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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 29, 2026 04:05 24 0

‘बैक्ट्रियन’ ऊँट

दो बैक्ट्रियन ऊँट ‘गलवान’ और ‘नुब्रा’ ने वर्ष 2026 के गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सेना के ‘पशु दस्ते’ के अंतर्गत भाग लिया।

‘बैक्ट्रियन’ ऊँट के बारे में

  • बैक्ट्रियन ऊँट दो कूबड़ वाला ऊँट होता है, जो अत्यधिक शीत तथा शुष्क मरुस्थलीय परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए विशिष्ट रूप से अनुकूलित है।
  • उद्गम एवं पालन
    • इस प्रजाति का पालन-पोषण लगभग 5,000–6,000 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में हुआ था, विशेष रूप से वर्तमान उज्बेकिस्तान और पश्चिम कज़ाखस्तान के क्षेत्रों में।
    • इसका नाम बैक्ट्रिया (Bactria) से लिया गया है, जो मध्य एशिया की एक प्राचीन सभ्यता थी।
  • प्रजातियाँ एवं वितरण
    • पालतू बैक्ट्रियन ऊँट (Camelus bactrianus): इसका वितरण दक्षिणी यूक्रेन और मध्य-पूर्व से लेकर मंगोलिया तक पाया जाता है। ऐतिहासिक रूप से यह मध्य एशिया के घुमंतू समुदायों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है।
    • जंगली बैक्ट्रियन ऊँट (Camelus ferus): यह जंगली प्रजाति केवल चीन और मंगोलिया के कुछ पृथक क्षेत्रों में ही पाई जाती है। इसे विश्व के सबसे दुर्लभ बड़े स्तनधारियों में से एक माना जाता है।
    • भारत में बैक्ट्रियन ऊँट विशेष रूप से लद्दाख की नुब्रा घाटी में ही पाया जाता है, जिससे यह एक दुर्लभ एवं क्षेत्र-विशिष्ट प्रजाति बन जाता है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • दो कूबड़: इसके दोनों कूबड़ों में जल के स्थान पर वसा संचित रहती है, जो शीत मरुस्थलों में दीर्घकाल तक भोजन की अनुपलब्धता की स्थिति में ऊर्जा उत्पन्न करने में सहायक होती है।
    • रोम एवं शीत अनुकूलन: इसका लंबा एवं घना शीतकालीन रोआँ, उप-शून्य तापमान से संरक्षण प्रदान करता है, जो ग्रीष्म ऋतु में अधिक ताप से बचाव हेतु स्वाभाविक रूप से गिर जाते हैं।
      • यह रोआँ वस्त्र एवं रेशा उद्योग में व्यावसायिक दृष्टि से मूल्यवान होता है।
    • जल एवं लवणीयता सहनशीलता: यह प्रजाति एक बार में लगभग पैंतीस गैलन जल का सेवन कर सकती है तथा अधिकांश स्तनधारियों के विपरीत अत्यधिक खारे जल को भी सुरक्षित रूप से ग्रहण कर सकती है।
      • बैक्ट्रियन ऊँट न्यूनतम पसीना एवं मूत्र उत्सर्जन द्वारा जल की अत्यल्प हानि करते हैं तथा शुष्क मल का उत्सर्जन करते हैं।
