100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

विकसित भारत 2047 के लिए नेट जीरो कृषि

Lokesh Pal February 14, 2026 03:13 4 0

संदर्भ

हाल ही में नीति आयोग ने विकसित भारत 2047 और नेट जीरो 2070 को प्राप्त करने के माध्यमों को रेखांकित करने वाली रिपोर्ट जारी कीं। इस कृषि अध्ययन में यह उल्लेख किया गया है कि जहाँ कृषि अपशिष्ट उत्सर्जन अधिक है, वहीं सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र भी है, जो मानव-केंद्रित परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

रिपोर्ट के बारे में

  • तैयारी एवं दायरा: 10 अंतर-मंत्रालयी कार्य समूहों द्वारा 18 महीनों में तैयार की गई यह रिपोर्ट, दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन मार्गों का भारत का पहला सरकार-प्रेरित, बहु-क्षेत्रीय मूल्यांकन है।
  • कार्यप्रणाली: इसमें विश्लेषणात्मक मॉडलिंग का उपयोग किया गया है, ताकि यह परखा जा सके कि ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ, मौजूदा नीतियाँ और अतिरिक्त उपाय—जैसे तीव्र विद्युतीकरण और चक्रीय अर्थव्यवस्था पद्धतियाँ आर्थिक वृद्धि को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ कैसे संतुलित कर सकती हैं।
  • परिणाम: यह विकास-प्रथम” किंतु न्यायसंगत और संतुलित परिवर्तन पर बल देती है तथा यह संकेत करती है कि विभिन्न जलवायु परिदृश्यों में भीविकसित भारत 2047’ प्राप्त किया जा सकता है।

PWOnlyIAS विशेष

कृषि की परिभाषा

  • खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, कृषि “मृदा को जोतने, फसलों का उत्पादन करने और पशुपालन करने का विज्ञान, कला और अभ्यास है।”
  • यह कृषि से संबंधित विशिष्ट गतिविधियों, जैसे-फसल उगाना और पशुपालन करना, पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।

वित्तीय एवं प्रशासनिक ढाँचा (वित्तीय वर्ष 2025-26)

  • वित्तीय आवंटन: सरकार ने पर्याप्त धनराशि आवंटित की है, जिसमें ग्रामीण विकास मंत्रालय के लिए 1,90,405.53 करोड़ रुपये तथा कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए 1,37,756.55 करोड़ रुपये शामिल हैं। यह कुल राष्ट्रीय बजट का 2.71% है।
  • केंद्र–राज्य समन्वय: हालाँकि कृषि राज्य का विषय है, फिर भी केंद्र सरकार उभरती क्षेत्रीय चुनौतियों के अनुरूप समय-समय पर समीक्षा की जाने वाली प्राथमिकताओं के माध्यम से राज्यों के प्रयासों को सहयोग देती है।
  • आधुनिकीकरण के स्तंभ: वर्तमान नीति जोखिम न्यूनीकरण (फसल बीमा के माध्यम से), डिजिटल कृषि, और ज्ञान सशक्तीकरण (विस्तार सेवाओं के माध्यम से) पर केंद्रित है, ताकि बाजार तक पहुँच सुधरे और खेती की कुल लागत कम हो।

रिपोर्ट की प्रमुख विशेषताएँ

  • मुख्य रणनीतिक दृष्टिकोण
    • अनुकूलन-प्रथम ढाँचा: यह रिपोर्ट अनुकूलन-प्रथम मार्गों को प्राथमिकता देती है, जो सबसे पहले किसानों की आजीविका, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा लचीलापन सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसमें जलवायु शमन को मुख्य कारक के स्थान पर एक महत्त्वपूर्ण सह-लाभ माना गया है।
    • हरित क्रांति से आगे संक्रमण: यह हरित क्रांति मॉडल से हटकर एक नए प्रतिमान का समर्थन करती है, जो केवल अनाज आत्मनिर्भरता पर केंद्रित था और अब उत्पादकता, सतत् प्राकृतिक संसाधन उपयोग तथा जलवायु अनुकूलन के संतुलन पर बल देता है।

  • मॉडलिंग परिदृश्य: रिपोर्ट भविष्य के परिणामों का अनुमान लगाने हेतु दो प्रमुख हितधारक-आधारित परिदृश्यों का विश्लेषण करती है:
    • वर्तमान नीति परिदृश्य (CPS): यह परिदृश्य मौजूदा सरकारी कृषि नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन को उनके वर्तमान लक्षित स्तरों पर मानकर चलता है।
    • नेट जीरो परिदृश्य (NZS): यह एक परिवर्तनकारी मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें मौजूदा और नई दोनों नीतियों को तीव्रता से अपनाकर संसाधन दक्षता, कृषि उत्पादकता और जलवायु अनुकूलन में वृद्धि होती है।

