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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 17, 2026 03:10 23 0

टायलर पुरस्कार 2026

अमेरिकी विकासवादी जीवविज्ञानी डॉ. टोबी कियर्स को वर्ष 2026 का टायलर पुरस्कार प्रदान किया गया, क्योंकि उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि भूमिगत माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal Networks) किस प्रकार पारितंत्र और जलवायु को नियंत्रित करते हैं।

माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal Networks)

  • माइकोराइजल नेटवर्क पौधों की जड़ों और कवकों के बीच सहजीवी संबंध होते हैं, जो लगभग सभी स्थलीय पारितंत्रों में पाए जाते हैं और पौधों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • ‘कवकीय हाइफ’ मृदा में दूर तक विस्तृत होते हैं, जिससे पोषक तत्त्वों और जल का अवशोषण बढ़ता है।
    • ये एक “जैविक बाजार” के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ पौधों से प्राप्त कार्बन के बदले पोषक तत्त्वों का आदान-प्रदान होता है।
    • मस्तिष्क के बिना कार्य करते हुए भी ये अनुकूलनशील, माँग–आपूर्ति आधारित व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
      • उदाहरण के लिए, कवक फॉस्फोरस को प्रचुरता वाले क्षेत्रों से कमी वाले क्षेत्रों की ओर सक्रिय रूप से स्थानांतरित करते हैं।
  • प्रमुख प्रकार 
    • आर्बस्कुलर माइकोराइजा (AM): अधिकांश फसलें, घासें, उष्णकटिबंधीय पौधे।
    • एक्टोमाइकोराइजा (EM): वन आधारित जैसे-वृक्ष जैसे चीड़ और ओक।
    • ऑर्किड माइकोराइजा: ऑर्किड के बीजों के अंकुरण के लिए आवश्यक।
    • एरिकॉइड माइकोराइजा: पोषक-तत्त्व की कमी वाली मृदा में उगने वाले ‘हीथलैंड’ पौधे।
  • पारिस्थितिकी भूमिका
    • प्रतिवर्ष लगभग 13 अरब टन CO को अवशोषित करते हैं, जिससे ये प्रमुख कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं।
    • मृदा की उर्वरता, पौधों की उत्पादकता और पारितंत्र की सहनशीलता को बढ़ाते हैं।
    • प्रारंभिक पौधों को स्थल पर आवास स्थापित करने में सक्षम बनाया, जिससे स्थलीय जीवन के विकास को आकार मिला।

पर्यावरणीय उपलब्धि हेतु टायलर पुरस्कार के बारे में

  • टायलर पुरस्कार, जिसे प्रायः “पर्यावरण के लिए नोबेल पुरस्कार” कहा जाता है, पर्यावरण विज्ञान और नीति में असाधारण योगदान को सम्मानित करता है।
  • संस्थापक: यह पुरस्कार जॉन और एलिस टायलर द्वारा स्थापित किया गया था, जो पर्यावरणीय मुद्दों के बढ़ते महत्त्व को मान्यता देता है।
  • उद्घाटन: इसे वर्ष 1973 में कैलिफोर्निया के तत्कालीन गवर्नर रोनाल्ड रीगन द्वारा औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया।
  • चयन प्रक्रिया: टायलर पुरस्कार कार्यकारी समिति द्वारा, प्रमुख वैश्विक शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से।
  • महत्त्व
    • वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए विज्ञान-आधारित समाधानों को मान्यता देता है।
    • इसमें 2,50,000 अमेरिकी डॉलर का पुरस्कार और एक “स्टेट ऑफ द एनवायरनमेंट” संबोधन शामिल है।
    • जैव विविधता, जलवायु और स्थिरता अनुसंधान के बढ़ते महत्त्व को रेखांकित करता है।

‘पफरफिश’

भारत में ताजे जल की पफरफिश द्वारा विषाक्तता होने का पहला मामला सामने आया है, जिसने टेट्रोडोटॉक्सिन कंटामिनेशन से संबंधित एक सार्वजनिक स्वस्थ्य समस्या को प्रदर्शित किया है।

