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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 30, 2026 02:27 21 0

संपूर्णता अभियान 2.0

नीति आयोग ने देशभर के आकांक्षी जिलों और आकांक्षी प्रखंडों में संपूर्णता अभियान 2.0 का शुभारंभ किया है।

  • यह अभियान देश के आकांक्षी जिलों में 5 प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों तथा आकांक्षी प्रखंडों में 6 प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों की पूर्ण संतृप्तता प्राप्त करने हेतु एक सतत् प्रयास के रूप में प्रारंभ किया गया है।

संपूर्णता अभियान 2.0 के बारे में

  • संपूर्णता अभियान 2.0 नीति आयोग द्वारा 28 जनवरी से 14 अप्रैल, 2026 तक प्रारंभ किया गया एक 3-महीने का राष्ट्रीय अभियान है।
  • पृष्ठभूमि: यह संपूर्णता अभियान (2024) की सफलता पर आधारित है, जिसने केंद्रित एवं समयबद्ध हस्तक्षेपों के माध्यम से सशक्त परिणाम प्रदर्शित किए थे।
  • कवरेज: भारत के 112 आकांक्षी जिले और 513 आकांक्षी प्रखंड।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य आकांक्षी जिला एवं आकांक्षी प्रखंड कार्यक्रम के अंतर्गत चयनित प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों (KPIs) की पूर्ण संतृप्ति (100% कवरेज) प्राप्त करना है, तथा यह निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित है:
    • स्वास्थ्य और पोषण
    • स्वच्छता और शिक्षा
    • पशुधन एवं संबद्ध क्षेत्र
  • क्रियान्वयन: नीति आयोग, केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों तथा राज्य और केंद्रशासित प्रदेश सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से क्रियान्वित।

आकांक्षी प्रखंडों के प्रमुख प्रदर्शन संकेतक

  • बाल पोषण: एकीकृत बाल विकास सेवाओं के अंतर्गत 6 माह–6 वर्ष आयु वर्ग के उन बच्चों का प्रतिशत, जिन्हें नियमित रूप से पूरक पोषण प्राप्त हो रहा है।
  • विकास निगरानी: आंगनवाड़ी केंद्रों में नामांकित बच्चों की माप-तौल संबंधी दक्षता
  • स्वच्छता: कार्यात्मक शौचालयों वाले संचालित आंगनवाड़ी केंद्रों का प्रतिशत।
  • पेयजल: सुरक्षित पेयजल सुविधाओं वाले आंगनवाड़ी केंद्रों का प्रतिशत।
  • शैक्षणिक अवसंरचना: पर्याप्त बालिका शौचालय सुविधाओं वाले विद्यालयों का प्रतिशत।
  • पशुधन स्वास्थ्य: खुरपका-मुँहपका रोग के विरुद्ध टीकाकृत गोवंशीय पशुओं का प्रतिशत।

आकांक्षी जिलों के प्रमुख प्रदर्शन संकेतक

  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य: जन्म के समय तौले गए जीवित शिशुओं का अनुपात।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य: अनुमानित मामलों की तुलना में तपेदिक (टीबी) मामलों की अधिसूचना दर (सार्वजनिक एवं निजी)
  • निवारक स्वास्थ्य सेवा: पिछले एक माह में आंगनवाड़ी केंद्रों या शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा कम-से-कम एक ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस/शहरी स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस का आयोजन।
  • विद्यालय अवसंरचना: कार्यात्मक बालिका शौचालयों वाले विद्यालयों का प्रतिशत।
  • पशु स्वास्थ्य: समग्र पशु टीकाकरण कवरेज।

क्रियान्वयन रणनीति

  • प्रत्येक जिला एवं प्रखंड द्वारा 3-महीने की कार्य योजना का निर्माण।
  • संतृप्ति की दिशा में प्रगति की मासिक निगरानी।
  • समुदाय स्तर पर जागरूकता एवं व्यवहार-परिवर्तन अभियान।
  • जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा समवर्ती क्षेत्रीय निगरानी भ्रमण।

