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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 19, 2026 04:54 52 0

इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में वृद्धि

हाल ही में सेबी के अध्यक्ष तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) की संख्या के संदर्भ में भारत वैश्विक अग्रणी के रूप में उभरा है।

भारत के IPO बाजार संबंधी प्रमुख तथ्य

  • वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में भारत में 311 IPO जारी किए गए, जिनसे ₹1.7 ट्रिलियन की पूँजी जुटाई गई।
  • संख्या के आधार पर भारत अब विश्व का सबसे बड़ा IPO बाजार है तथा मूल्य के आधार पर तीसरा सबसे बड़ा।
  • भारत का बाजार पूँजीकरण-से-जीडीपी अनुपात वित्तीय वर्ष 2015-16 के 69% से बढ़कर 130% से अधिक हो गया है, जो निवेशकों की गहरी भागीदारी को दर्शाता है।

इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के बारे में

  • इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोई निजी कंपनी पहली बार अपनी इक्विटी शेयरों को जनता को प्रस्तावित करती है, जिससे वह एक सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी बन जाती है।
  • भारत में नियामक: भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड IPO का प्राथमिक नियामक है, जो नियम निर्धारित करता है, प्रॉस्पेक्टस की समीक्षा करता है तथा निवेशक संरक्षण हेतु अनुपालन सुनिश्चित करता है।
  • संबद्ध संस्थान: स्टॉक एक्सचेंज (जैसे- NSE/BSE) सूचीबद्धता और कारोबार का प्रबंधन करते हैं तथा मर्चेंट बैंकर प्रक्रिया का प्रबंधन करते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

  • नए शेयर जारी कर प्राथमिक बाजार के माध्यम से पूँजी जुटाई जाती है।
  • प्रक्रिया में निवेश बैंकों द्वारा अंडरराइटिंग, नियामकीय प्रकटीकरण, मूल्य निर्धारण तथा स्टॉक एक्सचेंजों पर सार्वजनिक सूचीबद्धता शामिल होती है।
  • बाजार नियामकों द्वारा शासित, जिससे पारदर्शिता और निवेशक संरक्षण सुनिश्चित होता है।

लाभ

  • पूँजी तक पहुँच: विस्तार, नवाचार और ऋण में कमी हेतु कंपनियों को बड़े पैमाने पर पूँजी उपलब्ध कराता है।
  • विश्वसनीयता: दृश्यता तथा सस्ती वित्तीय पहुँच को बढ़ाता है।
  • निर्गमन अवसर: संस्थापकों और प्रारंभिक निवेशकों को लाभ संवर्द्धन हेतु निर्गमन का अवसर प्रदान करता है।

जोखिम और चुनौतियाँ

  • जाँच में वृद्धि: उच्च अनुपालन लागत, निरंतर प्रकटीकरण आवश्यकताएँ और नियामकीय निगरानी शामिल होती है।
    • सार्वजनिक स्वामित्व से प्रबंधकीय लचीलापन कम हो सकता है और अल्पकालिक प्रदर्शन का दबाव बढ़ सकता है।
  • बाजार अस्थिरता: मूल्य में उतार-चढ़ाव हो सकता है, जो निवेशकों और प्रबंधन के निर्णयों को प्रभावित करता है।

स्पेसएक्स क्रू-11 मिशन

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के चार चालक दल सदस्यों ने प्रशांत महासागर में सुरक्षित ‘स्प्लैशडाउन’ किया, जो वर्ष 1998 में ISS के प्रक्षेपण के बाद इसके इतिहास में पहली बार हुई ‘चिकित्सीय निकासी’ (Medical Evacuation) थी।

संबंधित तथ्य

  • यह निकासी एक अंतरिक्ष यात्री को प्रभावित करने वाली गंभीर चिकित्सीय स्थिति के कारण की गई।
  • इसमें नासा के स्पेसएक्स क्रू-11 मिशन के चार अंतरिक्ष यात्री शामिल थे, जिसका प्रक्षेपण अगस्त 2025 में हुआ था।

