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प्रहार: भारत की पहली आतंकवाद विरोधी नीति

Lokesh Pal February 26, 2026 03:46 8 0

संदर्भ

हाल ही में केंद्र सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा अधिसूचित भारत की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी नीति ‘प्रहार’ (PRAHAAR) का अनावरण किया है।

संबंधित तथ्य

  • यह नीति केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा वर्ष 2024 के अंत में घोषित एक रणनीतिक रोडमैप का अनुसरण करती है और अप्रैल 2025 की पहलगाम आतंकी घटना के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया था, जिसने अंतर-एजेंसी समन्वय को परिष्कृत करने के लिए उत्प्रेरक का कार्य किया।

प्रहार (PRAHAAR) के बारे में 

  • ‘जीरो टाॅलरेंस’ सिद्धांत: प्रहार आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टाॅलरेंस’ के कठोर सिद्धांत पर आधारित है।
  • समग्र सरकारी एवं समग्र सामाजिक दृष्टिकोण: यह राष्ट्रीय सुरक्षा को पुलिसिंग से आगे बढ़ाकर नागरिक समाज, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों को भी शामिल करता है।
  • धर्मनिरपेक्ष एवं गैर-भेदभावपूर्ण ढाँचा: यह नीति इस बात की पुष्टि करती है कि राज्य आतंकवाद को किसी धर्म, नृजातीयता, राष्ट्रीयता या सभ्यता से नहीं जोड़ता, बल्कि हिंसा के आपराधिक और वैचारिक नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित करता है।

प्रहार के 7 स्तंभ

  • P – आतंकी हमलों की रोकथाम: खुफिया जानकारी पर आधारित, सक्रिय हस्तक्षेप को प्राथमिकता देना। इसके अंतर्गत भूमिगत आतंकी नेटवर्क (OGW) को बाधित करने के लिए बहु-एजेंसी केंद्र (MAC) और संयुक्त खुफिया कार्य बल (JTFI) का एकीकरण अनिवार्य है।
  • R – त्वरित और आनुपातिक प्रतिक्रियाएँ: मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) को संस्थागत रूप देना। यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय पुलिस प्रमुख घटनाओं के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) के सहयोग से प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता के रूप में कार्य करे।
  • A – आंतरिक क्षमताओं का एकीकरण: परमाणु ऊर्जा और रक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा उन्नत हथियारों से संबद्ध कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEAs) का आधुनिकीकरण करना।
  • H – मानवाधिकार और ‘कानून के शासन’ पर आधारित प्रक्रियाएँ: कानून के शासन को बनाए रखते हुए, साक्ष्य न्यायिक मानकों के अनुरूप हों, यह सुनिश्चित करने के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के चरण से ही कानूनी विशेषज्ञों को शामिल करना अनिवार्य है।
  • A – आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली स्थितियों को कम करना: कट्टरपंथ से निपटने के लिए डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों और गैर-सरकारी संगठनों को शामिल करना। इसमें गुमराह युवाओं को दंड देने के बजाय, उन्हें समाज की मुख्यधारा में पुनः शामिल करने के लिए चरणबद्ध पुलिस कार्रवाई का उपयोग किया जाता है।
  • A – अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को संरेखित और आकार देना: सुरक्षित पनाहगाहों को नकारने और क्रिप्टो वॉलेट जैसे गुमनाम संसाधनों के माध्यम से होने वाले अंतरराष्ट्रीय आतंकी वित्तपोषण पर अंकुश लगाने के लिए पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों (MLAT) को मजबूत करना।
  • R – पुनर्प्राप्ति और लचीलापन: पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण का उद्देश्य आतंक के मनोवैज्ञानिक उद्देश्य को विफल करने के लिए सामान्य स्थिति की शीघ्र पुनर्स्थापन पर ध्यान केंद्रित करना है अर्थात् दीर्घकालिक भय और आर्थिक गतिरोध उत्पन्न करना।

प्रहार की आवश्यकता क्यों है?

