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निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

Lokesh Pal March 13, 2026 04:00 91 0

संदर्भ

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के 32 वर्षीय व्यक्ति हरीश राणा के लिए जीवन-रक्षक उपचार वापस लेने की अनुमति दी। वे वर्ष 2013 में गिरने से गंभीर सिर की चोट लगने के बाद से ‘पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (Persistent Vegetative State – PVS) में थे।

संबंधित तथ्य

  • यह निर्णय भारत में कृत्रिम जीवन-समर्थन प्रणाली हटाकर निष्क्रिय इच्छामृत्यु के न्यायालय द्वारा अनुमोदित पहले क्रियान्वयन का उदाहरण माना जा रहा है।
  • यह निर्णय भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु के संवैधानिक अधिकार से संबंधित विकसित हो रहे कानूनी ढाँचे को पुनः उजागर करता है।

‘पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) के बारे में

  • PVS एक तंत्रिका संबंधी स्थिति है, जिसमें रोगी चेतना और संज्ञानात्मक क्षमता खो देता है, लेकिन शरीर की मूल शारीरिक क्रियाएँ जैसे- साँस लेना, हृदय गति और नींद–जागरण चक्र जारी रहते हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • रोगी में स्वयं या आसपास के वातावरण के प्रति जागरूकता के कोई संकेत नहीं होते।
    • प्रतिवर्ती क्रियाएँ, जैसे- आँख खोलना या हाथ-पैर हिलाना हो सकता है, लेकिन इनका कोई उद्देश्यपूर्ण उत्तर नहीं होता है।
    • कई मामलों में साँस और रक्त संचार जैसी मूल क्रियाएँ जीवन-समर्थन मशीनों के बिना भी जारी रह सकती हैं।
    • यह स्थिति सामान्यतः गंभीर मस्तिष्क चोट, स्ट्रोक, ऑक्सीजन की कमी या किसी आघात के बाद उत्पन्न होती है।
  • चिकित्सीय वर्गीकरण
    • ‘पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’: जब मस्तिष्क चोट के बाद यह स्थिति एक महीने से अधिक समय तक बनी रहती है।
    • परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट: जब लंबे समय (आमतौर पर महीनों या वर्षों) तक रहने के बाद सुधार की संभावना अत्यंत कम हो जाती है।
  • नैतिक और कानूनी बहसों में महत्त्व: PVS जीवन के अंतिम चरण की देखभाल और निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़ी बहसों का महत्त्वपूर्ण आधार है, क्योंकि रोगी स्वयं चिकित्सा निर्णय लेने में असमर्थ होते हुए भी जैविक रूप से जीवित रहता है।
    • इससे जीवन-समर्थन हटाने, लिविंग विल और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार से संबंधित जटिल नैतिक और कानूनी प्रश्न उत्पन्न होते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य बिंदु

यह निर्णय गरिमा के साथ मृत्यु से संबंधित संचालनात्मक और पारिभाषिक परिदृश्य को स्पष्ट करता है:

