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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 07, 2026 03:52 29 0

व्हाइट-बेलीड हेरॉन

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने गंभीर रूप से लुप्तप्राय ‘व्हाइट-बेलीड हेरॉन’ (White-bellied Heron) पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताओं के संदर्भ में लोहित नदी पर स्थित कलाई-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरण संबंधी मंजूरी प्रदान की है।

व्हाइट-बेलीड हेरॉन’ के बारे में

  • परिचय: व्हाइट-बेलीड हेरॉन (Ardea Insignis) बगुलों में दूसरा सबसे बड़ा और दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है।
  • आवास: यह दलदली जंगलों और वन-आच्छादित नदी प्रणालियों में पाया जाता है और खाद्य आवश्यकताओं के लिए स्वतंत्र रूप से बहने वाली नदियों को तथा घोंसला बनाने के लिए ऊँचे पेड़ों को प्राथमिकता देता है।
  • आहार: यह प्रजाति मुख्य रूप से मछली और बड़े झींगे जैसे जलीय जीवों पर निर्भर रहती है तथा प्रायः तेज बहने वाली नदी की धाराओं में खाद्य की तलाश करती है।
  • क्षेत्र: इसका वर्तमान क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश, असम, भूटान और बांग्लादेश तक सीमित है, जिसमें नामदफा राष्ट्रीय उद्यान और कामलांग बाघ अभयारण्य जैसे प्रमुख भारतीय स्थल शामिल हैं।
  • खतरे: प्रमुख खतरों में बांधों के कारण आवास का नुकसान, शिकार, मानवीय हस्तक्षेप और नदी पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण शामिल हैं।
  • संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त, जिसकी अनुमानित वैश्विक आबादी 250 से कम है।
    • इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत भी सूचीबद्ध किया गया है (जो भारत में कानूनी संरक्षण का उच्चतम स्तर है)।

कलाई-II जलविद्युत परियोजना के बारे में

  • कलाई-II, टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड (THDC) द्वारा विकसित की जाने वाली 1,200 मेगावाट की रन-ऑफ-रिवर’ जलविद्युत परियोजना है।
  • इसका उद्देश्य पूर्वी हिमालय में स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देना है।
  • स्थान: अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में लोहित नदी (ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी) पर अवस्थित है।
  • पर्यावरणीय चिंताएँ: पर्यावरणविदों ने चिंता व्यक्त की है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में व्हाइट-बेलीड हेरॉन का उल्लेख नहीं किया गया है, जबकि लोहित बेसिन इस प्रजाति का ज्ञात निवास स्थान है।

भारत चावल उत्पादन

केंद्रीय कृषि मंत्री के अनुसार, भारत लगभग 150 मिलियन टन उत्पादन के साथ चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बन गया है।

भारत में चावल उत्पादन की प्रमुख विशेषताएँ

  • वैश्विक स्थिति: भारत चावल उत्पादन में प्रथम स्थान पर है और विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश बना हुआ है, जो वैश्विक बाजार में प्रतिवर्ष 2 करोड़ टन से अधिक चावल की आपूर्ति करता है।
  • प्रमुख उत्पादक राज्य (2024-25): उत्तर प्रदेश चावल उत्पादन में अग्रणी है, उसके बाद तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, पंजाब और छत्तीसगढ़ का स्थान आता है।
    • उच्च उपज वाली किस्मों, मशीनीकरण और सिंचाई के कारण पंजाब धान उत्पादन (प्रति हेक्टेयर उपज) में लगातार भारत में अग्रणी राज्य है।
  • निर्यात गंतव्य: भारतीय चावल का व्यापक रूप से पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में निर्यात किया जाता है, जिसमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, बेनिन और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
  • उत्पादकता में वृद्धि: 184 नई उच्च उपज वाली और जलवायु-प्रतिरोधी बीज किस्मों के जारी होने से उत्पादन तथा किसानों की आय में और वृद्धि होने की उम्मीद है।

