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तेल अर्थव्यवस्था

Lokesh Pal January 13, 2026 03:07 17 0

संदर्भ

रूसी ऊर्जा क्षेत्र पर हाल के अमेरिकी प्रतिबंधों और वेनेजुएला के तेल के फिर से जुड़ने से यह स्पष्ट होता है कि डॉलर पर निर्भरता कम करने (डी-डॉलराइजेशन) को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।। साथ ही, इससे वैश्विक तेल-आर्थिक शक्ति संरचना में पेट्रोडॉलर प्रणाली से दूर होने की प्रवृत्ति और संभावित परिवर्तन भी परिलक्षित होते हैं।

PW OnlyIAS विशेष

  • डी-डॉलराइजेशन (De-dollarisation) वह प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत देश व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर (USD) पर अपनी निर्भरता कम करते हैं।
  • इसमें वैकल्पिक मुद्राओं का उपयोग, द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्थाएँ और क्षेत्रीय वित्तीय तंत्रों को अपनाना शामिल है, ताकि मौद्रिक संप्रभुता को सुदृढ़ किया जा सके तथा अमेरिकी-नेतृत्व आधारित प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाव किया जा सके।

पेट्रोडॉलर प्रणाली के बारे में

  • पेट्रोडॉलर प्रणाली (Petrodollar System): पेट्रोडॉलर प्रणाली उस वैश्विक व्यवस्था को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार का मूल्य निर्धारण और भुगतान मुख्यतः अमेरिकी डॉलर (USD) में किया जाता है।
    • इस प्रणाली ने ऊर्जा बाजारों को वैश्विक वित्त से जोड़ दिया, जिससे तेल केवल एक वस्तु न रहकर अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बन गया।
  • उत्पत्ति: इस प्रणाली का उद्भव वर्ष 1970 के दशक की शुरुआत में ब्रेटन वुड्स प्रणाली के पतन के बाद हुआ।
    • इसके पश्चात् संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए समझौतों के तहत तेल निर्यातक देशों ने कच्चे तेल की कीमतें विशेष रूप से अमेरिकी डॉलर में तय करने पर सहमति व्यक्त की।
    • इसके बदले अमेरिका ने सुरक्षा गारंटी और वित्तीय पहुँच प्रदान की। बाद में यह व्यवस्था तेल निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) के माध्यम से वैश्विक मानक बन गई।
  • वर्तमान उपयोग: वर्तमान में वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर पर आधारित है, जिससे अमेरिकी मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय माँग लगातार बनी रहती है।
    • विश्व स्तर पर लगभग 80% तेल व्यापार डॉलर में होता है, जिसके कारण संयुक्त राज्य अमेरिका को बड़े राजकोषीय और चालू खाता घाटों का वित्तपोषण करने में सहायता मिलती है। साथ ही, यह व्यवस्था अमेरिका को प्रतिबंधों और वित्तीय नियंत्रणों के माध्यम से भू-राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की क्षमता प्रदान करती है।

कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के बारे में 

  • कच्चा तेल एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला, गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन है, जो मुख्यतः हाइड्रोकार्बनों से निर्मित होता है। इसका निर्माण लाखों वर्षों में दबे हुए कार्बनिक पदार्थों से निकलने वाली ऊष्मा और दाब के कारण होता है।
    • तेल विश्व की कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 30% प्रदान करता है।
  • कच्चे तेल का शोधन करके पेट्रोल, डीजल, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF), तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) तथा पेट्रोकेमिकल कच्चा माल (फीडस्टॉक) तैयार किया जाता है। इसी कारण कच्चा तेल आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं का एक आधार स्तंभ माना जाता है।
  • कच्चे तेल के निष्कर्षण की प्रक्रिया: कच्चे तेल का निष्कर्षण मुख्य रूप से स्थल पर या समुद्र तल के नीचे स्थित भूमिगत भंडारों में ड्रिलिंग के माध्यम से किया जाता है।
    • कच्चा तेल प्रायः प्राकृतिक गैस और खारे जल के साथ पाया जाता है।
    • निष्कर्षण के बाद कच्चे तेल को रिफाइनरियों तक पहुँचाया जाता है, जहाँ इसका आसवन तथा अन्य प्रसंस्करण प्रक्रियाएँ की जाती हैं, ताकि इसे उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जा सके।

कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के प्रकार

  • लाइट क्रूड ऑयल (Light Crude Oil): लाइट क्रूड ऑयल का घनत्व कम होता है और यह आसानी से प्रवाहित होता है।
    • इससे पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन जैसे उच्च-मूल्य वाले परिष्कृत उत्पादों की अधिक मात्रा प्राप्त होती है।
    • इसका शोधन अपेक्षाकृत सस्ता होता है और इसलिए अधिकांश आधुनिक रिफाइनरियाँ इसे प्राथमिकता देती हैं।
    • हल्का कच्चा तेल सामान्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका (शेल ऑयल क्षेत्र), नॉर्थ सी (ब्रेंट क्रूड), पश्चिमी अफ्रीका के कुछ भागों (नाइजीरिया) तथा अजरबैजान में पाया जाता है।
  • हैवी क्रूड ऑयल (Heavy Crude Oil): हैवी क्रूड ऑयल का घनत्व और श्यानता अधिक होती है। इससे अवशिष्ट उत्पादों  की मात्रा अधिक उत्सर्जित होती है और इसके शोधन के लिए कोकिंग तथा हाइड्रोक्रैकिंग जैसी जटिल तकनीकों की आवश्यकता होती है, जिससे प्रसंस्करण लागत बढ़ जाती है।
    • भारी कच्चा तेल मुख्यतः वेनेजुएला (ओरिनोको बेल्ट), कनाडा (ऑयल सैंड्स), मैक्सिको, तथा मध्य पूर्व के कुछ भागों में पाया जाता है।
  • स्वीट क्रूड ऑयल (Sweet Crude Oil): स्वीट क्रूड ऑयल में सल्फर की मात्रा कम होती है (आमतौर पर 0.5% से कम)।
    • इससे कम प्रदूषक उत्पन्न होते हैं, रिफाइनरी उपकरणों में कम जंग लगती है, और यह पर्यावरणीय मानकों को पूरा करता है।
    • यह संयुक्त राज्य अमेरिका (WTI क्रूड), नॉर्थ सी (ब्रेंट), लीबिया, नाइजीरिया, तथा इंडोनेशिया के कुछ भागों में उत्पादित होता है।
  • सोर क्रूड ऑयल  (Sour Crude Oil): सोर क्रूड ऑयल में सल्फर की मात्रा अधिक होती है (आमतौर पर 0.5% से अधिक), जिसके कारण यह अधिक प्रदूषणकारी होता है और इसका शोधन तकनीकी रूप से अधिक जटिल होता है।
    • इसके शोधन के लिए ‘डी-सल्फरीकरण’ तथा उन्नत रिफाइनिंग अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
    • सोर क्रूड ऑयल’ (Sour Crude Oil) मुख्यतः मध्य पूर्व (सऊदी अरब, इराक), कनाडा, वेनेजुएला और रूस में पाया जाता है।

तेल व्यापार मानक   

  • ब्रेंट क्रूड: उत्तरी सागर के तेल क्षेत्रों से प्राप्त, सबसे व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला वैश्विक बेंचमार्क, जो अधिकांश जलमार्ग से प्राप्त कच्चे तेल की कीमत निर्धारित करता है और लाइट व स्वीट क्रूड ऑयल के लिए जाना जाता है।
  • वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI): एक प्रमुख अमेरिकी बेंचमार्क, जो लाइट और स्वीट क्रूड ऑयल होता है और उत्तरी अमेरिका में इसका व्यापक रूप से कारोबार होता है।
  • दुबई/ओमान: मध्य पूर्वी तेल, विशेष रूप से एशियाई बाजारों के लिए, की कीमत निर्धारित करने के लिए उपयोग किया जाता है और प्रायः ब्रेंट से संबंधित होता है।
  • ओपेक रेफरेंस बास्केट: ओपेक द्वारा मूल्य निर्धारण निर्णयों के लिए उपयोग किया जाता है।
  • वेस्टर्न कैनेडियन सेलेक्ट (WCS): कनाडाई तेल के लिए एक हैवी, सोर क्रूड ऑयल बेंचमार्क है।
  • बोनी लाइट (नाइजीरिया) और यूराल्स (रूस): क्षेत्रीय बेंचमार्क है।

कच्चे तेल से संबंधित संगठन

  • पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (OPEC): यह एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1960 में सदस्य देशों के बीच पेट्रोलियम नीतियों के समन्वय, तेल बाजारों में स्थिरता लाने और उत्पादकों के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी।
    • सदस्य देश (वर्ष 2024 तक 12 देश): सऊदी अरब, ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, वेनेजुएला, नाइजीरिया, अल्जीरिया, लीबिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी और गैबॉन शामिल हैं।
      • अंगोला (जनवरी 2024 में सदस्यता समाप्त हो गई।)

