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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal March 02, 2026 04:19 12 0

INS अंजदीप 

 

भारतीय नौसेना ने तटीय पनडुब्बी-रोधी युद्धक क्षमता तथा तटीय (लिटोरल) सुरक्षा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से चेन्नई में INS अंजदीप को नौसेना में सम्मिलित (commission) किया गया है।

INS अंजदीप के बारे में

  • INS अंजदीप एक स्वदेशी रूप से अभिकल्पित एंटी-सबमरीन वॉरफेयर – शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) है, जिसका नाम अंजदीप द्वीप के नाम पर रखा गया है। इसे तटीय जलक्षेत्र में शत्रु पनडुब्बियों का पता लगाने, उनका अनुगमन करने तथा उन्हें निष्प्रभावी करने के लिए निर्मित किया गया है।
    • यह आठ पोतों के निर्माण की पनडुब्बी-रोधी परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य तटीय क्षेत्र में भारत की समुद्री रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना है।

INS अंजदीप की विशेषताएँ

  • स्वदेशी अभिकल्पना एवं निर्माण: INS अंजदीप का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा किया गया है। इसमें 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो नौसैनिक पोत निर्माण एवं रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता को प्रतिबिंबित करता है।
  • प्लेटफॉर्म की विशेषताएँ: यह पोत 77 मीटर लंबा है तथा इसका अनुमानित विस्थापन लगभग 1,400 टन है। यह 25 नॉट की अधिकतम गति प्राप्त करने में सक्षम है, जिससे यह तटीय एवं उथले जल क्षेत्रों में त्वरित प्रतिक्रिया के लिए उपयुक्त सिद्ध होता है।
  • उन्नत पनडुब्बी-रोधी सेंसर एवं आयुध: यह पोत ‘अभय’ नामक हुल-माउंटेड सोनार (Hull Mounted Sonar) सहित आधुनिक उथली जल सोनार प्रणालियों, हल्के टॉरपीडो तथा स्वदेशी रूप से विकसित पनडुब्बी-रोधी रॉकेटों से सुसज्जित है। ये सभी प्रणालियाँ जलमग्न खतरों का प्रभावी ढंग से पता लगाने तथा उन्हें निष्प्रभावी करने में सक्षम बनाती हैं।
  • बहु-भूमिका परिचालन क्षमता: पनडुब्बी-रोधी युद्धक भूमिका के अतिरिक्त, इस पोत में एक उन्नत युद्ध प्रबंधन प्रणाली है और यह तटीय निगरानी, ​​निम्न-तीव्रता समुद्री अभियान (LIMO) और खोज एवं बचाव (SAR) मिशनों में सहायक हो सकता है।

महत्त्व

INS अंजदीप भारत की तटीय रक्षा संरचना को सुदृढ़ करता है तथा रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में हुई प्रगति को प्रतिबिंबित करता है। साथ ही, यह वर्ष 2035 तक 200 से अधिक युद्धपोतों वाली नौसेना बनने के भारतीय नौसेना के दृष्टिकोण को समर्थन प्रदान करता है।

अंजदीप द्वीप के बारे में

  • अंजदीप द्वीप अरब सागर में कारवार तट के समीप स्थित है तथा गोवा का हिस्सा है।
  • यह द्वीप ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 1498 में वास्को द गामा ने भारत की अपनी प्रथम यात्रा के दौरान इसे पुर्तगाली साम्राज्य के लिए अधिगृहीत किया था।
  • महत्त्व: अरब सागर में इसकी सामरिक स्थिति समुद्री दृष्टि से इसके महत्त्व को रेखांकित करती है तथा यह भारत की ऐतिहासिक एवं समकालीन नौसैनिक विरासत का प्रतीक है।

भारत की पहली अमोर्फस मेटल निर्माण इकाई 

जापान स्थित कंपनी प्रोटीरियल (Proterial), आंध्र प्रदेश के श्री सिटी में भारत की पहली अमोर्फस मेटल (Amorphous Metal) निर्माण इकाई स्थापित करने हेतु 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगी।

