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संक्षिप्त समाचार

Lokesh Pal March 16, 2026 04:27 17 0

जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान के जारी संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों को प्रभावित करने वाला व्यापक जीपीएस हस्तक्षेप देखा जा रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के बारे में अधिक जानकारी

  • परिचय: आधुनिक संघर्ष अब प्रत्यक्ष संघर्ष के बिना भी इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र तक फैल रहे हैं, जिससे उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणालियों में व्यवधान उत्पन्न किया जा रहा है।
  • कारण: जीएनएसएस (GNSS) प्रणालियाँ जैमिंग (Jamming) और स्पूफिंग (Spoofing) के माध्यम से बाधित की जाती हैं, जिससे पायलट और जहाजों के कप्तानों को भ्रामक संकेत प्राप्त होते हैं।
    • जैमिंग (Jamming): इसमें जीपीएस की ही आवृत्ति (frequency) पर उच्च-शक्ति वाला “शोर” प्रसारित किया जाता है, जिससे उपग्रह से आने वाला कमजोर सिग्नल दब जाता है और नेविगेशन प्रणाली पूरी तरह निष्क्रिय हो जाती है।
    • स्पूफिंग (Spoofing): यह अधिक खतरनाक “साइबर-भौतिक” हमला है, जिसमें नकली सिग्नल वास्तविक सिग्नल की तरह प्रतीत होता है और रिसीवर को गलत निर्देशांक (coordinates) प्रदान करता है।
  • प्रभाव
    • ऊर्जा सुरक्षा: ऐसे व्यवधान वैश्विक तेल और एलएनजी आपूर्ति शृंखलाओं के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।
    • समुद्री सुरक्षा: गलत स्थान संबंधी जानकारी से जहाजों के टकराने या तट पर फँसने का जोखिम बढ़ जाता है।
    • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध: यह आधुनिक संघर्षों में साइबर तथा सिग्नल-आधारित हस्तक्षेप के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है।
    • भारत के लिए रणनीतिक प्रभाव: भारत इस मार्ग से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। यदि नेविगेशन में व्यवधान जारी रहता है, तो भविष्य में इसके परिणामस्वरूप चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है, जिससे यह एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय ऊर्जा-सुरक्षा चिंता बन जाती है।
  • लचीलापन एवं शमन रणनीतियाँ
    • INS (जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली): यह एक वैकल्पिक नेविगेशन प्रणाली है, जो जाइरोस्कोप और त्वरणमापी की सहायता से दिशा, गति और स्थिति का निर्धारण करती है।
    • डेड रेकनिंग (Dead Reckoning): इस विधि में पहले से ज्ञात स्थिति के आधार पर गति, दिशा और समय का उपयोग करके वर्तमान स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।
    • स्थलीय नेविगेशन सहायक प्रणालियाँ: ये पारंपरिक भूमि-आधारित संकेत प्रणालियाँ होती हैं (जैसे- विमानों के लिए दिशा और दूरी मापन प्रणाली), जो उपग्रह संकेत बाधित होने की स्थिति में न्यूनतम संचालन नेटवर्क के माध्यम से आवश्यक नेविगेशन सहायता प्रदान करती हैं।

वैश्विक उपग्रह नेविगेशन प्रणालियाँ

  • ये उपग्रह आधारित प्रणालियाँ हैं, जो स्थिति, नेविगेशन और समय निर्धारण से संबंधित सेवाएँ प्रदान करती हैं।
  • प्रमुख प्रणालियाँ
    •  जीपीएस- (Global Positioning System) – संयुक्त राज्य अमेरिका।
    •  ग्लोनास(Global Navigation Satellite System) रूस।

गैलीलियो(Galileo Global Navigation Satellite System) यूरोपीय संघ।

  •  बाइडू(BeiDou Navigation Satellite System) चीन।
  •  नाविक (IRNSS) – भारत
    • नाविक: नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन
    • IRNSS: भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली।

