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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 20, 2026 04:44 21 0

गुइलेन–बारे सिंड्रोम
(Gullian-Barré Syndrome)

हाल ही में मध्य प्रदेश के नीमच जिले में गुइलेन–बारे सिंड्रोम (Gullian-Barré Syndrome-GBS) के कारण दो बच्चों की मृत्यु हुई।

गुइलेन–बारे सिंड्रोम (GBS) क्या है?

  • प्रकृति: GBS एक दुर्लभ ऑटोइम्यून तंत्रिका संबंधी विकार है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली परिधीय तंत्रिकाओं पर हमला करती है, जिससे मांसपेशियों में कमजोरी और संभावित पक्षाघात हो सकता है।
  • महामारी विज्ञान
    • यह किसी भी आयु के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।
    • वयस्कों और पुरुषों में अधिक सामान्य।
    • इसकी घटना दर लगभग प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर 1–2 मामले है।
  • कारण
    • संक्रमण के बाद उत्पन्न होने वाला कारक: अधिकांश मामलों में, GBS किसी वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण के बाद होता है।
    • बैक्टीरियल संबंध: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कैंपिलोबैक्टर जेजूनी’ (Campylobacter jejuni) संक्रमण, जो गैस्ट्रोएंटेराइटिस का कारण बनता है, GBS के सबसे सामान्य जोखिम कारकों में से एक है।
    • वायरल संक्रमण: GBS को इन्फ्लुएंजा, साइटोमेगालोवायरस, एपस्टीन–बार वायरस और जीका वायरस संक्रमण से भी जोड़ा गया है।
    • टीकाकरण: कुछ टीकों को GBS से जोड़ा गया है, हालाँकि जोखिम अत्यंत कम होता है।
  • सामान्य लक्षण
    • प्रारंभिक लक्षण: लक्षण आमतौर पर पैरों में झनझनाहट और कमजोरी से शुरू होते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के ऊपरी हिस्से, हाथों तथा चेहरे तक फैलते हैं।
    • सामान्य अभिव्यक्तियाँ: इनमें सुई चुभने जैसा दर्द, पीठ दर्द, पैर दर्द, चलने या सीढ़ियाँ चढ़ने में कठिनाई, चेहरे की कमजोरी शामिल हैं।
    • गंभीर प्रगति: कुछ मामलों में हाथ, पैर या चेहरे की मांसपेशियों का पक्षाघात हो सकता है।
    • जटिलताएँ: यदि GBS स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जो हृदय गति और रक्तचाप जैसे गतिविधियों को नियंत्रित करता है, तो यह जीवन के लिए घातक बन सकता है।

उपचार

  • कोई निश्चित उपचार नहीं: गुइलेन–बारे सिंड्रोम का कोई ज्ञात निश्चित उपचार नहीं है।
  • प्रमुख उपचार
    • प्लाज्मा एक्सचेंज (प्लास्माफेरेसिस): तंत्रिकाओं पर हमला करने वाली हानिकारक एंटीबॉडी को समाप्त करताहै।
    • इंट्रावीनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG) थेरेपी: प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा होने वाले नुकसान को कम करने में सहायता करती है।
  • सहायक देखभाल: रोगियों को रिकवरी के दौरान वेंटिलेटर सपोर्ट के साथ-साथ शारीरिक और व्यावसायिक थेरेपी की आवश्यकता हो सकती है।

सम्मक्का–सरलम्मा जतारा

तेलंगाना, 28 जनवरी, 2026 से आयोजित होने वाले द्विवार्षिक सम्मक्का–सरलम्मा जतारा की तैयारी कर रहा है, साथ ही मेदाराम में पवित्र क्षेत्र का बड़े पैमाने पर पुनर्विकास भी किया जा रहा है।