    • आहार संबंधी व्यवहार
      • यद्यपि ये मुख्यतः शाकाहारी होते हैं, तथापि ‘बैक्ट्रियन’ ऊँट अत्यंत अवसरवादी आहारकर्ता होते हैं और काँटेदार, शुष्क तथा कड़वी वनस्पतियों का भी सेवन करते हैं, जिन्हें अन्य पशु सामान्यतः त्याग देते हैं।
      • भोजन की अत्यधिक कमी की परिस्थितियों में ये रस्सी, कपड़ा अथवा यहाँ तक कि पशु शव जैसे गैर-वनस्पति पदार्थों का भी उपभोग कर सकते हैं, जो इनकी असाधारण अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।
    • संवेदी संरक्षण: इनके नासिका छिद्र बंद किए जा सकने योग्य होते हैं तथा इनकी लंबी पलके होती हैं, जो स्टेपी एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में प्रचलित धूल तथा रेत के तूफानों से संरक्षण प्रदान करती हैं।
    • पाद संरचना: इनके चौड़े एवं गद्देदार पाँव भार को समान रूप से वितरित करते हैं, जिससे रेत में धँसने की संभावना न्यूनतम हो जाती है।
    • गमन शैली: इनमें ‘पेसिंग’ नामक गमन पद्धति पाई जाती है, जिसमें शरीर की एक ही ओर के अग्र तथा पश्च पैर एक साथ गतिशील होते हैं। ये लगभग 65 किलोमीटर प्रति घंटा तक की गति प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।
  • भारत में सांस्कृतिक महत्त्व
    • पार-एशियाई व्यापार में भूमिका: ‘बैक्ट्रियन’ ऊँट रेशम मार्ग के व्यापार के केंद्रीय आधार रहे हैं और जेड, घोड़े तथा वस्त्र जैसी वस्तुओं के परिवहन के कारण इन्हें “रेशम मार्ग के जहाज” की संज्ञा दी गई।
    • सांस्कृतिक आदान-प्रदान: इनके माध्यम से विचारों, धर्मों तथा विद्वानों का आवागमन संभव हुआ, जिनमें भारत और मध्य एशिया के मध्य यात्रा करने वाले बौद्ध भिक्षु भी सम्मिलित थे।
    • लद्दाख की व्यापारिक विरासत: यांत्रिक परिवहन के आगमन से पूर्व, लद्दाख में बैक्ट्रियन ऊँटों ने ट्रांस-हिमालयी व्यापार तथा संपर्क स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • संरक्षण स्थिति
    • जंगली ‘बैक्ट्रियन’ ऊँट को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ द्वारा अति संकटग्रस्त श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
    • खतरे: इसके प्रमुख खतरों में आवास क्षरण, जल की कमी, विषाक्त प्रदूषण, अवैध शिकार तथा पालतू ऊँटों के साथ संकरण शामिल हैं।
    • पालतू बैक्ट्रियन ऊँट: वैश्विक स्तर पर इसकी जनसंख्या दस लाख से अधिक होने के कारण, इस पालतू प्रजाति को संकटग्रस्त नहीं माना जाता।