भारत ऊर्जा सप्ताह 2026

वर्ल्ड ऑयल आउटलुक, 2025 के अनुसार, भारत ऊर्जा सप्ताह 2026 में प्रस्तुत आकलन के अनुसार, वर्ष 2050 तक वैश्विक तेल माँग वृद्धि में भारत के सबसे बड़े योगदानकर्ता बनने का अनुमान है।

भारत ऊर्जा सप्ताह, 2026

  • भारत ऊर्जा सप्ताह 2026 भारत का वार्षिक प्रमुख वैश्विक ऊर्जा सम्मेलन एवं प्रदर्शनी का चौथा संस्करण है।
  • स्थान: गोवा।
  • नोडल मंत्रालय : पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय।
  • प्रमुख क्षेत्र: हाइड्रोजन, जैव ईंधन, द्रवीकृत प्राकृतिक गैस, नवीकरणीय ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता/डिजिटल ऊर्जा, सिटी गैस वितरण, पेट्रो-रसायन, तथा शुद्ध-शून्य समाधान।

वर्ल्ड ऑयल आउटलुक

  • वर्ल्ड ऑयल आउटलुक एक दीर्घकालिक ऊर्जा रिपोर्ट है, जिसे पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है।
  • उद्देश्य: भविष्य की वैश्विक ऊर्जा माँग वृद्धि का आकलन करना तथा ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु तेल एवं गैस क्षेत्र में निवेश आवश्यकताओं को रेखांकित करना।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • वर्ष 2050 तक की अवधि के लिए वैश्विक तेल एवं ऊर्जा बाजारों का दीर्घकालिक आकलन प्रस्तुत करता है।
    • तेल माँग, आपूर्ति, निवेश, प्रौद्योगिकी एवं नीतियों में प्रवृत्तियों का विश्लेषण करता है।
    • विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच अंतर पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है।
  • वर्ल्ड ऑयल आउटलुक, 2025 के प्रमुख निष्कर्ष
    • वर्ष 2050 तक तेल माँग वृद्धि का सबसे बड़ा प्रेरक भारत होगा, जो वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक होगा; इसका कारण परिवहन, पेट्रो-रसायन तथा औद्योगिक विस्तार है।
    • वैश्विक तेल माँग: माँग वृद्धि का संकेंद्रण मुख्यतः विकासशील देशों में होगा, जो असमान ऊर्जा संक्रमण को दर्शाता है।
    • तेल एवं गैस: परिदृश्य बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में तेल एवं गैस के निरंतर महत्त्व को रेखांकित करता है।

क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा

भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान (BISAG-N) ने क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा समाधानों पर सहयोग हेतु क्यू-एन-यू लैब्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा के बारे में

  • क्वांटम सुरक्षा संगणनात्मक सुरक्षा से भौतिकी आधारित सुरक्षा की ओर मूल संक्रमण को चिह्नित करती है, जो भविष्य के उच्च-स्तरीय साइबर खतरों से निपटने में सहायक है।
  • क्वांटम यांत्रिकी पर आधारित: यह अध्यारोपण, अंतःसंलग्नता तथा अनिश्चितता जैसे सिद्धांतों का उपयोग करती है, जिनका कोई शास्त्रीय समकक्ष नहीं है।
  • क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन: यह क्वांटम सुरक्षा का सर्वाधिक परिपक्व अनुप्रयोग है, जो क्वांटम अवस्थाओं के माध्यम से सुरक्षित की डिस्ट्रीब्यूशन को सक्षम बनाता है।
  • निर्विकल्प सुरक्षा: पारंपरिक विधियों के विपरीत, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन संगणनात्मक जटिलता पर नहीं बल्कि भौतिकी के नियमों द्वारा सुनिश्चित सुरक्षा प्रदान करता है।
  • गोपनीय निगरानी का पता लगाना: किसी भी प्रकार का अवरोधन क्वांटम अनिश्चितता के कारण क्वांटम अवस्था को परिवर्तित कर देता है, जिससे वैध उपयोगकर्ताओं को तत्काल सूचना प्राप्त हो जाती है।
  • भविष्य-सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना: क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना, रक्षा तथा वित्तीय प्रणालियों को अगली पीढ़ी के हमलों से सुदृढ़ बनाती है।

