यवर्द्धन 30% से बढ़कर 70% हो गया है, जिसका लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 तक 90% तक पहुँचना है, जिससे भारत, विश्व स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन विनिर्माता बन गया है।
    • वित्त वर्ष 2020-21 से, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र ने 4 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया है।
  • फार्मास्युटिकल उद्योग नेतृत्व
    • भारत को विश्व की फार्मेसी’ का दर्जा प्राप्त है, जो मात्रा के हिसाब से वैश्विक स्तर पर तीसरे और मूल्य के हिसाब से चौदहवें स्थान पर है।
    • भारत, वैश्विक वैक्सीन की 50% और अमेरिका में जेनेरिक दवाओं की 40% आपूर्ति करता है।
    • इस क्षेत्र के वर्ष 2030 तक 130 अरब अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2047 तक वर्ष 450 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ने का अनुमान है।
  • ऑटोमोटिव उद्योग का विस्तार
    • भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में ऑटोमोबाइल क्षेत्र का योगदान 7.1% और विनिर्माण क्षेत्र के GDP में लगभग 49% है, जो इसके आर्थिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
    • वित्त वर्ष 2024-25 में 3.10 करोड़ वाहनों के उत्पादन के साथ, भारत, वैश्विक स्तर पर चौथा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल उत्पादक बन गया है, जिससे वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में इसकी स्थिति और मजबूत हुई है।
  • वस्त्र और परिधान क्षेत्र की वृद्धि
    • भारत का वस्त्र एवं परिधान उद्योग सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 2.3%, औद्योगिक उत्पादन में 13% और कुल निर्यात में 12% का योगदान देता है, जिससे यह वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े उद्योगों में से एक बन गया है।
    • इस क्षेत्र के वर्ष 2030 तक 350 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ने का अनुमान है और यह कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता बना हुआ है, जिसमें 4.5 करोड़ से अधिक श्रमिक कार्यरत हैं।
    • 4,445 करोड़ रुपये के अनुदान से समर्थित पीएम मित्र पार्कों के माध्यम से सरकार द्वारा दी जा रही सहायता का उद्देश्य उद्योग के विस्तार और प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाना है।
  • संधारणीयता और हरित विनिर्माण
    • नियामकीय दबाव बढ़ने और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों की वैश्विक माँग ने नवीकरणीय ऊर्जा और अपशिष्ट न्यूनीकरण में निवेश को गति दी है।
    • सौर PV मॉड्यूल के लिए भारत सरकार की 24,000 करोड़ रुपये की PLI योजना से 65 गीगावाट क्षमता की वृद्धि होने का अनुमान है, जो भारत के हरित विनिर्माण परिवर्तन में सहायक होगी।
  • कौशल विकास और रोजगार सृजन
    • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसी व्यापक कौशल विकास पहलों के माध्यम से कार्यबल को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आंतरिक सूचना प्रौद्योगिकी और रोबोटिक्स में उद्योग 4.0 की भूमिकाओं के लिए तैयार किया जा रहा है।
    • पिछले एक दशक में, भारत ने 17 करोड़ रोजगार सृजित किए हैं और हाल ही में जारी PLFS आँकड़ों से कार्यबल की भागीदारी, महिलाओं के रोजगार और बेरोजगारी में गिरावट में सुधार दिखाई देता है, जिसमें विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन 6% से बढ़कर 15% हो गया है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र के सामने प्रमुख चुनौतियाँ