होर्मुज जलडमरूमध्य के बारे में

  • भौगोलिक विस्तार 
    • यह एक ओर ओमान और संयुक्त अरब अमीरात तथा दूसरी ओर ईरान के मध्य स्थित है।
    • यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, जो आगे अरब सागर और हिंद महासागर से मिलती है।
  • भौतिक विशेषताएँ
    • सबसे संकीर्ण चौड़ाई: लगभग 33 किमी.।
    • जहाजों के लिए नौवहन मार्ग: प्रत्येक दिशा में लगभग 3 किमी., जिनके मध्य एक सुरक्षा क्षेत्र होता है।
  • कानूनी स्थिति: वर्ष 1982 के समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के अनुसार, तटीय देशों को 12 समुद्री मील (लगभग 22 किमी.) तक के क्षेत्रीय जल पर संप्रभुता संबंधी अधिकार प्राप्त होते हैं।
    • अपने सबसे संकीर्ण स्थान पर यह जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के जलीय क्षेत्र के भीतर आता है।
  • महत्त्व
    • यह विश्व का एक प्रमुख वैश्विक ऊर्जा अवरोधक बिंदु है। प्रतिदिन लगभग 17–20 मिलियन बैरल तेल (जो वैश्विक पेट्रोलियम खपत का लगभग 20% है) इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य में पूर्व के तनावपूर्ण घटनाक्रम
    • वर्ष 2019: संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच तेल टैंकरों पर हमलों की घटनाएँ हुईं, जिससे वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता उत्पन्न हुई।
    • 1980 का दशक: ईरान–इराक युद्ध के दौरान “टैंकर युद्ध” हुआ, जिसमें तेल टैंकरों पर हमले किए गए, नौसैनिक बारूदी सुरंगों का उपयोग हुआ और वाणिज्यिक समुद्री मार्ग बाधित हुए।

राष्ट्रीय कौशल योग्यता समिति (NSQC) की 48वीं बैठक 

हाल ही में 12 मार्च, 2026 को विभिन्न क्षेत्रों में कौशल योग्यताओं की समीक्षा और स्वीकृति के लिए राष्ट्रीय कौशल योग्यता समिति (NSQC) की 48वीं बैठक आयोजित की गई।

राष्ट्रीय कौशल योग्यता समिति (NSQC) की 48वीं बैठक

  • अध्यक्षता: कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के सचिव तथा राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद (NCVET) के अध्यक्ष द्वारा।
  • कार्यसूची और परिणाम
    • कुल 18 NCVET-मान्यता प्राप्त पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत 43 योग्यताओं, राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों (NOS) और सूक्ष्म प्रमाण-पत्रों (MCs) की समीक्षा पर विचार-विमर्श किया गया। ये प्रस्ताव इलेक्ट्रॉनिक्स, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवा, कृषि आदि कई क्षेत्रों से संबंधित थे।
    • तेजी से बदलते श्रम बाजार में श्रमिकों की अनुकूलन क्षमता और रोजगार योग्यता बढ़ाने के लिए बहु-कौशल से उन्हें सुसज्जित करने के महत्त्व पर बल दिया गया।

राष्ट्रीय कौशल योग्यता समिति (NSQC)

  • परिचय: यह भारत में राष्ट्रीय कौशल योग्यता रूपरेखा (NSQF) के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी सर्वोच्च निकाय है।
  • अध्यक्ष: राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी (NSDA) के अध्यक्ष।
  • मुख्य कार्य: राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों (NOS) और योग्यता पैकेज (QPs) को स्वीकृति देना, कौशल योग्यताओं को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना, मान्यता से संबंधित मानदंड निर्धारित करना, पूर्व अधिगम की मान्यता (RPL) को सक्षम बनाना।

राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद (NCVET)

  • स्थापना: वर्ष 2018।
  • संस्थागत मंत्रालय: कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय।
  • मुख्य दायित्व
    • व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थानों का नियमन
    • पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्थाओं और क्षेत्रीय कौशल परिषदों को मान्यता देना।
    • कौशल प्रमाण-पत्रों की गुणवत्ता और मानकीकरण सुनिश्चित करना।

ग्रीस का इको मूरिंग प्रोजेक्ट

ग्रीस ने एथेंस (ग्रीस) के पोर्टो राफ्ती में एक इको मूरिंग प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसका उद्देश्य भूमध्य सागर की एक संवेदनशील समुद्री घास प्रजाति की रक्षा करना है।