  • OPEC+: यह वर्ष 2016 में गठित एक व्यापक गठबंधन है, जिसमें ओपेक के 12 सदस्य और रूस, मैक्सिको, कजाकिस्तान और ओमान सहित ओपेक के अलावा 10 अन्य तेल-निर्यात करने वाले देश शामिल हैं, जो वैश्विक बाजार को प्रभावित करने के लिए उत्पादन स्तरों पर समन्वय करते हैं।

वर्तमान में कच्चा तेल उत्पादन संबंधी महत्त्वपूर्ण आँकड़े 

  • शीर्ष उत्पादक:  1. संयुक्त राज्य अमेरिका,  2. सऊदी अरब, 3. रूस, 4. कनाडा, 5. इराक
  • शीर्ष कच्चे तेल भंडार: 1. वेनेजुएला, 2. सऊदी अरब,  3. कनाडा,  4. ईरान, 5. इराक

वैश्विक तेल बाजार का वर्तमान परिदृश्य

वैश्विक तेल बाजार वर्तमान में भू-राजनीति, तकनीक और ऊर्जा संक्रमण से प्रेरित महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तनों से गुजर रहा है।

  • भू-राजनीतिक विखंडन: रूस–यूक्रेन संघर्ष के बाद यह विखंडन और भी तीव्र हो गया है।
    • रूसी तेल पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने पारंपरिक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर दिया, जिससे भारत और चीन जैसे खरीदारों को वैकल्पिक निपटान तंत्र के माध्यम से रियायती कच्चे तेल की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
  • तेल की गुणवत्ता में बदलाव: तेल की गुणवत्ता व्यापार प्रवाह को नया आकार दे रही है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका मुख्य रूप से हैवी-स्वीट शेल ऑयल उत्पादित करता है, जबकि इसकी कई रिफाइनरियाँ हैवी सोर क्रूड ऑयल के लिए डिजाइन की गई हैं।
    • ऊर्जा की प्रचुरता के बावजूद वेनेजुएला और कनाडा के तेल में अमेरिका की निरंतर बढ़ते हित का यही मूल कारण है।
  • बाजार अस्थिरता: पश्चिम एशिया में संघर्ष, OPEC+ के उत्पादन निर्णय, और जलवायु-संबंधी व्यवधानों के कारण तेल आपूर्ति में अनिश्चितता बढ़ गई है।
    • इन कारकों ने तेल बाजारों को और अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है।
  • ऊर्जा संक्रमण: हाल ही में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों  पर ध्यान बढ़ने से दीर्घकालिक तेल की माँग की अपेक्षाओं में बदलाव आ रहा है।
    • विशेषकर चीन में इलेक्ट्रिक वाहन का तीव्र विकास भविष्य में तेल की माँग की वृद्धि को धीरे-धीरे कम कर रहा है, साथ ही औद्योगिक और तकनीकी नेतृत्व को भी नई दिशा दे रहा है।
  • राज्यीय हस्तक्षेप में वृद्धि: सरकारें रणनीतिक भंडार, निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंधों का उपयोग करके बाजारों को प्रभावित कर रही हैं, जिससे विशुद्ध रूप से बाजार-संचालित मूल्य निर्धारण की भूमिका कम हो रही है।

तेल अर्थव्यवस्था का डी-डॉलराइजेशन 

कई समन्वित और असंगठित वैश्विक घटनाक्रमों के कारण पेट्रोडॉलर के प्रभुत्व पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

  • प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं द्वारा गैर-डॉलर तेल व्यापार: पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद, रूस ने अपने तेल निर्यात के लिए रूबल और युआन में भुगतान स्वीकार करना शुरू कर दिया है।
    • चीन ने भी युआन-निर्धारित तेल अनुबंधों का विस्तार किया है, विशेषकर रूस और कुछ खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ताओं के साथ।