समझौता ज्ञापन की प्रमुख विशेषताएँ

  • उद्देश्य: सहयोग एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से भारत की क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा क्षमताओं को सशक्त करना।
    • सरकारी प्रणालियों, रक्षा नेटवर्क, महत्त्वपूर्ण अवसंरचना तथा सार्वजनिक क्षेत्र के मंचों की सुरक्षा का लक्ष्य।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण: भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान के स्वदेशी क्रिप्टोग्राफिक सॉफ्टवेयर “वैदिक कवच” को क्यू-एन-यू लैब्स के क्वांटम हार्डवेयर एवं सुरक्षित अवसंरचना के साथ एकीकृत किया जाएगा।
    • यह हार्डवेयर-आधारित, क्वांटम-सुरक्षित सुरक्षा समाधानों को सक्षम बनाता है।
  • संबद्ध संस्थान
    • भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान  (BISAG-N)
      • इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्थान।
      • स्वदेशी क्रिप्टोग्राफिक सॉफ्टवेयर तथा सुरक्षित डिजिटल मंचों के लिए प्रसिद्ध।
    • क्यू-एन-यू लैब्स प्राइवेट लिमिटेड
      • क्वांटम साइबर सुरक्षा हार्डवेयर एवं समाधानों पर केंद्रित एक भारतीय गहन-प्रौद्योगिकी कंपनी।
      • भारत-प्रथम एवं स्वदेशी प्रौद्योगिकी दृष्टिकोण का अनुसरण करती है।

तुलु भाषा 

कर्नाटक अनुच्छेद-345 के अंतर्गत तुलु भाषा को अपनी द्वितीय राजकीय भाषा घोषित करने पर विचार कर रहा है।

तुलु भाषा के बारे में

  • तुलु एक प्राचीन द्रविड़ भाषा है, जो मुख्यतः कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ एवं उडुपी जिलों तथा केरल के कुछ भागों में बोली जाती है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • 3000 वर्षों से अधिक का इतिहास।
    • विशिष्ट लिपि-तिगलारी
    • समृद्ध मौखिक साहित्य, लोककथाएँ तथा आनुष्ठानिक परंपराएँ।
  • उपयोग: तुलु अकादमियों द्वारा समर्थित विश्वविद्यालयों में तुलु भाषा का शिक्षण।
    • यह गूगल अनुवाद में भी सम्मिलित है, जिससे डिजिटल संरक्षण को बल मिलता है।
  • समकालीन प्रासंगिकता: यह तुलुव समुदाय के लिए सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

भारत में राज्यों की राजकीय भाषाएँ

  • भारत में राज्य प्रशासनिक एवं आधिकारिक प्रयोजनों हेतु एक या अधिक राजकीय भाषाएँ अपना सकते हैं, जो भाषायी विविधता एवं संघीय लचीलेपन को प्रतिबिंबित करता है।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-345 राज्य विधानमंडलों को राज्य में प्रचलित किसी भी भाषा को राजकीय भाषा के रूप में अपनाने का अधिकार प्रदान करता है।
    • आठवीं अनुसूची में सम्मिलित होना आवश्यक नहीं है (तुलु अनुसूचित भाषाओं में सूचीबद्ध नहीं है)।
  • द्वितीय राजकीय भाषा मॉडल: प्राथमिक राजकीय भाषा को विस्थापित किए बिना प्रशासनिक समावेशन प्रदान करता है।
    • आंध्र प्रदेश: उर्दू को द्वितीय राजकीय भाषा घोषित किया गया।
    • पश्चिम बंगाल: अधिसूचित क्षेत्रों में अतिरिक्त भाषाओं का प्रयोग।

तुलु को राजकीय भाषा घोषित करने का महत्त्व

  • भाषायी समावेशन एवं सांस्कृतिक मान्यता को सुदृढ़ करता है।
  • स्थानीय शासन एवं नागरिक सहभागिता को मजबूत करता है।
  • भारत की “विविधता में एकता” की संवैधानिक भावना के अनुरूप है।

4B मूवमेंट  

दक्षिण कोरिया से उत्पन्न 4B मूवमेंट ने जड़ जमाए पितृसत्ता और लैंगिक आधारित हिंसा के विरुद्ध एक उग्र नारीवादी प्रतिक्रिया के रूप में पुनः सार्वजनिक विमर्श उत्पन्न किया है।

4B मूवमेंट क्या है?