‘लक्कुंडी’ गाँव

कर्नाटक के गदग जिले के लक्कुंडी गाँव में किए गए पुरातात्त्विक उत्खनन में नवपाषाण कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिससे ‘लक्कुंडी’ को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सूची में नामित किए जाने के प्रयासों को बल मिला है।

‘लक्कुंडी’ के बारे में

  • स्थान: ‘लक्कुंडी’ कर्नाटक के गदग जिले में स्थित है, जो गदग नगर से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है, तथा ऐतिहासिक रूप से इसे ‘लोक्किगुंडी’ के नाम से जाना जाता था।
  • प्राचीन पहचान: 11वीं–12वीं शताब्दी के अभिलेखों में लोक्किगुंडी का उल्लेख मिलता है, जहाँ इसकी समृद्धि की तुलना इंद्र की राजधानी अमरावती से की गई है।
  • राजनीतिक महत्त्व
    • चालुक्य, यादव तथा होयसलों द्वारा शासित
    • 1192 ईसवी में होयसल राजा एरदणे बल्लाल (वीरबल्लाल) की राजधानी।
  • आर्थिक केंद्र: “टंकशाले” (टकसाल) के लिए प्रसिद्ध, जो इसकी आर्थिक महत्ता को दर्शाता है।
  • ऐतिहासिक महत्त्व
    • लक्कुंडी 11वीं शताब्दी की जैन दानवीर रानी अत्तिमब्बे की “कर्मभूमि” थी।
    • उन्होंने मंदिरों, जैन बसदियों तथा कुओं का निर्माण कराया।
    • राज्य सरकार ने उनके सम्मान में “दान चिंतामणि अत्तिमब्बे प्रशस्ति” की स्थापना की है।
    • लक्कुंडी विशिष्ट “लक्कुंडी विद्यालय” की चालुक्य मंदिर स्थापत्य शैली के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसकी पहचान परिष्कृत मूर्तिकला एवं संरचनात्मक विशेषताओं से होती है।
  • स्थापत्य विरासत
    • इसे “सौ कुओं और मंदिरों का गाँव” कहा जाता था, जो उन्नत जल-प्रबंधन एवं मंदिर संस्कृति को दर्शाता है।
    • कुएँ जटिल नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं।
    • विद्यमान स्मारक: बॉम्बे स्टेट गजेटियर के अनुसार यहाँ 13 मंदिर हैं, जिनमें काशी विश्वेश्वर, मल्लिकार्जुन, विरूपाक्ष, मणिकेश्वर आदि सम्मिलित हैं।
    • शैली: मंदिर कल्याण चालुक्य स्थापत्य शैली को प्रतिबिंबित करते हैं।
    • दबी हुई संरचनाएँ: कई मंदिरों और कुओं के घरों एवं अन्य संरचनाओं के नीचे दबे होने की संभावना है।
  • पुरातात्त्विक खोजें
    • नवपाषाण कालीन मृदभांड: धूसर मृदा द्वारा निर्मित एक टूटा हुआ घड़ा, जिसे नवपाषाण (नव पाषाण युग) काल का माना जा रहा है, जो प्रारंभिक मानव बस्ती का संकेत प्रदान करता है।
    • पाषाण उपकरण
      • नवपाषाण उपकरण निर्माण परंपरा से संबंधित एक पत्थर की कुल्हाड़ी।
      • ‘क्रॉस-आकार’ के पत्थर का आधार।
    • कौड़ी शंख (कवड़े): दो से तीन कौड़ियों की प्राप्ति, जो प्रारंभिक विनिमय प्रथाओं अथवा आनुष्ठानिक उपयोग का संकेत देती है।
    • जैन धर्म से संबंध : जिन प्रतिमा से युक्त एक पत्थर का आधार प्राप्त हुआ है, जो मध्यकालीन काल में लक्कुंडी में जैन धर्म की सशक्त उपस्थिति की ओर संकेत करता है।
  • पवित्र स्थल की निरंतरता: ये निष्कर्ष स्तरित बस्ती को दर्शाते हैं, जिसमें नवपाषाण निवास के पश्चात् जैन एवं शैव संबंधी धार्मिक गतिविधियाँ विकसित हुईं।

खेलो इंडिया विंटर गेम्स (KIWG), 2026

खेलो इंडिया विंटर गेम्स (KIWG), 2026  लद्दाख चरण का समापन गणतंत्र दिवस के अवसर पर लेह स्थित NDS स्टेडियम में उच्च-तीव्रता आधारित प्रतिस्पर्द्धा के साथ हुआ।

खेलो इंडिया विंटर गेम्स के बारे में

  • प्रकृति: खेलो इंडिया विंटर गेम्स एक बहु-विषयक, राष्ट्रीय स्तर की विंटर गेम्स प्रतियोगिता है, जिसका उद्देश्य विंटर गेम्सों को प्रोत्साहित करना तथा शीत-जलवायु क्षेत्रों में भारत के प्रतिस्पर्द्धी खेल आधार का विस्तार करना है।
  • KIWG का आयोजन ‘खेलो इंडिया योजना’ के अंतर्गत किया जाता है, जो युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय की प्रमुख केंद्रीय क्षेत्र योजना है।
  • उद्देश्य: विंटर गेम्स का उद्देश्य खेल प्रतिभाओं की पहचान करना, प्रतिस्पर्द्धात्मक अनुभव प्रदान करना तथा विशेष रूप से हिमालयी एवं शीत-जलवायु क्षेत्रों में विंटर गेम्स संस्कृति को बढ़ावा देना है।
  • राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएँ: खेलो इंडिया योजना के अंतर्गत अनेक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, जिनमें शामिल हैं: 
    • खेलो इंडिया यूथ गेम्स
    • खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स
    • खेलो इंडिया विंटर गेम्स
    • खेलो इंडिया पैरा गेम्स
    • खेलो इंडिया बीच गेम्स
  • आयोजन प्राधिकरण: इन खेलों का आयोजन भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) द्वारा किया जाता है।