‘स्पेसएक्स क्रू-11 मिशन’ के बारे में

  • मिशन का प्रकार: नासा के ‘कमर्शियल क्रू प्रोग्राम’ के अंतर्गत 11वीं परिचालन उड़ान, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को ISS तक पहुँचाना था।
  • प्रक्षेपण: 1 अगस्त 2025, फाल्कन 9 ब्लॉक-5 रॉकेट के माध्यम से।
  • अंतरिक्ष यान: क्रू ड्रैगन (SpaceX)।
  • चालक दल की संख्या: 4 अंतरिक्ष यात्री।

मिशन का महत्त्व

  • ऐतिहासिक रूप से प्रथम
    • ISS से पहली चिकित्सीय निकासी को चिह्नित करता है, जो दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों में आपातकालीन तैयारी के महत्त्व को उजागर करता है।
  • भविष्यगत प्रभाव
    • अंतरिक्ष अन्वेषण में चिकित्सीय प्रोटोकॉल के लिए एक उदाहरण स्थापित करता है।
    • आगामी आर्टेमिस मिशनों और संभावित मंगल अभियानों के लिए महत्त्वपूर्ण, जहाँ चिकित्सीय आपात स्थितियाँ और अधिक जटिल होंगी।

77वाँ गणतंत्र दिवस समारोह

 

यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे।

77वें गणतंत्र दिवस समारोह के बारे में

  • गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता है, जो वर्ष 1950 में भारत के संविधान को अपनाए जाने की स्मृति में है और भारत के एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य में रूपांतरण का प्रतीक है।
  • गणतंत्र दिवस 2026: 77वाँ गणतंत्र दिवस समारोह कर्तव्य पथ, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा, जो लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक शासन और भारत के वैश्विक दृष्टिकोण का प्रतीक है।
  • वर्ष 2026 की थीम: ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष।
  • मुख्य अतिथि (2026): पहली बार यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेता संयुक्त रूप से मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे, जो भारत के लिए यूरोपीय संघ के सामूहिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
    • एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष
    • उर्सुला वॉन डेर लेयेन, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष।

यात्रा का महत्त्व

  • रणनीतिक महत्त्व: भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय संघ के नेताओं की भागीदारी, बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में यूरोपीय संघ को एक प्रमुख साझेदार के रूप में भारत की रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाती है।
  • आर्थिक और संस्थागत सहयोग: यह यात्रा 16वें भारत–EU शिखर सम्मेलन और भारत–EU बिजनेस फोरम के साथ संरेखित है, जिससे व्यापार, प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा, सुरक्षा और भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर चर्चाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग सुदृढ़ होता है।
  • साझा वैश्विक मूल्य: यह सहभागी लोकतंत्र, बहुपक्षवाद, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और सतत् विकास के प्रति साझा प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ करती है, जिससे भारत की वैश्विक कूटनीतिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।

अमिट स्याही (Indelible Ink)

वर्ष 2026 के महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों के दौरान अमिट स्याही (Indelible Ink) जाँच के दायरे में आ गई, जब विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि स्याही के निशान आसानी से हटाए जा सकते हैं, जिससे चुनावी निष्पक्षता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुईं।

उठाई गई चिंताएँ

  • विपक्षी नेताओं का दावा है कि वीडियो में स्याही के निशान को सैनिटाइजर या नेल पॉलिश रिमूवर से मिटाते हुए दिखाया गया है, विशेषकर जहाँ मार्कर पेन का उपयोग किया गया था।
  • आरोप है कि इससे दोबारा मतदान संभव हो सकता है, जिसके चलते चुनावी सुरक्षा उपायों के कमजोर होने और चुनाव अधिकारियों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगाए गए।