  • प्रमुख शमन हस्तक्षेप: NZS के अंतर्गत नौ प्रमुख हस्तक्षेपों का रणनीतिक विस्तार, CPS की तुलना में वर्ष 2070 तक लगभग 26% गैर-ऊर्जा आधारित शमन सह-लाभ प्रदान कर सकता है।
    • फसल विविधीकरण: धान, गेहूँ और गन्ने जैसी अधिक जल-खपत वाली फसलों से क्षेत्रफल को हटाकर (वर्ष 2070 तक 20% तक) दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों की ओर स्थानांतरण को प्रोत्साहित करना।
    • प्राकृतिक एवं रसायन-मुक्त कृषि: वर्ष 2070 तक कुल बोए गए क्षेत्र का 25% कृषि-पारिस्थितिकी पद्धतियों के अंतर्गत लाने का लक्ष्य, जिसमें कृत्रिम रसायनों के स्थान पर जैव-आधारित विकल्पों का प्रयोग किया जाए।
    • निरंतर धान की कृषि: धान की प्रत्यक्ष बुवाई और धान सघनता प्रणाली जैसी पद्धतियों का विस्तार, जिससे धान के खेतों से मेथेन उत्सर्जन में 59% तक कमी लाई जा सके।
    • उर्वरक उपयोग दक्षता: नीम-लेपित यूरिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परिशुद्ध कृषि जैसी तकनीकों के माध्यम से वर्ष 2070 तक पोषक तत्त्व अवशोषण में 50% तक की वृद्धि करना।
    • पशुधन उत्पादकता: दुधारू गोवंश की उत्पादकता को 15 किलोग्राम प्रति पशु प्रतिदिन तक बढ़ाना तथा बेहतर पशु स्वास्थ्य और पोषण के माध्यम से दुधारू पशुओं की हिस्सेदारी को 55% तक बढ़ाना।
  • ऊर्जा संक्रमण की प्रमुख विशेषताएँ
    • दक्षता-प्रथम रणनीति: यह रिपोर्ट संसाधन-कुशल पद्धतियों जैसे सूक्ष्म सिंचाई और सटीक समय-सारिणी को प्राथमिकता देने पर बल देती है, ताकि कुल ऊर्जा माँग में हो रही वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके।
    • स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना: सिंचाई में उपयोग होने वाले ईंधन मिश्रण में बड़े परिवर्तन का प्रस्ताव किया गया है, जिसमें वर्ष 2070 तक NZS के अंतर्गत 60% सौर पंप हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा गया है, तथा भूमि तैयारी को लगभग 99% विद्युत यंत्रीकरण की ओर स्थानांतरित करने का लक्ष्य है।
  • रणनीतिक सिफारिशें
    • कृषि-खाद्य प्रणाली दृष्टिकोण: यह रिपोर्ट आपूर्ति-पक्षीय उपायों से आगे बढ़कर माँग-पक्षीय परिवर्तनों को शामिल करने का सुझाव देती है, जैसे- सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मोटे अनाजों को शामिल करना, ताकि बाजार की माँग को प्रोत्साहित किया जा सके और फसल पैटर्न में बदलाव के लिए प्रेरणा मिले।
    • नीतिगत एकीकरण: यह भूमि, ऊर्जा और जल प्रणालियों में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है, ताकि समझौतों का प्रबंधन किया जा सके, जैसे- संसाधन क्षय को रोकने के लिए सौर सिंचाई को भूजल शासन से जोड़ना।
    • चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था: बाह्य-स्थल प्रबंधन और विविधीकृत कृषि आय स्रोतों के माध्यम से वर्ष 2070 तक कृषि अपशिष्ट दहन में 60% की कमी लाने के प्रयासों का विस्तार करेगा।

प्रशासन संबंधी समन्वय – सोलराइजेशन और भूजल के बीच संतुलन

नीति आयोग 2026 रिपोर्ट की एक प्रमुख सिफारिशअप्रतिबंधित संसाधन पहुँच” से विनियमित संसाधन प्रबंधन की ओर संक्रमण है।