अमोर्फस मेटल निर्माण इकाई के बारे में

  • प्रोटीरियल आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले के श्री सिटी में देश की पहली अमोर्फस मेटल सामग्री निर्माण इकाई स्थापित करेगी। इसका उद्देश्य उच्च दक्षता वाले ट्रांसफॉर्मर सामग्री की बढ़ती घरेलू माँग को पूरा करना है।
  • इकाई की प्रमुख विशेषताएँ
    • प्रथम चरण (Phase-I) की क्षमता: प्रतिवर्ष 30,000 टन, जिसे आगे चलकर कुल 1 लाख टन वार्षिक क्षमता तक विस्तारित किया जाएगा।
    • उत्पादन प्रारंभ: वर्ष 2026 के अंत तक उत्पादन आरंभ होने की अपेक्षा है।
    • स्थापना का आधार: यह परियोजना भारत सरकार की विशेष कर स्टील के लिए पीएलआई योजना के अंतर्गत स्थापित की जा रही है।
  • महत्त्व: यह परियोजना वर्तमान में 60,000–70,000 टन वार्षिक माँग के संदर्भ में भारत की 100 प्रतिशत आयात निर्भरता को कम करेगी।
    • साथ ही, यह ट्रांसफॉर्मरों की दक्षता में वृद्धि, विशेष इस्पात (Specialty Steel) के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन तथा क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार सृजन एवं आधारभूत संरचना के विकास में सहायक होगी।

अमोर्फस मेटल के बारे में

  • अमोर्फस मेटल एक अक्रिस्टलीय (non-crystalline) विद्युत-ग्रेड इस्पात है, जिसका उपयोग मुख्यतः ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए पावर ट्रांसफॉर्मरों में किया जाता है।
  • विशेषताएँ
    • पारंपरिक स्फटिकीय इस्पात के विपरीत, इसमें अव्यवस्थित परमाणविक संरचना होती है।
    • पारंपरिक सिलिकॉन इस्पात की तुलना में मुख्य हानियाँ उल्लेखनीय रूप से कम होती हैं।
    • ट्रांसफॉर्मर की दक्षता में लगभग 60% तक सुधार कर सकता है तथा निष्क्रिय अवस्था में होने वाली ऊर्जा हानि को लगभग एक-तिहाई तक घटा सकता है।
  • अनुप्रयोग
    • विद्युत वितरण ट्रांसफॉर्मर
    • ऊर्जा-कुशल विद्युत उपकरण
    • विद्युत ग्रिड का आधुनिकीकरण तथा नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण

मेनिंगोकोकल रोग  (Meningococcal Disease)

मेघालय सरकार ने शिलांग में दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की संदिग्ध मेनिंगोकोकल संक्रमण से मृत्यु के बाद स्वास्थ्य परामर्श जारी किया है, जिसके तहत निगरानी और निवारक उपायों को सुदृढ़ किया गया है।

मेनिंगोकोकल रोग के बारे में

  • मेनिंगोकोकल रोग एक गंभीर एवं तीव्र गति से फैलने वाला जीवाणुजनित संक्रमण है, जो नाइसेरिया मेनिंगिटिडिस (Neisseria meningitidis) नामक जीवाणु के कारण होता है।
  • यह मेनिनजाइटिस (मस्तिष्क और मेरुदंड को आवृत करने वाली झिल्लियों का संक्रमण) या मेनिंगोकोसीमिया (रक्त प्रवाह का संक्रमण) का कारण बन सकता है।
    • यह रोग अचानक प्रारंभ होने और समय पर उपचार न मिलने पर उच्च मृत्यु-दर के लिए जाना जाता है।
  • संक्रमण का प्रसार: यह संक्रमण श्वसन बूँदों तथा निकट व्यक्तिगत संपर्क—जैसे खाँसी, छींक या बर्तनों के साझा उपयोग के माध्यम से फैलता है।
    • यह छात्रावासों, सैन्य बैरकों और प्रशिक्षण केंद्रों जैसे भीड़भाड़ वाले स्थानों में अधिक सामान्य है।
    • संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क में रहने वालों को अधिक जोखिम होता है, जिसके कारण संपर्क अनुगमन और निवारक औषधि प्रदान करना आवश्यक हो जाता है।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव मेनिंगोकोकल रोग अत्यंत तीव्र गति से बढ़ता है और निम्नलिखित लक्षण उत्पन्न कर सकता है:
    • उच्च ज्वर और तीव्र सिरदर्द
    • गर्दन में अकड़न तथा वमन
    • दबाव देने पर फीका न पड़ने वाला बैंगनी चकत्ता
    • उन्नत अवस्था में रक्त परिसंचरण में अवरोधन, आघात तथा बहु-अंग विफलता।
  • मृत्यु-दर: तत्काल प्रतिजैविक उपचार न मिलने पर यह रोग कुछ ही घंटों में मृत्यु का कारण बन सकता है।
  • दीर्घकालिक प्रभाव: जीवित बचे रोगियों में तंत्रिका संबंधी क्षति, श्रवण हानि अथवा अंग-विच्छेदन जैसी दीर्घकालिक जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • रोकथाम
    • टीकाकरण (मुख्य जीवाणु समूहों के विरुद्ध प्रभावी)
    • शीघ्र पहचान और तत्काल प्रतिजैविक उपचार
    • प्रकोप के दौरान भीड़भाड़ वाले स्थानों से परहेज
    • श्वसन स्वच्छता का पालन और बार-बार हाथ धोना।

