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संक्षिप्त समाचार

Lokesh Pal March 05, 2026 05:30 56 0

विश्व वन्यजीव दिवस 

विश्व वन्यजीव दिवस (3 मार्च) के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वन्यजीव संरक्षण, सतत् प्रथाओं और भारत की समृद्ध जैव विविधता तथा संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया।

विश्व वन्यजीव दिवस के बारे में

  • इतिहास: 20 दिसंबर, 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 68वें सत्र में 3 मार्च को संयुक्त राष्ट्र विश्व वन्यजीव दिवस (WWD) घोषित किया गया।
  • थीम-2026 संस्करण: ‘औषधीय और सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण’।

औषधीय और सुगंधित पौधों (MAPs) के बारे में

  • ये पौधे मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी संतुलन दोनों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • उदाहरण: अमेरिकन जिनसेंग (Panax quinquefolius), स्पाइकनार्ड (Nardostachys grandiflora) और अगरवुड (Aquilaria, Gonystylus) तथा Gyrinops प्रजातियाँ।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इन पौधों के महत्त्व को स्वीकार करता है, विशेष रूप से विकासशील देशों में, जहाँ 70–95 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर करती है।

महत्त्व

  • विश्व वन्यजीव दिवस का महत्त्व इस बात में है कि इसी दिन वर्ष 1973 में वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन (CITES) पर हस्ताक्षर किए गए थे।
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र कैलेंडर में वन्यजीवों के लिए इस विशेष दिवस के वैश्विक आयोजन का समन्वय CITES सचिवालय को सौंपा गया है।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के 25 वर्ष

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (Bureau of Energy Efficiency) ने 1 मार्च, 2026 को अपना 25वाँ स्थापना दिवस मनाया, जो ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में उपलब्धियों का प्रतीक है।

  • केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने BEE@25 लोगो, RCO (नवीकरणीय खपत दायित्व) पोर्टल और बीईई स्टार लेबेल मोबाइल एप (BEE Star Label Mobile App) का शुभारंभ कर BEE की इस यात्रा को स्मरणीय बनाया।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) के बारे में

  • उत्पत्ति: ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के प्रावधानों के अंतर्गत 1 मार्च, 2002 को एक वैधानिक निकाय के रूप में इसकी स्थापना की गई।
  • उद्देश्य: नीतियों और रणनीतियों का विकास करके भारतीय अर्थव्यवस्था की ऊर्जा तीव्रता को कम करना।
  • नोडल मंत्रालय: विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power)
  • कार्य
    • नियामक: उपकरणों के लिए ऊर्जा दक्षता मानक निर्धारित करना, ऊर्जा-गहन प्रतिष्ठानों की पहचान करना तथा उनका निरीक्षण करना।
    • प्रोत्साहन: राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना, अनुसंधान एवं विकास (R&D) को समर्थन देना तथा मान्यता प्राप्त ऊर्जा लेखा परीक्षकों (Energy Auditors) को प्रशिक्षण प्रदान करना।
  • BEE के अन्य प्रमुख कार्यक्रम
    • स्टार लेबलिंग कार्यक्रम (2006): यह भारतीय मानकों के आधार पर 1 से 5 स्टार की दृश्य रेटिंग प्रणाली का उपयोग करता है, जिससे उपभोक्ताओं को ऊर्जा-दक्ष उपकरणों की पहचान करने में आसानी होती है। इससे बिजली बिल में कमी आती है तथा निर्माताओं को हरित तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
    • पीएटी योजना (प्रदर्शन, प्राप्ति और व्यापार): ऊर्जा-गहन “नामित उपभोक्ताओं” में विशिष्ट ऊर्जा खपत को कम करने के लिए राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता संवर्द्धन मिशन (NMEEE) के तहत एक बाजार-आधारित तंत्र।
    • आरसीओ पोर्टल: गैर-जीवाश्म ईंधन दायित्व अनुपालन तंत्र के लिए एक वेब-आधारित निगरानी उपकरण।
    • सीसीटीएस (कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना): उत्सर्जन में कमी को प्रोत्साहित करने के लिए भारत के घरेलू कार्बन बाजार को विकसित करने वाली प्रमुख एजेंसी बीईई है।
  • अब तक की उपलब्धियाँ: भारत ने वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 36% की कमी हासिल की है तथा वर्ष 2030 के लक्ष्यों से पहले ही 52% गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त कर ली है।

