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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal March 07, 2026 03:00 80 0

ब्रह्मपुत्र नदी पर नदीय प्रकाश स्तंभ 

भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय जलमार्ग–2 के अंतर्गत ब्रह्मपुत्र नदी पर नदीय प्रकाश स्तंभों का विकास प्रारंभ किया गया है।

ब्रह्मपुत्र पर नदीय प्रकाश स्तंभ के बारे में

  • अंतर्देशीय जलमार्ग पर पहला प्रकाश स्तंभ अवसंरचना तंत्र: यह परियोजना भारत के अंतर्देशीय जलमार्गों पर स्थापित होने वाला पहला प्रकाशस्तंभ अवसंरचना तंत्र है।
  • उद्देश्य: ब्रह्मपुत्र नदी पर नौवहन सुरक्षा तथा जलमार्ग की संचालन दक्षता को बेहतर बनाना।
  • क्रियान्वयन एजेंसियाँ: इस परियोजना को संयुक्त रूप से प्रकाश स्तंभ एवं प्रकाश पोत महानिदेशालय और अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण द्वारा लागू किया जा रहा है।
    • दोनों संस्थाएँ पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती हैं।
  • प्रकाश स्तंभों के स्थान: राष्ट्रीय जलमार्ग–2 के अंतर्गत ब्रह्मपुत्र पर चार नदीय प्रकाश स्तंभ निम्नलिखित स्थानों पर बनाए जाएँगे:
    • बोगीबील
    • पांडु
    • सिलघाट
    • बिश्वनाथ घाट
    • ये सभी ब्रह्मपुत्र के महत्त्वपूर्ण नदी बंदरगाह और नौवहन बिंदु हैं।
  • महत्त्व
    • ब्रह्मपुत्र नदी पर सुरक्षित नौवहन और संचालन दक्षता में वृद्धि।
    • जलमार्ग परिवहन के माध्यम से सतत् और निम्न-कार्बन परिवहन को बढ़ावा।
    • पूर्वोत्तर भारत में क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक विकास को सुदृढ़ करना।

राष्ट्रीय जलमार्ग–2 के बारे में

  • स्थान: असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर स्थित।
    • विस्तार: धुबरी से सादिया तक लगभग 891 किलोमीटर।
  • राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 1988 के अंतर्गत इसे राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया।
  • कार्यान्वयन प्राधिकरण: इसका विकास और रखरखाव भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) द्वारा किया जाता है।
  • कार्गो परिवहन: वित्तीय वर्ष 2024–25 में कार्गो परिवहन में लगभग 53% की वृद्धि दर्ज की गई, जो क्षेत्रीय व्यापार के लिए इसके बढ़ते महत्त्व को दर्शाती है।

प्रोजेक्ट हनुमान (HANUMAN)

आंध्र प्रदेश सरकार ने बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामलों को कम करने के लिए विश्व वन्यजीव दिवस, 2026 (03 मार्च) के अवसर पर प्रोजेक्ट हनुमान (HANUMAN) शुरू किया है।