4B मूवमेंट दक्षिण कोरिया से उत्पन्न एक नारीवादी राजनीतिक आंदोलन है, जिसमें महिलाएँ उन पारंपरिक विषमलैंगिक संस्थाओं में सामूहिक रूप से भागीदारी से इनकार करती हैं, जिन्हें पितृसत्ता को सुदृढ़ करने वाला माना जाता है।

चार ‘Nos’

  • विवाह नहीं (बिहोन): विवाह को एक ऐसी संस्था के रूप में अस्वीकार करना, जो प्रायः अवैतनिक देखभाल कार्य और असमान शक्ति संबंधों को संस्थागत बनाती है।
  • संतानोत्पत्ति नहीं (बिचुलसान): सामाजिक दबावों के बीच मातृत्व से इनकार, जो महिलाओं को केवल प्रजनन भूमिकाओं तक सीमित कर देता है।
  • डेटिंग नहीं (बियेओनाए): उन डेटिंग संस्कृतियों से दूरी, जो भावनात्मक श्रम और लैंगिक अपेक्षाओं को सामान्य बनाती हैं।
  • यौन संबंध नहीं (बिसेक्सु): दबाव और अधिकार-बोध के विरुद्ध प्रतिरोध के रूप में यौन संबंधों को अस्वीकार करना।

मूवमेंट के पीछे तर्क

  • संरचनात्मक पितृसत्ता: विवाह, परिवार और डेटिंग को अवैतनिक श्रम, घटती स्वायत्तता और प्रणालीगत लैंगिक असमानता की ओर ले जाने वाली प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाता है।
  • लैंगिक हिंसा और स्त्री-द्वेष के प्रति प्रतिक्रिया: यह मूवमेंट बढ़ते स्त्री-द्वेष, ऑनलाइन उत्पीड़न, महिला हत्या और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संस्थागत उदासीनता की पृष्ठभूमि में उभरा।
  • राजनीतिक, व्यक्तिगत नहीं, प्रतिरोध: 4B एक सामूहिक रूप से अस्वीकारण संबंधी मूवमेंट है, जिसका उद्देश्य उन प्रणालियों से सहभागिता वापस लेना है, जिन्हें मूलतः शोषणकारी माना जाता है, न कि इसे जीवनशैली विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना।

4B मूवमेंट संयम और सहभागिता-त्याग को राजनीतिक असहमति के उपकरण के रूप में पुनर्परिभाषित करता है तथा आधुनिक समाजों में गहराई से निहित लैंगिक मानदंडों को चुनौती देता है।

‘रजोनिवृत्ति’ क्लीनिक

महाराष्ट्र ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में महिलाओं के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत करते हुए भारत की पहली सरकार-संचालित समर्पित ‘रजोनिवृत्ति क्लीनिकों’ (Menopause clinics) की शुरुआत की है।

रजोनिवृत्ति (Menopause) के बारे में 

  • रजोनिवृत्ति एक प्राकृतिक जैविक संक्रमण है, जो महिला के प्रजनन चरण के अंत को चिह्नित करता है। यह सामान्यतः 45–55 वर्ष की आयु के बीच घटित होता है और मासिक धर्म के स्थायी रूप से समाप्त होने से पहचाना जाता है।
  • संबद्ध स्वास्थ्य समस्याएँ
    • हार्मोनल और शारीरिक परिवर्तन: नींद में व्यवधान, थकान तथा हार्मोनल असंतुलन, जो दैनिक कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं।
    • अस्थि और हृदय संबंधी जोखिम: एस्ट्रोजन स्तर में गिरावट के कारण ऑस्टियोपोरोसिस और हृदय रोगों के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि।
    • मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य: संक्रमण काल के दौरान चिंता, अवसाद, मनोदशा में उतार-चढ़ाव और मनोवैज्ञानिक तनाव की अधिक घटनाएँ।