  • कुसुम विरोधाभास-ऊर्जा बनाम जल: प्रधानमंत्री-कुसुम योजना कृषि क्षेत्र के डीकार्बनाइजेशन के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती भी प्रस्तुत करती है।
    • असीमित पंपिंग” का जोखिम: किसानों कोमुफ्त” या अत्यधिक सब्सिडी वाली सौर ऊर्जा उपलब्ध कराने से पानी पंप करने की सीमांत लागत लगभग शून्य हो जाती है।
      • कठोर भूजल प्रशासन के अभाव में, इससे जलभृतों का अत्यधिक दोहन हो सकता है, क्योंकि अब न तो अधिक बिजली बिल आता है और न ही सीमित बिजली आपूर्ति का समय, जो प्राकृतिक बाधा का कार्य करता था।
    • नीतिगत समझौता: नीति आयोग चेतावनी देता है कि सोलराइजेशन अनभिज्ञता से जल-भूवैज्ञानिक क्षरण का कारण नहीं बनना चाहिए।
  • नेट जीरो के लिए रणनीतिक सुरक्षा उपाय: इस जोखिम को कम करने हेतु निम्नलिखित प्रशासनिक हस्तक्षेप प्रस्तावित किए गए हैं:
    • अनिवार्य स्मार्ट मीटरिंग: सभी सौर पंपों पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम स्मार्ट मीटरों को लागू करना, ताकि वास्तविक समय में जल निष्कर्षण की निगरानी की जा सके।
      • इससेऊर्जा लेखांकन” संभव होता है, जहाँ अतिरिक्त बिजली को तभी ग्रिड द्वारा खरीदा जाएगा, जब जल निष्कर्षण सतत् सीमा के भीतर रहेगा।
    • फीडर पृथक्करण: ‘फीडर-स्तरीय सोलराइजेशन’ दृष्टिकोण को लागू करना, जिससे बिजली उपलब्धता की अवधि पर केंद्रीकृत नियंत्रण संभव हो और यह वास्तविक फसल जल आवश्यकताओं के अनुरूप रहे।
    • जल बचत” को प्रोत्साहन: बचाए गए जल को वित्तीय संपत्ति के रूप में मानना। जो किसान सूक्ष्म सिंचाई का उपयोग करके अपनी जल कोटा” सीमा से कम जल का उपयोग करते हैं, उन्हें ग्रिड को बेची गई अतिरिक्त सौर ऊर्जा पर अधिक फीड-इन-टैरिफ’ प्राप्त हो सकता है।

नेट जीरो क्या है?

  • अर्थ: ‘नेट जीरो’ का अर्थ जलवायु तटस्थता की वह स्थिति है, जहाँ मानव गतिविधियों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा वायुमंडल से हटाई गई मात्रा के बराबर होती है।
    • यह शून्य उत्सर्जन” नहीं है (जिसका अर्थ बिल्कुल भी प्रदूषण न होना है), बल्कि एक नेट-जीरो’ स्थिति है।
    • इसे एक वित्तीय लेखा-बही की तरह समझें, आपका व्यय (कार्बन उत्सर्जन) आपकी आय’ (कार्बन आउटपुट) से अधिक नहीं होना चाहिए।
    • वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए, विश्व को वर्ष 2050 तक यह संतुलन प्राप्त करना होगा।

  • कृषि में, नेट जीरो का अर्थ धान, पशुधन, उर्वरकों और ऊर्जा उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को कम करना तथा मृदा और जैव-भार में कार्बन भंडारण को बढ़ाना है।
  • नेट जीरो’ के छह स्तंभ
    • नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण: ‘नेट जीरो’ की आधारशिला विद्युत क्षेत्र का पूर्ण रूपांतरण है।
      • इसके लिए जीवाश्म ईंधन दहन कोजीरो कार्बन स्रोतों’ मुख्यतः सौर, पवन और परमाणु द्वारा प्रतिस्थापित करना आवश्यक है, ताकि उपयोग की जाने वाली बिजली से नया कार्बन वायुमंडल में निष्कासित न हो।
    • अवसंरचना का विद्युतीकरण: जब ग्रिड स्वच्छ हो जाए, तब सभी संभावित मशीनों को उस पर संचालित करना आवश्यक है।
      • इसमें परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल और भवनों के लिए हीट पंप शामिल हैं, जिससे हमारा दैनिक जीवन नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड से जुड़ जाता है।
    • औद्योगिक नवाचार: इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे कुछ क्षेत्र ऐसी प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं जिन्हें सीधे विद्युत-आधारित प्रणालियों से संचालित करना सरल नहीं है।
      • इन्हें हरित हाइड्रोजन और वैकल्पिक ईंधनों की आवश्यकता होती है, ताकि उच्च ताप निर्माण के दौरान होने वालेप्रक्रिया उत्सर्जन” को समाप्त किया जा सके।
    • कार्बन हटाने की प्रौद्योगिकियाँ: जिन उत्सर्जनों को समाप्त नहीं किया जा सकता, उन्हें संतुलित करने के लिए नकारात्मक उत्सर्जन तकनीकों का उपयोग आवश्यक है।
      • इसमें प्रत्यक्ष वायु अवशोषण (DAC) और स्रोत पर कार्बन प्रग्रहण एवं भंडारण (CCS) शामिल हैं।
    • प्रकृति-आधारित कार्बन संचयन: यह स्तंभ पृथ्वी की प्राकृतिक कार्बन भंडारण क्षमता का उपयोग करता है।
      • इसमें बड़े पैमाने पर वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण तथा आर्द्रभूमि और पीटलैंड की पुनर्स्थापना शामिल है, जो अत्यधिक प्रभावी जैविक कार्बन स्पंज के रूप में कार्य करते हैं।
    • संचालन दक्षता एवं कमी: ‘नेट जीरो’ की सबसे प्रत्यक्ष राह कुल ऊर्जा माँग को कम करना है।
      • इसमें चक्रीय अर्थव्यवस्था पद्धतियाँ तथा भवनों में ऊर्जा दक्षता उन्नयन शामिल हैं, ताकि उत्पादित स्वच्छ ऊर्जा की बर्बादी न हो।

