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संक्षिप्त समाचार

Lokesh Pal April 08, 2026 03:30 26 0

पुरी एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को स्टेज-I वन मंजूरी

हाल ही में प्रस्तावित पुरी एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को वन भूमि के हस्तांतरण के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से स्टेज-I वन मंजूरी प्राप्त हुई।

पुरी एयरपोर्ट प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएँ

  • तीर्थ स्थल के लिए बुनियादी ढाँचे में सुधार: श्री जगन्नाथ अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा, पुरी की कनेक्टिविटी बढ़ाने का लक्ष्य रखता है, जो एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र है।
  • वन भूमि के हस्तांतरण के लिए सिद्धांत को मंजूरी: लगभग 27.886 हेक्टेयर वन भूमि को शर्तों के अधीन हस्तांतरण के लिए स्वीकृत किया गया है।
  • अंतिम मंजूरी के लिए सशर्त स्वीकृति: परियोजना को स्टेज-II मंजूरी से पूर्व प्रतिपूर्ति वृक्षारोपण, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा जैसी शर्तों का पालन करना होगा।
  • आर्थिक और पर्यटन प्रभाव: वार्षिक 40 लाख यात्रियों को समर्थन, पर्यटन, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और जगन्नाथ संस्कृति की वैश्विक पहुँच को बढ़ावा मिलेगा।

स्टेज-I वन मंजूरी के बारे में

स्टेज-I वन मंजूरी वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अंतर्गत गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि के हस्तांतरण हेतु “सिद्धांत में स्वीकृति” है।

  • मुख्य प्रावधान
    • मंजूरी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) या उसके क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा परियोजना प्रस्तावों की समीक्षा के बाद दी जाती है।
    • इसमें निम्नलिखित शर्तें शामिल हैं:
      • प्रतिपूर्ति वृक्षारोपण (Compensatory Afforestation – CA)
      • नेट प्रजेंट वैल्यू (Net Present Value – NPV) का भुगतान
      • भूमि हस्तांतरण और अंकन अनुपालन
  • प्रक्रिया और स्टेज-II मंजूरी: शर्तों को पूरा करने के बाद, राज्य एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जिसके बाद स्टेज-II (अंतिम) मंजूरी मिलती है और इसके पश्चात् निर्माण शुरू किया जा सकता है।
  • छूट (2023 संशोधन): कुछ परियोजनाएँ छूट प्राप्त हैं, जैसे:-
    • अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से 100 किमी के भीतर रणनीतिक परियोजनाएँ
    • सुरक्षा से संबंधित बुनियादी ढाँचा (10 हेक्टेयर तक)
  • महत्त्व: यह प्रक्रिया पर्यावरणीय सुरक्षा, प्रतिपूर्ति तंत्र और सतत् भूमि उपयोग निर्णयों को सुनिश्चित करती है, इससे पहले कि वन भूमि का हस्तांतरण किया जाए।

नेट प्रजेंट वैल्यू (NPV) के बारे में

  • संकल्पना: नेट प्रजेंट वैल्यू (NPV) वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए एकमुश्त भुगतान है।
  • गणना का आधार: यह पारिस्थितिकी सेवाओं का मौद्रीकरण दर्शाता है, जैसे कि कार्बन संचित करना, मृदा संरक्षण, और जैव विविधता।
  • फंड का उपयोग: संकलित राशि क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA: Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) फंड में जमा की जाती है और इसका उपयोग वृक्षारोपण और पारिस्थितिकी पुनर्स्थापना के लिए किया जाता है।

एनुअल सर्वे ऑफ इन्कॉरपोरेटेड सर्विस सेक्टर एंटरप्राइजेज (ASISSE)

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistical Office) ने पहली बार एनुअल सर्वे ऑफ इन्कॉरपोरेटेड सर्विस सेक्टर एंटरप्राइजेज (ASISSE) शुरू किया है, जो इनकॉरपोरेटेड सर्विसेज सेक्टर को कवर करता है।