 रजोनिवृत्ति क्लीनिक के बारे में

  • महाराष्ट्र ने सरकारी अस्पतालों और शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में विशेष रजोनिवृत्ति क्लीनिक स्थापित किए हैं, जिससे वह केंद्रित रजोनिवृत्ति देखभाल को संस्थागत रूप देने वाला पहला राज्य बन गया है।
  • उद्देश्य
    • स्त्री-रोग, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली मार्गदर्शन को समाहित करते हुए एकीकृत चिकित्सकीय परामर्श प्रदान करना।
    • अस्थि, हृदय और हार्मोनल विकारों की जाँच तथा शीघ्र पहचान सुनिश्चित करना।
    • एक ही सुलभ स्थान पर औषधियाँ, परामर्श और स्वास्थ्य शिक्षा उपलब्ध कराना।
  • पहल की आवश्यकता
    • रजोनिवृत्ति एक उपेक्षित और कम चर्चित चरण बना हुआ है, जहाँ संरचित सार्वजनिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव है।
    • उपेक्षा और कम जागरूकता के कारण महिलाएँ प्रायः अनुपचारित शारीरिक असुविधा और मानसिक पीड़ा का सामना करती हैं।
    • समर्पित क्लीनिक गरिमा, निवारक देखभाल और लैंगिक संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देते हैं, जो महिला-केंद्रित सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों के अनुरूप है।
  • महत्त्व: यह पहल अन्य राज्यों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करती है, निवारक स्वास्थ्य देखभाल को सुदृढ़ करती है और प्रजनन वर्षों से आगे महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को संबोधित करती है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 को केंद्रीय बजट से पूर्व 29 जनवरी, 2026 को संसद में प्रस्तुत किया गया, जिसमें भारत के आर्थिक प्रदर्शन और परिदृश्य का ढाँचा प्रस्तुत किया गया है।

आर्थिक सर्वेक्षण के बारे में

  • आर्थिक सर्वेक्षण भारत सरकार का वार्षिक प्रमुख नीतिगत दस्तावेज है, जो पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान व्यापक आर्थिक प्रवृत्तियों, क्षेत्रीय प्रदर्शन और संरचनात्मक सुधारों की समीक्षा करता है।
  • उत्पत्ति: इसे पहली बार वर्ष 1950–51 में आर्थिक प्रदर्शन का अवलोकन प्रस्तुत करने हेतु केंद्रीय बजट के एक भाग के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
    • वर्ष 1964 में इसे बजट से पृथक कर दिया गया और तब से इसे वार्षिक रूप से, सामान्यतः बजट से एक दिन पूर्व, आर्थिक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने हेतु प्रस्तुत किया जाता है।
  • संयोजन: सर्वेक्षण का संकलन वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग द्वारा मुख्य आर्थिक सलाहकार और उनकी टीम के मार्गदर्शन में किया जाता है।
  • प्रस्तुतीकरण: इसे बजट सत्र के दौरान औपचारिक रूप से केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण की विषयवस्तु
    • अर्थव्यवस्था की स्थिति: विकास प्रवृत्तियाँ, मुद्रास्फीति, रोजगार, राजकोषीय स्थिति और बाह्य क्षेत्र का प्रदर्शन।
    • क्षेत्रीय विश्लेषण: कृषि, उद्योग, सेवा, अवसंरचना और वित्तीय क्षेत्र के विकास का आकलन।
    • नीतिगत दृष्टिकोण: मध्यम अवधि की आर्थिक चुनौतियाँ, सुधार प्राथमिकताएँ और विकास के प्रति जोखिम।
    • आँकड़े और साक्ष्य: नीतिगत अनुशंसाओं के समर्थन हेतु आँकड़ों, आलेखों और अनुभवजन्य विश्लेषण का व्यापक उपयोग।

आर्थिक सर्वेक्षण एक निदानात्मक उपकरण और नीतिगत मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है, जो बजट की प्राथमिकताओं को आकार देता है तथा संसद, नीति-निर्माताओं और अभ्यर्थियों को भारत की आर्थिक दिशा के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

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