भारत में कृषि परिदृश्य

  • जीविका का आधार: कृषि देश की प्रमुख आर्थिक गतिविधि बनी हुई है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 66% भारतीय जनसंख्या का समर्थन करती है तथा भोजन, रेशा और औद्योगिक कच्चे माल का मूल उत्पादक है।
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ भारत की राष्ट्रीय आय में लगभग पाँचवें हिस्से का योगदान देती हैं तथा लगभग 46.1% कार्यबल को रोजगार प्रदान करती हैं, जो समावेशी और संतुलित आर्थिक विकास में इस क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
    • पिछले पाँच वर्षों में, कृषि और संबद्ध क्षेत्र ने स्थिर मूल्यों पर लगभग 4.4% की औसत वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है, जो पूर्व अवधियों की तुलना में सर्वाधिक दशकीय वृद्धि है।
    • बागवानी का प्रदर्शन
      • बागवानी क्षेत्र एक उल्लेखनीय क्षेत्र के रूप में उभरा है, जो कृषि सकल मूल्य वर्द्धन का लगभग एक-तिहाई योगदान देता है और मात्रा के हिसाब से खाद्यान्न उत्पादन से आगे निकल चुका है।
      • वैश्विक स्थिति 
        • भारत सूखी प्याज का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है।
        • फल, सब्जियों और आलू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो उच्च-मूल्य फसलों की ओर विविधीकरण को दर्शाता है।
  • कला और विज्ञान का उच्च-तकनीकी संगम: वर्ष 2026 तक, भारतीय कृषि पारंपरिक मृदा आधारित खेती से आगे बढ़कर एक परिष्कृत ‘कला और विज्ञान’ बन चुकी है, जो उच्च-उपज उत्पादकता को आक्रामक पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के साथ संतुलित करती है।
  • उद्यमिता की ओर विकास: आत्मनिर्भर कृषि से वाणिज्यिक कृषि की ओर एक स्पष्ट संरचनात्मक परिवर्तन दिखाई देता है, जहाँ चाय (असम), कॉफी (कर्नाटक) और नारियल (केरल) जैसी फसलों को उच्च-मूल्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत किया गया है।

वित्तीय वर्ष 2025–26 के कृषि परिदृश्य की प्रमुख विशेषताएँ

  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: एग्रीस्टैक और भारत-विस्तार AI परामर्श के शुभारंभ ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है, जिससे 8.48 करोड़ से अधिक किसानों को ऋण तक सहज पहुँच और स्थानीय फसल परामर्श के लिए विशिष्ट डिजिटल पहचान प्रदान की गई है।
  • यंत्रीकरण और परिशुद्ध कृषि: भारत 47% यंत्रीकरण स्तर तक पहुँच चुका है और विश्व का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार है, हालाँकि वर्तमान ध्यान नमो ड्रोन दीदी” पहल के अंतर्गत ड्रोन जैसे उपकरणों की ओर स्थानांतरित हो गया है।
  • जैविक नेतृत्व की ओर संक्रमण: सिक्किम वैश्विक स्तर पर पहले 100% जैविक राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त बना हुआ है, जबकि उत्तराखंड जैसे राज्य प्रीमियम जैविक बाजार को प्राप्त करने के लिए समान ढाँचों को तेजी से अपना रहे हैं।
  • ऊर्जा खपत और संक्रमण: कृषि भारत की कुल बिजली का लगभग 18% उपभोग करती है, जिससे कुसुम योजना के माध्यम से कार्बन-प्रधान ऊर्जा को सौर-संचालित सिंचाई पंपों से परिवर्तित करने  का एक बड़ा अवसर उत्पन्न होता है।

