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दुर्लभ मृदा गलियारे

Lokesh Pal February 04, 2026 03:16 6 0

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 में, केंद्र सरकार ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय राज्यों में समर्पित दुर्लभ मृदा गलियारों (Rare Earth Corridors) की स्थापना का प्रस्ताव रखा।

भारत में दुर्लभ मृदा तत्त्व

  • प्राथमिक स्रोत: भारत में समुद्री तट की रेत से प्राप्त खनिज (Beach Sand Minerals – BSM) दुर्लभ मृदा तत्त्वों का प्रमुख स्रोत हैं।
  • मोनाजाइट की उपस्थिति: BSM में मोनाजाइट पाया जाता है, जो एक फॉस्फेट खनिज है और नियोडिमियम तथा प्रसीओडिमियम जैसे दुर्लभ मृदा तत्त्वों के साथ यूरेनियम और थोरियम से समृद्ध होता है, जिससे यह एक रणनीतिक पदार्थ बन जाता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: उन्नत प्रौद्योगिकियों और राष्ट्रीय सुरक्षा में आवश्यक भूमिका के कारण दुर्लभ मृदा तत्त्वों को महत्त्वपूर्ण खनिजों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • रेडियोधर्मी तत्वों की उपस्थिति के कारण मोनाजाइट को परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के अंतर्गत विनियमित किया जाता है।

दुर्लभ मृदा चुंबकों के बारे में

  • दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPMs) व्यावसायिक रूप से उपलब्ध सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबक होते हैं।
  • इन्हें दुर्लभ मृदा तत्त्वों (आवर्त सारणी में 17 धातुओं का समूह) की मिश्र धातुओं को आयरन और बोरॉन जैसे अन्य तत्त्वों के साथ मिलाकर बनाया जाता है।
  • गुण: अत्यधिक उच्च चुंबकीय शक्ति, उच्च ऊर्जा घनत्व, छोटा आकार, फेराइट/एलनिको से श्रेष्ठ।
  • सीमाएँ: भंगुर, जंग लगने की संभावना तथा सामान्यतः निकल-लेपित या कोटेड होते हैं।
  • दुर्लभ मृदा चुंबकों के प्रकार
    • नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (Nd-Fe-B)
      • सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबक।
      • संरचना: नियोडिमियम, आयरन, बोरॉन।
      • सीमाएँ: ऊष्मा और जंग के प्रति संवेदनशील।
      • इलेक्ट्रिक वाहनों और पवन टरबाइनों में व्यापक उपयोग।
    • सैमरियम-कोबाल्ट (Sm-Co)
      • Nd-Fe-B से थोड़ा दुर्बल लेकिन अधिक स्थिर।
      • संरचना: सैमरियम, कोबाल्ट।
      • लाभ: उच्च ताप (~350°C तक) और जंग के प्रति अधिक प्रतिरोध।
      • सीमा: अधिक कीमती।
      • एयरोस्पेस और रक्षा अनुप्रयोगों में उपयोग।

राज्यवार दुर्लभ मृदा संबंधी स्थान

  • ओडिशा: छत्रपुर (OSCOM) क्षेत्र में वर्तमान में दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण का उच्चतम स्तर है।
  • आंध्र प्रदेश: श्रीकाकुलम, विशाखापत्तनम और नेल्लोर के तटीय क्षेत्रों में उल्लेखनीय भंडार पाए जाते हैं।
  • तमिलनाडु: मणावलाकुरिची और दक्षिणी तटीय जिलों में समृद्ध समुद्री रेत क्षेत्र हैं।
  • केरल: चवारा और विझिंजम बंदरगाह के निकट महत्त्वपूर्ण भंडार स्थित हैं।

योजना की प्रमुख विशेषताएँ

  • एकीकृत गलियारा मॉडल: खनन, पृथक्करण, प्रसंस्करण, अनुसंधान एवं विकास तथा विनिर्माण सुविधाओं को एक स्थान पर स्थापित किया जाएगा, जिससे लॉजिस्टिक लागत घटेगी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में तेजी आएगी।
  • चुंबक विनिर्माण संबंध: ये गलियारे ₹7,280 करोड़ की ‘सिंटर्ड’ दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPM) योजना से संबंधित हैं, जिसका लक्ष्य 6,000 MTPA घरेलू चुंबक क्षमता का निर्माण करना है।
  • नीति संबंध: यह पहल राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन और चुंबक विनिर्माण योजना पर आधारित है।
  • राज्य-नेतृत्व औद्योगीकरण: इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाएगा, जिससे राष्ट्रीय नीति से हटकर राज्य-प्रेरित मूल्य संवर्द्धन और औद्योगिक क्लस्टरिंग पर जोर दिया जाएगा।
  • विनिर्माण क्षमता लक्ष्य: 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) की एकीकृत REPM विनिर्माण क्षमता को समर्थन।
  • लाभार्थी आवंटन: प्रतिस्पर्द्धी बोली के माध्यम से चयनित पाँच लाभार्थी, प्रत्येक को 1,200 MTPA तक की क्षमता प्रदान की जाएगी।
  • वित्तीय प्रोत्साहन
    • बिक्री-आधारित प्रोत्साहन: पाँच वर्षों में ₹6,450 करोड़।
    • पूँजी सब्सिडी: एकीकृत सुविधाओं की स्थापना हेतु ₹750 करोड़।

दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबकों (REPMs) का रणनीतिक महत्त्व

  • मुख्य अनुप्रयोग: इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा प्रौद्योगिकियाँ।
  • वैश्विक आपूर्ति संकेंद्रण: चीन वैश्विक दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण और REPM विनिर्माण का 90% से अधिक नियंत्रित करता है।
  • आपूर्ति शृंखला जोखिम: आयात पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा संक्रमण, रक्षा तैयारी और औद्योगिक विकास के लिए जोखिम उत्पन्न करती है।
  • भारत की माँग–आपूर्ति स्थिति
    • बढ़ती माँग: इलेक्ट्रिक वाहनों के अपनाने और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार के कारण REPMs की माँग बढ़ रही है।
    • आयात निर्भरता: भारत ने वित्त वर्ष 2024–25 में 53,000 मीट्रिक टन से अधिक दुर्लभ मृदा चुंबकों का आयात किया।
    • भविष्य अनुमान: वर्ष 2030 तक REPMs की घरेलू खपत के दोगुना होने की संभावना है, जिसमें वर्तमान में अधिकांश माँग आयात से पूरी होती है।

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