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भारत में केवल 4 में से 1 सीमांत किसान ही सहकारी समितियों से पंजीकृत है

Lokesh Pal December 29, 2025 03:27 115 0

संदर्भ 

भारत में सीमांत किसानों की स्थिति रिपोर्ट 2025 के अनुसार, देश के 25 प्रतिशत से भी कम सीमांत किसान कृषि सहकारी संस्थाओं के सक्रिय सदस्य हैं।

रिपोर्ट के बारे में

  • यह रिपोर्ट किसान दिवस (23 दिसंबर) के अवसर पर समतापूर्ण विकास के लिए उद्यम मंच (FEED) द्वारा जारी की गई थी।
  • आंध्र प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और उत्तराखंड इन छह राज्यों का अध्ययन किया गया।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • सहकारी संस्थाओं से जुड़ाव: केवल चार में से एक (25 प्रतिशत से कम) सीमांत किसान ही कृषि सहकारी संस्थाओं के सक्रिय सदस्य हैं।
    • सबसे कम भागीदारी बिहार, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में पाई गई।
  • डिजिटल विभाजन: सहकारी समितियों में डिजिटल तकनीक को अपनाना असमान और अक्सर सतही होता है।
    • कम उपयोग: त्रिपुरा में 77.8 प्रतिशत सहकारी संस्थाएँ किसी भी डिजिटल उपकरण का उपयोग नहीं करतीं हैं, जबकि बिहार में यह आँकड़ा 25 प्रतिशत है।
  • नेतृत्व में लैंगिक असमानता: सहकारी संस्थाएँ अब भी पुरुष-प्रधान बनी हुई हैं, जहाँ महिला सदस्यता एवं नेतृत्व के बीच बड़ा अंतर है।
    • महिला सदस्य: 21.25 लाख महिलाएँ सहकारी संस्थाओं की सदस्य के रूप में पंजीकृत हैं।
    • महिला नेतृत्व: संपूर्ण देश में केवल 3,355 महिलाएँ सहकारी बोर्डों में निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।
    • बाधाएँ: प्रतिबंधात्मक सामाजिक मानदंड, सीमित गतिशीलता और अवैतनिक देखभाल कार्य का बोझ महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका निभाने से रोकते हैं।
  • सहकारी संस्थाओं का सकारात्मक प्रभाव: जहाँ सीमांत किसानों को सहकारी संस्थाओं तक पहुँच प्राप्त हुई है, वहाँ परिणाम उल्लेखनीय रूप से बेहतर हुए हैं।
    • आय में वृद्धि: सहकारी समितियों से जुड़े 45% किसानों ने घरेलू आय में वृद्धि की सूचना दी। केवल 21% ने आय में गिरावट या स्थिरता की सूचना दी।
    • आजीविका सुरक्षा: 49 प्रतिशत किसानों ने जुड़ने के बाद बेहतर सुरक्षा की सूचना दी।
    • ऋण तक पहुँच: 67 प्रतिशत (दो-तिहाई) सदस्यों को ऋण और वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता हुई।
    • कृषि उत्पादन: 42 प्रतिशत किसानों ने फसल उपज में सुधार की सूचना दी।

भारत में सीमांत किसान

भारत में सीमांत किसान वह कृषक होता है, जिसके पास 1 हेक्टेयर से कम (या 2.5 एकड़ से कम) कृषि भूमि होती है।

कृषि में सहकारी संस्थाओं  की भूमिका

  • प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ छोटे किसानों के लिए सबसे सुलभ संस्थागत सहायता प्रणाली हैं।
  • रणनीतिक स्थिति: सबसे निचले स्तर की संस्था होने के कारण, PACS किसानों के औपचारिक संस्थाओं और सरकारी योजनाओं से संपर्क को आकार देती हैं।
  • प्रदान की जाने वाली सेवाएँ: ऋण तक पहुँच, कृषि संबंधी सामग्री, खरीद के साधन और डिजिटल/सार्वजनिक सेवाएँ।
  • विकसित होती भूमिका: कई प्राथमिक कृषि साख समिति ग्रामीण सेवा केंद्रों में परिवर्तित हो रही हैं तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अन्य आवश्यक सेवाओं का संचालन भी कर रही हैं।
  • बहिष्करण का परिणाम: अनौपचारिक बाजारों पर बढ़ती निर्भरता, आय में धीमी वृद्धि और जलवायु एवं बाजार संबंधी संकटों के प्रति अधिक संवेदनशीलता।

सीमांत किसानों को सहकारी संस्थाओं से दूर रखने वाली बाधाएँ

रिपोर्ट में चार प्रमुख संरचनात्मक बाधाओं की पहचान की गई है:

  • जटिल प्रक्रियाएँ: सदस्यता की कठिन प्रक्रियाएँ
  • भौतिक पहुँच: निकटतम PACS तक लंबी दूरी
  • सीमित पूँजी: वित्तीय संसाधनों की कमी
  • सामाजिक बहिष्करण: जाति, लैंगिक या वर्ग आधारित भेदभाव।

किसान दिवस (राष्ट्रीय किसान दिवस)

  • प्रतिवर्ष 23 दिसंबर को मनाया जाता है।
  • यह भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री और प्रसिद्ध किसान नेता चौधरी चरण सिंह की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
  • थीम: विकसित भारत 2047 – भारतीय कृषि के वैश्वीकरण में किसान उत्पादक संगठनों की भूमिका

प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ  (PACS)

  • प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ अल्पकालिक सहकारी ऋण संरचना की ग्राम-स्तरीय आधारभूत इकाई हैं।
  • उनका प्राथमिक दायित्व किसानों और ग्रामीण परिवारों को किफायती, संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना है।
  • संगठनात्मक संरचना: ये राज्य सहकारी कानूनों के अंतर्गत सहकारी संस्थाओं के रूप में कार्य करती हैं और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों तथा राज्य सहकारी बैंकों से संबद्ध होती हैं।
  • गठन: किसी गाँव या मोहल्ले के कम-से-कम दस व्यक्ति पंजीकरण करा सकते हैं।
  • प्रबंधन: सदस्यों में से चुनी गई प्रबंधन समिति द्वारा संचालित।
  • सदस्यता: कार्यक्षेत्र से संबंधित सभी निवासी, जो शेयर खरीदने के लिए सहमत हों, सदस्यता के लिए पात्र हैं।

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