इको मूरिंग प्रोजेक्ट के बारे में

  • परिचय: यह परियोजना भूमध्य सागर में पाई जाने वाली पोसिडोनिया समुद्री घास (जिसे “प्राथमिक आवास” का दर्जा प्राप्त है) के विस्तृत घास क्षेत्रों को नौकाओं के लंगरों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए शुरू की गई है।
  • समस्या: पारंपरिक नौका लंगर और उनकी जंजीरें, समुद्र तल को खुरच देती हैं। जब लंगर ऊपर उठाया जाता है, तो इससे समुद्री घास की जड़-जैसी संरचनाएँ (राइजोम) उखड़ जाती हैं।
  • समाधान: पारिस्थितिकी एंकरिंग प्रणाली में समुद्र तल में लगभग 3 मीटर गहराई तक एक विशेष बोल्ट लगाया जाता है, जिसे एक तैरते हुए संकेतक चिन्ह से जोड़ा जाता है।
  • लाभ: इससे जहाज सुरक्षित रूप से बाँधे जा सकते हैं और भारी जंजीरों का नाजुक समुद्री तल से संपर्क नहीं होता है।
  • परियोजना का कार्यान्वयन: यह परियोजना ग्रीस के वाणिज्यिक नौवहन मंत्रालय द्वारा संचालित है और इसे लगभग 13,000 किमी. लंबे तटरेखा क्षेत्र में विस्तारित करने का लक्ष्य है, जहाँ लगभग 70% क्षेत्र समुद्री घास के मैदानों से आच्छादित है।

पोसिडोनिया ओसियानिका – “नेप्च्यून घास”

  • यह समुद्री घास की एक प्रजाति है, जो केवल भूमध्य सागर में पाई जाती है।
    • समुद्री घास: ये समुद्र में पाई जाने वाली पुष्पीय पौधों की प्रजातियाँ हैं, जो प्रायः उथले जल में उगती हैं।
    • ये विश्व के 159 देशों में छह महाद्वीपों में पाई जाती हैं।
    • ये 3,00,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में विस्तृत है।
    • ये समुद्र के भीतर विस्तृत घास के मैदान बनाती हैं, जो अत्यंत उत्पादक और जैविक रूप से समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं।
  • पारिस्थितिकी कार्य
    • कार्बन अवशोषण: इन्हें “ब्लू कार्बन” का महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है, क्योंकि ये अपनी भूमिगत जड़ संरचनाओं में स्थलीय वनों की तुलना में अधिक प्रभावी रूप से कार्बन को संगृहीत करती हैं।
    • ऑक्सीजन उत्पादन: इन्हें अक्सर “भूमध्य सागर के फेफड़े” कहा जाता है।
    • जल शुद्धिकरण: ये तटीय जल को शुद्ध करने के लिए प्राकृतिक फिल्टर की तरह कार्य करती हैं।
    • जैव विविधता संरक्षण: ये अनेक समुद्री जीवों के लिए प्रजनन स्थल और आवास प्रदान करती हैं।

डेवोन द्वीप

वैज्ञानिक भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करने तथा मंगल ग्रह जैसी परिस्थितियों का अध्ययन करने हेतु कनाडा के डेवोन द्वीप का उपयोग कर रहे हैं।