विरासत उत्कर्ष क्षेत्र (LTTs) 

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पूर्व में नक्सल प्रभावित जिलों को विरासत उत्कर्ष क्षेत्र (Legacy Thrust Territories) के रूप में नामित किया है।

विरासत उत्कर्ष क्षेत्र (LTTs) के बारे में

  • LTTs एक रणनीतिक वर्गीकरण है, जिसका उद्देश्य उन जिलों में प्रशासनिक शून्यता को रोकना है, जहाँ वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) काफी हद तक कमजोर हो चुका है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
  • उद्देश्य: उग्रवाद के पुनरुत्थान को रोकना तथा लक्षित विकास पहलों को चरणबद्ध सुरक्षा पुनर्तैनाती के साथ एकीकृत कर दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • चरणबद्ध पुनर्तैनाती: यह सुनिश्चित करना कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPFs) को अचानक वापस न बुलाया जाए, जिससे सुरक्षा में किसी प्रकार की कमी न आए।
    • विकासात्मक सुदृढ़ीकरण: 15,000 किमी. सड़क परियोजना और 9,000 से अधिक मोबाइल टॉवरों की स्थापना को तेजी से पूरा करना, ताकि बुनियादी ढाँचे की कमी को दूर किया जा सके।
    • शासन निगरानी: यह सुनिश्चित करना कि राज्य पूर्व संघर्ष क्षेत्रों में उत्तरदायी प्रशासन और कुशल सार्वजनिक सेवा वितरण बनाए रखें।
    • खुफिया सतर्कता: उग्रवादी प्रचार के पुनरुत्थान को रोकने के लिए शहरी सभाओं और सोशल मीडिया गतिविधियों की निगरानी करना।
  • महत्त्व: वामपंथी उग्रवाद (LWE) के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण संचालनात्मक सफलताओं के बाद केंद्र सरकार अब सक्रिय सैन्य कार्रवाई से आगे बढ़कर “समेकन चरण” में प्रवेश कर चुकी है, ताकि दीर्घकालिक सुरक्षा और विकासात्मक हस्तक्षेप सुनिश्चित किए जा सके।

वामपंथी उग्रवाद (LWE) के बारे में

  • परिचय: यह एक व्यापक शब्द है, जो भारत में सभी सशस्त्र वामपंथी आंदोलनों को शामिल करता है, जिनमें माओवादी और नक्सलवादी भी सम्मिलित हैं।
  • उत्पत्ति: यह आंदोलन वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में हुए विद्रोह से प्रारंभ हुआ।
  • विचारधारा: इसके अनुयायी चीनी नेता माओ त्से-तुंग (Mao Zedong) की विचारधारा का अनुसरण करते हैं, जिसका उद्देश्य वर्तमान राज्य व्यवस्था को हटाकर “नई लोकतांत्रिक क्रांति (New Democratic Revolution)” स्थापित करना है।
  • मुख्य क्षेत्र: ऐतिहासिक रूप से ये समूह अविकसित, आदिवासी-बहुल और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से “रेड कॉरिडोर (Red Corridor)” कहा जाता है।
  • वर्तमान स्थिति: वर्ष 2026 तक LWE-प्रभावित जिलों की संख्या 200 (सन् 2000 में) से घटकर केवल 7 जिले रह गई है — जिनमें 5 छत्तीसगढ़ में, 1 झारखंड में और 1 ओडिशा में स्थित है।
  • लक्ष्य: भारत के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में विकास और आदिवासी कल्याण के प्रमुख अवरोध रहे नक्सलवाद को 31 मार्च, 2026 तक पूर्णतः समाप्त करना।

