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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 24, 2026 04:02 65 0

पराक्रम दिवस

हाल ही में प्रधानमंत्री ने पराक्रम दिवस 2026 पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि अर्पित की, जो उनके 129वें जन्म दिवस के अवसर पर मनाया गया।

  • पराक्रम दिवस हर वर्ष 23 जनवरी को उनके जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में

  • सुभाष चंद्र बोस (वर्ष 1897–1945) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे, जिन्होंने क्रांतिकारी माध्यम से पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की।
  • प्रारंभिक जीवन और शिक्षा: 23 जनवरी, 1897 को कटक (ओडिशा) में जानकीनाथ बोस और प्रभाबती दत्त के घर जन्मे बोस ने रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता से पढ़ाई की।
    • बाद में वह कैंब्रिज विश्वविद्यालय गए, वर्ष 1920 में इंडियन सिविल सर्विसेज (ICS) की परीक्षा पास की, लेकिन वर्ष 1921 में राष्ट्रीयता की भावना और जलियाँवाला बाग हत्याकांड से प्रेरित होकर इस सेवा से इस्तीफा दे दिया।
  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: बोस का मानना था कि स्वतंत्रता केवल संवैधानिक साधनों से प्राप्त नहीं की जा सकती।
    • उनका नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा” उनके क्रांतिकारी उत्साह को दर्शाता है। उन्होंने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और सशस्त्र संघर्ष की दिशा में प्रयास किए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में भूमिका

  • भागीदारी: 1921 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में शामिल हुए, चित्तरंजन दास के साथ मिलकर कार्य किया, असहयोग आंदोलन में भाग लिया, और एक प्रमुख युवा नेता के रूप में उभरे।
  • अध्यक्षता: उन्हें वर्ष 1938 में हरिपुरा में कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया और वर्ष 1939 में त्रिपुरी में पुनः निर्वाचित किया गया, जहाँ उन्होंने आर्थिक योजना तथा क्रांतिकारी कार्यों की वकालत की।
  • त्रिपुरी संकट: रणनीति और सत्ता के विषय में गांधीवादी नेतृत्व के साथ मतभेदों के कारण बोस ने वर्ष 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
    • डॉ. राजेंद्र प्रसाद को शेष कार्यकाल के लिए अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया।
  • राजनीतिक दल: वर्ष 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की, ताकि तत्काल स्वतंत्रता की माँग करने वाली क्रांतिकारी राष्ट्रवादी शक्तियों को एकजुट किया जा सके।
  • भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) में भूमिका: वर्ष 1943 में उन्होंने INA का नेतृत्व सँभाला और इसे आजाद हिंद फौज के रूप में पुनर्गठित किया।
    • आजाद हिंद फौज (भारतीय राष्ट्रीय सेना – INA) की स्थापना वर्ष 1942 में कैप्टन मोहन सिंह द्वारा मलाया में भारतीय युद्धबंदियों के साथ की गई थी।
  • भारत की मुक्ति: उन्होंने 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में अस्थायी आजाद भारत सरकार (आजाद हिंद सरकार) की स्थापना की, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान निर्वासित सरकार के रूप में कार्यरत थी और इसे जापान तथा अन्य धुरी देशों का समर्थन प्राप्त था।
    • अस्थायी सरकार के प्रमुख के रूप में, बोस ने वर्ष 1943 में ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह को स्वतंत्र भारतीय क्षेत्र के रूप में घोषित किया।
    • उन्होंने भारत की ओर सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया और मॉइरांग तथा पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया।
  • साहित्यिक योगदान
    • द इंडियन स्ट्रगल (1935): भारत के स्वतंत्रता संग्राम (1920–1934) का विश्लेषण।
    • उन्होंने फॉरवर्ड और स्वराज (1921–22) जैसे समाचार-पत्रों का संपादन किया।
  • मृत्यु: कथित रूप से 18 अगस्त, 1945 को बोस का ताइवान में एक हवाई दुर्घटना में निधन हो गया, हालाँकि यह आज भी विवादित हैं।
  • विरासत: नेताजी साहसिक राष्ट्रवाद और अविचलित देशभक्ति के प्रतीक बने हुए हैं, जो कई पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं; उनके सम्मान में 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (NLI) की प्रस्तावना 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में की गई थी। इसका उद्देश्य संसद एवं राज्य विधानसभाओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और तुलना सक्षम बनाना है।

