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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 09, 2026 05:30 26 0

अलेप्पो, सीरिया

हाल ही में, नागरिकों की निकासी के बाद सीरियाई सरकारी बलों और कुर्द नेतृत्व वाले सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) के बीच अलेप्पो में झड़प हुईं, जो अवरुद्ध सैन्य एकीकरण प्रयासों और बढ़ती मानवीय चिंताओं को रेखांकित करती हैं।

अलेप्पो शहर के बारे में 

  • अवस्थिति : अलेप्पो उत्तरी सीरिया में तुर्की सीमा के निकट स्थित है।
  • स्थिति: यह सीरिया का सर्वाधिक आबादी वाला शहर और इसका पूर्व वाणिज्यिक और औद्योगिक केंद्र है।
  • सामरिक महत्व: अलेप्पो अनातोलिया, मेसोपोटामिया और भूमध्य सागर को जोड़ने वाले व्यापार मार्गों के केंद्र में स्थित है।
  • संघर्ष का इतिहास: सीरियाई गृहयुद्ध के समय यह शहर एक प्रमुख युद्धक्षेत्र था और इसने सरकारी बलों और गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के बीच निरंतर संघर्ष देखा है।
  • हालिया विवाद का केंद्र : शेख मकसूद और अशरफियेह के आसपास के इलाकें जो मुख्य रूप से कुर्द बहुल क्षेत्र है हिंसा का  वर्तमान केंद्र है।

सीरिया के बारे में 

  • अवस्थिति : सीरिया एक पश्चिम एशियाई देश है जो उत्तरी और पूर्वी गोलार्ध में स्थित है।
    • यह भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर स्थित है।
  • राजधानी: दमिश्क
  • सीमाएँ:
    • तुर्की – उत्तर
    • इराक – पूर्व और दक्षिणपूर्व
    • जॉर्डन – दक्षिण
    • इजराइल और लेबनान – दक्षिण पश्चिम
  • भौतिक भूगोल:
    • पश्चिमी सीमा पर एंटी लेबनान पर्वतमाला
    • माउंट हर्मन (2,814 मीटर) सबसे ऊँची चोटी है।
    • फरात (Euphrates) नदी और इसकी सहायक खाबुर नदी प्रमुख नदी तंत्र का निर्माण करती हैं।
    • अल-असद झील एक प्रमुख मानव निर्मित जलाशय है।
    • सीरियाई मरुस्थल का विस्तार पूर्वी सीरिया के अधिकांश भू-क्षेत्र में है।
  • जलवायु:
    • पश्चिमी क्षेत्रों में हल्की,
    • शीतकाल  और ऊष्ण, शुष्क ग्रीष्मकाल के साथ भूमध्यसागरीय जलवायु
    • पूर्व में शुष्क रेगिस्तानी जलवायु
  • महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ:
    • समृद्ध लेवंट (Levant) क्षेत्र
      • लेवंट पूर्वी भूमध्यसागरीय पश्चिम एशिया में एक महत्त्वपूर्ण-भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें सीरिया, लेबनान, इजराइल, फिलिस्तीन, जॉर्डन और दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग शामिल हैं।
    • शिया-सुन्नी संघर्षों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र और अरब स्प्रिंग आंदोलन से प्रभावित एक मुख्य क्षेत्र।

ओलिव रिडले टर्टल   (लेपिडोचेलिस ओलिवेसिया)

हाल ही में, चेन्नई के समुद्र तटों पर मृत कछुओं की बढ़ती संख्या के बीच ओलिव रिडले टर्टल के घोंसलों को वन विभाग की हैचरी (hatcheries) में स्थानांतरित कर दिया गया और तटीय गश्त को बढाया गया  है।

ओलिव रिडले टर्टल (लेपिडोचेलिस ओलिवेसिया)