डेवोन द्वीप के बारे में

  • स्थान: नुनावुत (Nunavut), कनाडा – आर्कटिक महासागर क्षेत्र में स्थित।
  • विशेषताएँ 
    • यह विश्व का सबसे बड़ा निर्जन द्वीप है।
    • यहाँ ध्रुवीय मरुस्थल जैसी परिस्थितियाँ पाई जाती हैं– अत्यधिक ठंडा, शुष्क और बंजर वातावरण।
    • यहाँ भूमिगत बर्फ और प्राचीन सूखी झीलों के अवशेष मिलते हैं, जो मंगल ग्रह के भू-दृश्य से मिलते-जुलते हैं।
  • मंगल अध्ययन के लिए इसे क्यों चुना गया: हॉटन प्रभाव गर्त (Haughton Impact Crater) की उपस्थिति
    • डेवोन द्वीप पर लगभग 20 किमी. चौड़ा प्रभाव गर्त स्थित है।
    • इसकी भू-आकृतिक विशेषताएँ मंगल ग्रह के गर्तों से काफी मिलती-जुलती हैं।
    • यही क्षेत्र हॉटन–मंगल परियोजना का स्थल है, जो मंगल के समान परिस्थितियों पर आधारित एक प्रमुख अनुसंधान कार्यक्रम है।
    • सूक्ष्म-मरुस्थलीय एस्ट्रोबायोलॉजी क्लूज का आवास, जहाँ सूक्ष्मजीव चट्टानों के भीतर छिपकर अत्यधिक पराबैंगनी विकिरण से बच जाते हैं। इस प्रक्रिया को इंटर-ग्लेशियल कोलोनाइजेशन के नाम से जाना जाता है।
  • मंगल आधारित अनुसंधान प्रयोग:  भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए विभिन्न प्रौद्योगिकियों का परीक्षण किया जा रहा है, जैसे-
    • दाबयुक्त अन्वेषण वाहन
    • स्वायत्त उड़ने वाले यान
    • गहरे स्तर तक ड्रिलिंग प्रणालियाँ (जल-बर्फ की खोज के लिए)
    • आर्थर क्लार्क मंगल ग्रीनहाउस – मंगल जैसी मिट्टी में पौधे उगाने का प्रयोग।
  • महत्त्व
    • मंगल समान अनुसंधान स्थल: यह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से मंगल ग्रह की परिस्थितियों का काफी निकटता से अनुकरण करता है।
    • खगोल-जीवविज्ञान अनुसंधान: यह मंगल पर अतीत या वर्तमान जीवन की संभावित खोज के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान करने में सहायता करता है।
    • प्रौद्योगिकी परीक्षण: यहाँ अंतरिक्ष उपकरणों का परीक्षण किया जाता है, क्योंकि अंतरिक्ष में प्रक्षेपण के बाद उन्हें ठीक करना संभव नहीं होता।
    • मानव मिशन की तैयारी: यह अत्यधिक प्रतिकूल वातावरण में अंतरिक्ष यात्रियों के एकांत, जीवित रहने की रणनीतियों और मनोवैज्ञानिक चुनौतियों के अध्ययन में मदद करता है।

मेडागास्कर को मानवीय सहायता 

हाल ही में भारत ने उष्णकटिबंधीय चक्रवात फाइटिया और गेजा से प्रभावित समुदायों की सहायता के लिए मेडागास्कर को लगभग 30 टन मानवीय राहत सामग्री भेजी है।

मेडागास्कर के बारे में

  • स्थान: मेडागास्कर, हिंद महासागर में स्थित एक द्वीपीय देश है, जो मोजांबिक के दक्षिण-पूर्वी तट के पास स्थित है।
  • राजधानी: अंतानानारिवो
  • यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा द्वीप है।
  • समुद्री पड़ोसी
    • पूर्व: मॉरीशस और रीयूनियन
    • उत्तर-पश्चिम: मायोट और कोमोरोस
    • पश्चिम: मोजांबिक (मोजांबिक जलडमरूमध्य के पार)
  • सबसे ऊँचा शिखर: मारोमोकात्रो
  • प्रमुख झीलें: अलाओत्रा झील, किंकोनी झील, इहोत्री झील
  • प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान: इसालो तथा मासोआला
  • उच्च जैव विविधता और स्थानिक प्रजातियों (जैसे- लेमूर, बाओबाब के पेड़) के लिए जाना जाता है।

हाल के अंतरराष्ट्रीय मानवीय राहत अभियान 

  • ऑपरेशन ब्रह्मा – म्याँमार (मार्च 2025)
  • ऑपरेशन सागर बंधु – श्रीलंका (2025)
  • ऑपरेशन सद्भाव – दक्षिण-पूर्व एशिया (2024)
  • ऑपरेशन दोस्त – तुर्की और सीरिया (2023)।

खार्ग द्वीप

खार्ग द्वीप पर अमेरिकी हमलों की खबरों के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति में संभावित व्यवधान और फारस की खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका उत्पन्न हो गई है।