धान की खेती के बारे में

  • धान विश्व की एक प्रमुख खाद्य फसल है और उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, विशेष रूप से एशिया का मुख्य आहार है।
  • जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ
    • गर्म और आर्द्र जलवायु में पनपता है।
    • इष्टतम तापमान: दिन में लगभग 30°C और रात में 20°C।
  • मिट्टी संबंधी आवश्यकताएँ
    • जलोढ़, दोमट और चिकनी मिट्टी में अच्छी तरह उगता है।
    • 5.5–6.5 के pH सीमा वाली उप मृदा के लिए सबसे उपयुक्त है।
    • हल्की अम्लीय से क्षारीय मिट्टी को सहन कर सकता है।
  • वर्षा की आवश्यकता
    • धान को 100-150 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता होती है।
    • धान एक अर्द्ध-जलीय फसल है, जिसे अपनी अधिकांश वृद्धि अवधि के दौरान स्थिर जल (10-15 सेंटीमीटर) की आवश्यकता होती है।
  • खेती के मौसम के आधार पर प्रकार
    • अमन (शीतकालीन चावल): जून-जुलाई में बोया जाता है; नवंबर-दिसंबर में फसल कटाई होती है।
    • औस (शरदकालीन चावल): मई-जून में बोया जाता है; सितंबर-अक्टूबर में फसल कटाई होती है।
    • बोरो (ग्रीष्मकालीन चावल): नवंबर से मई के बीच आर्द्र या सिंचित क्षेत्रों में उगाया जाता है।
  • भारत में GI टैग वाली चावल की किस्मों के उदाहरण: थूयामल्ली चावल (तमिलनाडु), गोबिंदोभोग (पश्चिम बंगाल), कालानमक (यूपी/उत्तराखंड), वायनाड जीरकासला (केरल), और तुलापंजी (पश्चिम बंगाल)।

पिपरहवा अवशेष प्रदर्शनी

प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली में पवित्र  पिपरहवा अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जो 125 वर्षों से अधिक समय के बाद बुद्ध से संबंधित अवशेषों की भारत में वापसी का प्रतीक है।

  • पिपरहवा की कलाकृतियों की भारत में वापसी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और गोदरेज इंडस्ट्रीज ग्रुप के बीच सहयोग के माध्यम से संभव हो पाई।

 पिपरहवा के पवित्र अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी

  • परिचय: प्रकाश और कमल: प्रबुद्ध व्यक्ति के अवशेष’ शीर्षक वाली इस प्रदर्शनी में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के साथ-साथ भारतीय संग्रहालयों से प्राप्त संबंधित पुरातात्त्विक सामग्री प्रदर्शित की गई है।
  • स्थान: यह प्रदर्शनी राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर, नई दिल्ली में आयोजित की जा रही है।
  • महत्त्व
    • यह प्रदर्शनी बुद्ध की आध्यात्मिक विरासत के संरक्षक के रूप में भारत की भूमिका को प्रदर्शित करती है और सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करती है।
    • साथ ही, यह आकर्षक और डिजिटल प्रदर्शनों के माध्यम से बौद्ध विरासत के बारे में वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा देती है।

 पिपरहवा अवशेषों के बारे में

  • पिपरहवा के अवशेष प्राचीन बौद्ध कलाकृतियाँ हैं, जो भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेष हैं और शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु से संबंधित हैं।
  • खोज: वर्ष 1898 में, ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने  पिपरहवा (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत-नेपाल सीमा के निकट) में एक स्तूप का उत्खनन किया, जिसमें ये अवशेष प्राप्त हुए।
  • सामग्री: इनमें अस्थि के टुकड़े, सोपस्टोन और क्रिस्टल के ताबूत, बलुआ पत्थर का एक संदूक और स्वर्ण आभूषण, मोती, माणिक, नीलम और पुखराज जैसे उपहार शामिल हैं, जो मुख्य रूप से मौर्य काल (लगभग 240-200 ईसा पूर्व) की हैं।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: माना जाता है कि ये अवशेष उन आठ मूल स्तूपों का हिस्सा हैं, जिनमें बुद्ध के दाह संस्कार के अवशेषों के अंश रखे गए थे और संभवतः शाक्य वंश द्वारा ही स्थापित किए गए थे।

सावित्रीबाई फुले (1831-1897)

प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री ने सावित्रीबाई फुले की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर शिक्षा और सामाजिक सुधार में उनकी अग्रणी भूमिका को याद किया।