  • ऑलिव रिडले टर्टल समुद्री कछुओं की सबसे छोटी और सबसे प्रचुर प्रजाति है, जिसका नाम इसके खोल के जैतून-हरे रंग के नाम पर रखा गया है।
  • पर्यावास: यह गर्म उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय समुद्री जल में निवास करता है, अपने घोंसले बनाने के लिए नदी मुहाने और खाड़ियों के पास तटीय क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है।
  • वितरण: ओलिव रिडले टर्टल हिंद, प्रशांत और अटलांटिक महासागरों में पाए जाते हैं।
    • भारत में, मुख्य रूप से ओडिशा तट, अंडमान द्वीप समूह, तमिलनाडु और कर्नाटक (पश्चिमी तट पर एकमात्र घोंसला स्थल) पर घोंसले बनाते हैं।
  • आहार: ये सर्वाहारी हैं, शैवाल, जेलिफिश, केकड़े, झींगा मछली, मोलस्क और ट्यूनिकेट्स इनके भोजन में शामिल हैं।
  • घोंसला बनाने की प्रथा: इस अनूठी विशेषता को अरिबाडा’ (Arribada) कहा जाता  है, यह सामूहिक रूप से घोंसला बनाने की घटना है जहाँ हजारों मादाएँ एक ही समुद्र तट पर एक साथ अंडे देती हैं।
    • भारत में, प्रमुख अरिबाडा स्थलों में गहिरमाथा, देवी नदी का मुहाना और ओडिशा में रुशिकुल्या शामिल हैं।
    • प्रत्येक मादा जनवरी और अप्रैल के मध्य अधिकांश रात्रि के समय लगभग 100-140 अंडे देती है।
  • संरक्षण स्थिति
    • IUCN रेड लिस्ट: सुभेद्य
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची I
    • CITES: परिशिष्ट-I
  • संकट: प्रमुख खतरों में मछली पकड़ने के जाल को फँसना, तटीय विकास, जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, अंडों को अवैध रूप से एकत्र करना या हार्वेस्ट आदि शामिल हैं।

भारत में संरक्षण के प्रयास

  • ओडिशा के तट पर घोंसले बनाने वाले कछुओं की सुरक्षा के लिए भारतीय तट रक्षक द्वारा ऑपरेशन ओलिविया का संचालन।
  • प्रजनन  समय में मतस्यन गतिविधियों पर प्रतिबंध और बायकैच से बचने के लिए टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) का उपयोग करना।
  • गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य जैसे संरक्षित घोंसले वाले समुद्र तट।
  • चेन्नई और ओडिशा में हैचरी सहित पूर्व-स्थाने संरक्षण
    • स्टूडेंट्स सी टर्टल कंजर्वेशन नेटवर्क (एसएसटीसीएन) जैसे गैर सरकारी संगठन हैचरी के प्रबंधन में वन विभाग के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
    • भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा फ्लिपर टैगिंग और रेडियो टेलीमेट्री के माध्यम से वैज्ञानिक निगरानी करना।

बायो-बिटुमेन

वर्ष 2026 में, भारत सड़क निर्माण हेतु व्यावसायिक रूप से बायो-बिटुमेन का उत्पादन करने वाला विश्व का प्रथम देश बन गया, जो हरित बुनियादी अवसंरचना की दिशा में एक प्रमुख कदम है।

भारत में बायो-बिटुमेन की मुख्य विशेषताएँ 

  • विकास: स्वदेशी बायो-बिटुमेन प्रौद्योगिकी सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRIE), नई दिल्ली और सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP), देहरादून द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है।
  • परियोजना संचालन: जोराबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे (एनएच-40), मेघालय पर 100 मीटर के परीक्षण खंड के माध्यम से इस परियोजना का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है।
  • लक्ष्य: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करते हुए और फसल अवशेषों (Crop Residues) का प्रबंधन करते हुए, भारत के सड़क बुनियादी ढाँचे को स्वच्छ, हरित और चक्रीय अर्थव्यवस्था-आधारित राजमार्गों की ओर परिवर्तित करना।
  • आर्थिक लाभ: 20-30% पारंपरिक बिटुमेन को हस्तांतरित करना तथा सालाना 25,000-30,000 करोड़ रुपये के आयात को कम करने की क्षमता, आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बढ़ावा देना।

बायो-बिटुमेन के बारे में 

  • बायो-बिटुमेन पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन का एक संधारणीय विकल्प है, जिसे बायोमास और कृषि अपशिष्टों का उपयोग करके विकसित किया गया है।
  • पारंपरिक बिटुमेन कच्चे तेल से प्राप्त एक काला, चिपचिपा हाइड्रोकार्बन का मिश्रण है और सड़क निर्माण में एक बंधक पदार्थ (Binding Material) के रूप में उपयोग किया जाता  है।
  • बायो-बिटुमेन आंशिक रूप से या पूर्णत: जीवाश्म-आधारित बिटुमेन को प्रतिस्थापित करता है।