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (NLI) के बारे में

  • NLI भारत में विधायी निकायों के लिए प्रस्तावित प्रदर्शन मूल्यांकन और मानकीकरण ढाँचा है।
  • यह संसद (लोकसभा और राज्यसभा) तथा राज्य विधायी सभाओं/परिषदों के कार्यकलापों को मानकीकृत, डेटा-संचालित मापदंडों के माध्यम से वस्तुनिष्ठ रूप से मापने, तुलना करने और रैंकिंग करने का कार्य करेगा।
  • इसका उद्देश्य विधायी कार्य की उत्पादकता, दक्षता, पारदर्शिता और समग्र गुणवत्ता का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का सूचकांक तैयार करना है।

उद्देश्य और लाभ

  • विधायिकाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना, ताकि उनके प्रदर्शन और नवाचार में सुधार हो सके।
  • संवाद, बहस और विधायी उत्पादन की गुणवत्ता को उन्नत बनाना।
  • मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से वर्ष 2047 तक विकसित भारत (Viksit Bharat) के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य का समर्थन करना।
  • राज्यों और विधायिकाओं के बीच अंतर और सर्वोत्तम प्रथाओं को उजागर करके सहकर्मी अधिगम (peer learning) को प्रोत्साहित करना।

अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC)

  • अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) भारत की विधायी संस्थाओं के पीठासीन अधिकारियों के लिए राष्ट्रीय मंच है।
  • प्रतिभागी: यह सम्मेलन लोकसभा के अध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति या उपसभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, और विधान परिषदों के अध्यक्षों को एक मंच प्रदान करता है।

निकोबार जनजातीय परिषद

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह की मेगा परियोजना को लेकर नए सिरे से विवाद खड़ा हो गया है क्योंकि निकोबार जनजातीय परिषद ने आरोप लगाया है कि जिला प्रशासन की ओर से उन पर पैतृक भूमि के लिए ‘सरेंडर सर्टिफिकेट’ पर हस्ताक्षर करने का दबाव डाला जा रहा है।

निकोबार जनजातीय परिषद के बारे में

  • निकोबार जनजातीय परिषद निकोबार द्वीपसमूह में आदिवासी निकोबारी समुदाय (अनुसूचित जनजाति) के लिए सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है।
  • विधिक दर्जा: इसकी स्थापना अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह (जनजातीय परिषद ) विनियमन, 2009 जैसे कानूनी नियमों के तहत की गई है।
  • यह आदिवासी अधिकार, संस्कृति, भूमि और कल्याण की रक्षा के लिए एक पारंपरिक और निर्वाचित शासन तंत्र के रूप में कार्य करता है।
  • संरचना और संगठन
    • ग्राम-स्तरीय आधार: प्रत्येक निकोबारी गाँव में एक ग्राम परिषद होती है, जिसका नेतृत्व लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कप्तान द्वारा किया जाता है।
    • जनजातीय परिषद स्तर: यह परिषद अपने क्षेत्राधिकार के गाँवों (लिटिल और ग्रेट निकोबार समूह) के कप्तानों से मिलकर बनती है।
      • वे एक मुख्य कप्तान/अध्यक्ष और उप मुख्य कप्तान/उपाध्यक्ष के साथ-साथ अन्य सदस्यों का चुनाव करते हैं।

प्रमुख दायित्व और अधिकार

  • पारंपरिक भूमि, पारंपरिक आजीविका और सांस्कृतिक प्रथाओं का संरक्षण करती है।
  • आदिवासी आरक्षित क्षेत्रों या भूमि को प्रभावित करने वाली परियोजनाओं के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्रदान करता है या रद्द कर सकती है।
  • सुरक्षा कानूनों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956, वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006, और सुनामी के बाद पुनर्वास संबंधी प्रतिबद्धताएँ।
  • यह अंडमान और निकोबार प्रशासन, केंद्र सरकार (जैसे, केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री, लेफ्टिनेंट गवर्नर) और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग (NCST) जैसे निकायों के साथ बातचीत में समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
  • विकास परियोजनाओं में स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति का समर्थन करती है।

निवल  प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)

भारत का निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नवंबर 2025 में लगातार चौथे माह नकारात्मक रहा, जिसमें निकासी प्रवाह $446 मिलियन से अधिक थी।