IAEA बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक

अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद, ईरान की परमाणु सुविधाओं को हुए नुकसान को लेकर परस्पर विरोधी दावों के बीच अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने बोर्ड की एक आपात बैठक बुलाई।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बारे में

  • IAEA विश्व की प्रमुख अंतर-सरकारी संस्था है, जो परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देती है तथा इसके सैन्य दुरुपयोग को रोकने का प्रयास करती है।
    • यह संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर स्वायत्त रूप से कार्य करती है और संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट करती है।
  • उत्पत्ति: वर्ष 1957 में अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर के “शांति के लिए परमाणु” प्रस्ताव के बाद इसकी स्थापना की गई।
  • मुख्यालय: वियना, ऑस्ट्रिया
  • सदस्य: 180 सदस्य देश
    • भारत IAEA का संस्थापक सदस्य है।
  • संरचना: इसमें आम सम्मेलन (सभी सदस्य), शासी मंडल और एक सचिवालय शामिल हैं, जिसका नेतृत्व महानिदेशक करते हैं। 
  • शासी मंडल (Board of Governors): शासी मंडल 35 सदस्यीय एक प्रमुख नीति-निर्धारण निकाय है, जिसकी संरचना वार्षिक रूप से बदलती रहती है।
    • 2025–2026 अवधि के लिए सदस्य
      • अमेरिका क्षेत्र: अर्जेंटीना, ब्राजील, कनाडा, चिली, कोलंबिया, पेरू, अमेरिका, वेनेजुएला।
      • अफ्रीका: मिस्र, घाना, मोरक्को, नाइजर, दक्षिण अफ्रीका, टोगो।
      • पूर्वी एशिया एवं प्रशांत: ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, फिलीपींस, थाईलैंड।
      • यूरोप: बेल्जियम, फ्राँस, जॉर्जिया, जर्मनी, इटली, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, रूसी संघ, यूनाइटेड किंगडम।
      • मध्य पूर्व एवं दक्षिण एशिया: भारत, जॉर्डन, पाकिस्तान, सऊदी अरब।
  • भूमिका: IAEA परमाणु सुरक्षा (safeguards) की पुष्टि करता है तथा सुरक्षा और संरक्षा के मानक विकसित करता है।
    • यह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अनुच्छेद-III के अंतर्गत एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण तंत्र के रूप में कार्य करता है।
      • यह सुनिश्चित करता है कि गैर-परमाणु-हथियार राज्य अपने उस वचन का पालन करें कि वे परमाणु हथियार प्राप्त नहीं करेंगे।
    • इसके अतिरिक्त, यह स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है और सदस्य देशों के बीच तकनीकी सहयोग को प्रोत्साहित करता है।
  • मान्यता: IAEA और इसके तत्कालीन महानिदेशक मोहम्मद एलबरादेई को वर्ष 2005 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया था। यह पुरस्कार परमाणु ऊर्जा के सैन्य उपयोग को रोकने और इसके शांतिपूर्ण उपयोग को सुरक्षित बनाने के प्रयासों के लिए दिया गया था।
  • IAEA में भारत की भूमिका: भारत, IAEA द्वारा संचालित परमाणु सुरक्षा व्यवस्था और नागरिक परमाणु सहयोग का समर्थन करता है, जबकि वह NPT ढाँचे से बाहर अपना रणनीतिक परमाणु कार्यक्रम बनाए रखता है।

कारबी आंगलोंग अदरक

 

कारबी आंगलोंग अदरक (Karbi Anglong Ginger) को पहली बार लंदन के बाजार में निर्यात किया गया है, जो असम के कृषि निर्यात के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

