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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 22, 2026 03:30 16 0

डॉल्फिन गणना सर्वेक्षण

भारत में नदियों और मुहानों में पाई जाने वाली डॉल्फिन की गणना प्रोजेक्ट डॉल्फिन के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के बिजनौर से शुरू किया गया।

संबंधित तथ्य

  • डॉल्फिन की राष्ट्रीय आबादी के पूर्वानुमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात के गिर में आयोजित राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक (मार्च 2024) में जारी किए गए थे।

सर्वेक्षण के बारे में

  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • नोडल एजेंसी: सर्वेक्षण का समन्वय भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून द्वारा किया जा रहा है।
  • सहयोगी: इस कार्य का समन्वय WII द्वारा राज्य वन विभागों और संरक्षण साझेदारों, जिनमें WWF इंडिया, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट शामिल हैं, के सहयोग से किया जा रहा है।
  • भौगोलिक दायरा
    • पहला चरण: बिजनौर से गंगा सागर और सिंधु नदी तक गंगा का मुख्य भाग।
    • दूसरा चरण: ब्रह्मपुत्र नदी, गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ, सुंदरबन, ओडिशा की नदी प्रणालियाँ।
  • शामिल प्रजातियाँ
    • प्रमुख प्रजातियाँ: गंगा नदी डॉल्फिन और सिंधु नदी डॉल्फिन।
    • नई शामिल प्रजाति: पहली बार, इस सर्वेक्षण में सुंदरबन और ओडिशा में पाई जाने वाली इरावदी डॉल्फिन को भी शामिल किया जाएगा।

पिछले सर्वेक्षण (2021-2023) के निष्कर्ष

  • संख्या अनुमान: लगभग 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज की गईं।
  • वितरण
    • गंगा, यमुना, चंबल, गंडक, घाघरा, कोसी, महानंदा और ब्रह्मपुत्र नदियों में गंगा नदी डॉल्फ़िन पाई जाती हैं।
    • ब्यास नदी में सिंधु नदी डॉल्फिन की एक छोटी आबादी पाई जाती है।
  • उच्च संख्या वाले राज्य: उत्तर प्रदेश और बिहार में इनकी संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई, इसके बाद पश्चिम बंगाल और असम का स्थान आता है, जो गंगा बेसिन के महत्त्व को दर्शाता है।

प्रोजेक्ट डॉल्फिन के बारे में

  • प्रोजेक्ट डॉल्फिन भारत सरकार की एक राष्ट्रीय संरक्षण पहल है, जिसका उद्देश्य भारतीय जलक्षेत्र में पाई जाने वाली नदी और महासागरीय डॉल्फिन प्रजातियों की सुरक्षा तथा संरक्षण करना है।
  • उद्घाटन: 15 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा।
  • अवधि: यह परियोजना 10 वर्षों की दीर्घकालिक पहल के रूप में परिकल्पित है।
  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • सामुदायिक भागीदारी: यह परियोजना स्थानीय समुदायों, मछुआरों और अन्य हितधारकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है, मानव जनित खतरों को कम करने और स्थायी संरक्षण परिणाम सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका को मान्यता देती है।

अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) वित्तपोषण योजना

उद्योग समर्थित परियोजनाओं के लिए अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष के तहत धन का वितरण जनवरी 2026 के अंत तक शुरू होने वाला है।

अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) के लिए मिलने वाली धनराशि के बारे में