पफरफिश द्वारा विषाक्तता के बारे में

  • पफरफिश द्वारा विषाक्तता, टेट्रोडोटॉक्सिन के कारण होती है, जो एक शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन है, जो भारतीय नदी प्रणालियों में पाई जाने वाली कुछ ताजे जल और समुद्री पफरफिश प्रजातियों में पाया जाता है।
  • मनुष्यों पर प्रभाव
    • टेट्रोडोटॉक्सिन तंत्रिका कोशिकाओं में सोडियम मार्गों को अवरुद्ध करता है, जिससे निस्तेजना, उल्टी, मांसपेशियों का पक्षाघात, श्वसन विफलता तथा संभावित रूप से मृत्यु हो सकती है।
    • ग्रामीण मछली बाजारों में जागरूकता की कमी और गलत पहचान उपभोक्ताओं की संवेदनशीलता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देती है।
  • निवारण
    • मछुआरों, विक्रेताओं, उपभोक्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जन-जागरूकता अभियान।
    • बाजार निगरानी, मत्स्य विषाक्तता की निगरानी, तथा पफरफिश के उपभोग के विरुद्ध स्पष्ट परामर्श।
  • उपचार: उपचार प्रारंभिक पहचान, श्वसन सहायता और लक्षणात्मक प्रबंधन पर निर्भर करता है।
    • टेट्रोडोटॉक्सिन के लिए कोई विशिष्ट प्रतिविष उपलब्ध नहीं है।

पफरफिश के बारे में

  • पफरफिश, टेट्राओडोन्टिफॉर्मीज (Tetraodontiformes) गण की मछलियाँ हैं और भारत में समुद्री, खारे तथा मीठे जल के पारितंत्रों में पाई जाती हैं।
  • भारत में प्रकार: भारत में लगभग 32 पफरफिश प्रजातियाँ आठ वंशों में पाई जाती हैं, जिनमें मीठे जल की प्रजातियाँ जैसे ‘लियोडॉन कटक्यूटिया’ शामिल हैं, जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और महानदी घाटियों में पाई जाती हैं।
  • मानव उपभोग: पफरफिश प्रायः ‘बायकैच’ के माध्यम से खाद्य में प्रवेश कर जाती हैं और कम कीमत वाली मीठे जल की मछलियों के साथ मिश्रित रूप में बेची जाती हैं।
    • जापान के विपरीत, जहाँ लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है, भारत में पफरफिश के उपभोग हेतु कोई नियामक सुरक्षा-व्यवस्था नहीं है।

मत्स्यपालन एवं जलीय कृषि के लिए भारत–इजरायल उत्कृष्टता केंद्र

हाल ही में इजरायल में आयोजित “ब्लू फूड सिक्योरिटी: सी द फ्यूचर 2026” के द्वितीय वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारत और इजरायल ने मत्स्यपालन और जलीय कृषि में सहयोग को गहरा करने हेतु एक संयुक्त मंत्रिस्तरीय घोषणा पर हस्ताक्षर किए।

समझौते की प्रमुख विशेषताएँ

  • सततता और क्षमता निर्माण: उत्तरदायी मत्स्यपालन, प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी, गहरे समुद्र में मत्स्यपालन, पोत डिजाइन, मछुआरों का प्रशिक्षण तथा समुद्री संसाधन संरक्षण पर बल।
  • व्यापार और नवाचार सहयोग: मत्स्यपालन और जलीय कृषि व्यापार में स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहन, ट्रेसबिलिटी प्रणालियों का संवर्द्धन तथा शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने हेतु संवाद।

मत्स्यपालन एवं जलीय कृषि के लिए भारत–इजरायल उत्कृष्टता केंद्र

  • इस घोषणा में मत्स्यपालन और जलीय कृषि में भारत–इजरायल उत्कृष्टता केंद्र (CoEs) स्थापित करने का प्रस्ताव है, जो 43 मौजूदा कृषि उत्कृष्टता केंद्र (CoEs) की सफलता पर आधारित होगा।
  • उद्देश्य
    • जलीय कृषि और मत्स्य प्रौद्योगिकियों में इजरायली विशेषज्ञता का हस्तांतरण।
    • मछुआरों और जलीय कृषकों के लिए अनुसंधान, नवाचार और कौशल विकास का समर्थन।
      • रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम्स (RAS), बायोफ्लॉक, केज कल्चर, एक्वापोनिक्स, मैरीकल्चर, समुद्री शैवाल की खेती, आनुवंशिक सुधार, ब्रूडस्टॉक विकास तथा रोग-मुक्त बीज उत्पादन पर संयुक्त अनुसंधान।
    • जलवायु-सहिष्णु और उच्च-उत्पादकता वाले जलीय कृषि मॉडलों का प्रदर्शन।
  • महत्त्व
    • विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक (वैश्विक उत्पादन का 8%) के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करता है।
    • सतत् आजीविकाओं और खाद्य सुरक्षा के माध्यम से ब्लू इकोनॉमी को सशक्त करता है।
    • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सतत् विकास में भारत–इजरायल रणनीतिक सहयोग को गहरा करता है।

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