प्रोजेक्ट हनुमान (HANUMAN) के बारे में

  • HANUMAN का पूर्ण रूप ‘हीलिंग एंड नर्चरिंग यूनिट्स फॉर मॉनिटरिंग, ऐड एंड  नर्सिंग ऑफ वाइल्डलाइफ (Healing and Nurturing Units for Monitoring, Aid and Nursing of Wildlife)’ है।
  • उद्देश्य: घायल वन्यजीवों के बचाव, उपचार, पुनर्वास और निगरानी के लिए एक व्यापक तकनीकी और वैज्ञानिक कार्यक्रम।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • अवसंरचना: 100 वाहनों (93 रैपिड रिस्पांस और 7 एंबुलेंस) की तैनाती तथा विशाखापट्टनम्, राजमहेंद्रवरम्, तिरुपति और बिरलुट में चार बचाव केंद्रों की स्थापना।
    • प्रौद्योगिकी: रियल-टाइम ट्रैकिंग के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग तथा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के लिए ‘हनुमान  डिजिटल ऐप’ का विकास।
    • क्षतिपूर्ति: मृत्यु की स्थिति में अनुग्रह राशि ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख की गई; जबकि चोट लगने की स्थिति में मुआवजा ₹2 लाख तक बढ़ाया गया।
    • ‘वज्र’ (वन्यजीव रक्षत) टीम: ग्राम स्तर पर स्थानीय स्वयंसेवकों को साँपों के बचाव और छोटे वन्यजीव प्रवेश की घटनाओं को सँभालने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे वन अधिकारियों पर निर्भरता कम होगी।
    • कुमकी हाथी: कर्नाटक से लाए गए प्रशिक्षित हाथियों का उपयोग चित्तूर और श्रीकाकुलम जैसे जिलों में जंगली हाथियों की समस्या से निपटने के लिए किया जाएगा।
  • कानूनी संदर्भ
    • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: यह वन्य जीवों की सुरक्षा और उनके आवासों के प्रबंधन के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
    • सातवीं अनुसूची: “पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम” और “वन” समवर्ती सूची में आते हैं, जिससे केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।
  • कुमकी हाथी
    • ‘कुमकी’ या ‘कूनकी’ शब्द फारसी शब्द ‘कुमक’ से निकला है, जिसका अर्थ है “सहायता करना”।
    • इनका व्यापक रूप से प्रशिक्षित हाथियों के रूप में उपयोग, हिंसक हाथियों को पकड़ने तथा घायल वन्यजीवों के बचाव या उपचार के लिए किया जाता है।
    • खेड़ा विधि कुमकी हाथियों का उपयोग करने वाली ऐसी ही एक विधि है।

भारत में गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर को खत्म करने के प्रयास

 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने वर्ष 2030 तक गर्भाशय सर्वाइकल कैंसर (Cervical Cancer) को समाप्त करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के 90-70-90 लक्ष्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया।

संबंधित तथ्य

विश्व स्वास्थ्य  संगठन  का 90-70-90 लक्ष्य (2030 तक)

  • टीकाकरण: 15 वर्ष की आयु तक 90% लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन की पूर्ण खुराक दी जानी चाहिए।
  • स्क्रीनिंग: 70% महिलाओं की उच्च-प्रदर्शन परीक्षण से जाँच 35 वर्ष की आयु तक और पुनः 45 वर्ष की आयु तक की जानी चाहिए।
  • उपचार: 90% प्री-कैंसर से पीड़ित महिलाओं का उपचार तथा 90% आक्रामक कैंसर (Invasive Cancer) से पीड़ित महिलाओं का प्रबंधन किया जाना चाहिए।

सर्वाइकल कैंसर (Cervical Cancer) के बारे में

  • सर्वाइकल कैंसर वह स्थिति है, जिसमें कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) में शुरू होती है
    • गर्भाशय ग्रीवा गर्भाशय का निचला भाग होता है जो योनि (Vagina) से जुड़ा होता है।
  • कारण: यह ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) के लगातार संक्रमण के कारण होता है।

प्रमुख सरकारी पहल

  • स्क्रीनिंग अवसंरचना यह एनपी-एनसीडी (National Programme for Prevention and Control of Non-Communicable Diseases) के अंतर्गत संचालित की जाती है।
    • विधि: विजुअल इंसपेक्सशन विद एसीटिक एसिड (VIA)
    • पात्रता: 30–65 वर्ष की आयु की महिलाएँ
    • उपलब्धता: आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं में।
  • HPV टीकाकरण अभियान (28 फरवरी 2026 को प्रारंभ):
    • लक्ष्य: प्रत्येक वर्ष 14 वर्ष आयु की 1.2 करोड़ लड़कियाँ।
    • खुराक: मुफ्त तथा गारदासिल क्वाडरीवैलेंट (Gardasil Quadrivalent) वैक्सीन की एकल-खुराक।
  • डिजिटल निगरानी
    • U-WIN प्लेटफॉर्म: टीकाकरण की स्थिति की निगरानी करता है।
    • eVIN (इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलीजेंस नेटवर्क): वैक्सीन की कोल्ड चेन (Cold Chain) लॉजिस्टिक्स का प्रबंधन करता है, जिससे वैक्सीन की गुणवत्ता बनी रहती है।