  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य उच्च जोखिम वाले, उच्च प्रभाव वाले अनुसंधान को वित्तपोषित करना और प्रयोगशालाओं, स्टार्ट-अप्स तथा उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।
  • निधि: RDI योजना की निधि 1 लाख करोड़ रुपये है।
  • प्रारंभ: इस योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जुलाई 2025 में मंजूरी दी और नवंबर 2025 में औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया।
  • नोडल मंत्रालय: इस योजना का कार्यान्वयन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा किया जाता है।
  • वित्तपोषण तंत्र: यह दो स्तरीय तंत्र है:
    • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के अंतर्गत विशेष प्रयोज्य कोष (SPF)
    • परियोजनाओं को निधि आवंटित करने वाले द्वितीय स्तरीय निधि प्रबंधक (SLFMs)।
  • प्रथम द्वितीय स्तरीय निधि प्रबंधक: प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) को RDI निधि के अंतर्गत प्रथम द्वितीय स्तरीय निधि प्रबंधक के रूप में अनुमोदित किया गया है।
    • प्रत्येक को पहली तिमाही में ₹2,000 करोड़ (कुल ₹4,000 करोड़) का प्रारंभिक आवंटन प्राप्त होगा, जिसके तहत वे स्टार्ट-अप, कंपनियों और उद्योग से प्रस्ताव आमंत्रित करना शुरू करेंगे।
    • TDB: सभी RDI सनराइज और रणनीतिक क्षेत्रों में परियोजनाएँ।
    • BIRAC: जैव प्रौद्योगिकी और संबद्ध क्षेत्रों में परियोजनाएँ।
  • उद्योग समर्थित परियोजनाओं और उच्च प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) पर ध्यान केंद्रित करना: RDI फंडिंग उन नवाचार-प्रेरित उद्यमों और उद्योग समर्थित परियोजनाओं पर केंद्रित होगी, जिन्होंने प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) 4 या उससे अधिक को पार कर लिया है।
    • उच्च TRL का अर्थ है, वे परियोजनाएँ, जो प्रारंभिक अवधारणा प्रमाण से आगे बढ़कर विकास और विस्तार के चरण में पहुँच चुकी हैं।
  • प्राथमिकता क्षेत्र एवं उद्देश्य: RDI योजना का उद्देश्य निम्नलिखित है:-
    • अनुसंधान और नवाचार में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
    • परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों और उच्च प्रभाव वाले उपक्रमों को वित्तपोषित करना।
    • ऊर्जा, जलवायु, गहन प्रौद्योगिकियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जैव प्रौद्योगिकी, डिजिटल अर्थव्यवस्था आदि जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को बढ़ावा देना।
    • प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को मजबूत करना।
  • रणनीतिक पर्यवेक्षण: इस योजना का रणनीतिक मार्गदर्शन अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के शासी बोर्ड (जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं) द्वारा किया जाता है।

इलेक्ट्रिक वाहनों के कारण ताँबे की की माँग में वृद्धि

वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) की बिक्री 0.55 मिलियन (2015) से बढ़कर लगभग 20 मिलियन (2025) हो गई, जिससे EV में प्रयुक्त होने वाले ताँबे की माँग में तीव्र बढोतरी हुई है, साथ ही यह माँग 1.28 मिलियन टन से अधिक हो गई है।

  • चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड अपग्रेड से वाहनों के अलावा भी ताँबे की खपत में और अधिक वृद्धि होती है।

ताँबे की माँग पर इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रभाव

  • बैटरी, मोटर, वायरिंग और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों को आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों की तुलना में 4-5 गुना अधिक ताँबे की आवश्यकता होती है।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री के साथ ताँबे की माँग की लोच अधिकतर 1 से ऊपर रही है, जो EV वाहनों को अपनाने की तुलना में माँग में तेजी से वृद्धि दर्शाती है।

ताँबे के बारे में

  • ताँबा (Cu) एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक और रणनीतिक धातु है, जो विद्युतीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों तथा आधुनिक अवसंरचना के लिए अपरिहार्य है।
  • प्रमुख अयस्क: चैल्कोपाइराइट (CuFeS₂), चैल्कोसाइट (Cu₂S), बोर्नाइट, मैलाकाइट।
  • गुणधर्म: उत्कृष्ट विद्युत और ऊष्मीय चालकता।
    • यह अत्यधिक तन्य, लचीला, संक्षारण-प्रतिरोधी और आसानी से पुनर्चक्रण योग्य है।
  • अनुप्रयोग
    • विद्युत वायरिंग, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और मोटर
    • पॉवर ग्रिड, ट्रांसफार्मर और चार्जिंग स्टेशन
    • इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ।
  • वैश्विक उत्पादन
    • प्रमुख उत्पादक देश चिली, पेरू, चीन, डी. आर. कांगो और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं।
    • चिली विश्व का सबसे बड़ा ताँबा उत्पादक देश है (वैश्विक उत्पादन का लगभग 27%)।
      • चिली में विश्व की सबसे बड़ी ताँबा खदानें, एस्कोन्डिडो और कोलाहुआसी अवस्थित हैं।
  • भारत में उत्पादन
    • प्रमुख भंडार: सिंहभूम (झारखंड), बालाघाट (मध्य प्रदेश), झुँझुनू और अलवार (राजस्थान)।
    • अल्प भंडार: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु।
    • सबसे बड़ा उत्पादक: मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा ताँबा उत्पादक राज्य है, जो देश के ताँबा संकेंद्रण उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा उत्पादित करता है।