खार्ग द्वीप के बारे में

  • खार्ग द्वीप ईरान का प्रमुख कच्चे तेल का निर्यात टर्मिनल है, जहाँ से देश के अधिकांश पेट्रोलियम निर्यात होते हैं।
    • वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति के दौरान ईरान ने इस द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया था।
  • 1960–1970 के दशक में ईरान के पेट्रोलियम विस्तार के समय यह एक प्रमुख तेल लोडिंग केंद्र के रूप में विकसित हुआ और बड़े टैंकरों के संचालन के लिए अबादान जैसे बंदरगाहों का स्थान ले लिया।
  • स्थान: यह फारस की खाड़ी के उत्तरी भाग में स्थित एक छोटा प्रवाल (कोरल) द्वीप है। यह बुशेहर बंदरगाह से लगभग 55 किमी. उत्तर-पश्चिम और ईरान के मुख्य भू-भाग से लगभग 50 किमी. दूर स्थित है।
    • आकार में छोटा होने के बावजूद (लगभग 8 किमी. लंबा) इसका वैश्विक ऊर्जा व्यापार में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • फारस की खाड़ी के द्वीपों में यह उन कुछ स्थानों में से एक है, जहाँ प्राकृतिक मीठे जल के स्रोत उपलब्ध हैं, जिससे सीमित मानव बसावट संभव हो पाई है।
    • यहाँ विशाल तेल भंडारण सुविधाएँ, लोडिंग टर्मिनल और टैंकर पोर्ट मौजूद हैं, जो एक साथ कई अत्यधिक बड़े तेल टैंकरों की सुविधा प्रदान कर सकते हैं।
    • कच्चे तेल के अलावा यहाँ से द्रवीकृत गैस, उर्वरक और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों का भी निर्यात होता है।
  • सामरिक महत्त्व
    • खार्ग द्वीप से ईरान के लगभग 90% तेल निर्यात होते हैं और यहाँ से प्रतिवर्ष लगभग 95 करोड़ बैरल तेल का निर्यात किया जाता है।
    • होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण, जिससे वैश्विक तेल व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है, यह द्वीप अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा का एक प्रमुख केंद्र है।
    • परिणामस्वरूप, द्वीप के आस-पास किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव को जन्म दे सकता है।

सिल्वरपिट क्रेटर

हालिया शोध से पुष्टि हुई है कि उत्तर सागर के नीचे स्थित सिल्वरपिट क्रेटर लगभग 43–46 मिलियन वर्ष पूर्व एक विशाल क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने के कारण बना था।

सिल्वरपिट क्रेटर के बारे में

  • स्थान: सिल्वरपिट क्रेटर यूनाइटेड किंगडम के तट के पास उत्तर सागर के नीचे स्थित है।
  • खोज: इसकी खोज वर्ष 2002 में तेल अन्वेषण के दौरान किए गए भूकंपीय सर्वेक्षण के आँकड़ों के माध्यम से हुई थी।
  • नाम की उत्पत्ति: इस क्रेटर का नाम उत्तर सागर के सिल्वर पिट नामक मत्स्य क्षेत्र के नाम पर रखा गया है, जहाँ यह स्थित है।
  • संरचना: इस क्रेटर की चौड़ाई लगभग 20 किमी. है। इसके चारों ओर कई संकेंद्रित वलय (Concentric rings) पाए जाते हैं, जो प्रभाव क्रेटरों में अपेक्षाकृत दुर्लभ माने जाते हैं।
  • भू-वैज्ञानिक आयु: यह संरचना संभवतः 43–46 मिलियन वर्ष पूर्व निर्मित हुई थी, जो पृथ्वी के प्राचीन भू-वैज्ञानिक काल से संबंधित है।
  • वैज्ञानिक प्रमाण: यहाँ शॉक्ड क्वार्ट्ज और फेल्डस्पार खनिज पाए गए हैं, जो केवल उल्कापिंड के अत्यधिक दाब वाले प्रभाव के दौरान ही बनते हैं।
  • वैज्ञानिक महत्त्व: यह समुद्र के नीचे स्थित दुर्लभ और अच्छी तरह संरक्षित क्रेटरों में से एक है। इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को प्राचीन क्षुद्रग्रह टक्करों और पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलती है।

आर्थिक स्थिरीकरण कोष  (ESF)

भारत ने वैश्विक झटकों—जैसे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक संकट—से निपटने के लिए ₹57,381 करोड़ का आर्थिक स्थिरीकरण कोष स्थापित करने की घोषणा की है।

  • इस कोष का उद्देश्य सरकार को ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त वित्तीय गुंजाइश प्रदान करना है, ताकि वित्त वर्ष 2025–26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 4.4% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बनाए रखते हुए आवश्यक कदम उठाए जा सकें।