कारबी आंगलोंग अदरक के बारे में

  • कारबी आंगलोंग अदरक भारत में पाई जाने वाली अदरक की सबसे सुगंधित और स्वादिष्ट किस्मों में से एक है।
  • स्थान: यह असम के पहाड़ी जिले कारबी आंगलोंग में उगाई जाती है।
  • GI टैग: इसे भौगोलिक संकेतक टैग प्राप्त है, जिससे इसकी बाजार में पहचान और निर्यात क्षमता बढ़ी है।
  • कृषि-जलवायु अनुकूलता: यह उत्तर-पूर्व क्षेत्र की अधिक वर्षा और अच्छी जल-निकासी वाली दोमट मिट्टी में उगाई जाती है, जो आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए आदर्श है।
  • विशिष्ट गुणवत्ता: यह अदरक उच्च फाइबर सामग्री, तीव्र सुगंध और अधिक ओलियोरेज़िन  सामग्री के लिए प्रसिद्ध है, जिससे यह मसालों और औषधीय उपयोगों के लिए उपयुक्त बनती है।
  • जैविक उत्पादन: इसे प्रायः न्यूनतम रासायनिक इनपुट के साथ उगाया जाता है, जो उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने की भारत की नीति के अनुरूप है।
  • आर्थिक महत्त्व: यह आदिवासी किसानों के लिए एक प्रमुख नकदी फसल है और ग्रामीण आजीविका तथा कृषि-आधारित मूल्य शृंखलाओं को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

आर्टेमिस चंद्र कार्यक्रम

नासा (NASA) ने बार-बार हो रही देरी के कारण अपने आर्टेमिस (Artemis) कार्यक्रम का पुनर्गठन किया है। अब वर्ष 2028 तक चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने से पहले निम्न-पृथ्वी कक्ष (Low-Earth Orbit) में एक परीक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी।

  • स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) और ओरियन अंतरिक्ष यान में तकनीकी खराबी के कारण, आर्टेमिस III अब सीधे चंद्रमा पर जाने के बजाय पृथ्वी की निम्न कक्षा में चंद्र लैंडर (lunar lander) के साथ डॉकिंग करेगा।
    • आर्टेमिस III का मूल उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र (South Polar Region) में अंतरिक्ष यात्रियों को उतारना था।

आर्टेमिस चंद्र कार्यक्रम (Artemis Lunar Programme) के बारे में

  • आर्टेमिस कार्यक्रम नासा का प्रमुख मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को फिर से चंद्रमा पर भेजना और वहाँ दीर्घकालिक, टिकाऊ उपस्थिति स्थापित करना है।
  • मिशन उद्देश्य: आर्टेमिस का लक्ष्य चंद्रमा पर पहली महिला और अगले पुरुष को उतारना, चंद्र अवसंरचना विकसित करना, गहरे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करना और मंगल ग्रह पर भविष्य के मानव मिशनों की तैयारी करना है।

आर्टेमिस मिशन को चार भागों में विभाजित किया गया है

  • आर्टेमिस I (2022): अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली (SLS) और ओरियन अंतरिक्ष यान की पहली मानवरहित एकीकृत परीक्षण उड़ान।
    • उद्देश्य: गहरे अंतरिक्ष में क्षमताओं का सत्यापन करना, पुनः प्रवेश के दौरान हीट शील्ड के प्रदर्शन का परीक्षण करना और मानवयुक्त उड़ानों से पहले मिशन प्रणालियों का प्रदर्शन करना।
  • आर्टेमिस II (मार्च 2026): अपोलो कार्यक्रम युग के बाद चंद्रमा की परिक्रमा करने वाला पहला मानवयुक्त आर्टेमिस मिशन।
    • उद्देश्य: जीवन-सहायता प्रणालियों, चालक दल के संचालन और गहरे अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यान के प्रदर्शन का परीक्षण करने के लिए चंद्र फ्लाईबाय मिशन का संचालन करना।
  • आर्टेमिस III (2027): चंद्र कक्षा में एक वाणिज्यिक मानव लैंडिंग प्रणाली के साथ डॉकिंग से जुड़ा मानवयुक्त मिशन।
    • उद्देश्य: महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों (डॉकिंग, स्पेससूट, लैंडिंग सिस्टम) का प्रदर्शन करना और निरंतर मानव लैंडिंग मिशनों के लिए तैयारी करना।
  • आर्टेमिस IV (2028): चंद्र सतह संचालन और लूनर गेटवे के संयोजन में सहायता करने वाला मिशन।
    • उद्देश्य: अंतरराष्ट्रीय आवास मॉड्यूल (आई-हैब) को गेटवे तक पहुँचाना और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास चार सदस्यीय दल को उतारना, जो निरंतर चंद्र अन्वेषण की शुरुआत का प्रतीक होगा।