खेलो इंडिया विंटर गेम्स, 2026

  • स्थान: खेलो इंडिया विंटर गेम्स का छठा संस्करण, 2026 लेह (लद्दाख) तथा गुलमर्ग (जम्मू एवं कश्मीर) में आयोजित किया जा रहा है।
  • चरण-वार: खेलों का आयोजन दो अध्यायों में किया गया है, जिसमें भू-आकृतिक उपयुक्तता के आधार पर विभिन्न खेल विधाएँ अलग-अलग स्थानों पर आयोजित की जाती हैं।
    • चरण 1- आइस स्पोर्ट्स (लेह): इसमें आइस हॉकी तथा आइस स्केटिंग प्रतियोगिताएँ सम्मिलित हैं।
    • चरण 2- स्नो स्पोर्ट्स (गुलमर्ग): इसमें स्की माउंटेनियरिंग, अल्पाइन स्कीइंग, स्नोबोर्डिंग तथा नॉर्डिक स्कीइंग शामिल हैं।
  • ‘फिगर स्केटिंग’ को पहली बार खेलो इंडिया विंटर गेम्स कार्यक्रम में सम्मिलित किया गया है।

भारत–कनाडा मंत्रिस्तरीय ऊर्जा संवाद

भारत ऊर्जा सप्ताह 2026 (IEW’26), जो गोवा में आयोजित हुआ, के दौरान भारत और कनाडा ने ऊर्जा सहयोग पर एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया, जिससे भारत-कनाडा मंत्रिस्तरीय ऊर्जा संवाद का नवीनीकरण हुआ।

संयुक्त वक्तव्य के प्रमुख बिंदु

  • साझा आकलन: दोनों पक्षों ने यह पुष्टि की कि ऊर्जा सुरक्षा तथा आपूर्ति की विविधता आर्थिक स्थिरता, सार्वजनिक कल्याण और दीर्घकालिक विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • पूरक भूमिकाएँ
    • कनाडा: स्वच्छ एवं पारंपरिक ऊर्जा दोनों क्षेत्रों में निर्यात-विविधीकरण के साथ एक ऊर्जा महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखता है।
    • भारत: वैश्विक ऊर्जा माँग वृद्धि का केंद्रबिंदु है, जो आने वाले दो दशकों में वैश्विक ऊर्जा माँग वृद्धि के एक-तिहाई से अधिक के लिए उत्तरदायी होगा।
  • संयुक्त प्रतिबद्धता: दोनों देशों ने द्विपक्षीय ऊर्जा व्यापार को और गहरा करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की, जिसमें शामिल हैं
    • कनाडा से भारत को LNG, LPG तथा कच्चे तेल की आपूर्ति
    • भारत से कनाडा को परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति।
  • स्वच्छ ऊर्जा एवं जलवायु सहयोग
    • उत्सर्जन में कमी: पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्रों में उत्सर्जन घटाने हेतु सहयोग, जिसमें कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) शामिल है।
    • स्वच्छ ऊर्जा मूल्य शृंखलाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, तथा सतत् विमानन ईंधन (SAF) सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग।
  • संस्थागत एवं संवाद तंत्र
    • मंत्रिस्तरीय ऊर्जा संवाद: सरकार-से-सरकार (G2G) सतत् संवाद तथा नियमित विशेषज्ञ-स्तरीय सहयोग के प्रति प्रतिबद्धता।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी: ऊर्जा मूल्य शृंखला के समस्त चरणों में व्यवसाय-से-व्यवसाय (B2B) और व्यवसाय-से-सरकार (B2G) सहयोग को समर्थन।
    • वैश्विक सहभागिता: वैश्विक जलवायु उद्देश्यों को आगे बढ़ाने हेतु द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से निरंतर सहयोग।