इलेक्ट्रिक वाहनों के नेतृत्व वाले ऊर्जा संक्रमण में ताँबा एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिससे संसाधन सुरक्षा, पुनर्चक्रण और नवाचार भविष्य के कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों के लिए केंद्रीय बन गए हैं।

केंद्रीय रेशम बोर्ड

वस्त्र मंत्रालय ने केंद्रीय रेशम बोर्ड (CSB) की वित्तीय स्वीकृति सीमा को 50 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दिया है।

केंद्रीय रेशम बोर्ड के बारे में

  • वैधानिक निकाय: संसद के अधिनियम (केंद्रीय रेशम बोर्ड अधिनियम, 1948) द्वारा वर्ष 1948 में स्थापित किया गया।
  • नोडल मंत्रालय: वस्त्र मंत्रालय (भारत सरकार)
  • मुख्यालय: बंगलूरू, कर्नाटक
  • कार्यक्षेत्र
    • रेशम उत्पादन में अनुसंधान एवं विकास
    • प्रौद्योगिकी प्रसार
    • गुणवत्ता सुधार
    • रेशम उत्पादन एवं निर्यात को प्रोत्साहन।

भारत में रेशम क्षेत्र

  • वैश्विक स्थिति: भारत विश्व में रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और साथ ही सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।
  • आजीविका संबंधी सहायता: यह लगभग 9.76 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान करता है, मुख्य रूप से ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में।
  • उत्पादन रुझान: वित्त वर्ष 2025 में 41,121 मीट्रिक टन।
    • शहतूत रेशम का इसमें सबसे बड़ा हिस्सा है।
  • प्रमुख उत्पादक राज्य: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, जम्मू और कश्मीर।
    • झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और उत्तर-पूर्वी राज्यों में शहतूत के वृक्ष के अतिरिक्त साधनों से रेशम का उत्पादन होता है।
  • निर्यात प्रदर्शन
    • वित्त वर्ष 2025 में निर्यात: 246 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का रेशम और रेशम उत्पाद की विदेशी आपूर्ति सुनिश्चित की।
    • निर्यात बास्केट: कच्चा रेशम, रेशमी धागा, कपड़े, वस्त्र, रेशम अपशिष्ट और हथकरघा उत्पाद।
    • प्रमुख निर्यात बाजार: संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूनाइटेड किंगडम, इटली, फ्राँस, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग और कनाडा

रेशम के प्रकार

  • शहतूत रेशम
    • शहतूत का रेशम उन रेशमकीटों से प्राप्त होता है, जो केवल शहतूत के पत्तों पर ही पलते हैं।
    • यह अपनी कोमलता, चिकनी बनावट और प्राकृतिक चमक के लिए जाना जाता है, जो इसे महँगी साड़ियों और प्रीमियम वस्त्रों के लिए आदर्श बनाता है।
    • भारत के कुल कच्चे रेशम उत्पादन का लगभग 92% शहतूत के वृक्षों से आता है।
  • गैर-शहतूत रेशम
    • गैर-शहतूत रेशम, जिसे वन्य रेशम भी कहा जाता है, जंगली रेशम के कीड़ों से प्राप्त होता है, जो ओक, अरंडी और अर्जुन जैसे वन वृक्षों पर पलते हैं।
    • इसकी बनावट खुरदरी और मिट्टी जैसी होती है, चमक अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन इसकी मजबूती, टिकाऊपन और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इसे महत्त्व दिया जाता है।

सागर मैत्री

हाल ही में सागर मैत्री के पाँचवें संस्करण के लिए कोच्चि से INS सागरध्वनि को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया।

  • INS सागरध्वनि एक विशेष समुद्री ध्वनिक अनुसंधान पोत है, जिसे नौसेना भौतिक और समुद्र विज्ञान प्रयोगशाला (NPOL)-DRDO द्वारा डिजाइन किया गया है, GRSE द्वारा निर्मित किया गया है और वर्ष 1994 में कमीशन किया गया था, जो तीन दशकों से अधिक समय से समुद्री अनुसंधान में सेवा दे रहा है।