आर्टेमिस 3 का महत्त्व 

  • कक्षीय परीक्षण के माध्यम से जोखिम कम करना: निम्न-पृथ्वी कक्षा में डॉकिंग और सिस्टम एकीकरण का अभ्यास करके, आर्टेमिस 3 अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र अवतरण के लिए भेजने से पहले तकनीकी और सुरक्षा जोखिमों को कम करता है।
  • परिचालन कौशल का निर्माण: अधिक बार मिशन नासा को अपोलो युग के दौरान हासिल की गई गति के समान संस्थागत विशेषज्ञता को पुनः प्राप्त करने में मदद करेंगे।
  • रणनीतिक स्थिति को मजबूत करना: संशोधित समय-सीमा चीन की मानवयुक्त चंद्र महत्त्वाकांक्षाओं से बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के बीच अंतरिक्ष में अमेरिकी नेतृत्व को बनाए रखती है, जिससे भू-राजनीतिक और तकनीकी विश्वसनीयता मजबूत होती है।

गिचक नाकाना (Gitchak nakana)

यूरोप, अमेरिका और भारत के मत्स्य वैज्ञानिकों की एक टीम ने पूर्वोत्तर भारत में पाए जाने वाली पहली जलभंडार में रहने वाली (फ्रीटोबिटिक) मछली, गिचक नाकाना (Gitchak nakana) की खोज की है। इस खोज के निष्कर्ष साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं

गिचक नाकाना के बारे में

  • गिचक नाकाना असम में खोजी गई ब्लाइंड ग्राउंडवॉटर लोच (blind groundwater loach) की एक नई प्रजाति है, जो कोबिटिडे (Cobitidae) परिवार के अंतर्गत एक नए वंश का प्रतिनिधित्व करती है।
    • लोच छोटी, लंबी तथा तल-निवासी मीठे पानी की मछलियों का एक विविध समूह है, जो कोबिटिडे सबऑर्डर (Suborder) से संबंधित हैं और मुख्यतः एशिया में पाए जाते हैं।
  • आवास (Habitat): यह प्रजाति असम में एक खुदे हुए कुएँ में पाई गई। यह भूमिगत जलभृतों (aquifers) के फ्रीटोबिटिक क्षेत्र (phreatic zones) में निवास करती है, जो एक दुर्लभ और मीठे जल का पारितंत्र है और गुफा प्रणालियों से भिन्न होता है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • पूर्ण नेत्रहीनता (Complete Eye Loss): इस मछली में बाहरी रूप से दिखाई देने वाली आँखें नहीं होतीं। यह अनुकूलन ट्रोग्लोमॉर्फी (Troglomorphy) कहलाता है, जो पूर्ण अंधकार में रहने वाले भूमिगत जीवों में सामान्यतः पाया जाता है।
    • विशिष्ट खोपड़ी संरचना (Unique Skull Structure): इस प्रजाति में एक दुर्लभ शारीरिक विशेषता पाई गई है—खोपड़ी का ऊपरी भाग (skull roof) पूर्णतः अनुपस्थित होता है, और मस्तिष्क ऊपर की ओर केवल त्वचा से ढका होता है।
    • सूक्ष्म और पारदर्शी शरीर (Miniaturised and Translucent Body): यह मछली लगभग 2 सेमी. तक ही बढ़ती है। इसका शरीर पारदर्शी, अवर्णी (Pigmentless) होता है तथा जीवित अवस्था में इसका रंग गहरा लाल दिखाई देता है।

खोज का महत्त्व: यह खोज एशिया में भूमिगत जैव विविधता (Subterranean biodiversity) के ज्ञान का विस्तार करती है और यह दर्शाती है कि पूर्वोत्तर भारत दुर्लभ और स्थानिक भूजल जीवों का एक महत्त्वपूर्ण हॉटस्पॉट है।

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