सम्मक्का–सरलम्मा जतारा के बारे में

  • सम्मक्का–सरलम्मा जतारा एक द्विवार्षिक जनजातीय आध्यात्मिक उत्सव है, जो कोया आदिवासी समुदाय की पूर्वज देवियों सम्मक्का और उनकी पुत्री सरलम्मा के सम्मान में आयोजित किया जाता है।
  • स्थान: यह उत्सव तेलंगाना के मुलुगु जिले के मेदाराम गाँव में, एटूरनागरम वन्यजीव अभयारण्य के भीतर, दंडकारण्य वन क्षेत्र के हिस्से के रूप में, हिंदू माह माघ की पूर्णिमा के दौरान आयोजित होता है।
  • ऐतिहासिक उत्पत्ति: यह जतारा कोया जनजातीय कथाओं में निहित है, जिनमें सम्मक्का और सरलम्मा ने काकतीय शासकों द्वारा आरोपित कर का प्रतिरोध किया था, जो जनजातीय प्रतिरोध, बलिदान का प्रतीक है।
    • कोया आदिवासी समुदाय तेलंगाना का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है, जो मुख्य रूप से भद्राद्री कोठागुडेम और ओडिशा के मल्कानगिरी जिलों में निवास करता है, द्रविड़-आधारित कोया भाषा (कोया बाशा) बोलता है और अपने पारंपरिकबाइसन-हॉर्न’ नृत्य के लिए प्रसिद्ध है।
  • जतारा में धार्मिक प्रथाएँ: यह सर्वात्मवादी और कुटुंब-आधारित परंपराओं का पालन करती है, जहाँ कोई स्थायी मंदिर या मूर्तियाँ नहीं होतीं।
    • देवियों को प्रतीकात्मक रूप से वन से लाकर तीन दिनों के लिए लोगों के बीच लाया जाता है।
  • मुख्य विशेषताएँ: भक्त धन के स्थान पर गुड़ (बंगारम्) अर्पित करते हैं, जो कृषि-आधारित समानता को दर्शाता है। अनुष्ठान कोया जनजातीय पुजारियों द्वारा पवित्र वृक्षों, बाँस के टोटेम, कबीलाई ध्वज (दल्गुड्डा) और मौखिक कथाओं के माध्यम से संपन्न किए जाते हैं।
  • स्थिति: इसे एशिया का सबसे बड़ा जनजातीय उत्सव माना जाता है, जिसमें एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु आते हैं, और यह भारत में कुंभ मेले के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयोजन है।

भारत के अन्य महत्त्वपूर्ण जनजातीय उत्सव

  • नागोबा जतारा (तेलंगाना): गोंड जनजाति का एक प्रमुख उत्सव, जो केस्लापुर में मनाया जाता है और गुसादी नृत्य तथा पूर्वज सर्प पूजा से जुड़ा है।
  • मुर्मा जात्रा (झारखंड): ओराँव जनजाति का एक सांस्कृतिक उत्सव, जो जनजातीय एकता, विरासत और मुंडा समुदाय के साथ भाईचारे का उत्सव है।
  • बनेश्वर मेला (राजस्थान): “जनजातीय कुंभ” के रूप में प्रसिद्ध, यह डूंगरपुर में सोम–माही नदी संगम पर आयोजित होने वाला भील जनजाति का प्रमुख आयोजन है।
  • हिल जात्रा (उत्तराखंड): ‘सोर घाटी’ में मनाया जाने वाला एक कृषि उत्सव, जिसमें कृषि चक्र और लोक देवताओं का प्रतीकात्मक मुखौटा नृत्य होता है।
  • बस्तर दशहरा (छत्तीसगढ़): स्थानीय देवताओं के सम्मान में मनाया जाने वाला एक विशिष्ट जनजातीय उत्सव है।

कोकोनट रूट विल्ट’ डिजीज

दक्षिण भारत मेंकोकोनट रूट विल्ट’ डिजीज, जो अनुपचारित एक फाइटोप्लाज्मा जनित खतरा है, तेजी से नारियल के बागानों को नष्ट कर रही है।