उत्सर्जन प्रवृत्ति और “द्वि-दशीय” जलवायु संबंध

  • ग्रीनहाउस गैस योगदान: यह क्षेत्र वर्तमान में भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 13–15% योगदान करता है, जो मुख्य रूप से पशुधन और धान की कृषि से उत्सर्जित मेथेन तथा उर्वरकों के उपयोग से उत्पन्न नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) के कारण है।

  • संवेदनशीलता का एक विशिष्ट विरोधाभास: औद्योगिक क्षेत्रों के विपरीत कृषि, विशिष्ट रूप सेद्वि-दिशीय” है, क्योंकि यह उन उत्सर्जनों से गंभीर रूप से प्रभावित होती है, जिनके उत्पादन में यह स्वयं योगदान देती है और अब भारत के 40% जिलों को “उच्च जलवायु जोखिम” क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • पशुधन और मेथेन की चुनौतियाँ: विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक होने के माध्यम से (वैश्विक उत्पादन में 25% योगदान), भारत को आँत्र किण्वन के प्रबंधन में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है और यदि शमन रणनीतियों को तीव्र नहीं किया गया, तो पशुधन उत्सर्जन के बढ़ने की संभावना है।

कृषि क्षेत्र का महत्त्व 

यह क्षेत्र केवल कैलोरी का प्रदाता होने से आगे बढ़कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का “आधार स्तंभ” और वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख स्तंभ बन चुका है।

  • आर्थिक और आजीविका स्तंभ: यह भारत के सकल मूल्य वर्द्धन का 18–20% योगदान देता है और 46.1% कार्यबल के लिए प्रमुख नियोक्ता बना हुआ है। यह वैश्विक औद्योगिक अनिश्चितता के दौरान एक महत्त्वपूर्ण “आघात अवशोषक” के रूप में कार्य करता है।

  • उत्पादन नेतृत्व: भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है (वैश्विक उत्पादन का 25%) तथा दलहन, मसालों और मोटे अनाजों के उत्पादन में अग्रणी है।
  • स्वच्छ ऊर्जा योगदानकर्ता: कृषि अब जैव-ईंधन के लिए एक प्रमुख कच्चा माल प्रदाता बन चुकी है, जो राष्ट्रीय एथेनॉल मिश्रण लक्ष्यों को प्राप्त करने और कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए आवश्यक है।
  • रणनीतिक वैश्विक प्रभाव: घरेलू खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर, भारत समुद्री उत्पादों, चाय और जैविक उत्पादों के एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है, और कृषि कोसॉफ्ट पॉवर’ के एक उपकरण के रूप में उपयोग कर रहा है।
  • शमन क्षमता: रणनीतिक नीतिगत विस्तार से वर्ष 2070 तक लगभग 25% जलवायु शमन सह-लाभ प्राप्त होने का अनुमान है, साथ ही राष्ट्रीय उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

कृषि से संबंधित भारत सरकार की महत्त्वपूर्ण पहलें

  • ई-नाम- राष्ट्रीय कृषि बाजार (eNAM): यह एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जो मौजूदा APMCs मंडियों को जोड़कर कृषि उत्पादों के लिए एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करता है।
  • राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (NMSA): इसे विशेष रूप से वर्षा-आधारित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है, जिसमें एकीकृत कृषि, जल उपयोग दक्षता, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा संसाधन संरक्षण के समन्वय पर ध्यान दिया गया है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इसेहर खेत को पानी’ के माध्यम से सिंचाई कवरेज बढ़ाने और प्रति बूँद अधिक फसल’ के माध्यम से जल उपयोग दक्षता में सुधार के उद्देश्य से तैयार किया गया है, जिसमें स्रोत निर्माण, वितरण, प्रबंधन, क्षेत्रीय उपयोग और विस्तार गतिविधियों का समग्र समाधान शामिल है।
  • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): इसे वर्ष 2015 में शुरू किया गया था। यह केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (NMSA) की मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (SHM) योजना का एक विस्तारित घटक है।
    • PKVY का उद्देश्य जैविक खेती को समर्थन और बढ़ावा देना है, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): यह सरकार द्वारा प्रायोजित एक फसल बीमा योजना है, जो कई हितधारकों को एक ही मंच पर एकीकृत करती है।
  • सूक्ष्म सिंचाई कोष (MIF): सरकार ने कृषि उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से अधिक भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाने के लिए नाबार्ड के अंतर्गत ₹5,000 करोड़ का एक समर्पित कोष स्वीकृत किया है।
  • डिजिटल कृषि: इसका उद्देश्य कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGPA) को सुदृढ़ करना है, जिसके तहत कृषि के लिए एक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना विकसित की जाएगी, ताकि प्रासंगिक सूचना सेवाओं के माध्यम से समावेशी और किसान-केंद्रित समाधान उपलब्ध कराए जा सकें।
  • नई कृषि निर्यात नीति: इसका उद्देश्य वर्तमान लगभग 30 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक कृषि निर्यात को वर्ष 2022 तक लगभग 60 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक तक दोगुना करना और इसके बाद आने वाले वर्षों में इसे 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना है, एक स्थिर व्यापार नीति व्यवस्था के साथ।
    • निर्यात बास्केट और गंतव्यों में विविधता लाने तथा उच्च-मूल्य और मूल्यवर्द्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया गया है, विशेषकर शीघ्र नष्ट होने वाले उत्पादों पर।