  • पारिभाषिक परिवर्तन (WWMT): न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि “निष्क्रिय इच्छामृत्यु” शब्द अब पुराना और चिकित्सकीय रूप से भ्रमित करने वाला है। अब न्यायालय “चिकित्सीय उपचार का वापस लेना या रोकना (Withdrawal or Withholding of Medical Treatment – WWMT)” शब्द को प्राथमिकता देता है।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “इच्छामृत्यु” शब्द का प्रयोग केवल सक्रिय कृत्यों के लिए होना चाहिए, जबकि WWMT उस चिकित्सकीय स्थिति की मान्यता है, जिसमें आगे का उपचार निरर्थक हो जाता है।
  • CANH को चिकित्सीय उपचार के रूप में मान्यता: निर्णय का एक केंद्रीय कानूनी आधार यह था कि चिकित्सकीय रूप से सहायक पोषण और जलयोजन (Clinically Assisted Nutrition and Hydration – CANH)—जिसमें फीडिंग ट्यूब और अंतःशिरा द्रव शामिल हैं—को चिकित्सीय उपचार माना जाएगा।
    • अतः यदि CANH से अब कोई चिकित्सीय लाभ नहीं मिल रहा हो तो उसे वापस लेना कानूनी रूप से अनुमेय है।
  • ‘सर्वोत्तम हित’ सिद्धांत: उपचार वापस लेने के लिए न्यायालय ने दो-आधारित कठोर परीक्षण लागू किया:
    • उपचार को चिकित्सीय हस्तक्षेप होना चाहिए (सामान्य नर्सिंग देखभाल नहीं)।
    • उपचार वापस लेना रोगी के सर्वोत्तम हित में होना चाहिए, जो केवल जैविक श्वसन को बनाए रखने के संकीर्ण उद्देश्य से आगे जाता है।
  • अनिवार्य प्रशामक देखभाल (Palliative Care): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार उच्च गुणवत्ता वाली प्रशामक देखभाल से अविभाज्य है।
    • न्यायालय ने निर्देश दिया कि उपचार वापस लेने की प्रक्रिया विशेषीकृत चिकित्सीय वातावरण में की जाए, ताकि रोगी को शारीरिक पीड़ा न हो, और इस प्रक्रिया को देखभाल समाप्त करने के बजाय एक चिकित्सीय संक्रमण के रूप में देखा जाए।

चिकित्सीय उपचार का वापस लेना या रोकना (WWMT) और आत्महत्या के बीच अंतर

इन दोनों अवधारणाओं के बीच स्पष्ट अंतर करने के लिए न्यायालय ने चिकित्सीय निष्फलता सिद्धांत (Medical Futility Doctrine) का उपयोग किया।

  • चिकित्सीय निष्फलता सिद्धांत: यह वह सिद्धांत है, जिसके अनुसार चिकित्सकों पर ऐसे उपचार देने का न तो नैतिक और न ही कानूनी दायित्व होता है, जो कोई शारीरिक लाभ न दें या अर्थपूर्ण सुधार प्राप्त करने में विफल हों।
  • उद्देश्य बनाम चिकित्सीय मान्यता: आत्महत्या आत्म-विनाश का कार्य है। इसके विपरीत, WWMT उस अंतिम चिकित्सीय वास्तविकता की पेशेवर मान्यता है, जिसमें कृत्रिम समर्थन केवल “मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा” करता है।
  • शारीरिक अखंडता: उपचार से इनकार करने का अधिकार शारीरिक अखंडता का एक पहलू है। WWMT की अनुमति देकर कानून रोगी के इस अधिकार का सम्मान करता है कि उसके शरीर में निरर्थक तकनीक का हस्तक्षेप न किया जाए।
  • कारण: आत्महत्या में मृत्यु का कारण स्वयं किया गया कार्य होता है। जबकि WWMT में मृत्यु का कारण मूल रोग या चोट होती है; चिकित्सक केवल उस प्राकृतिक परिणाम तक पहुँचने से रोकने वाली कृत्रिम बाधाओं को हटा देता है।

इच्छामृत्यु के बारे में

  • संदर्भ: इच्छामृत्यु उस प्रथा को संदर्भित करती है, जिसमें कोई व्यक्ति जानबूझकर अपने जीवन को समाप्त करता है।
  • कारण: यह प्रथा अक्सर किसी असाध्य बीमारी या असहनीय दर्द और पीड़ा से राहत पाने से जुड़ी होती है।
  • किसके द्वारा किया जाता है: इच्छामृत्यु केवल चिकित्सक द्वारा दी जा सकती है और यह “सक्रिय” या “निष्क्रिय” हो सकती है।
  • इच्छामृत्यु के प्रकार: इच्छामृत्यु के चार प्रकार होते हैं।
    • सक्रिय इच्छामृत्यु: इसमें किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए पदार्थों या बाहरी बल के माध्यम से सक्रिय हस्तक्षेप किया जाता है, जैसे- घातक इंजेक्शन देना।
    • निष्क्रिय इच्छामृत्यु: यह उस जीवन-समर्थन या उपचार को वापस लेने को संदर्भित करता है, जो किसी अंतिम अवस्था के रोगी को जीवित रखने के लिए आवश्यक होता है।
    • स्वैच्छिक इच्छामृत्यु: यह रोगी की सहमति के साथ होती है।
    • अनैच्छिक इच्छामृत्यु: यह रोगी की सहमति के बिना दी जाती है।