आर्थिक स्थिरीकरण कोष के बारे में

  • आर्थिक स्थिरीकरण कोष सरकार द्वारा बनाया गया एक वित्तीय भंडार होता है, जिसका उद्देश्य बाहरी आर्थिक झटकों या मंदी के दौरान अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखना होता है।
  • ऐसे कोष सामान्य समय में संसाधनों का संचय करते हैं और संकट की स्थिति में सरकार को प्रतिचक्रीय राजकोषीय व्यय करने की अनुमति देते हैं, जिससे विकास, रोजगार तथा व्यापक आर्थिक स्थिरता को बनाए रखा जा सके।

आर्थिक स्थिरीकरण कोष की आवश्यकता

  • वैश्विक वस्तु मूल्यों के झटकों से सुरक्षा: वैश्विक तेल कीमतों में तेज वृद्धि—जैसे पश्चिम एशिया में तनाव के कारण प्रति बैरल 100 डॉलर तक पहुँचने की स्थिति—से आयात बिल, महँगाई और राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है।
    • ऐसे में यह कोष सरकार को इन झटकों से निपटने के लिए वित्तीय लचीलापन प्रदान करता है।
  • आपूर्ति शृंखला व्यवधानों का प्रबंधन: हाल के भू-राजनीतिक संघर्षों और महामारी से संबंधित व्यवधानों ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरियों को उजागर किया है।
    • ऐसी परिस्थितियों में सरकारों को महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का समर्थन करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए त्वरित वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
  • क्षेत्र-विशिष्ट आर्थिक झटकों का जवाब देना: वित्तीय अस्थिरता, प्राकृतिक आपदाओं या प्रमुख उद्योगों में अचानक माँग में आए व्यवधान जैसे अप्रत्याशित संकटों के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों से विचलित हुए बिना तत्काल सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

विश्व में ऐसे कोष के उदाहरण

  • नॉर्वे – सरकारी पेंशन कोष (वैश्विक): यह एक संप्रभु संपत्ति कोष है, जो तेल राजस्व में उतार-चढ़ाव से अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में सहायता करता है।
  • चिली – आर्थिक एवं सामाजिक स्थिरीकरण कोष: ताँबे के राजस्व में उतार-चढ़ाव का प्रबंधन करने और राजकोषीय स्थिरता बनाए रखने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • रूस – राष्ट्रीय संपत्ति कोष: तेल की कीमतों में गिरावट और आर्थिक संकट के समय अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए बनाया गया है।

इस प्रकार, आर्थिक स्थिरीकरण कोष सरकारों को वैश्विक अस्थिरता के समय आर्थिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और आर्थिक विकास की रक्षा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में मदद करता है।

वी. ओ. चिदंबरनार बंदरगाह पर डिजिटल ट्विन

तूतीकोरिन स्थित वी. ओ. चिदंबरनार बंदरगाह भारत का पहला ऐसा बंदरगाह बन गया है, जिसने बंदरगाह प्रबंधन के लिए “डिजिटल ट्विन” मंच शुरू किया है।

डिजिटल ट्विन पहल के बारे में

  • परिचय: डिजिटल ट्विन एक ऐसी तकनीक है, जो बंदरगाह के ढाँचे, परिसंपत्तियों और संचालन का वास्तविक समय का आभासी प्रतिरूप तैयार करती है, जिससे निगरानी और निर्णय-निर्माण अधिक प्रभावी हो जाता है।
  • उपयोग की गई प्रौद्योगिकियाँ: इस प्रणाली में इंटरनेट ऑफ थिंग्स सेंसर, वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणाली, लिडार मानचित्रण, ड्रोन चित्रण, सीसीटीवी नेटवर्क तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों का समावेश किया गया है।
  • वास्तविक समय निगरानी: यह प्रणाली जहाजों की आवाजाही, क्रेन के उपयोग और भंडारण क्षेत्र की क्षमता का वास्तविक समय में दृश्यांकन प्रदान करती है।
  • पूर्वानुमान आधारित रखरखाव: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परिसंपत्ति निगरानी के माध्यम से उपकरणों में संभावित खराबी का पहले से अनुमान लगाकर संचालन में रुकावट को कम किया जा सकता है।
  • संचालन दक्षता: यह जहाजों और माल संचालन के स्मार्ट निर्धारण में सहायता करती है, जिससे भीड़भाड़ और प्रतीक्षा समय कम होता है।
  • संभावित लाभ: जहाजों के आवागमन समय में लगभग 25% तक कमी, सुरक्षा में सुधार, उपकरणों की विश्वसनीयता में वृद्धि, ऊर्जा उपयोग का अनुकूलन और कार्बन उत्सर्जन में कमी।