कोकोनट रूट विल्ट’ डिजीज के बारे में

  • रोग की प्रकृति: नारियल के पेड़ों को प्रभावित करने वाला एक दीर्घकालिक, असाध्य फाइटोप्लाज्मा संबंधी रोग, जिससे उत्पादकता में धीरे-धीरे गिरावट आती है।
  • इतिहास: पहली बार 150 से अधिक वर्ष पूर्व केरल में पहचाना गया था, लेकिन अब तक इसका कोई ज्ञात उपचार नहीं है।
  • कारक जीव: फाइटोप्लाज्मा (कोशिका भित्ति रहित बैक्टीरिया)।
  • मुख्य प्रभावित क्षेत्र: मुख्यतः केरल; तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ हिस्सों को प्रभावित करता है।
  • प्रसार: कीट वाहकों (विशेषकर व्हाइटफ्लाई) और वायु के माध्यम से प्रसारित होता है।
    • जलवायु परिवर्तन (अनियमित तापमान) और नए कीट समूहों के कारण तेजी से विस्तार हो रहा है।
  • प्रमुख लक्षण
    • पत्तियों में शिथिलता (लटकना)
    • पत्तियों का पीला पड़ना और सँकरा होना
    • जड़ प्रणाली का कमजोर होना और फलोत्पादन कम होना।
  • उपज पर प्रभाव: समय के साथ नारियल उत्पादन में 30–80% तक गिरावट आ सकती है; पेड़ लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं लेकिन आर्थिक रूप से अनुपयोगी हो जाते हैं।
  • प्रबंधन रणनीति: कोई उपचार नहीं; एकीकृत रोग प्रबंधन (IDM) पर ध्यान:
    • वाहक नियंत्रण (Systemic insecticides)
    • संतुलित पोषण (विशेष रूप से N, K, Mg)
    • अंतरवर्तीय फसल, मृदा स्वास्थ्य में सुधार
    • गंभीर रूप से प्रभावित पेड़ों को हटाना

काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना

हाल ही में प्रधानमंत्री ने वन्यजीव सुरक्षा और कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए ₹6,957 करोड़ की काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का शिलान्यास किया।

काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना

  • काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना एक प्रमुख वन्यजीव–अनुकूल अवसंरचना पहल है, जिसका उद्देश्य काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व के भीतर सुरक्षित पशु आवागमन सुनिश्चित करना तथा क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में सुधार करना है।
  • उद्देश्य: विशेष रूप से मानसून के दौरान वन्यजीव–वाहन दुर्घटना को कम करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • राष्ट्रीय राजमार्ग–715 के कालीआबोर–नुमालीगढ़ खंड के चार लेन में उन्नयन का हिस्सा।
    • इसमें लगभग 34.45 किमी. के एलिवेटेड कॉरिडोर तथा जाखलाबँधा और बोकाखाट में बाइपास मार्ग का निर्माण शामिल हैं।
    • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की सिफारिशों के अनुरूप डिजाइन किया गया।
  • महत्त्व: यह परियोजना संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करती है, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा करती है, सड़क दुर्घटनाओं को कम करती है, इको-टूरिज्म को बढ़ावा देती है और स्थानीय रोजगार सृजन करती है।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व

  • काजीरंगा अपनी असाधारण जैव विविधता के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है और भारत का एक प्रमुख संरक्षण परिदृश्य है।
  • स्थान: यह असम में स्थित है और ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ मैदानों के साथ गोलाघाट, नागाँव, सोनितपुर, बिश्वनाथ और कार्बी आंगलोंग जिलों में विस्तृत है।
  • मान्यता: इसे वर्ष 1974 में असम का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
    • वर्ष 2007 मेंप्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया; यह पूर्वी हिमालयी जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्थित है और वर्ष 1985 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
  • नदी: यह ब्रह्मपुत्र नदी से घिरा है, जबकि डिफ्लू, मोरा डिफ्लू और मोरा धनसिरी इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
  • वनस्पति: उद्यान में जलोढ़ घासभूमियाँ, आर्द्रभूमियाँ और उष्णकटिबंधीय वन शामिल हैं।
  • पशु: काजीरंगा में एक-सींग वाले गैंडों’ की विश्व की सबसे बड़ी आबादी पाई जाती है, साथ ही बाघ, हाथी, ‘वाटर बफेलो’ और ‘स्वैम्प डियर’ भी पाए जाते हैं।