इच्छामृत्यु के प्रकार, भारत में वर्तमान स्थिति और उदाहरण

इच्छामृत्यु का प्रकार भारत में वर्तमान स्थिति हाल के उदाहरण / मामले
सक्रिय अवैध भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 100 (गैर-इरादतन हत्या) और धारा 101 (हत्या) के अंतर्गत प्रतिबंधित। घातक इंजेक्शन जैसे सक्रिय कृत्यों के लिए “दया मृत्यु” का कोई अपवाद नहीं।
निष्क्रिय कानूनी (निर्देशों के अंतर्गत) कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018/2023) में लिविंग विल को वैध किया गया।

हरीश राणा मामला (2026) में PVS रोगी के लिए फीडिंग ट्यूब हटाने की वास्तविक प्रक्रिया का क्रियान्वयन।

स्वैच्छिक लिविंग विल के माध्यम से अनुमेय वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने अग्रिम चिकित्सा निर्देश (लिविंग विल) संबंधी दिशा-निर्देशों को सरल बनाया और न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनिवार्य उपस्थिति की शर्त हटाई।
अनैच्छिक अवैध सामान्यतः किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध जीवन समाप्त करना। अरुणा शानबाग (2011) के संदर्भ में यह अस्वैच्छिक था, क्योंकि रोगी सहमति देने में असमर्थ थी; अब परिवार “निकट मित्र” के रूप में कार्य कर सकते हैं।

आत्महत्या बनाम इच्छामृत्यु

  • आत्महत्या और इच्छामृत्यु वैचारिक रूप से अलग अवधारणाएँ हैं। किसी व्यक्ति द्वारा चोट पहुँचाकर, विषाक्त पदार्थ लेकर या किसी अन्य तरीके से अपने जीवन को समाप्त करना आत्महत्या कहलाता है। इस प्रकार आत्महत्या वह जानबूझकर किया गया कार्य है, जो व्यक्ति स्वयं करता है।
    • इसके विपरीत, इच्छामृत्यु में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए कदम उठाए जाते हैं।

क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार, मरने के अधिकार को भी शामिल करता है?

  • पी. रथीनम बनाम भारत संघ (1994): न्यायपालिका ने यह विचार किया कि आत्महत्या के प्रयास के लिए दंड (भारतीय दंड संहिता की धारा 309) उचित है या नहीं।
    • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मरने की स्वतंत्रता, जीने की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है। इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को असंवैधानिक माना गया।
  • ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान में निहित जीवन का अधिकार, मरने के अधिकार को शामिल नहीं करता, क्योंकि आत्महत्या या स्वयं मृत्यु चुनना जीवन समाप्त करने का एक अप्राकृतिक तरीका है।
    • न्यायालय ने धारा 309 की वैधता को पुनः स्थापित किया और आत्महत्या के प्रयास को फिर से अपराध बना दिया।

इच्छामृत्यु पर भारतीय न्यायपालिका

भारतीय कानून की दिशा जीवन की पवित्रता से व्यक्ति की गरिमा की ओर संक्रमण को दर्शाती है,

  • ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): इस निर्णय में स्थापित किया गया कि अनुच्छेद-21 गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की रक्षा करता है, जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु की प्रक्रिया भी शामिल है, हालाँकि इसने “मरने के अधिकार” को जीवन के अधिकार के समानांतर अधिकार के रूप में अस्वीकार किया।
  • अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011): इस निर्णय में पहली बार उच्च न्यायालय की कड़ी निगरानी के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता को मान्यता दी गई।
  • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): संवैधानिक पीठ ने गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया और अग्रिम निर्देश (लिविंग विल) को वैध बनाया।
  • वर्ष 2023 का प्रक्रियात्मक संशोधन: चिकित्सा बोर्ड की स्तर व्यवस्था को सरल बनाया गया और लिविंग विल पर न्यायिक मजिस्ट्रेट के अनिवार्य प्रतिहस्ताक्षर की आवश्यकता को हटा दिया गया।
  • रेबीज मामला (लंबित): वर्ष 2019 में रेबीज रोगियों के लिए इच्छामृत्यु की माँग करने वाली याचिका अभी लंबित है, जो जीवन के अंतिम चरण की देखभाल में रोग-विशिष्ट प्रोटोकॉल की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