कई संरचनात्मक और विकसित हो रही सुरक्षा कमियों के कारण एक समर्पित राष्ट्रीय नीति का निर्माण आवश्यक हो गया था:-

  • एकीकृत रणनीति का अभाव: पहले, भारत के पास कोई लिखित राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी रणनीति नहीं थी।
    • इसके कारण एक खंडित दृष्टिकोण विकसित हुआ, जिसमें विभिन्न राज्य और केंद्रीय एजेंसियाँ ​​अलग-अलग कार्य करती थीं।
    • प्रहार यह सुनिश्चित करती है कि समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के लिए सभी एक ही रणनीति का पालन करें।
  • उच्च तकनीक और रोबोटिक्स से जुड़े खतरे: आतंकवाद अब केवल बंदूक और ग्रेनेड जैसी तकनीक तक ही सीमित नहीं है।
    • ड्रोन संबंधी चुनौतियाँ: सीमा क्षेत्र में हुई हालिया घटनाओं में देखा गया है कि शत्रुतापूर्ण घटक पंजाब और जम्मू-कश्मीर में हथियार तथा नशीले पदार्थ गिराने के लिए अक्सर मानवरहित हवाई प्रणालियों (UAV) का उपयोग करते हैं।
    • साइबर-भौतिक युद्ध: नेशन-स्टेट हैकर्स द्वारा भारत के आधारभूत ढाँचे जैसे विद्युत ग्रिड, विमानन और परमाणु संयंत्र, को परिष्कृत साइबर हमलों के माध्यम से निशाना बनाने का खतरा बढ़ रहा है।
  • हाइब्रिड खतरों का उदय: आधुनिक युद्ध अब एक ऐसे ‘ग्रे जोन’ में प्रवेश कर चुका है, जहाँ स्थानीय अपराधियों और विदेशी समर्थित तत्त्वों के बीच अंतर करना कठिन हो गया है।
    • तकनीकी अंतर: जैसा कि पहलगाम हमले (2025) में देखा गया, अब समूह तस्करी के लिए ड्रोन और योजना बनाने के लिए एन्क्रिप्टेड ऐप्स का उपयोग कर रहे हैं।
    • जवाबदेही: प्रहार (PRAHAAR) स्थानीय हमलावरों और उनके विदेशी संचालकों दोनों को जवाबदेह ठहराने की कानूनी शक्ति प्रदान करता है।
  • आतंकवाद-अपराध का गठजोड़: आतंकवाद अब केवल विचारधारा तक सीमित नहीं है; यह एक व्यवसाय बन गया है।
    • नशीले पदार्थों का वित्तपोषण: गृह मंत्रालय (भारत सरकार) की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सीमावर्ती राज्यों में आतंकवाद के वित्तपोषण का लगभग 30% हिस्सा मादक पदार्थों की तस्करी से आता है।
    • लॉजिस्टिक्स: आतंकवादी समूह अब स्थानीय भर्ती और परिवहन के लिए संगठित आपराधिक नेटवर्क को संचालित करते हैं, जिससे स्थानीय अपराध तथा राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।
  • डिजिटल और “व्हाइट-कॉलर” कट्टरपंथ: भर्ती अब “डिजिटल लिविंग रूम” में पहुँच गई है।
    • ऑनलाइन लक्ष्यीकरण: विदेशी वित्तपोषित सोशल मीडिया और निजी संदेशों के माध्यम से शिक्षित युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है।
    • सामुदायिक भागीदारी: चूँकि पुलिस अकेले इसका समाधान नहीं कर सकती, इसलिए नीति में मनोवैज्ञानिकों और सामुदायिक नेताओं को शामिल किया गया है ताकि अपराध होने से पूर्व ही कट्टरपंथ को रोका जा सके।
  • अर्थव्यवस्था की सुरक्षा: जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती है, उसके पॉवर ग्रिड, परमाणु संयंत्र और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी उच्च मूल्य के लक्ष्य बन जाते हैं।
    • प्रहार (PRAHAAR) नीति इन ‘महत्त्वपूर्ण संपत्तियों’ की सुरक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च प्राथमिकता देती है ताकि बड़े पैमाने पर आर्थिक व्यवधान को रोका जा सके।
  • उच्च जोखिम वाले ‘CBRNED’ पदार्थ: प्रहार (PRAHAAR) की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है गैर-सरकारी तत्त्वों द्वारा रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु पदार्थों के उपयोग के प्रयासों को रोकना।
    • डिजिटल और विस्फोटक (CBRNED) खतरों के साथ ये जोखिम, इस नीति द्वारा अनिवार्य उन्नत पहचान क्षमताओं की आवश्यकता उत्पन्न करते हैं।
  • कानूनी और जाँच संबंधी कमियों को दूर करना: पिछले सुधारों के बावजूद, आतंकी मामलों में दोषसिद्धि दर कम (लगभग 3%) बनी हुई है।
    • यह अक्सर खराब साक्ष्य संग्रह या विशेष तकनीक की कमी के कारण होता है।
  • बेहतर साक्ष्य: नीति बेहतर डिजिटल फोरेंसिक और साझा डेटाबेस (जैसे राष्ट्रीय मेमोरी बैंक) को अनिवार्य बनाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आतंकवादियों को वास्तव में न्यायालय के समक्ष  दोषी ठहराया जाए।
  • सक्रिय पुलिसिंग: यह विस्फोट के बाद केवल “प्रतिक्रिया” देने के बजाय, भविष्यसूचक उपकरणों का उपयोग करके हमलों को होने से पहले ही रोकने पर ध्यान केंद्रित करती है।