मुख्य विशेषताएँ

  • नवीकरणीय स्रोत-आधारित: फसल अवशेष और बायोमास अपशिष्ट से उत्पादित।
  • न्यूनतम कार्बन फुटप्रिंट: कच्चे तेल पर निर्भरता कम करता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करता है।
  • प्रदर्शन-संगत: पारंपरिक बिटुमेन की तुलना में बंधक या बाध्यकारी गुणों के साथ सड़क निर्माण के लिए उपयुक्त।
  • अपशिष्ट उपयोग: कृषि अपशिष्ट को मूल्य वर्धित उत्पाद में परिवर्तित करता है।

महत्व

  • पर्यावरणीय लाभ: फसल अपशिष्ट जलाने को हतोत्साहित करता है  और जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन को न्यूनतम कर वायु प्रदूषण को कम करने में मदद करता है।
  • स्वच्छ बुनियादी ढाँचा: हरित और संधारणीय राजमार्गों के विकास का बढ़ावा देता है।
  • आर्थिक लाभ: कच्चे तेल के आयात को कम करता है और संसाधन दक्षता को बढ़ाता है।
  • नीति संरेखण: यह अपशिष्ट से धन, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 जैसे राष्ट्रीय मिशनों की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक है।
  • वैश्विक नेतृत्व: भारत को पर्यावरण-अनुकूल सड़क निर्माण प्रौद्योगिकियों में अग्रणी के रूप में स्थापित करता है।

भारत द्वारा बायो-बिटुमेन को व्यावसायिक रूप से अपनाना निम्न-कार्बन, चक्रीय और आत्मनिर्भर बुनियादी ढाँचे के विकास की दिशा में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाता है।

धूल डिटेक्टर उपकरण (DEX)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भारत के पहले घरेलू स्तर पर विकसित धूल डिटेक्टर उपकरण DEX द्वारा अंतरग्रहीय धूल कणों (IDP) का सफलतापूर्वक  पता लगाने की सूचना दी है।

धूल प्रयोग (DEX) के बारे में 

  • DEX (धूल प्रयोग) भारत का पहला स्वदेशी उपकरण है जिसे तीव्र गति के अंतरग्रहीय धूल कणों (IDPs) का पता लगाने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • अंतरग्रहीय धूल कण (IDPs): IDPs धूमकेतु और क्षुद्रग्रहों के सूक्ष्म टुकड़े हैं जो लगातार पृथ्वी के वायुमंडल पर अपनी बौछार करते हैं।
    • जब ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो वे उल्का परत” का निर्माण करते हैं और जमीन से टूटते तारों के रूप में दिखाई देते हैं।
  • विकास: DEX अहमदाबाद में इसरो की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा विकसित तीन किलोग्राम का उपकरण है।
  • प्रक्षेपण : इसे PSLV-C58/एक्स्पोसैट मिशन के हिस्से के रूप में PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM-3) के आधार पर जनवरी, 2024 में लॉन्च किया गया था।
  • मुख्य परिणाम: 1 जनवरी से 9 फरवरी, 2024 तक, DEX ने सफलतापूर्वक कई धूल प्रभाव संकेतों को रिकॉर्ड किया, लगभग प्रत्येक  1,000 सेकंड में प्रभावों का पता लगाया।
    • इसने लगभग 6.5 × 10⁻³ कण प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकंड का धूल प्रवाह मापा, जो संचालित ब्रह्मांडीय बमबारी की पुष्टि करता है।
  • भविष्य के अनुप्रयोग: DEX आगामी मिशनों के लिए समान उपकरणों के लिए एक प्रोटोटाइप के रूप में कार्य करता है, जो चंद्रमा के चारों ओर, शुक्र के सघन वातावरण या मंगल के विरल वातावरण में धूल को मापने में सक्षम बनाता है।

PSLV-C62/EOS-N1 मिशन

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 12 जनवरी, 2026 को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन प्रक्षेपित करने वाला है।

PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के बारे में 

  • प्रक्षेपण विवरण: 12 जनवरी, 2026 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र , श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से निर्धारित।
  • PSLV-C62/EOS-N1 मिशन वर्ष 2026 में इसरो का पहला प्रक्षेपण है।
  • प्रक्षेपण यान: ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV)।
    • मई 2025 में PSLV-C61 की आंशिक विफलता के बाद यह PSLV की 64वाँ वापसी-उड़ान मिशन है।
  • प्राथमिक पेलोड: EOS-N1 (जिसे अन्वेषा के नाम से भी जाना जाता है)।
  • द्वितीयक पेलोड: लगभग 18 सह-यात्री पेलोड, जिसमें भारतीय स्टार्टअप और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के वाणिज्यिक और प्रायोगिक उपग्रह शामिल हैं।

EOS-N1 (अन्वेषा) उपग्रह

  • EOS-N1, कोडनेम-अन्वेषा (संस्कृत में जिसका अर्थ है “अन्वेषण”), एक उन्नत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है।
  • इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा मुख्य रूप से रणनीतिक और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए विकसित किया गया है।
  • मुख्य विशेषताएँ: हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सेंसर से युक्त जो सैकड़ों संकीर्ण वर्णक्रमीय बैंड (दृश्यमान प्रकाश से परे, अवरक्त और अन्य तरंग दैर्ध्य में) में डेटा एकत्रित करता है।
    • यह कृषि, शहरी मानचित्रण, पर्यावरण निगरानी और संसाधन मूल्यांकन जैसे नागरिक अनुप्रयोगों का भी समर्थन करता है।

अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE)–2026 

जनवरी 2026 में, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण प्रोटोकॉल का पालन करते हुए, तमिलनाडु के अनामलाई बाघ अभयारण्य में अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) -2026 क्षेत्र सर्वेक्षण शुरू हुआ।

अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) के बारे में

  • अखिल भारतीय बाघ आकलन विश्व का सबसे बड़ा वन्यजीव निगरानी अभ्यास है, जो भारत भर में बाघों की आबादी, शिकार आधार, सह-शिकारियों और आवास की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए प्रत्येक चार वर्ष में आयोजित की जाती है।
  • द्वारा संचालित: यह संयुक्त रूप से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा राज्य वन विभागों की सक्रिय भागीदारी के साथ संचालित किया जाता है।
  • आवृत्त क्षेत्र: इस अभ्यास में देश भर में सभी बाघ अभयारण्यों, बाघ वाले वन प्रभागों को शामिल किया गया है।
  • आवधिकता: AITE प्रत्येक चार वर्ष में एक बार आयोजित की जाती है।
    • वर्तमान में छठा चक्र (AITE-2026) संचालित है, जिसकी अंतिम रिपोर्ट वर्ष 2027 तक आने की उम्मीद है।
  • बाघ गणना के लिए प्रयुक्त पद्धतियाँ
  • एम-स्ट्रिप्स (M-STrIPES) ऐप: बाघ-गहन सुरक्षा और पारिस्थितिक स्थिति के लिए निगरानी प्रणाली (एम-स्ट्रिप्स) बाघ के संकेतों और गश्ती डेटा की जीपीएस-आधारित डिजिटल निगरानी है।
  • कैमरा ट्रैप:  वैयक्तिक बाघ की पहचान के लिए चित्र खींचना।
  • प्रतीक सर्वे: पगमार्क, मल  और खुरचने के निशान को ट्रैक करना।
  • रेखा ट्रांसेक्ट्स: शिकार प्रजातियों के घनत्व का अनुमान।
  • आनुवंशिक नमूनाकरण: अवशेषों और बालों के नमूनों से DNA का  विश्लेषण।

भारत में बाघों की वर्तमान स्थिति

  • बाघों की कुल संख्या: नवीनतम ALTE (2022) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जंगली बाघों की औसत आबादी 3,682 (3,167 से 3,925 तक) है, जो दुनिया की कुल बाघ आबादी का लगभग 75% है।
    • सर्वाधिक बाघों वाला राज्य: मध्य प्रदेश (785 बाघ)
    • अधिकतम बाघों वाला बाघ अभयारण्य: जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड) (260 बाघ)
  • कुल बाघ अभयारण्य: वर्ष 2025 तक, भारत में 18 राज्यों में विस्तृत 58 अधिसूचित बाघ अभयारण्य हैं।
    • नवीनतम अभयारण्य मध्य प्रदेश का माधव बाघ अभयारण्य है
    • भारत में मध्य प्रदेश में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या सबसे अधिक है, नौ बाघ अभयारण्य इसे “टाइगर स्टेट” का दर्जा प्रदान करते हैं।
  • संरक्षण में सफलता: प्रथम AITE (2006) के बाद से बाघों की आबादी में लगभग 6% की उल्लेखनीय वार्षिक वृद्धि दर देखी गई है।
    • यह 1973 में शुरू की गई सरकार की प्रमुख संरक्षण पहल, प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता को दर्शाता है।