त्वरित सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी तथा निकट संपर्कों का पृथक्करण, प्रकोप नियंत्रण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

डिजिटल खाद्य मुद्रा पायलट

भारत ने पुडुचेरी में केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) आधारित डिजिटल खाद्य मुद्रा का एक पायलट प्रारंभ किया है, जिसके माध्यम से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत सब्सिडी को प्रोग्राम योग्य डिजिटल रुपये (ई₹) वॉलेट के जरिए वितरित किया जा रहा है।

डिजिटल खाद्य मुद्रा पायलट के बारे में

  • केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत खाद्य सब्सिडी के वितरण हेतु केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा का उपयोग करते हुए एक पायलट परियोजना प्रारंभ की है। इसके अंतर्गत लाभार्थियों को डिजिटल रुपये (e₹) वॉलेट के माध्यम से राशि प्रदान की जाती है।
    • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना मार्च 2020 में प्रारंभ की गई एक प्रमुख खाद्य सुरक्षा कल्याण योजना है, जिसके अंतर्गत 80 करोड़ से अधिक गरीब एवं वंचित नागरिकों को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है।
  • उद्देश्य: इस पहल का लक्ष्य पारदर्शिता बढ़ाना, भ्रष्टाचार को कम करना तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से खाद्य सब्सिडी के उद्देश्यपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • सब्सिडी को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी प्रोग्राम योग्य डिजिटल कूपन (e₹) के रूप में जमा किया जाता है।
    • यह केवल उचित मूल्य की दुकानों और अधिकृत विक्रेताओं से खाद्यान्न खरीदने हेतु प्रयोज्य है।
    • जन धन–आधार–मोबाइल (JAM) ढाँचे के साथ एकीकृत।
    • स्मार्टफोन और साधारण मोबाइल फोन दोनों उपयोगकर्ताओं के लिए सुलभ।
    • लाभार्थियों को अधिकृत दुकानों का डिजिटल माध्यम से पता लगाने की सुविधा प्रदान करता है।
  • महत्त्व: यह सुधार भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को सुदृढ़ करता है, लक्षित वितरण की दक्षता बढ़ाता है, पोषण सुरक्षा (जिसमें मोटे अनाज भी शामिल हैं) को प्रोत्साहित करता है तथा 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों के लिए डिजिटल वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देता है।

केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) – ई-रुपया

  • केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) संप्रभु मुद्रा का डिजिटल रूप है, जिसे केंद्रीय बैंक द्वारा जारी और विनियमित किया जाता है। यह अस्थिर एवं विकेंद्रीकृत क्रिप्टोकरेंसी से भिन्न होती है।
  • प्रारंभ: भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष 2022 में पायलट कार्यक्रमों के माध्यम से डिजिटल रुपया (e₹) की शुरुआत की।
    • थोक खंड (e₹-W) का शुभारंभ 1 नवंबर, 2022 को हुआ, जबकि खुदरा खंड (e₹-R) 1 दिसंबर, 2022 को प्रारंभ किया गया।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • केंद्रीय बैंक द्वारा समर्थित वैध मुद्रा का दर्जा।
    • बैंक-प्रदत्त डिजिटल वॉलेट के माध्यम से व्यक्ति-से-व्यक्ति तथा व्यक्ति-से-व्यापारी लेन-देन हेतु उपलब्ध।
    • कम संपर्क आधारित क्षेत्रों में ऑफलाइन लेन-देन का समर्थन।
    • सब्सिडी एवं कूपन जैसे लक्षित भुगतान के लिए प्रोग्राम योग्य।

महत्त्व 

CBDC भुगतान दक्षता को बढ़ाती है, लेन-देन लागत को कम करती है, वित्तीय समावेशन को सुदृढ़ करती है तथा सुरक्षित एवं पारदर्शी सरकारी अंतरण को समर्थन प्रदान करती है।

राजस्थान ने स्थानीय निकाय चुनाव में दो-संतान मानदंड को समाप्त किया

 

राजस्थान मंत्रिमंडल ने स्थानीय निकाय चुनावों से पूर्व पंचायती राज एवं नगर निकाय चुनाव लड़ने के लिए लागू दो-संतान मानदंड को समाप्त कर दिया है।

संबंधित तथ्य

  • यह मानदंड वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत के शासनकाल में जनसंख्या नियंत्रण उपाय के रूप में लागू किया गया था।
  • अब दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवार भी पंचायत और नगर निकाय चुनाव लड़ सकेंगे।
  • इसके कार्यान्वयन हेतु राज्य मंत्रिमंडल ने राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 तथा राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 में संशोधन को स्वीकृति दी है। इसके अंतर्गत राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) विधेयक, 2026 तथा राजस्थान नगरपालिका (संशोधन) विधेयक, 2026 प्रस्तावित किए गए हैं।

यह नियम क्यों समाप्त किया गया?