  • BRICS-नेतृत्व वाली वित्तीय पहलें: BRICS देशों ने वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और यहाँ तक कि संभावित साझा निपटान तंत्र पर चर्चा की है, ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके।
  • द्विपक्षीय मुद्रा समझौते: भारत ने तेल आयात के निपटान के लिए डॉलर-आधारित व्यापार ढाँचे और तृतीय-मुद्रा निपटान सहित गैर-डॉलर तंत्रों के साथ प्रयोग किया है, विशेष रूप से रियायती रूसी कच्चे तेल के लिए।
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जुलाई 2022 में भारतीय रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार निपटान के लिए एक औपचारिक ढाँचा स्थापित किया था।
    • यह भारतीय रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में भी एक कदम है।
  • प्रतिबंधों के माध्यम से डॉलर का हथियार के रूप में उपयोग: ईरान, रूस और वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापक वित्तीय प्रतिबंधों ने देशों को चीन की क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (CIPS) जैसी समानांतर भुगतान प्रणालियाँ विकसित करने के लिए प्रेरित किया है।
  • बहुध्रुवीय ऊर्जा बाजारों का उदय: तेल आपूर्तिकर्ताओं का विविधीकरण, चिंहित बाजारों का विकास और क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र, तेल व्यापार में किसी एक मुद्रा के एकाधिकार को कमजोर कर रहे हैं।

वर्तमान तेल अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति

  • आयात पर अत्यधिक निर्भरता: आयातित कच्चे तेल पर 85% से अधिक निर्भरता भारत को बाहरी आपूर्ति में व्यवधान और वैश्विक मूल्य तनावों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • भू-राजनीतिक जोखिम: होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान, रूसी संघ पर प्रतिबंध और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा टैरिफ की धमकियों से आपूर्ति पक्ष की अनिश्चितता बढ़ जाती है।
  • मैक्रोइकॉनॉमिक भेद्यता: कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति 25-35 आधार अंक तक बढ़ सकती है और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि 20-30 आधार अंक तक घट सकती है।
  • प्रतिबंध और अनुपालन दबाव: रियायती रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध से भारत के वार्षिक कच्चे तेल आयात बिल में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
  • अपर्याप्त रणनीतिक बफर: रणनीतिक भंडारण क्षमता अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम बनी हुई है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के सदस्य देश 90 दिनों का आपातकालीन तेल भंडार बनाए रखते हैं।
    • भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) वर्तमान में लगभग 9-10 दिनों के कच्चे तेल का भंडार प्रदान करते हैं।
    • इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) जैसी तेल विपणन कंपनियों (OMC) के भंडारों को मिलाकर, कुल आपातकालीन भंडार लगभग 70-75 दिनों तक बढ़ जाता है।
    • भारत का लक्ष्य SPR क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करना है, जिसके तहत लगभग 11.83 मिलियन मीट्रिक टन (लगभग 22 दिनों की माँग) तक पहुँचने की योजना है।

तेल संबंधी संकट को कम करने के विकल्प

  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG), नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता।
    • भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है और वर्ष 2025 के मध्य तक अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50% से अधिक गैर-जीवाश्म स्रोतों (जल, परमाणु, नवीकरणीय ऊर्जा) से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।
  • स्रोत देशों का विविधीकरण: भारत द्वारा कच्चे तेल की हालिया सोर्सिंग में महत्त्वपूर्ण विविधता दिखाई देती है, जो पारंपरिक पश्चिम एशियाई निर्भरता से हटकर रूसी, अमेरिकी और अफ्रीकी आपूर्ति को अधिक शामिल कर रही है।
  • जैव ईंधन का विस्तार: पेट्रोलियम की माँग को कम करने के लिए एथेनॉल मिश्रण, जैव-संपीडित प्राकृतिक गैस (बायो-CNG) और बायोडीजल को बढ़ावा देना।
  • इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ग्रीन हाइड्रोजन: तेल की खपत को संरचनात्मक रूप से कम करने के लिए दीर्घकालिक संक्रमणकालीन मार्ग है।
    • भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत वर्ष 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) वार्षिक क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • दक्षता में सुधार: रिफाइनरी की दक्षता में वृद्धि और माँग-पक्ष ऊर्जा प्रबंधन।

निष्कर्ष 

भू-राजनीतिक विभाजन, डी-डॉलराइजेशन के प्रयास और ऊर्जा संक्रमण के बीच, पेट्रोडॉलर प्रणाली धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। आज तेल का मूल्य निर्धारण केवल बाजार के मूलभूत तत्त्वों से नहीं, बल्कि मुद्रा तथा राजनीतिक रणनीतियों  से भी प्रभावित होने लगा है।

अभ्यास प्रश्न 

वैश्विक ऊर्जा गठबंधनों में हो रहे बदलावों और डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाली वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों के उद्भव के संदर्भ में वेनेजुएला के तेल क्षेत्र के प्रति अमेरिकी नीति के भू-राजनीतिक और आर्थिक परिणामों का मूल्यांकन कीजिए।

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