अनामलाई बाघ अभयारण्य (ATR)

  • वर्ष 2007 में बाघ अभयारण्य घोषित, अन्नामलाई बाघ अभयारण्य दक्षिणी पश्चिमी घाट में स्थित एक प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट है।
  • अवस्थिति: तमिलनाडु के कोयंबटूर और तिरुप्पुर जिलों की अनामलाई पहाड़ियों में, पलक्कड़ दर्रे के दक्षिण में और परम्बिकुलम बाघ अभयारण्य (केरल) के निकटवर्ती स्थित है।
  • वनस्पति: यह आर्द्र सदाबहार, अर्द्ध-सदाबहार, नम और शुष्क पर्णपाती, शोला वन, पर्वतीय घास के मैदान, सवाना और दलदली घासभूमियों का समर्थन करता है।
  • संरक्षित जीव: प्रमुख प्रजातियों में बाघ, एशियाई हाथी, तेंदुआ, सांभर, चित्तीदार हिरण, बार्किंग डियर, गौर और जंगली बिल्ली शामिल हैं।
    • यह नीलगिरि तहर और नीलगिरि लंगूर जैसी कई स्थानिक प्रजातियों  का भी आवास स्थल है।

इंडसफूड 2026 

इंडसफूड 2026, भारत की प्रमुख वैश्विक खाद्य और पेय (food and beverage) प्रदर्शनी, ग्रेटर नोएडा में (8 से 10 जनवरी 2026 तक) आयोजित की जा रही है।

इंडसफूड के बारे में 

  • आयोजक: भारतीय व्यापार संवर्द्धन परिषद (TPCI)।
  • इंडसफूड को एशिया की प्रमुख खाद्य और पेय व्यापार प्रदर्शनी के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो भारतीय उत्पादकों, वैश्विक खरीदारों, नीति निर्माताओं और संस्थानों को एक साथ लाती है।
  • सरकार का समर्थन: प्रदर्शनी का उद्घाटन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री द्वारा किया गया।
  • अंतरराष्ट्रीय भागीदारी: 120 से अधिक देश इसमें भाग ले रहे हैं।

प्रमुख पहलें और विशेषताएँ

  • भारत-UAE खाद्य गलियारा: खाद्य सुरक्षा, रसद एकीकरण और द्विपक्षीय व्यापार को मजबूत करने के लिए अबू धाबी फूड हब के सहयोग से शुरू किया गया।
  • एपीडा की भारती पहल: एक मंच जो नवीन कृषि-खाद्य स्टार्ट-अप को प्रदर्शित करता है और उन्हें सीधे वैश्विक खरीदारों से जोड़ता है।
    • इस पहल का उद्देश्य भारत के कृषि-खाद्य क्षेत्र में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना है।
  • डीपी वर्ल्ड द्वारा भारत मार्ट: यह भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए निर्यात अवसंरचना, रसद दक्षता और नीति संवाद पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • विश्व पाक विरासत सम्मेलन: यह पाक कला में विरासत संरक्षण और नवाचार पर चर्चा करने के लिए शेफ, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रमुखों को एक मंच पर लाता है।
  • कौशल विकास: इंडिया इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्यूलिनरी लीडरशिप (ICICCL), लेवल-1 ‘भारतीय व्यंजन के राजदूत’ प्रमाणन की पेशकश करने वाले भारतीय व्यंजन कार्यक्रम के राजदूत के तहत 150 शेफ को प्रशिक्षित करेगा।
  • इंडिया ऑन ए प्लैटर’ गाला डिनर: यह मंत्रियों, राजदूतों, वैश्विक खरीदारों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों को एक साथ लाएगा, जो वैश्विक खाद्य और पेय उद्योग में भारत की भूमिका को मजबूत करेगा।
    • इसकी मेजबानी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा की जाती है।

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