सागर मैत्री के बारे में

  • सागर मैत्री, DRDO और भारतीय नौसेना की एक प्रमुख सहयोगात्मक समुद्र विज्ञान पहल है।
  • उद्देश्य: हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करना।
    • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में 23 सदस्य देश शामिल हैं।
  • उत्पत्ति: अप्रैल 2019 में भारत के सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) के समुद्री दृष्टिकोण के तहत DRDO द्वारा इसकी शुरुआत की गई।
    • वैज्ञानिक घटक मैत्री (समुद्री और संबद्ध अंतःविषयक प्रशिक्षण और अनुसंधान पहल) को दीर्घकालिक समुद्री अनुसंधान सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए शुरू किया गया था।
    • यह आवधिक मिशन-आधारित पहलों के रूप में संचालित किया जाता है (यह सख्ती से वार्षिक या द्विवार्षिक नहीं है)।

सागर मैत्री–V (SM-5)

  • सागर मैत्री-V, DRDO के समुद्री ध्वनिक अनुसंधान पोत INS सागरध्वनि का उपयोग करके आयोजित की गई इस पहल का पाँचवाँ संस्करण है।
  • उद्देश्य
    • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों के बीच संयुक्त समुद्र विज्ञान और ध्वनिक अनुसंधान (Oceanographic and Acoustic Research) को बढ़ावा देना।
    • समुद्री विज्ञान में वैज्ञानिक क्षमता और पेशेवर आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
    • भारतीय नौसेना के जलमग्न क्षेत्र जागरूकता (UDA) से संबंधित समुद्र विज्ञान और ध्वनिक डेटा एकत्र करना।
  • सहभागी देश (8): आठ हिंद महासागर क्षेत्र के देश: ओमान, मालदीव, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया और म्याँमार।

महत्त्व

  • समुद्री विज्ञान कूटनीति में भारत के नेतृत्व को मजबूत करता है।
  • नौसेना सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण जलक्षेत्रीय जागरूकता को बढ़ाता है।
  • महासागर (MAHASAGAR) (क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति) के भारत के विकसित होते समुद्री दृष्टिकोण के अनुरूप है।

प्रतास (डोंगशा) द्वीप समूह

हाल ही में एक चीनी टोही ड्रोन ने ताइवान के नियंत्रण वाले प्रतास (डोंगशा) द्वीपों के हवाई क्षेत्र में संक्षिप्त रूप से प्रवेश किया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया।

प्रतास द्वीप समूह के बारे में

  • प्रतास द्वीपसमूह, जिसे डोंगशा द्वीपसमूह के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण चीन सागर के उत्तरी भाग में स्थित प्रवाल भित्तियों का एक छोटा समूह है, जो एक एटाॅल का निर्माण करता है।
  • स्थान: यह दक्षिणी ताइवान और हांगकांग के बीच अवस्थित है।
  • भूगोल: इसमें तीन द्वीप शामिल हैं, जो एक वृत्ताकार प्रवाल भित्ति बनाते हैं।
    • डोंगशा द्वीप समुद्र तल से ऊपर स्थित एकमात्र द्वीप है; अन्य दो जलमग्न हैं।
    • यह एटाॅल लगभग 24 किमी. व्यास का है, जिसके भीतर लगभग 16 किमी. चौड़ा एक लैगून है।
    • यह प्रवाल भित्तियों, समुद्री जैव विविधता और प्रवासी पक्षियों के आवासों से समृद्ध है।
  • वर्तमान प्रशासन: ताइवान (चीन गणराज्य) द्वारा नियंत्रित और डोंगशा एटाॅल राष्ट्रीय उद्यान के रूप में प्रशासित है।
    • यहाँ कोई स्थायी आबादी नहीं है; ताइवानी नौसेना इस द्वीप पर तैनात है।
    • इस पर चीन जनवादी गणराज्य का दावा है, जिससे यह विवाद का केंद्र बना हुआ है।
  • सामरिक महत्त्व: यह दक्षिण चीन सागर के उत्तरी छोर पर, प्रशांत और हिंद महासागरों को जोड़ने वाले महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों के निकट स्थित है।
    • मुख्य भूमि ताइवान से इसकी दूरी के कारण इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, जो इसे जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर की सुरक्षा गतिशीलता में महत्त्वपूर्ण बनाता है।

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