वी. ओ. चिदंबरनार बंदरगाह के बारे में

  • स्थान: यह तमिलनाडु के तूतीकोरिन में भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर मन्नार की खाड़ी के किनारे स्थित एक कृत्रिम बंदरगाह है।
  • पूर्व नाम: पहले इसे तूतीकोरिन बंदरगाह कहा जाता था, जिसे बाद में स्वतंत्रता सेनानी वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै के सम्मान में नया नाम दिया गया।
  • बड़ा बंदरगाह: यह भारत के 13 प्रमुख बंदरगाहों में से एक है।
  • स्थान: तमिलनाडु में चेन्नई बंदरगाह के बाद दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है।
  • कंटेनर संचालन: यहाँ भारत का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल स्थित है, जिससे यह कंटेनरीकृत माल परिवहन का एक प्रमुख केंद्र बनता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: यह बंदरगाह दक्षिण-पूर्व एशिया और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों के साथ भारत के व्यापार के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है।

समृद्ध ग्राम फिजिटल सेवाएँ पहल

हाल ही में सरकार ने मध्य प्रदेश के उमरी गाँव में समृद्ध ग्राम फिजिटल सेवाएँ (Samriddh Gram Phygital Services) पहल का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है।

समृद्ध ग्राम फिजिटल सेवाएँ पहल

  • परिचय: समृद्ध ग्राम फिजिटल सेवाएँ एक ग्रामीण डिजिटल परिवर्तन कार्यक्रम है, जो भौतिक अवसंरचना और डिजिटल मंचों को एकीकृत करके (“फिजिटल”) नागरिकों को विभिन्न सेवाएँ प्रदान करता है। इन सेवाओं को गाँव स्तर पर स्थापित समृद्धि केंद्र के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा।
  • उद्देश्य: यह दिखाना कि तेज गति वाले ग्रामीण ब्रॉडबैंड संपर्क के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ई-शासन, वित्तीय सेवाएँ और डिजिटल वाणिज्य जैसे क्षेत्रों में एकीकृत सेवा वितरण कैसे संभव है।
  • नोडल मंत्रालय: यह कार्यक्रम संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग द्वारा संचालित किया जा रहा है, जो देश में डिजिटल संपर्क अवसंरचना का दायित्व सँभालता है।
  • कार्यान्वयन: इस पहल को डिजिटल एंपॉवरमेंट फाउंडेशन के सहयोग से लागू किया जा रहा है, जो क्षेत्रीय संचालन, सामुदायिक सहभागिता और ग्रामीण स्तर पर डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देता है।
    • समृद्धि केंद्र: प्रत्येक केंद्र पंचायत भवन में स्थापित होगा। यह अपने आस-पास के लगभग 5 किमी. के दायरे में स्थित गाँवों को सेवाएँ प्रदान करेगा।
  • पायलट परियोजना: इस पायलट परियोजना में भिन्न जनसांख्यिकीय विशेषताओं वाले तीन गाँव शामिल हैं-
    • उमरी – मध्य प्रदेश
    • नरकोडुरु – आंध्र प्रदेश
    • चौरावाला – उत्तर प्रदेश।

महत्त्व

  • यह दर्शाता है कि भारतनेट ब्रॉडबैंड अवसंरचना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी सेवा वितरण संभव है।
  • इसमें टेलीमेडिसिन, डिजिटल शासन, कृषि परामर्श, वित्तीय समावेशन और कौशल विकास जैसी सेवाओं का एकीकरण किया गया है।
  • यह डिजिटल संपर्क, सेवाओं और सामुदायिक भागीदारी के समन्वय से ग्रामीण डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का एक दोहराया जा सकने वाला मॉडल प्रस्तुत करता है।
  • इससे समावेशी विकास और ग्रामीण समुदायों के डिजिटल सशक्तीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

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