सरकार का तर्क

  • परिवर्तित सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ 
    • दो-संतान मानदंड का मूल उद्देश्य छोटे परिवारों को प्रोत्साहित करना था। तथापि, वर्तमान में राज्य सरकार का मत है कि बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में यह प्रावधान अब अप्रासंगिक हो गया है।
  • पात्र उम्मीदवारों के दायरे का विस्तार: अधिकारियों का मत है कि इस प्रावधान को हटाने से पात्र उम्मीदवारों का दायरा विस्तृत होगा तथा मूलभूत स्तर के लोकतंत्र में सहभागिता बढ़ेगी।

पक्ष

  • समर्थकों के अनुसार यह समावेशी राजनीतिक भागीदारी की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • यह संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों (भाग IX और IX-क) के अंतर्गत निहित समावेशी जमीनी लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहित करता है।

विपक्ष

  • आलोचकों का मत है कि इससे जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास कमजोर हो सकते हैं और यह उम्मीदवारों की योग्यता जैसे मूलभूत मुद्दों का समाधान नहीं करता है।
  • चुनावों से पूर्व इस निर्णय के क्रियान्वयन से राजनीतिक अवसरवादिता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

जापानी मकाॅक (Japanese Macaque) 

एक परित्यक्त शिशु जापानी मकाॅक से संबंधित वायरल कथा ने इस प्रजाति के जटिल सामाजिक संबंधों और मातृ-निर्भरता को उजागर किया।

जापानी मकाॅक के बारे में

  • जापानी मकाॅक, जिसे “स्नो मंकी” भी कहा जाता है, पुरानी दुनिया के वानरों की एक प्रजाति है, जो सर्कोपिथेसिडी कुल से संबंधित है।
  • विशेषताएँ: इसमें घना भूरा-धूसर रोआँ, लाल चेहरा और छोटी पूँछ होती है, जो इसे शीत जलवायु में जीवित रहने में सक्षम बनाती है।
  • विशिष्ट अनुकूलन: यह जापान के प्राकृतिक गरम जलस्रोतों में स्नान करने के लिए प्रसिद्ध है, जिससे यह शून्य से नीचे तापमान में भी जीवित रह पाता है। इसी कारण इसे मानवेतर प्राणियों में सर्वाधिक उत्तरी अक्षांश पर निवास करने वाला प्राइमेट माना जाता है।
  • IUCN स्थिति: इसे “कम चिंताजनक” श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है, यद्यपि कुछ क्षेत्रीय आबादियाँ आवासीय दबावों का सामना कर रही हैं।

अन्य महत्त्वपूर्ण मकाॅक प्रजातियाँ

  • रीसस (Rhesus)  मकाॅक: रीसस मकाॅक उत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक रूप से पाया जाता है। यह शहरी क्षेत्रों में अत्यंत अनुकूलनशील है तथा अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ द्वारा “न्यूनतम चिंताजनक” श्रेणी में सूचीबद्ध है।
  • लायन टेल्ड मकाॅक: लायन टेल्ड मकाॅक पश्चिमी घाट का स्थानिक प्राणी है। इसकी पहचान इसके चांदी जैसे दिखने वाले ‘अयाल’ से होती है। आवास विखंडन के कारण इसे “संकटग्रस्त” श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
  • कलगीदार काला मकाॅक: कलगीदार काला मकाॅक इंडोनेशिया के सुलावेसी क्षेत्र का मूल प्रजाति है। इसके सिर पर बालों की विशिष्ट कलगी होती है। गंभीर आवास-क्षति के कारण इसे “अत्यंत संकटग्रस्त” श्रेणी में रखा गया है।
  • बारबरी मकाॅक: बारबरी मकाॅक उत्तरी अफ्रीका और जिब्राल्टर में पाया जाता है। यह एशिया के बाहर मिलने वाला एकमात्र मकाॅक है और “संकटग्रस्त” श्रेणी में सूचीबद्ध है।

मकाॅक सामाजिक स्वभाव वाले प्राइमेट हैं, जिनमें मातृ-संबंध अत्यंत सुदृढ़ होते हैं। शिशु भावनात्मक सुरक्षा के लिए शारीरिक संपर्क पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं।

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