भारत में तंत्र — कार्यान्वयन का मानकीकरण

जहाँ हरीश राणा निर्णय ने मौजूदा कानून को व्यवहार में लागू किया, वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मसौदा दिशा-निर्देश (2024) का उद्देश्य इसे पूरे देश में मानकीकृत करना है:

  • स्तरीय चिकित्सा बोर्ड: एक प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड (अस्पताल स्तर पर) और एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड (जिसमें राज्य द्वारा नामित विशेषज्ञ शामिल हो) दोनों को यह प्रमाणित करना होगा कि उपचार चिकित्सकीय रूप से निरर्थक है।
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका: अब स्पष्ट किया गया है कि पारदर्शिता के लिए अस्पतालों को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) को सूचित करना होगा, लेकिन पूर्व न्यायिक स्वीकृति आवश्यक नहीं है, जिससे चिकित्सकीय प्रक्रिया तीव्र हो जाती है।

इच्छामृत्यु पर 241वीं विधि आयोग रिपोर्ट

  • 241वीं विधि आयोग रिपोर्ट, जिसका शीर्षक ‘पैसिव यूथेनेशिया – ए रीलुक” है, इच्छामृत्यु पर कई महत्त्वपूर्ण अवलोकन प्रस्तुत करती है।
  • यह रिपोर्ट कहती है कि इच्छामृत्यु और सहायक आत्महत्या दोनों भारत में अवैध ही बने रहने चाहिए, जबकि यह सिफारिश करती है कि स्थायी वनस्पति अवस्था, अपरिवर्तनीय कोमा, या निर्णय लेने की क्षमता से वंचित व्यक्तियों के लिए जीवन-समर्थन प्रणाली हटाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • रिपोर्ट इस पर भी जोर देती है कि चिकित्सा पेशेवरों को रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना चाहिए और यह स्वीकार करती है कि सचेत और सक्षम अंतिम अवस्था के रोगियों को जीवन-विस्तार करने वाले उपचार से इनकार करने का अधिकार है, क्योंकि आधुनिक चिकित्सा हस्तक्षेप कई बार अत्यधिक दर्द और पीड़ा का कारण बन सकते हैं।