  • बुनियादी ढाँचा अंतराल
    • भारत के विनिर्माण क्षेत्र को बुनियादी ढाँचे से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें न केवल सड़कें, बंदरगाह और विद्युत आपूर्ति जैसी भौतिक बुनियादी संरचनाएँ शामिल हैं, बल्कि डिजिटल संरचनाएँ भी शामिल हैं।
    • खराब कनेक्टिविटी और विद्युत की अनियमित आपूर्ति से परिचालन लागत बढ़ती है, उत्पादन बाधित होता है और समग्र दक्षता कम हो जाती है।
  • नियामक जटिलता
    • अनेक स्वीकृतियाँ, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में देरी, भारी अनुपालन बोझ, कठोर श्रम नियम और कठोर पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ लेन-देन की लागत को बढ़ा देती हैं, विशेषकर लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए।
      • उदाहरण के लिए, भारत के विनिर्माण क्षेत्र के MSME को श्रम, पर्यावरण, कर और कॉरपोरेट कानूनों से संबंधित 1,450 से अधिक वार्षिक नियामक अनुपालनों से निपटना पड़ता है, जिससे अनुपालन अत्यंत जटिल और समय लेने वाला हो जाता है।
  • कौशल की कमी
    • भारत के कार्यबल का केवल 4.7% ही औपचारिक कौशल प्रशिक्षण प्राप्त कर चुका है, जबकि दक्षिण कोरिया में यह आँकड़ा 96% है। इसके परिणामस्वरूप उत्पादकता में कमी और उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने में धीमी गति जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
    • यह अंतर मुख्य रूप से व्यावसायिक प्रशिक्षण और शिक्षा प्रणालियों की खामियों के कारण है, जो औद्योगिक आवश्यकताओं के विकास के साथ सामंजस्य नहीं स्थापित कर पाई हैं।
    • सिद्धांत’ पर ‘अभ्यास’ की तुलना में अत्यधिक ध्यान देना
      • भारत में इंजीनियरिंग शिक्षा में व्यावहारिक कौशल और नवाचार की तुलना में अकादमिक प्रदर्शन पर अधिक जोर दिया जाता है।
      • परिणामतः स्नातकों में अक्सर समस्या-समाधान क्षमताओं और वास्तविक औद्योगिक अनुभव की कमी पाई जाती है।
    • पाठ्यक्रम डिजाइन: हालिया नीतिगत सुधारों से पहले तक प्रशिक्षण मानक और पाठ्यक्रम काफी हद तक सरकार द्वारा संचालित थे, जिनमें उद्योगों की भागीदारी सीमित थी।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा और नवाचार घाटा
    • भारतीय निर्माताओं को चीन और वियतनाम जैसे कम लागत वाले उत्पादकों से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है, साथ ही अनुसंधान एवं विकास (R&D) में कम निवेश और आयातित प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता भी इस समस्या को और बढ़ा देती है।
    • वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में भारत का योगदान मात्र 2.8% है, जबकि चीन का योगदान 28.8% है, जो वैश्विक विनिर्माण में भारत की सीमित उपस्थिति को रेखांकित करता है।
  • नई प्रौद्योगिकी को अपनाने में धीमापन
    • भारतीय विनिर्माण कंपनियाँ अक्सर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कम लागत वाले श्रम पर निर्भर रहती हैं, जिससे उत्पादकता बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकियों में निवेश करने का तत्काल दबाव कम हो जाता है।
    • प्रेरित नवाचार का अभाव: उच्च वेतन वाली अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, भारत में पूँजी-गहन या प्रौद्योगिकी-आधारित विनिर्माण की ओर बढ़ने के लिए पर्याप्त वेतन-प्रेरित प्रोत्साहन नहीं मिले हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन की भूमिका
    • सरकारी क्षेत्र में मिलने वाले उच्च वेतन पूरी अर्थव्यवस्था में ऐसे वेतन मानदंड स्थापित करते हैं, जो अक्सर विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर श्रम-प्रधान उद्योगों में, प्राप्त की जा सकने वाली उत्पादकता के स्तर से अधिक होते हैं।
    • सार्वजनिक क्षेत्र के आकर्षक मुआवजे कुशल और अर्द्ध-कुशल श्रमिकों को विनिर्माण नौकरियों से प्रतिकर्षित करते हैं, जिससे औद्योगिक उद्यमों के लिए श्रम की उपलब्धता कम हो जाती है, यह विकृति ‘डच डिजीज’ (Dutch Disease) की घटना के समान है।
  • अन्य
    • लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए वित्त तक पहुँच: किफायती ऋण की सीमित उपलब्धता और अनौपचारिक उधार पर निर्भरता विस्तार तथा आधुनिकीकरण को बाधित करती है।
    • अनुसंधान एवं विकास में निवेश की कमी: भारत अनुसंधान एवं विकास पर सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.65% खर्च करता है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्थाओं (2.5% से अधिक) से काफी कम है।
    • रणनीतिक क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता: भारत पूँजीगत वस्तुओं और पेट्रोकेमिकल मध्यवर्ती पदार्थों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है, लगभग 45% पेट्रोकेमिकल मध्यवर्ती पदार्थ आयात किए जाते हैं।
    • व्यापार बाधाएँ एवं बाजार पहुँच: गैर-टैरिफ बाधाएँ, कार्बन कर और नए टैरिफ उपाय, जैसे कि वर्ष 2025 में भारतीय वस्तुओं पर हाल ही में लगाया गया 50% अमेरिकी डॉलर का टैरिफ, 87 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करते हैं।