प्रमुख चुनौतियाँ और प्रणालीगत बाधाएँ

वर्तमान में यह क्षेत्र विखंडित संरचनात्मक समस्याओं का सामना कर रहा है, जहाँ व्यक्तिगत समस्याएँ छोटी होती हैं, लेकिन उनका सामूहिक प्रभाव राष्ट्रीय विकास के लिए बड़े अवरोध उत्पन्न करता है।

  • जलवायु संवेदनशीलता और जल तनाव
    • उच्च-जोखिम जिले: लगभग 40% भारतीय जिले उच्च जलवायु जोखिम का सामना कर रहे हैं, जबकि 65% कृषि भूमि अभी भी वर्षा पर निर्भर है और अनियमित मानसून के प्रति संवेदनशील है।
    • आभासी जल निर्यात: भारत वर्तमान में प्रतिवर्ष 20 मिलियन टन (mt) जल-गहन चावल का निर्यात करता है। यह प्रभावी रूप से जल-संकटग्रस्त देश से अरबों लीटर भूजल का “निर्यात” है, जिससे दीर्घकालिक जल के भू-वैज्ञानिक क्षरण का खतरा बढ़ता है।

  • भूमि विखंडन और कृषि योग्य भूमि में कमी
    • शहरी अतिक्रमण: औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण कुल कृषि योग्य भूमि 180 मिलियन हेक्टेयर (mha) से घटकर 176 मिलियन हेक्टेयर (mha) हो गई है।
    • घटता प्रतिफल: औसत भूमि जोत घटकर 0.6–1.08 हेक्टेयर (ha) रह गई है। यह विखंडन पैमाने की अर्थव्यवस्था को रोकता है, जिससे भारी मशीनरी या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को अपनाना छोटे किसानों के लिए आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो जाता है।
  • उपज और उत्पादकता में अंतर
    • अधोउपयोगित परिसंपत्तियाँ: वैश्विक मानकों की तुलना में लगभग 66% उपज अंतर बना हुआ है। मानसून के बाद लगभग 12 मिलियन हेक्टेयर परती भूमि उपलब्ध होने के बावजूद, भारत दालों और तिलहनों की घरेलू मांग पूरी करने के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर बना हुआ है।
    • विशिष्ट अंतर: तिलहनों (18–40%) और दालों (31–37%) में उपज का अंतर अब भी अनसुलझा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) में अल्प-निवेश
    • वित्तीय कमी: कृषि अनुसंधान एवं विकास में केवल ₹11,600 करोड़ (कृषि-GDP का 0.5%) का निवेश किया गया है।
    • इसके विपरीत, विकसित देश आमतौर पर 1.5% से 3% तक व्यय करते हैं, जिससे वे जैव-प्रौद्योगिकी और जलवायु-सहनशील बीजों पर व्यय के मामले में अग्रणी बने रहते हैं।
  • पोस्ट हार्वेस्ट’ हानि और बाजार अक्षमता
    • मूल्य ह्रास: अपर्याप्त कोल्ड चेन और खेत से थाली तक” शृंखला संबंधी लॉजिस्टिक्स के कारण प्रतिवर्ष ₹92,000 करोड़ से अधिक का नुकसान होता है, विशेषकर फलों और सब्जियों में।
    • पोषण परिवर्तन: जबकि उपभोक्ता माँग डेयरी, पोल्ट्री और बागवानी जैसे उच्च-मूल्य उत्पादों की ओर बढ़ रही है, नीतिगत ढाँचे अभी भी मुख्यतः अनाज पर केंद्रित हैं।