भारत में अब तक आतंकवाद विरोधी नीति क्यों नहीं है?

ऐतिहासिक रूप से, भारत ने संहिताबद्ध राष्ट्रीय सिद्धांत के बजाय तदर्थ विधायी उपायों पर भरोसा किया है।

  • संघीय घर्षण (सातवीं अनुसूची): संविधान के तहत, “पुलिस” और “सार्वजनिक व्यवस्था” राज्य के विषय हैं। राज्य अक्सर केंद्र की नीति को संघ द्वारा “अतिक्रमण” के रूप में देखते थे।
  • खुफिया विभाग का  अलग-थलग होना: “जानने की आवश्यकता” की संस्कृति ने खुफिया ब्यूरो, रॉ और राज्य एटीएस को प्रभावित किया, जिससे एक एकीकृत खुफिया संरचना का निर्माण बाधित हुआ।
  • प्रतिक्रियात्मक बनाम सक्रिय: UAPA (1967) या POTA (2002) जैसे कानून मुख्य रूप से दंडात्मक (घटना के बाद) थे, जबकि एक “नीति” निवारक (घटना से पहले) होती है।
  • परिभाषा संबंधी अस्पष्टता: वैश्विक आतंकवाद सूचकांक (GTI) के अनुसार, भारत “विद्रोह”, “उग्रवाद” और “आतंकवाद” की परिभाषाओं में संतुलन बनाने के लिए संघर्ष करता रहा, जिसके परिणामस्वरूप खंडित कानूनी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।

भारत की पहली आतंकवाद-विरोधी नीति का महत्त्व

प्रहार नीति महज नए नियमों का एक समूह नहीं है; यह इस बात में एक मौलिक परिवर्तन है कि भारत अपने नागरिकों की रक्षा कैसे करता है।

  • रक्षा से आक्रमण की ओर परिवर्तन: वर्षों से, भारत किसी घटना के घटित होने के बाद ही प्रतिक्रिया देता रहा है। यह नीति देश को एक सक्रिय दृष्टिकोण की ओर ले जाती है, जिससे एक स्थायी रोडमैप तैयार होता है ताकि सुरक्षा बल हमेशा एक कदम आगे रहें, न कि पिछड़ने की स्थिति में।
  • देश की आर्थिक स्थिति की सुरक्षा: आधुनिक खतरे केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं हैं। बंदरगाहों, रेलवे और परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठानों का विशेष उल्लेख करते हुए, यह नीति आर्थिक क्षति को आतंकवाद का एक प्रमुख आयाम मानती है तथा यह स्वीकार करती है कि भारत के विकास को नुकसान पहुँचाना उसके नागरिकों पर प्रत्यक्ष आघात के समान है।”
  • पूरे भारत में एकसमान मानक: वर्तमान में, एक बड़े शहर में ग्रामीण सीमावर्ती कस्बे की तुलना में बेहतर सुरक्षा व्यवस्था हो सकती है। यह नीति एक समान संरचना तैयार करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि स्थानीय बजट की परवाह किए बिना, प्रत्येक राज्य में प्रतिक्रिया का मानक समान रूप से उच्च हो।
  • न्यायालय में जीत: अधिकांश आतंकी मामले कमजोर दस्तावेजी कार्रवाई के कारण विफल हो जाते हैं। जाँच शुरू होते ही कानूनी विशेषज्ञों को शामिल करके, सरकार यह सुनिश्चित करती है कि साक्ष्य पुख्ता हों, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित एजेंसियों में देखी जाने वाली उच्च दोषसिद्धि दरों के बराबर पहुँचना है।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से सीखना