इनकॉरपोरेटेड सर्विसेज सेक्टर एंटरप्राइजेज (ASISSE) के बारे में

  • उद्देश्य: भारत के इनकॉरपोरेटेड सर्विस सेक्टर का एक व्यापक डेटाबेस तैयार करना ताकि नीति-निर्माण में सुधार हो सके।
  • कवरेज: इसमें कंपनियाँ और LLPs शामिल हैं, जो कंपनी अधिनियम (1956/2013) और LLP अधिनियम, 2008 के तहत पंजीकृत हैं।
    • कवर किए गए सेक्टर: व्यापार (Trade), परिवहन (Transport), आतिथ्य (Hospitality), सूचना प्रौद्योगिकी (IT), शिक्षा (Education), स्वास्थ्य सेवा (Healthcare)।
  • संदर्भ अवधि: वित्तीय वर्ष 2024–25।
  • डेटा स्रोत और तरीका: वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) डेटाबेस का उपयोग सैंपलिंग फ्रेम के रूप में किया गया।
    • डेटा संग्रह: सुरक्षित वेब-आधारित पोर्टल के माध्यम से डेटा एकत्रित किया जाता है।
  • कानूनी ढाँचा: यह कलेक्शन ऑफ स्टेटिस्टिक्स एक्ट, 2008 (संशोधित 2017) और जन विश्वास अधिनियम, 2023 के तहत आयोजित किया जाता है।
  • आर्थिक महत्त्व: सर्विसेज सेक्टर भारत की GDP में 50% से अधिक योगदान देता है और यह रोजगार का एक प्रमुख स्रोत है।
  • महत्त्वपूर्ण योगदान: ASISSE इस ‘डॉमिनेंट सेक्टर’ में महत्त्वपूर्ण डेटा अंतराल को पूर्ण करता है।
  • पूरक सर्वेक्षण
    • औद्योगिक वार्षिक सर्वेक्षण (ASI): मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए।
    • एनुअल सर्वे ऑफ़ इनकॉरपोरेटेड सेक्टर एंटरप्राइजेज (ASUSE): अनौपचारिक (Informal) सेक्टर के लिए।

कोझिकोड–वायनाड टनल प्रोजेक्ट

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केरल के कोझिकोड–वायनाड टनल प्रोजेक्ट को रोकने से इनकार कर दिया, इसका तर्क देते हुए कि यह राष्ट्रीय महत्त्व का प्रोजेक्ट है।

कोझिकोड–वायनाड टनल प्रोजेक्ट के बारे में

  • परिचय: यह एक 8.73 किमी. का ट्विन-ट्यूब टनल कॉरिडोर है, जो कोझिकोड और वायनाड को जोड़ता है और यह टनल पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील पश्चिमी घाट से होकर गुजरती है।
  • निर्माणकर्ता: प्रोजेक्ट केरल राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित और निष्पादित किया गया और पर्यावरणीय मूल्यांकन विशेषज्ञ समितियों द्वारा किया गया।
  • उद्देश्य: यात्रा समय और जाम की समस्या से निपटना तथा कनेक्टिविटी सुधारना, जो कि एक भू-सीमित, पहाड़ी क्षेत्र में जो सड़क जाम के लिए संवेदनशील है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • इंजीनियरिंग डिजाइन: ट्विन-ट्यूब यूनिडायरेक्शनल टनल (2+2 लेन) और फोर-लेन एप्रोच रोड्स ताकि ट्रैफिक फ्लो प्रभावी हो।
    • रणनीतिक कनेक्टिविटी: अनक्कंपॉयिल–कलाडी–मेप्पाड़ी कॉरिडोर से जुड़ता है, जिससे क्षेत्रीय गतिशीलता और आर्थिक समेकन बढ़ता है।
    • भू-भाग और स्थान: 700–2061 मीटर की ऊँचाई पर स्थित, संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों से होकर और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों के पास।
  • प्रोजेक्ट के विरुद्ध उठाए गए मुद्दे
    • पारिस्थितिकी संवेदनशीलता: नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व के निकट होने से जैव विविधता हानि और पारिस्थितिकी विघटन की चिंता।
    • भूस्खलन जोखिम: वर्ष 2024 में इस क्षेत्र में भारी भूस्खलन हुआ था (400+ मौतें), जिससे टनल निर्माण में कंपन के कारण सुरक्षा चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
    • पर्यावरण मंजूरी संबंधी मुद्दे: जल्दबाजी में समीक्षा और अपर्याप्त प्रभाव मूल्यांकन का आरोप, विशेषकर कैटेगरी ‘A’ प्रोजेक्ट्स के लिए।
  • न्यायालय के निर्णय
    • केरल उच्च न्यायालय का निर्णय (वर्ष 2025 – वायनाड प्रकृति संरक्षण समिति बनाम केरल राज्य): कड़ी पर्यावरणीय सुरक्षा और निगरानी तंत्र के साथ प्रोजेक्ट को अनुमति दी।
  • सर्वोच्च न्यायालय (2026) का निर्णय: हस्तक्षेप करने से इनकार, विशेषज्ञ मंजूरी को नोट किया और उल्लंघन की स्थिति में राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल की शरण लेने की अनुमति दी।

निष्कर्ष

यह प्रोजेक्ट विकास बनाम पर्यावरण बहस को उजागर करता है और इन्फ्रास्ट्रक्चर आवश्यकताओं और पारिस्थितिकी संधारणीयता के बीच संतुलन बनाने के लिए सख्त सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक बनाता है।

मिशन मित्र (Mission MITRA)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने मिशन मित्र (MITRA: Mapping of Interoperable Traits and Response Assessment) की घोषणा की है, जो 2–9 अप्रैल के बीच लेह, लद्दाख में आयोजित किया जा रहा है।