इच्छामृत्यु पर कानून की आवश्यकता

  • “भय-आधारित” चिकित्सा को रोकना: अभी डॉक्टर एक कठिन स्थिति में फँसे हुए हैं। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय मरने की अवस्था वाले रोगियों के लिए उपचार रोकने की अनुमति देता है, फिर भी संसद द्वारा बनाया गया कोई स्थायी कानून नहीं है।
    • डॉक्टरों को डर रहता है कि उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत हत्या या गैर-इरादतन हत्या का आरोप लगाया जा सकता है।
    • कानून क्या करता है: यह एक “सुरक्षित आश्रय” (Safe Harbour) नियम बनाता है। इससे डॉक्टरों को कानूनी संरक्षण मिलता है, ताकि वे जेल जाने के भय के बिना रोगी की इच्छा का सम्मान कर सकें।
  • हर जगह नियमों को समान बनाना: वर्तमान में “गरिमापूर्ण मृत्यु” की संभावना इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस राज्य में रहते हैं। केवल कुछ स्थानों जैसे महाराष्ट्र में ही आवश्यक चिकित्सा बोर्ड उपलब्ध हैं।
    • भारत के अधिकांश हिस्सों में यह व्यवस्था अस्तित्व में ही नहीं है।
    • एक राष्ट्रीय कानून प्रत्येक जिले में चिकित्सा समीक्षा बोर्ड स्थापित करने को अनिवार्य करेगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि किसी छोटे गाँव के रोगी को भी वही अधिकार मिले, जो किसी बड़े शहर के अस्पताल में उपचार करा रहे रोगी को मिलते हैं।
  • परिवार या आर्थिक दबाव को रोकना: यह जोखिम रहता है कि कुछ परिवार केवल धन बचाने या संपत्ति विवाद के कारण उपचार बंद करवाने का प्रयास कर सकते हैं।
    • वर्तमान न्यायालयीय नियमों की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है, जो जोखिमपूर्ण है।
    • एक कानून कड़े सुरक्षा प्रावधान स्थापित करेगा।
      • एक निगरानी निकाय प्रत्येक मामले की जाँच करेगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निर्णय केवल चिकित्सीय निष्फलता (जब चिकित्सा से कोई लाभ संभव न हो) के आधार पर लिया गया है, न कि आर्थिक दबाव के कारण।
  • “लिविंग विल” को डिजिटल बनाना: वर्तमान में लिविंग विल (वे दस्तावेज जिनमें व्यक्ति जीवन-समर्थन न चाहने की इच्छा व्यक्त करता है) का उपयोग करना बहुत कठिन है।
    • आपातकाल की स्थिति में डॉक्टर किसी परिवारिक सदस्य के पास रखे कागजी दस्तावेज का इंतजार नहीं कर सकते हैं।
    • कानून क्या करेगा: यह इन इच्छापत्रों को ABHA (डिजिटल हेल्थ अकाउंट) से जोड़ेगा।
      • इससे एक डिजिटल रजिस्ट्री बनेगी, जिससे डॉक्टर कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत रोगी की इच्छा देख सकेंगे।
  • बेहतर दर्द प्रबंधन (पैलिएटिव केयर): न्यायालय के आदेश सरकार के बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन संसद का कानून ऐसा कर सकता है।
    • कई लोग केवल इसलिए इच्छामृत्यु की माँग करते हैं, क्योंकि वे अत्यधिक दर्द में होते हैं और उनका उपचार नहीं हो रहा होता है।
    • एक कानून आरामदायक देखभाल के लिए राष्ट्रीय बजट निर्धारित करेगा।
      • इससे यह सुनिश्चित होगा कि रोगियों को पहले सर्वोत्तम दर्द-निवारण उपचार मिले, ताकि वे केवल शारीरिक पीड़ा से बचने के लिए मृत्यु न चुनें।
  • स्पष्ट और निष्पक्ष सार्वजनिक बहस: न्यायालय के निर्णय कुछ न्यायाधीशों और वकीलों द्वारा लिए जाते हैं, जबकि संसदीय कानून पूरे देश को अपनी राय रखने का अवसर देता है।
    • एक सार्वजनिक बहस यह सुनिश्चित करेगी कि अंतिम कानून में डॉक्टरों, धार्मिक नेताओं और नैतिकता विशेषज्ञों के विचार शामिल हों, जिससे कानून सभी के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी बन सके।