भारत की ऊर्जा प्रस्थिति

  • विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता
  • चौथा सबसे बड़ा LNG आयातक
  • तीसरा सबसे बड़ा LPG उपभोक्ता
  • चौथी सबसे बड़ी परिष्करण क्षमता 

कनाडा की ऊर्जा क्षेत्र की स्थिति

  • स्वच्छ तथा पारंपरिक दोनों प्रकार की ऊर्जा में एक ऊर्जा महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखता है।
  • LNG परियोजनाओं का विस्तार, ट्रांस माउंटेन एक्सपेंशन (TMX) पाइपलाइन के माध्यम से एशिया को कच्चे तेल का निर्यात तथा पश्चिमी तट से LPG का निर्यात।
  • USD 116 बिलियन से अधिक मूल्य की ऊर्जा एवं संसाधन परियोजनाओं को शीघ्र स्वीकृति देने हेतु वर्ष 2025 में ‘मेजर प्रोजेक्ट्स ऑफिस’ की शुरुआत की गई।

लॉन्ग रेंज एंटीशिप हाइपरसोनिक मिसाइल

77वें गणतंत्र दिवस की परेड में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा पहली बार ‘लॉन्ग रेंज एंटीशिप हाइपरसोनिक मिसाइल’ (LR-AShM) को उसके प्रक्षेपक के साथ प्रदर्शित किया गया।

लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-AShM) के बारे में

  • प्रकृति: यह एक हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल है, जिसे भारतीय नौसेना की तटीय बैटरी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्वदेशी रूप से अभिकल्पित एवं विकसित किया गया है।
  • संचालनात्मक भूमिका
    • यह स्थिर एवं गतिशील दोनों प्रकार के समुद्री लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है।
    • इसका उद्देश्य समुद्री निषेध (सी डिनायल) अभियानों में उपयोग करना है, ताकि हिंद महासागर क्षेत्र जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में शत्रु के नौसैनिक आवागमन को प्रतिबंधित किया जा सके।
  • मारक क्षमता: LR-AShM की अनुमानित परिचालन सीमा लगभग 1,500 किलोमीटर है।
  • गति: यह मिसाइल हाइपरसोनिक श्रेणी में कार्य करती है, जिसकी गति मैक 10 तक हो सकती है, जबकि इसका ग्लाइड चरण मैक 5 से अधिक की गति बनाए रखता है, जिससे शत्रु की प्रतिक्रिया समय अत्यंत सीमित हो जाता है।
  • पथ संबंधी विशेषताएँ: यह एक सेमी-बैलिस्टिक पथ का अनुसरण करती है।
    • प्रारंभ में यह बैलिस्टिक चरण में प्रवेश करती है।
    • निम्न ऊँचाई पर उड़ान भरती है।
    • अवरोधन से बचने हेतु उड़ान के दौरान दिशा परिवर्तन करने में सक्षम है।
  • प्रणोदन प्रणाली: इसमें द्वि-चरणीय ठोस ईंधन रॉकेट मोटर संलग्न है:
    • प्रथम चरण: मिसाइल को हाइपरसोनिक वेग तक पहुँचाकर पृथक हो जाता है।
    • द्वितीय चरण: मिसाइल को और अधिक वेग प्रदान करता है।
    • द्वितीय चरण के समाप्त होने के पश्चात् मिसाइल वायुमंडलीय गति के साथ हाइपरसोनिक ग्लाइड निष्पादित करती है।
  • पता लगाने में कठिनाई: निम्न ऊँचाई पर उच्च गति एवं उच्च गतिशीलता के साथ उड़ान के कारण शत्रु के स्थल-आधारित एवं पोत-आधारित रडारों द्वारा इसका पता लगाना अत्यंत कठिन हो जाता है।
  • तैनाती में लचीलापन: प्रारंभिक रूप से LR-AShM को भूमि-आधारित मोबाइल प्रक्षेपकों के लिए विन्यासित किया गया है, जबकि भविष्य में पोत-आधारित तथा वायु-प्रक्षेपित संस्करणों की भी परिकल्पना की गई है।

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