वैश्विक कार्रवाई और रणनीतिक पहलें

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोगी ढाँचे: भारत सतत् और लचीली खाद्य प्रणालियों के मानक तय करने हेतु वैश्विक मंचों का उपयोग करता है।
    • G20 कृषि कार्य समूह (AWG): भारत की अध्यक्षता के तहतएक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” विषय पर कार्यवाही, तथा खाद्य सुरक्षा एवं पोषण पर दक्कन उच्च-स्तरीय सिद्धांतों’ को बढ़ावा देना।
      • इसमें वर्ष 2030 तक खाद्य हानि और अपशिष्ट को 50% तक कम करने की वैश्विक प्रतिबद्धता शामिल है।
    • COP30 और बेलेम घोषणा:  कृषि को जलवायु एजेंडा के केंद्र में लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों के साथ रणनीतिक समन्वय।
      • इसमें वहनीय वित्त को मापनीय परिणामों से जोड़ना शामिल है, जैसे बहाल की गई भूमि के हेक्टेयर या संग्रहीत कार्बन की मात्रा।
    • क्वाड की कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ‘एंगेज’ पहल: भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के बीच एक साझेदारी (अगली पीढ़ी की कृषि को सशक्त बनाने हेतु नवाचारों को आगे बढ़ाना), जो इंडो पैसिफिक क्षेत्र में वास्तविक समय में फसल रोग पहचान और कीट प्रबंधन के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करती है।
  • वैश्विक प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान एवं विकास साझेदारियाँ: 11,600 करोड़ रुपये के अनुसंधान एवं विकास अंतराल को पाटने के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग की आवश्यकता है।
    • अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पर परामर्शदात्री समूह (CGIAR): भारत इस नेटवर्क (जिसमें अंतरराष्ट्रीय अर्द्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान तथा अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान शामिल हैं) के साथ जैव-संवर्द्धित और जलवायु-सहिष्णु बीज विकसित करने के लिए साझेदारी करता है।
      • उदाहरण के लिए, वर्ष 2024 में 109 जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों का शुभारंभ ऐसे वैश्विक–स्थानीय अनुसंधान सहयोग का प्रत्यक्ष परिणाम था।
    • कृषि नवाचार मिशन: एक वैश्विक पहल, जिसका उद्देश्य 10 करोड़ किसानों तक डिजिटल जलवायु परामर्श सेवाएँ पहुँचाना है।
      • भारत अफ्रीका और एशिया के अन्य विकासशील देशों के साथ अपने कृषि-स्टैक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल साझा करके योगदान देता है।
    • एक देश एक प्राथमिक उत्पाद (OCOP): खाद्य और कृषि संगठन द्वारा संचालित एक कार्यक्रम, जो भारत को वैश्विक बाजारों में विशिष्ट भौगोलिक पहचान वाले विशेष कृषि उत्पादों (जैसे सहजन या मोटे अनाज) को बढ़ावा देने में सहायता करता है।
  • स्थिरता एवं संसाधन संरक्षण: अंतरराष्ट्रीय पहलें वैश्विक साझा संसाधनों, मृदा, जल और वायु के पुनर्स्थापन पर केंद्रित हैं।
    • भुखमरी और गरीबी के विरुद्ध वैश्विक गठबंधन: G-20 में प्रारंभ किया गया यह मंच विश्वभर में 10 करोड़ लघु किसानों का समर्थन करता है।
      • भारत अपने लखपति दीदी’ मॉडल के माध्यम से योगदान देता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं को आत्मनिर्भर उद्यमी बनने के लिए सशक्त बनाता है।
    • विश्व बैंक की जलवायु-स्मार्ट कृषि: भारत जलवायु-स्मार्ट कृषि निवेश योजनाओं का उपयोग उन प्रथाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए करता है, जो एक साथ उत्पादकता बढ़ाती हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करती हैं, विशेषकर धान और पशुपालन में।
    • वेस्ट टू वेल्थ” आधारित चक्रीय अर्थव्यवस्था: जैव-उर्वरक उत्पादन में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ बायोगैस स्लरी’ और फसल अवशेषों (जैसे धान का पुआल) को संसाधनों में बदलने का लक्ष्य रखती हैं, जिससे पराली जलाने जैसे पर्यावरणीय खतरों को नियंत्रित किया जा सके।

आगे की राह 

विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, कृषि क्षेत्र को “उत्पादन-केंद्रित” मॉडल से सतत् आय-केंद्रित” पारिस्थितिकी तंत्र की ओर स्थानांतरित होना होगा। इसके लिए इनपुट सब्सिडी से हटकर दीर्घकालिक निवेश-आधारित अवसंरचना की ओर एक मौलिक परिवर्तन आवश्यक है।