भारत किसी से अलग-थलग होकर काम नहीं कर रहा है; प्रहार दुनिया भर की सबसे सफल रणनीतियों को अपनाता है:

  • चार स्तंभों वाली रणनीति: ब्रिटेन के CONTEST मॉडल से प्रेरणा लेते हुए, भारत अब चार स्पष्ट लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है:
    • रोकथाम (भर्ती रोकना)
    • पीछा करना (अपराधियों का पीछा करना)
    • सुरक्षा (लक्ष्यों को मजबूत करना)
    • तैयारी (कुछ होने पर तुरंत उबरने की तैयारी)।
  • विश्वव्यापी ‘जीरो टाॅलरेंस’: यह नीति संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुरूप है और दुनिया को स्पष्ट संदेश देती है कि हिंसा का कोई औचित्य नहीं है, जिससे आतंकवाद के लिए किसी भी राजनीतिक या सामाजिक बहाने का कोई आधार नहीं रह जाता।
  • सामुदायिक दृष्टिकोण: सिंगापुर मॉडल का अनुसरण करते हुए, यह नीति मानती है कि चरमपंथी विचारों को रोकने का सबसे अच्छा तरीका सामुदायिक नेताओं और शिक्षकों के माध्यम से है। यह नीति कट्टरपंथ-विरोधी गतिविधियों को एक सामाजिक कार्य मानती है, न कि केवल पुलिस का काम।

भारत का समकालीन आतंकवाद-विरोधी ढाँचा

आयाम मुख्य घटक मुख्य विशेषताएँ / महत्त्व
विधिक ढाँचा गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 यह व्यक्तियों और संगठनों को आतंकवादी घोषित करने, संपत्ति की कुर्की तथा जब्ती करने एवं जटिल आतंकी नेटवर्क को नष्ट करने के लिए विस्तारित जाँच अवधि (180 दिनों तक) प्रदान करता है।
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अधिनियम, 2008 यह प्रावधान NIA को राज्य की पूर्व सहमति के बिना आतंकवादी अपराधों की जाँच करने के लिए राष्ट्रव्यापी अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है, जिससे उच्च प्रभाव वाले मामलों में त्वरित संघीय हस्तक्षेप सुनिश्चित होता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरों को बेअसर करने के लिए निवारक हिरासत का प्रावधान करता है, विशेष रूप से जहाँ अभियोजन तत्काल संभव नहीं है।
भारतीय न्याय संहिता, 2024 (धारा 113) इसमें “आतंकवादी कृत्य” की एक आधुनिक परिभाषा प्रस्तुत की गई है, जो स्थानीय पुलिसिंग, खुफिया जानकारी और केंद्रीय जाँच के बीच के अंतर को पाटती है।
संस्थागत संरचना राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) यह प्रमुख संघीय आतंकवाद-विरोधी अभियोजन एजेंसी के रूप में कार्य करता है, जिसे UAPA के तहत विशेष जाँच इकाइयों और समर्पित विशेष अदालतों द्वारा समर्थित किया जाता है।
राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड (NATGRID) आतंकवाद के वित्तपोषण और स्लीपर नेटवर्क का पता लगाने के लिए बैंकिंग, यात्रा, दूरसंचार तथा आव्रजन डेटाबेस को एकीकृत करने वाला एक प्रौद्योगिकी-आधारित खुफिया संलयन मंच।
विशिष्ट इकाइयाँ (NSG और राज्य ATS) शहरी आतंकी घटनाओं, बंधकों को बचाने और उच्च जोखिम वाले आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए प्राथमिक सामरिक प्रतिक्रिया बलों के रूप में कार्य करना।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के नेतृत्व में, यह रक्षा, खुफिया, आंतरिक सुरक्षा और कूटनीति के क्षेत्र में सरकार के समग्र समन्वय को सुनिश्चित करता है।
सामरिक सिद्धांत प्रतिक्रिया में रणनीतिक स्वायत्तता यह नीति आतंकी हमलों को राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन मानती है, जिससे भारत को प्रतिक्रिया के समय, पैमाने और प्रकृति के संबंध में लचीलापन मिलता है।
प्रायोजक जवाबदेही यह आतंकवादी समूहों और उनके राज्य प्रायोजकों के बीच के अंतर को समाप्त करता है तथा राजनयिक एवं रणनीतिक उपायों के माध्यम से दोनों को समान रूप से जिम्मेदार ठहराता है।
दंडात्मक निवारण इनकार के माध्यम से निवारण से हटकर दंड के माध्यम से निवारण की ओर परिवर्तन, भविष्य के हमलों को रोकने के लिए विश्वसनीय और अस्वीकार्य लागतें लगाना।
निवल सुरक्षा दृष्टिकोण यह आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों को वैश्विक सुरक्षा मानदंडों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे द्विपक्षीय संघर्ष के बजाय बहुपक्षीय मंचों में भारत की स्थिति मजबूत होती है।