इच्छामृत्यु संबंधी दिशा-निर्देशों को लागू करने में चुनौतियाँ

  • डॉक्टरों का डर: संसद द्वारा कोई आधिकारिक कानून पास नहीं होने के कारण, डॉक्टर डरते हैं कि यदि वे जीवन-समर्थन प्रणाली बंद कर दें तो उन्हें हत्या का आरोप लग सकता है।
    • सुरक्षित रहने के लिए, वे प्रायः मरीजों को मशीन पर आवश्यक से बहुत अधिक समय तक रखते हैं।
  • “धन बनाम दया” का जोखिम: यह चिंता रहती है कि कुछ परिवार केवल पैसे बचाने या संपत्ति जल्दी हासिल करने के लिए उपचार रोकने की कोशिश कर सकते हैं।
    • इस वजह से नियम बहुत कड़े हैं और कई डॉक्टरों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है, जिससे प्रक्रिया धीमी और कठिन हो जाती है।
  • सिर्फ धनि वर्ग के लिए प्रणाली: अधिकांश बड़े अस्पताल और विशेषज्ञ बड़े शहरों में हैं।
    • गाँव या छोटे शहरों के लोग अक्सर उन विशेष चिकित्सा बोर्डों तक पहुँच नहीं रखते हैं, जो इन अनुरोधों को मंजूरी देने के लिए अत्यावश्यक हैं।
  • दस्तावेज की कमी: भले ही कोई अपनी इच्छा लिख कर रखे (लिविंग विल), यह आमतौर पर सिर्फ कागज का टुकड़ा होता है।
    • आपातकाल में यदि परिवार वह कागज नहीं ढूँढ पाता, तो डॉक्टरों के ज्ञात नहीं रहता कि रोगी ने क्या चाहा था।
  • देखभाल की कमी: भारत के कई हिस्सों में अच्छी दर्द निवारक देखभाल महँगी है या उपलब्ध नहीं है।
    • कुछ लोग केवल इसलिए जीवन समाप्त करने का निर्णय ले सकते हैं क्योंकि उन्हें आवश्यक दवा नहीं मिल रही है, जो शारीरिक पीड़ा को रोक सके।
  • न्यायालयों में भ्रम: विभिन्न न्यायाधीशों की अलग-अलग राय होती है।
    • एक न्यायालय “नहीं” कह सकता है, जबकि दूसरा न्यायालय उसी अनुरोध पर “हाँ” कह सकता है। इससे परिवार भ्रमित और निराश महसूस करता है।

आगे की राह

  • स्पष्ट कानून बनाना: संसद को एक स्थायी कानून तैयार करना चाहिए, जो डॉक्टरों को स्पष्ट रूप से बताए कि वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। यह कानून यह सुनिश्चित करे कि यदि डॉक्टर नियमों का पालन करते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।
  • डिजिटल करना: कागज पर लिखी लिविंग विल की बजाय, व्यक्ति की इच्छाओं को उनके डिजिटल स्वास्थ्य आईडी (ABHA) से जोड़ना चाहिए। इस तरह, डॉक्टर एक कोड स्कैन करके तुरंत देख सके कि मरीज क्या चाहता है, भले ही वह बेहोश हो।
  • स्थानीय बोर्ड स्थापित करना: हर जिले में पहले से चुने गए डॉक्टरों की एक टीम तैयार होनी चाहिए, जो मदद करने के लिए उपलब्ध हो। इससे परिवारों को बड़े शहरों तक यात्रा करने या महँगे वकीलों को अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
  • सभी के लिए बेहतर दर्द निवारक: सरकार को आरामदायक देखभाल पर अधिक खर्च करना चाहिए। किसी को केवल इसलिए मृत्यु का विकल्प चुनने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए क्योंकि वे धर्मशाला का बिस्तर या उचित दर्द निवारक दवा नहीं खरीद सकते।
  • डॉक्टरों और जनता को शिक्षित करना: डॉक्टरों को यह सिखाना आवश्यक है कि वे इन परिस्थितियों को केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि दया और सहानुभूति के साथ सँभालें। साथ ही जनता को यह समझाना आवश्यक है कि लिविंग विल लिखना उनके परिवार के लिए एक मददगार उपहार है, डराने वाला विषय नहीं।

निष्कर्ष

हरीश राणा बनाम भारत संघ का निर्णय भारतीय कानून में केवल जैविक अस्तित्व से सम्मानजनक जीवन के अंत की देखभाल की ओर परिवर्तन को दर्शाता है। मेडिकल ट्रीटमेंट को रोकने या न करने (WWMT) की प्रक्रिया को लागू करके, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दवा से न तो मृत्यु शीघ्र होनी चाहिए और न ही पीड़ा बढ़नी चाहिए। यह भारत के विकसित हो रहे ‘एंड-ऑफ-लाइफ’ (EOL) देखभाल ढाँचे को मजबूत करता है, जिसमें कानून, चिकित्सा नैतिकता और सहानुभूति का संतुलन है।

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