  • विविधीकरण एवं संसाधन संरक्षण
    • पुनर्संरेखण के माध्यम से आत्मनिर्भरता: जल गहन धान–गेहूँ चक्र से हटकर उच्च मूल्य वाली दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों की ओर संक्रमण। तिलहन आत्मनिर्भरता मिशन जैसे कार्यक्रम आयात निर्भरता को कम करेंगे, जबकि स्वदेशी बीज किस्में शुष्क क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाएँगी।
    • जल तटस्थता एवं “प्रति बूँद अधिक फसल” का लक्ष्य: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का विस्तार कर उत्पादन को भूजल दोहन से अलग करना। इसमें स्थायी धान कृषि तकनीकों, जैसे प्रत्यक्ष बीज वुबाई, का विस्तार शामिल है, जिससे मेथेन उत्सर्जन में लगभग 59% की कमी आएगी और अरबों लीटर जल की बचत होगी।
    • SKY मॉडल एवं भूजल शासन: कुसुम योजना का विस्तार कर सौर ऊर्जा को “द्वितीयक फसल” के रूप में विकसित करना।
      • संतुलन की चुनौती: निःशुल्क सौर ऊर्जा से उत्पन्न “असीमित पंपिंग” को रोकने हेतु नीति आयोग स्मार्ट मीटरिंग और ‘फीड-इन टैरिफ’ पर बल देता है, ताकि किसान अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचें और अत्यधिक जल दोहन से बचें।
  • नवाचार एवं प्रौद्योगिकी-आधारित सघनीकरण
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (एग्री-स्टैक): डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परामर्श के माध्यम से मृदा की गुणवत्ता और मौसम की वास्तविक समय जानकारी प्रदान करना, जिससे 8 करोड़ से अधिक किसानों के लिए भौतिक–डिजिटल अंतराल को पाटा जा सके।
    • अनुसंधान एवं विकास निवेश को दोगुना करना: अनुसंधान एवं विकास व्यय को कृषि सकल घरेलू उत्पाद के 0.5% से बढ़ाकर 1.5% करना। उच्च उपज देने वाली और जलवायु-सहिष्णु बीज किस्मों पर ध्यान केंद्रित करना, जो वर्ष 2047 तक अनुमानित ‘हीट स्ट्रेस’ को सहन कर सकें।
    • मृदा की “कार्बन अवशोषण” क्षमता: शुद्ध बोए गए क्षेत्र के 25% तक प्राकृतिक खेती का विस्तार करना। रासायनिक पदार्थों के स्थान पर जैविक पदार्थ अपनाकर कृषि एक विशाल कार्बन अवशोषक बन सकती है, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ा सकती है और कार्बन क्रेडिट के माध्यम से नई आय उत्पन्न कर सकती है।
  • संस्थागत एवं संरचनात्मक सुधार
    • विस्तार सेवा 2.0 एवं ज्ञान समानता: कृषि विज्ञान केंद्रों को पुनर्जीवित कर प्रयोगशाला से खेत तक की दूरी को कम करना। (टिप्पणी: यहाँ निवेश किए गए प्रत्येक 1 रुपये पर कृषि उत्पादकता में 7 रुपये का प्रतिफल मिलता है।)
    • सामूहिक सौदेबाजी (किसान उत्पादक संगठन): 10,000 किसान उत्पादक संगठनों की योजना का विस्तार कर छोटे किसानों को संगठित करना। इससे किसान मूल्य ग्रहणकर्ता” से मूल्य निर्धारक” बनेंगे और वैश्विक मूल्य शृंखला में अधिक हिस्सा प्राप्त करेंगे।
    • सहायक क्षेत्रों का समन्वय: पशुपालन, मत्स्यपालन और कुक्कुट पालन को प्राथमिकता देना। प्रति पशु प्रतिदिन दुग्ध उत्पादन को 15 किलोग्राम तक बढ़ाने से फसल विफलता की स्थिति में वित्तीय सुरक्षा और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
  • निवेश एवं अनुकूलन की वास्तविकता: खाद्य सुरक्षा और कार्बन तटस्थता के इस दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वर्ष 2070 तक लगभग 22.7 ट्रिलियन डॉलर के संचयी निवेश की आवश्यकता होगी। नीति आयोग का अनुकूलन-प्रथम दृष्टिकोण” यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक डॉलर लघु और सीमांत किसानों की आजीविका को प्राथमिकता दे तथा कार्बन न्यूनीकरण को समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण सह-लाभ माने।

निष्कर्ष

नीति आयोग की वर्ष 2026 की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत की नेट जीरो यात्रा विकास के साथ समझौता नहीं, बल्कि उसकी पूर्व शर्त है। कृषि क्षेत्र के लिए लक्ष्य केवलकार्बन न्यूनीकरण” नहीं, बल्कि “हरित विकास” है, जहाँ उत्सर्जन में कमी, बेहतर उत्पादन, अधिक किसान आय और एक सुदृढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सह-लाभ के रूप में प्राप्त होती है।

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.