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Lokesh Pal
March 13, 2026 04:00
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हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के 32 वर्षीय व्यक्ति हरीश राणा के लिए जीवन-रक्षक उपचार वापस लेने की अनुमति दी। वे वर्ष 2013 में गिरने से गंभीर सिर की चोट लगने के बाद से ‘पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (Persistent Vegetative State – PVS) में थे।
यह निर्णय गरिमा के साथ मृत्यु से संबंधित संचालनात्मक और पारिभाषिक परिदृश्य को स्पष्ट करता है:
भारतीय कानून की दिशा जीवन की पवित्रता से व्यक्ति की गरिमा की ओर संक्रमण को दर्शाती है,
जहाँ हरीश राणा निर्णय ने मौजूदा कानून को व्यवहार में लागू किया, वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मसौदा दिशा-निर्देश (2024) का उद्देश्य इसे पूरे देश में मानकीकृत करना है:
हरीश राणा बनाम भारत संघ का निर्णय भारतीय कानून में केवल जैविक अस्तित्व से सम्मानजनक जीवन के अंत की देखभाल की ओर परिवर्तन को दर्शाता है। मेडिकल ट्रीटमेंट को रोकने या न करने (WWMT) की प्रक्रिया को लागू करके, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दवा से न तो मृत्यु शीघ्र होनी चाहिए और न ही पीड़ा बढ़नी चाहिए। यह भारत के विकसित हो रहे ‘एंड-ऑफ-लाइफ’ (EOL) देखभाल ढाँचे को मजबूत करता है, जिसमें कानून, चिकित्सा नैतिकता और सहानुभूति का संतुलन है।
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