सावित्रीबाई फुले (1831-1897) के बारे में

  • सावित्रीबाई फुले एक समाज सुधारक, शिक्षाविद, कवयित्री और महिला अधिकारों की अग्रणी थीं, जिन्हें व्यापक रूप से भारतीय नारीवाद की जननी माना जाता है।
  • प्रारंभिक जीवन: 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के नाइगाँव में जन्मीं, वे माली समुदाय से थीं।
    • उनकी शादी कम आयु में ज्योतिराव फुले से हुई थी, जिन्होंने उन्हें घर पर ही शिक्षा दी, जिससे वह भारत की पहली महिला शिक्षिका और पुणे में एक बालिका विद्यालय की पहली महिला प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्य कर सकीं।
  • संबद्ध संगठन: ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज (1873) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और सामाजिक समानता के लिए महिलाओं की पहलों का नेतृत्व किया।
    • पुणे में ‘नेटिव फीमेल स्कूल’ और महिला सेवा मंडल की स्थापना की, ताकि महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों को बढ़ावा दिया जा सके।
  • सामाजिक सुधार
    • भारत के पहले बालिका विद्यालय, भीडे वाडा विद्यालय, पुणे (1848) की सह-स्थापना की।
    • बाल विवाह, दहेज और जातिगत भेदभाव का सक्रिय रूप से विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
    • कन्या भ्रूणहत्या को रोकने और कमजोर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की।
    • दहेज और ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों से मुक्त सत्यशोधक विवाहों को बढ़ावा दिया।
  • साहित्यिक योगदान
    • काव्या फुले (1854), आधुनिक मराठी महिला कवयित्री का पहला काव्य संग्रह।
    • बावन काशी सुबोध रत्नाकर, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर बल देते हैं।
  • विरासत: वर्ष 1897 में प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए उनका निधन हो गया।

शिक्षा तक व्यापक पहुँच, सामाजिक न्याय आंदोलनों और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के माध्यम से उनकी विरासत आज भी मौजूद है, जो समावेशी विकास के लिए भारत की दृष्टि को प्रेरित करती है।

समुद्र प्रताप (Samudra Pratap)

रक्षा मंत्री ने गोवा में भारत के पहले स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए प्रदूषण नियंत्रण पोत ICGS समुद्र प्रताप को शामिल किया।

समुद्र प्रताप के बारे में

  • भारतीय तटरक्षक बल का जहाज (Indian Coast Guard Ship- ICGS) समुद्र प्रताप भारतीय तटरक्षक बल के बेड़े का सबसे बड़ा जहाज है और प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाए गए दो जहाजों में से पहला है।
  • गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा 60% से अधिक स्वदेशी सामग्री से निर्मित यह जहाज रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में हुई प्रगति को दर्शाता है।
  • डिजाइन और क्षमताएँ: मुख्य रूप से समुद्री प्रदूषण से निपटने के लिए डिजाइन किया गया यह पोत अग्निशमन, समुद्री सुरक्षा, तटीय गश्ती और लंबी दूरी की निगरानी सहित कई भूमिकाओं में कार्य करने की क्षमता रखता है।
  • सामरिक महत्त्व: यह भारत की समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों, तटीय आजीविका और ब्लू इकोनॉमी की रक्षा करने की क्षमता को बढ़ाता है।
    • यह समझौता भारत को उन्नत समुद्री पर्यावरण प्रतिक्रिया क्षमताओं वाले चुनिंदा देशों के समूह में शामिल करता है।
    • यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करता है।

समुद्री प्रदूषण नियंत्रण में भारतीय तटरक्षक बल (ICG) की भूमिका

  • केंद्रीय समन्वय प्राधिकरण: भारतीय तटरक्षक बल राष्ट्रीय तेल रिसाव-आपदा आकस्मिक योजना [National Oil Spill–Disaster Contingency Plan (NOS-DCP)] के तहत तेल रिसाव प्रतिक्रिया के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है और समुद्री प्रदूषण की घटनाओं के दौरान मंत्रालयों, राज्यों, बंदरगाहों और एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करता है।
  • निगरानी एवं शीघ्र पता लगाना: भारत के समुद्री क्षेत्रों में तेल रिसाव और प्रदूषण के खतरों का पता लगाने के लिए जहाजों, डॉर्नियर विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोनों का उपयोग करके निरंतर समुद्री निगरानी की जाती है।
  • प्रदूषण निवारण अभियान: समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करने, और उसे कम करने के लिए बूम, स्किमर और अनुमोदित तेल रिसाव रोधी पदार्थों का उपयोग करता है, जिसमें समुद्री दुर्घटनाओं के दौरान अग्निशमन सहायता भी शामिल है।
  • तैयारी और क्षमता निर्माण: प्रदूषण निवारण केंद्र (PRC) संचालित करता है, राष्ट्रीय स्तर के अभ्यास आयोजित करता है और त्वरित, समन्वित प्रदूषण निवारण सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता तथा प्रशिक्षण प्रदान करता है।

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