डच डिजीज’ की क्रियाविधि

  • डच डिजीज फ्रेमवर्क बताता है कि कैसे अप्रत्याशित आय विभिन्न क्षेत्रों के बीच सापेक्ष कीमतों को विकृत कर सकती है, जिससे व्यापार योग्य उद्योगों की कीमत पर अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों का अत्यधिक मूल्यांकन हो सकता है।
  • भारत के संदर्भ में 
    • भारत में, सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन में निरंतर वृद्धि एक प्रकार के अप्रत्याशित लाभ के रूप में कार्य करती है, जो संसाधन संपन्न अर्थव्यवस्थाओं में देखे जाने वाले प्रभावों के समान है।
    • वेतन-प्रेरित यह आय वृद्धि विनिमय दर में वास्तविक वृद्धि में योगदान करती है, जिससे आयात सस्ता हो जाता है, जबकि निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है।
    • परिणामस्वरूप, घरेलू विनिर्माण के लिए प्रोत्साहन कमजोर हो जाते हैं, जिससे सेवाओं और आयात के पक्ष में औद्योगिक उत्पादन कम हो जाता है।

चीन का विनिर्माण परिवर्तन

  • वर्ष 2023 में वैश्विक विनिर्माण में चीन के विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 28-30% थी, जबकि भारत की हिस्सेदारी केवल 3% थी।

चीन द्वारा अपनाई गई प्रमुख रणनीतियाँ

  • विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ): निर्यात-उन्मुख विनिर्माण को आकर्षित करने के लिए कर प्रोत्साहन, लचीले श्रम कानूनों और सरल नियमों के साथ शेन्जेन जैसे विशेष आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) द्वारा संचालित औद्योगीकरण: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के भारी प्रवाह ने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVCs) में एकीकरण और पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को सक्षम बनाया

दक्षिण कोरिया की विनिर्माण सफलताएँ

अपनाई गई प्रमुख रणनीतियाँ

  • निर्यात-उन्मुख औद्योगीकरण: सरकारी सहायता निर्यात प्रदर्शन से जुड़ी थी, जिससे दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित हुई।
  • चाईबोल-संचालित मॉडल (Chaebol-Driven Model): बड़े औद्योगिक समूहों (सैमसंग, हुंडई) को बढ़ावा देना ताकि वे बड़े पैमाने पर उत्पादन, पूँजी संचय और प्रौद्योगिकी में निपुणता हासिल कर सकें।
  • क्रमबद्ध औद्योगिक नीति: हल्के उद्योगों से भारी और रासायनिक उद्योगों की ओर और फिर उच्च-तकनीकी क्षेत्रों की ओर क्रमिक बदलाव शुरू करना।
  • मानव पूँजी विकास: शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित (STEM) कौशल पर विशेष जोर।