आतंकवाद-विरोधी ढाँचे का संवैधानिक, कानूनी और न्यायिक आधार

  • संवैधानिक दायित्व: अनुच्छेद-355 के तहत, संघ का यह कर्तव्य है कि वह राज्यों को “आंतरिक अशांति” से बचाए।
    • यद्यपि “पुलिस” राज्य का विषय है (सातवीं अनुसूची), फिर भी यह नीति परिचालन में एकरूपता लाने के उद्देश्य से एक समान आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) संरचना के माध्यम से सहकारी संघवाद को बढ़ावा देती है।
  • न्यायिक सामंजस्य: यह नीति भारतीय न्याय संहिता (BNS) के साथ एकीकृत है, विशेष रूप से धारा 113 के साथ, जो “आतंकवादी कृत्य” की आधुनिक परिभाषा प्रदान करती है।
    • यह नीति के.एस. पुट्टास्वामी (निजता) निर्णय के अनुरूप होने का प्रयास करती है, जिसके तहत NATGRID और NIDAAN के माध्यम से संसाधित डेटा के लिए कठोर जाँच सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित किया जाता है।
  • अनुपस्थिति में मुकदमा: आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 356 घोषित अपराधियों पर उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने की अनुमति देती है।
    • इस उपाय का उद्देश्य भगोड़ों को वापस लौटने के लिए बाध्य करना है, बशर्ते यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के अनुरूप हो।