मिशन मित्र (MITRA) के बारे में

  • उद्देश्य: यह मिशन गगनयात्रियों (Astronauts) और ग्राउंड-कंट्रोल टीम्स के मध्य टीम इंटरऑपरेबिलिटी को समझने, और चरम पर्यावरणीय और संचालन संबंधी तनावों के तहत उनके निर्णय लेने की क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए है।
  • पद्धति: इस मिशन के तहत चार अंतरिक्ष यात्री-नियतशुभांशु शुक्ला, प्रशांत बालकृष्णन नायर, अजीत कृष्णन, और अंगद प्रताप – को शारीरिक, मानसिक और संचालनात्मक गुणों के विभिन्न व्यावहारिक परीक्षणों के माध्यम से जाँचा जाएगा।
    • इसके अलावा, उन्हें संचार क्षमता, अनुकूलन क्षमता, तनाव प्रबंधन और चरम परिस्थितियों में सहनशीलता के लिए भी देखा जाएगा।
  • सहयोग: मिशन मित्र (MITRA) का नेतृत्व इसरो (ISRO) के ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर द्वारा किया जा रहा है और इसे भारतीय वायु सेना के इंस्टिट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन और प्रोटोप्लैनेट प्रा. लि., बंगलूरू के साथ साझेदारी में संपन्न किया जा रहा है।

लद्दाख को चुनने का कारण

  • सिम्युलेटेड स्पेस कंडीशंस: अंतरिक्ष एक चुनौतीपूर्ण वातावरण है, जिसके अनुकूल होने के लिए कड़े शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
  • ISRO का प्रयास: ISRO पृथ्वी पर स्पेस जैसी परिस्थितियों को दोहराने का प्रयास कर रहा है और इसके लिए लद्दाख में उपलब्ध प्राकृतिक कठोर और चरम पर्यावरण का उपयोग किया जा रहा है।
  • हाई एल्टीट्यूड वाला स्थान: लद्दाख समुद्र तल से लगभग 3,500 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ वर्ष के छह महीने से अधिक समय तक तापमान शून्य से नीचे रहता है, वर्षा बहुत कम होती है, नमी का स्तर न्यूनतम होता है और अधिकांश महीनों में आसमान साफ रहता है। यह सभी स्थितियाँ मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन के लिए आदर्श परीक्षण क्षेत्र बनाती हैं।
  • स्पेस एनालॉग वातावरण: लद्दाख में निम्न तापमान, हाइपॉक्सिया (ऑक्सीजन की कमी) और अलगाव सभी अंतरिक्ष उड़ान की परिस्थितियों के समान हैं।

महत्त्व 

मिशन मित्र (MITRA) से प्राप्त परिणाम भारत के मानव आधारित गगनयान मिशन के डिजाइन और विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देंगे।

भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि

हाल ही में, भारत ने वित्तीय वर्ष 2025–26 में 6.05 GW पवन ऊर्जा जोड़कर अपनी अब तक की सबसे अधिक पवन ऊर्जा वृद्धि दर्ज की, जो पिछले वर्ष की तुलना में 46% वृद्धि दर्शाती है।

भारत की पवन ऊर्जा में उपलब्धियाँ

  • वार्षिक रिकॉर्ड क्षमता में वृद्धि: भारत ने वित्तीय वर्ष 2025–26 में 6.05 GW पवन ऊर्जा जोड़ी, जो पिछली अधिकतम सीमा 5.5 GW (FY 2016–17) को पार कर गई।
    • यह वित्तीय वर्ष 2024–25 के स्तर (लगभग 50 GW) के मुकाबले 46% वृद्धि दर्शाता है, जो क्षेत्र में तीव्र गति को संकेत करता है।
  • कुल स्थापित क्षमता में वृद्धि: कुल स्थापित क्षमता 56 GW को पार कर चुकी है, जिससे भारत वैश्विक पवन ऊर्जा बाजार में शीर्ष स्थानों में शामिल है।
  • नीतिगत और संस्थागत समर्थन: वृद्धि को इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) शुल्क में छूट (2028 तक), प्रतिस्पर्द्धी बोली प्रक्रिया, और ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस द्वारा समर्थन मिला।
    • तकनीकी सहायता: राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) द्वारा तकनीकी सहायता और बेहतर परियोजना पाइपलाइन।
  • जलवायु लक्ष्यों में योगदान: पवन ऊर्जा उत्पादन का विस्तार वर्ष 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

पवन ऊर्जा उत्पादन परिदृश्य

  • वैश्विक पवन ऊर्जा परिदृश्य: चीन की क्षमता 650 GW से अधिक है।
    • अमेरिका में लगभग 150–160 GW, जबकि जर्मनी यूरोप में अग्रणी बना हुआ है।
    • वैश्विक स्थापित क्षमता वर्ष 2026 में लगभग 160 GW रहने की संभावना है, (वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 170 GW के बाद)।
  • भारत की वैश्विक स्थिति: भारत वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान पर है, 50+ GW स्थापित क्षमता के साथ और भविष्य में तीव्र वृद्धि की संभावना रखता है।
  • भारत के प्रमुख पवन ऊर्जा राज्य:
    • गुजरात > तमिलनाडु > कर्नाटक > महाराष्ट्र।

निष्कर्ष

पवन ऊर्जा एक तेजी से बढ़ता हुआ नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र बनकर उभर रही है, जो भारत के लिए सततता और ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ जोड़ती है।

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