अमिट स्याही के बारे में

  • परिभाषा: अमिट स्याही बैंगनी रंग का निशान है, जो मतदान के बाद मतदाता की उँगली पर लगाया जाता है और कई दिनों तक दिखाई देने के लिए बनाया गया है।
  • उत्पादन और स्रोत
    • स्याही का सूत्र 1950 के दशक में राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला द्वारा विकसित किया गया था।
    • इसे विशेष रूप से ‘मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड’, कर्नाटक सरकार की एक इकाई, द्वारा निर्मित किया जाता है।
  • भारतीय चुनावों में उपयोग
    • भारत में अमिट स्याही का उपयोग वर्ष 1962 के आम चुनावों से किया जा रहा है।
    • इसे बाएँ हाथ की तर्जनी उँगली पर, सामान्यतः नाखून और क्यूटिकल पर, ब्रश, बोतल या मार्कर पेन से लगाया जाता है।
  • रासायनिक आधार
    • इसमें सिल्वर नाइट्रेट होता है, जो त्वचा और प्रकाश के साथ अभिक्रिया कर ‘स्थायी निशान’ बनाता है।
    • यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।
  • आधिकारिक प्रतिक्रिया: चुनाव अधिकारियों का कहना है कि यदि स्याही फीकी पड़ जाए या हटा भी दी जाए, तब भी कई प्रक्रियात्मक जाँचें दोहरे मतदान को रोकती हैं और वर्ष 2011 से मार्कर पेन के उपयोग की अनुमति दी गई है।

ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स

AI-संचालित ऊर्जा माँग में तीव्र वृद्धि के बीच, गूगल के प्रोजेक्ट सनकैचर और इसरो सौर ऊर्जा से पूर्णतः संचालित अंतरिक्ष-आधारित ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स (Orbital Datacentres) की संभावना का अन्वेषण कर रहे हैं।

ऑर्बिटल डेटा सेंटर (Orbital Datacentres) के बारे में

  • ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स की अवधारणा के अंतर्गत ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (Low-Earth Orbit) में AI कंप्यूटिंग अवसंरचना की स्थापना का प्रस्ताव है, ताकि ऊर्जा-सघन स्थलीय डेटा केंद्रों के विकल्प के रूप में अंतरिक्ष का उपयोग किया जा सके।
  • प्रमुख विशेषताएँ: ये डेटा केंद्र सघन रूप से समूहित उपग्रह नक्षत्रों के रूप में संचालित होंगे।
  • संभावित लाभ: सौर ऊर्जा के निरंतर संपर्क से स्थलीय विद्युत ग्रिड पर निर्भरता समाप्त होती है, जिससे संभावित रूप से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है तथा पृथ्वी पर भूमि, जल और शीतलन (कूलिंग) संबंधी बाधाओं से बचा जा सकता है।

ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स की व्यवहार्यता

  • तकनीकी व्यवहार्यता: गूगल के अनुसंधान के अनुसार, आधुनिक टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट्स (TPUs) अंतरिक्ष विकिरण को सहन कर सकती हैं, जबकि ‘डिस्ट्रीब्यूटेड आर्किटेक्चर AI मॉडलों’ की अत्यधिक आंतरिक बैंडविड्थ संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।
  • अभियांत्रिकीय चुनौतियाँ: निर्वात में तापीय प्रबंधन, दीर्घकालिक रखरखाव तथा कक्षा में उपग्रहों का प्रतिस्थापन अब भी प्रमुख अनसुलझी चुनौतियाँ बने हुए हैं।
  • आर्थिक पक्ष: प्रक्षेपण लागत में गिरावट और सौर ऊर्जा द्वारा बचत बचत ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स को प्रतिस्पर्द्धी बना सकती है, किंतु इन्हें तीव्र गति से उन्नत हो रहे भू-आधारित विकल्पों से बेहतर प्रदर्शन करना होगा।

यद्यपि यह अवधारणा अभी प्रायोगिक अवस्था में है, फिर भी ऑर्बिटल डेटा सेंटर, AI अवसंरचना पर पुनर्विचार के बढ़ते प्रयासों को परिलक्षित करते हैं, क्योंकि ऊर्जा माँग, जलवायु संबंधी चिंताएँ और कंप्यूटिंग तीव्रता निरंतर बढ़ रही हैं।

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