जिन प्रमुख चुनौतियों पर नियंत्रण पाना है

  • संघीय संतुलन: चूँकि राज्य सरकारें पुलिस का प्रबंधन करती हैं, इसलिए राष्ट्रीय रणनीति को अतिरेक के रूप में देखा जा सकता है।
    • चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि केंद्र सरकार राज्य के अधिकार को छीने बिना एक सहयोगी भागीदार के रूप में कार्य करे।
  • निजता का अंतर: अपराधी एन्क्रिप्टेड ऐप्स और गुप्त डिजिटल उपकरणों के पीछे छिपते हैं, इसलिए राज्य को कानून का पालन करने वाले नागरिकों की निजता का उल्लंघन किए बिना खतरों पर नजर रखने के तरीके खोजने होंगे।
  • जेल में कट्टरपंथ: जेलें अक्सर अपराध के लिए “पाठशाला” बन जाती हैं, जहाँ खतरनाक कैदी दूसरों को प्रभावित करते हैं।
    • भारत में इस भर्ती चक्र को रोकने के लिए उच्च-सुरक्षा वाली विशिष्ट इकाइयों का अभाव है।
  • संसाधन असमानता: स्थानीय पुलिस सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाली होती है, लेकिन उनके पास अक्सर वह धन और साइबर प्रशिक्षण नहीं होता है, जो विशिष्ट केंद्रीय इकाइयों के पास होता है।
    • यह सुरक्षा शृंखला में एक कमजोर कड़ी उत्पन्न करता है।
  • सूचना का अलगाव: विभिन्न सरकारी विभाग अक्सर नौकरशाही देरी और आंतरिक राजनीति के कारण वास्तविक समय की खुफिया जानकारी साझा करने में संघर्ष करते हैं, जिससे खतरों पर प्रतिक्रिया धीमी हो जाती है।
  • कानूनी व्यक्तिपरकता: किसी व्यक्ति के “कट्टरपंथीकरण के स्तर” को मापने वाले कार्यक्रम व्यक्तिपरक हो सकते हैं।
    • स्पष्ट कानूनी मानदंडों के अभाव में, इससे अनुचित प्रोफाइलिंग या असंगत व्यवहार हो सकता है।

आगे की राह

  • कानूनी व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना
    • पुलिस इकाइयों में वकील: कानूनी विशेषज्ञों को सीधे विशेष पुलिस टीमों में तैनात करें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रत्येक गिरफ्तारी और साक्ष्य न्यायालय के समक्ष  पेश करने के लिए तैयार हो, जिससे दोषसिद्धि दर में वृद्धि होगी।
    • समर्पित अभियोजक: जटिल मामलों को अधिक प्रभावी ढंग से सँभालने के लिए डिजिटल अपराधों में प्रशिक्षित संघीय अभियोजकों का एक विशेष समूह बनाएँ।
  • तकनीकी संप्रभुता
    • स्वदेशी उपकरण: भारत को अपना ड्रोन-डिटेक्शन और साइबर-फोरेंसिक सॉफ्टवेयर विकसित करना चाहिए। इससे विदेशी सॉफ्टवेयर में मौजूद “बैकडोर” का खतरा समाप्त हो जाएगा, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।
    • अवैध धन का पता लगाना: हिंसक समूहों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले धन प्रवाह की पहचान करने और उसे रोकने के लिए बैंकिंग प्रणाली में क्रिप्टो-करेंसी ट्रैकिंग को एकीकृत करें।
    • भविष्यवाणी तकनीक: किसी घटना के घटित होने से पूर्व ही वित्तीय और व्यवहार संबंधी संदिग्ध पैटर्न का पता लगाने के लिए बिग डेटा तथा मशीन लर्निंग का उपयोग करें।
  • लोगों और समुदायों में निवेश
    • सामुदायिक लचीलापन: मानव-केंद्रित सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करें और ऐसे कार्यक्रमों को वित्तपोषित करें, जिनमें मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से युवाओं को हिंसक विचारधाराओं से दूर रखा जा सके।
    • डिजिटल जवाबदेही: IT नियमों को अद्यतन करना ताकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चरमपंथी कंटेंट को बढ़ावा देने वालों की जवाबदेही सुनिश्चित हों।
  • वैश्विक नेतृत्व
    • वैश्विक रूपरेखा: भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की एक एकीकृत परिभाषा बनाने के प्रयासों का नेतृत्व करना चाहिए, जिसका सभी देश पालन कर सकें।
    • अंतरराष्ट्रीय डेटा साझाकरण: आपातकालीन जाँच के दौरान डिजिटल साक्ष्यों तक वास्तविक समय में पहुंच के लिए अन्य देशों के साथ त्वरित समझौते करना।

निष्कर्ष

प्रहार भारत की सुरक्षा व्यवस्था के परिपक्व होने का प्रतीक है। ‘जीरो टाॅलरेंस’ की कठोर शक्ति और मानवाधिकार एवं कट्टरपंथ-विरोधी नरम शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर, भारत अब आतंकवाद के तंत्र को नष्ट करने और एक उभरती वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए बेहतर रूप से तैयार है।

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