गैर-संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD)

  • यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत भारत सरकार की एक पहल है।
  • उद्देश्य: कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसे बढ़ते गैर-संचारी रोगों (NCDs) से निपटना।
  • मुख्य फोकस: स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना, 30 वर्ष से अधिक आयु की आबादी की स्क्रीनिंग, प्रारंभिक निदान (Early Diagnosis), जिला क्लीनिकों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के माध्यम से रोग प्रबंधन।

विशालकाय लैटेराइट चट्टान को काटकर बनाया गया शवाधान कक्ष

हाल ही में केरल के कासरगोड जिले के पनयाल  में निर्माण कार्य के दौरान लगभग 2,000 वर्ष प्राचीन मेगालिथिक लैटेराइट शैल-कृत शवाधान कक्ष खोजा गया है।

मेगालिथिक शैल-कृत शवाधान कक्ष

  • मेगालिथिक शैल-कृत शवाधान कक्ष भूमिगत शवाधान संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें लैटेराइट चट्टानों में काटकर बनाया जाता था और जो दक्षिण भारत की लौह युग (Iron Age) की मेगालिथिक अंतिम संस्कार परंपराओं से संबंधित हैं।
  • स्थान: ये शवाधान कक्ष मुख्य रूप से केरल और तटीय कर्नाटक के लैटेराइट-समृद्ध क्षेत्रों में पाए जाते हैं, विशेषकर पश्चिमी घाट क्षेत्र (Western Ghats belt) में।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • भूमिगत गोलाकार कक्ष: शवाधान संरचना सामान्यतः लेटराइट चट्टान में काटकर बनाया गया एक गोलाकार भूमिगत कक्ष होती है, जिसमें एक संकीर्ण ऊर्ध्वाधर शाफ्ट (Vertical shaft) के माध्यम से प्रवेश किया जाता है।
    • सीलबंद प्रवेश द्वार और आनुष्ठानिक छिद्र: कक्ष के प्रवेश द्वार को प्रायः भारी पत्थर की स्लैब से बंद किया जाता है और इसमें अक्सर एक छोटा गोलाकार छिद्र होता है, जिसका उपयोग आनुष्ठानिक अर्पण या आत्मा के प्रतीकात्मक मार्ग के रूप में किया जाता था।
    • संबद्ध मेगालिथिक स्मारक: ये संरचनाएँ अक्सर अन्य मेगालिथिक स्मारकों जैसे कुडक्कल्लु (Umbrella Stones) और टोप्पिकल्लु (Cap Stones) के पास पाई जाती हैं, जो संगठित शवाधान स्थलों (Burial landscapes) का संकेत देती हैं।

महत्त्व

  • मेगालिथिक शवाधान प्रथाओं का प्रमाण: इन कक्षों से जटिल अंतिम संस्कार परंपराओं का पता चलता है, जहाँ मृतकों की हड्डियों को मिट्टी के बर्तन, लोहे के औजार और मनकों के साथ शवाधानाया जाता था।
  • प्रारंभिक लौह युग संस्कृति की जानकारी: ये दक्षिण भारत में नवपाषाण काल (Neolithic) से लौह युग में संक्रमण के पुरातात्त्विक प्रमाण प्रदान करते हैं।
  • तकनीकी और सांस्कृतिक महत्त्व: ये कक्ष प्राचीन समुदायों की लोहे के औजारों के प्रारंभिक उपयोग और कठोर लैटेराइट चट्टान में शवाधान संरचनाएँ बनाने की वास्तु क्षमता को दर्शाते हैं।

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