मुख्य बिंदु

  • निवल/शुद्ध FDI नकारात्मक रहा क्योंकि विदेशी कंपनियों ने उच्च मात्रा में पूँजी वापस भेजी और विनिवेश किया।
  • सकल प्रवाह $6.4 बिलियन पर मजबूत बना रहा (प्रत्येक वर्ष  22.5% की वृद्धि), जिसका नेतृत्व जापान, सिंगापुर और अमेरिका ने किया।
  • शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) भी वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक नकारात्मक रहे हैं, क्योंकि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और रूपए में कमजोरी ने निवेशकों के विश्वास को प्रभावित किया।
  • भारत में FDI के प्रमुख स्रोत: सिंगापुर, मॉरिशस, संयुक्त राज्य अमेरिका, नीदरलैंड्स, आदि।
  • FDI के प्रमुख गंतव्य राज्य: महाराष्ट्र (सबसे बड़ा हिस्सा), कर्नाटक, दिल्ली / NCR, गुजरात, और तमिलनाडु / तेलंगाना।
  • भारत में FDI प्राप्त करने वाले प्रमुख क्षेत्र: सेवाएँ (वित्त, बैंकिंग, बीमा), कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर, व्यापार, दूरसंचार, ऑटोमोबाइल और विनिर्माण।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के बारे में

  • FDI एक गैर-ऋण पूँजी प्रवाह है, जिसमें विदेशी निवेशक भारतीय उद्यमों में स्थायी हित और प्रबंधन नियंत्रण प्राप्त करते हैं, जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास का समर्थन करता है।
  • निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश  = सकल प्रवाह – पूँजी वापसी, विनिवेश, और बहिर्वाह  FDI।
    • विदेशी कंपनियों द्वारा की गई पूँजी की वापसी (Repatriation): विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में अपनी गतिविधियों से प्राप्त लाभ, डिविडेंड या पूँजी को अपने मूल देश में वापस स्थानांतरित करना।
    • विनिवेश (Disinvestment): विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय फर्मों में अपने स्वामित्व हिस्सेदारी को आंशिक या पूर्ण रूप से बेचना या कम करना।
    •  बहिर्वाह  FDI (Outward FDI): भारतीय कंपनियों द्वारा भारत के बाहर स्थित व्यवसायों या संपत्तियों में किया गया निवेश।

द्वितीयक प्रदूषक

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के एक मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि द्वितीयक कणीय पदार्थ दिल्ली में शीत ऋतु में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक हैं, जो PM2.5 स्तर का 27% गठित करते हैं।

CAQM रिपोर्ट के मुख्य तथ्य 

  • दिल्ली में शीत ऋतु में होने वाले प्रदूषण में द्वितीयक कणीय पदार्थ प्रमुख हैं (27%), इसके बाद परिवहन (23%), जैविक ईंधन दहन (20%), धूल (15%), और उद्योग (9%) प्रमुख कारक हैं।
  • सर्दियों में PM2.5 का उच्च स्तर केवल सीधे उत्सर्जन के कारण नहीं, बल्कि वायुमंडलीय रासायनिक अभिक्रियाओं से उत्पन्न होता है।

द्वितीयक प्रदूषकों के बारे में

  • ये वायु प्रदूषक स्रोतों से सीधे उत्सर्जित नहीं होते, बल्कि वायुमंडल में प्राथमिक प्रदूषकों के साथ रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से बनते हैं।
  • द्वितीयक प्रदूषकों के उदाहरण: अमोनियम सल्फेट और अमोनियम नाइट्रेट।
    • ये यौगिक दिल्ली में सर्दियों के दौरान PM2.5 का प्रमुख हिस्सा बनाते हैं।
  • गठन
    • SO उत्सर्जन (मुख्यतः कोयला जलाने और ईंट भट्ठों से) एरोसोल सतहों पर ऑक्सीकरण और गैस-चरण प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सल्फ्यूरिक एसिड (HSO) का निर्माण करते हैं।
    • इसके अलावा, NOx उत्सर्जन प्रकाश रासायनिकी और रात्रीकालीन ऑक्सीकरण के माध्यम से नाइट्रिक एसिड (HNO) का निर्माण करते हैं।
    • HSO और HNO दोनों अमोनिया (NH) के साथ अभिक्रिया करके अमोनियम सल्फेट और अमोनियम नाइट्रेट एरोसोल का निर्माण करते हैं।
  • अमोनिया की भूमिका: भारत में लगभग 80% अमोनिया उत्सर्जन उर्वरक के उपयोग और पशुपालन उपोत्पाद से उत्पन्न होता है, जिससे कृषि शहरी वायु प्रदूषण में का एक प्रमुख अप्रत्यक्ष कारक बन जाती है।
  • स्वास्थ्य प्रभाव: द्वितीयक PM2.5 कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश करते हैं, जिससे अस्थमा, COPD, फेफड़ों का कैंसर, हृदय और रक्त वाहिकाओं संबंधी रोगों, नेत्र संबंधी रोग और तीव्र श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

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