आगे की राह

  • अनुसंधान एवं विकास एवं नवाचार क्षमता को बढ़ाना
    • भारत को नवाचार और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए अनुसंधान एवं विकास व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 0.65% से बढ़ाकर 2% करना होगा।
    • औद्योगिक समूहों में उन्नत प्रयोगशालाओं, उपकरण कक्षों और परीक्षण केंद्रों की स्थापना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • तकनीकी शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण में सुधार
    • भारत को इंजीनियरिंग और ITI के पाठ्यक्रम को उद्योग-उन्मुख बनाकर तकनीकी शिक्षा में सुधार करना होगा, जिसमें कम-से-कम 50% प्रशिक्षण असेंबली लाइनों, टूल रूम और उत्पाद प्रयोगशालाओं के माध्यम से व्यावहारिक प्रशिक्षण पर केंद्रित हो।
    • साथ ही, पूँजीगत वस्तुओं में आयात पर निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता निर्माण के लिए मुख्य इंजीनियरिंग विषयों को मजबूत करना तथा मशीनरी एवं उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है।
  • राज्य-विशिष्ट विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
    • राज्यों को साझा डिजाइन, परीक्षण और प्रमाणन सुविधाओं वाले प्लग-एंड-प्ले’ औद्योगिक पार्क विकसित करने चाहिए, साथ ही साथ इन-हाउस प्रोटोटाइपिंग और अकादमिक-उद्योग सहयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • बुनियादी ढाँचे और रसद संबंधी बाधाओं को कम करना
    • राष्ट्रीय रसद नीति के तहत लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार किया जाना चाहिए, जिसके लिए विद्युत, परिवहन, भंडारण और आपूर्ति शृंखला की मजबूती में लक्षित निवेश किया जाना चाहिए ताकि विनिर्माण लागत को कम किया जा सके।
  • सतत् और हरित विनिर्माण को बढ़ावा देना
    • भारत को हरित इस्पात, हरित सीमेंट, स्क्रैप पुनर्चक्रण और ऊर्जा-कुशल प्रक्रियाओं को अपनाने में तेजी लानी चाहिए, जिससे घरेलू विनिर्माण वैश्विक जलवायु और स्थिरता मानकों के अनुरूप हो सके।
  • लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए ऋण पहुँच का विस्तार
    • विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने के लिए लघु एवं मध्यम उद्यमों और स्टार्ट-अप्स को बेहतर ऋण प्रवाह की आवश्यकता है।
    • विशेष वित्तपोषण योजनाओं और विस्तारित ऋण गारंटी निधि तंत्र के माध्यम से इसे प्राप्त किया जा सकता है।
  • निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना
    • भारत को रसद लागत कम करके, अनुकूल व्यापार समझौतों पर बातचीत करके और वैश्विक मानकों के प्रमाणीकरण का समर्थन करके निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाना चाहिए।
    • जिलों को निर्यात केंद्र बनाने की पहल को जिले-विशिष्ट निर्यात उत्पादों की पहचान करके और डिजाइन, पैकेजिंग, विपणन तथा प्रमाणीकरण सहायता प्रदान करके शीघ्रता से लागू किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत के विनिर्माण क्षेत्र का खराब प्रदर्शन मूलतः चक्रीय के बजाय संरचनात्मक है। बुनियादी ढाँचे की कमियाँ, नियामक जटिलताएँ, श्रम की अनौपचारिकता और कमजोर नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र इसके कारण हैं। हालाँकि हालिया सुधार एक रणनीतिक बदलाव का संकेत देते हैं, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में निरंतर परिवर्तन के लिए केवल प्रोत्साहन-आधारित विस्तार के बजाय गहन संस्थागत सुधार, कौशल-प्रधान विकास, नवाचार-आधारित उन्नयन और मजबूत वैश्विक मूल्य शृंखला एकीकरण की आवश्यकता होगी।

अभ्यास प्रश्न स्वतंत्रता के बाद से भारत के विनिर्माण क्षेत्र के प्रदर्शन को आकार देने में नीतिगत उद्देश्य बनाम संरचनात्मक चुनौतियों की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।