जैव-सुरक्षा स्तर–4 (BSL-4) प्रयोगशाला

हाल ही में गुजरात के गांधीनगर में अपनी पहली राज्य-वित्तपोषित जैव-सुरक्षा स्तर–4 (BSL-4) प्रयोगशाला की आधारशिला रखी गई।

जैव-सुरक्षा स्तर–4 (BSL-4) प्रयोगशाला

  • BSL-4 प्रयोगशाला जैविक नियंत्रण अवसंरचना का सर्वोच्च स्तर दर्शाती है, जिसे विश्व के सबसे खतरनाक और संक्रामक रोगजनकों के प्रबंधन हेतु डिजाइन किया गया है।
    • BSL जैविक नियंत्रण मानक हैं (BSL-1 से BSL-4) जो BSL-1 (न्यूनतम जोखिम, मानक प्रक्रियाएँ) से लेकर BSL-4 (उच्च-जोखिम, इबोला जैसे विदेशी एजेंट, जिनके लिए अधिकतम नियंत्रण और पृथक सुविधाएँ आवश्यक होती हैं) तक प्रगति को निर्धारित करते हैं।
  • गांधीनगर, गुजरात में स्थित BSL-4 प्रयोगशाला भारत की पहली पूर्णतः राज्य-वित्तपोषित और राज्य-नियंत्रित BSL-4 नागरिक सुविधा है।
  • उद्देश्य: उन्नत अनुसंधान, त्वरित प्रकोप प्रतिक्रिया तथा उच्च-जोखिम रोगजनकों के लिए निदान, टीके और उपचार विकसित करने में सक्षम बनाकर घातक संक्रामक रोगों के प्रति भारत की तैयारी को सुदृढ़ करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • उच्च-नियंत्रण अवसंरचना: इसमें BSL-4, BSL-3, BSL-2, पशु जैव-सुरक्षा स्तर–4 (ABSL-4) और ABSL-3 मॉड्यूल उन्नत सुरक्षा उपयोगिताओं के साथ शामिल हैं।
    • संस्थागत ढाँचा: यह गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर के अंतर्गत संचालित होती है, जिसने COVID-19 महामारी के दौरान जीनोम अनुक्रमण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
    • वैश्विक मानक: इसे सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ हेल्थ, जैव प्रौद्योगिकी विभाग और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा जारी अंतरराष्ट्रीय जैव-सुरक्षा दिशा-निर्देशों के अनुरूप विकसित किया गया है।
    • जूनोटिक अनुसंधान क्षमता: ABSL-4 सुविधा भारत में पशु रोग अनुसंधान और टीका विकास को सक्षम बनाती है।
  • महत्त्व: यह प्रयोगशाला विदेशी सुविधाओं पर निर्भरता कम करके, अनुसंधान बाधाओं को दूर करके, वास्तविक समय में प्रकोप नियंत्रण को सुदृढ़ करके तथा भारत की जैव प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देकर एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढाल के रूप में कार्य करेगी।

भारत का जैव-सुरक्षा प्रयोगशाला नेटवर्क

  • भारत ने महामारी तैयारी और जैव-चिकित्सीय अनुसंधान क्षमता में सुधार के लिए अपनी जैव-सुरक्षा अवसंरचना का लगातार विस्तार किया है।
  • प्रमुख प्रयोगशालाएँ और उद्देश्य
    • नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे: घातक मानव रोगजनकों के लिए भारत की एकमात्र कार्यात्मक नागरिक BSL-4 प्रयोगशाला।
    • रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, ग्वालियर: रणनीतिक जैव-सुरक्षा अनुसंधान के लिए रक्षा-क्षेत्र की BSL-4 सुविधा।
    • ICAR–नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीजेज, भोपाल: जूनोटिक रोगों के लिए ABSL-3+ प्रयोगशाला, जिसे ABSL-4 में उन्नत करने का प्रस्ताव है।
    • वायरस अनुसंधान और निदान प्रयोगशाला (VRDL) नेटवर्क: महामारी निगरानी और प्रतिक्रिया के लिए पूरे भारत में 154 BSL-2 और 11 BSL-3 प्रयोगशालाएँ स्थित हैं।

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