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लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया

Lokesh Pal February 11, 2026 03:43 4 0

संदर्भ

INDIA गठबंधन की विपक्षी पार्टियों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंप दिया। जिसमें बार-बार व्यवधान और सांसदों के निलंबन के बीच पक्षपातपूर्ण आचरण का आरोप लगाया गया है।

प्रस्तावित प्रस्ताव के पीछे कारण

  • पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली: विपक्षी नेताओं ने अध्यक्ष पर “पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य करने” और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर न देने का आरोप लगाया।
  • सांसदों का निलंबन: यह कदम लोकसभा से आठ विपक्षी सांसदों के निलंबन के बाद उठाया गया है।
  • महिला सांसदों पर आरोप: विपक्ष ने महिला कांग्रेस सांसदों पर लगाए गए “असत्यापित” आरोपों पर आपत्ति जताई।

धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks)

  • धन्यवाद प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति द्वारा वर्ष की शुरुआत में तथा आम चुनाव के बाद संयुक्त बैठक में दिए गए विशेष अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रकट करने हेतु प्रस्तुत किया जाने वाला औपचारिक प्रस्ताव है।
  • उत्पत्ति: यह परंपरा वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रणाली से ली गई है।

लोकसभा अध्यक्ष के बारे में

  • अध्यक्ष लोकसभा के पीठासीन अधिकारी होते हैं, जो उसके दैनिक कार्य संचालन को नियंत्रित करते हैं।
  • अध्यक्ष एक संवैधानिक पद धारण करते हैं और संविधान तथा कार्य संचालन नियमों के अंतर्गत कार्य करते हैं।
  • अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं और संसद द्वारा मतदान के अधीन नहीं होते।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-93: लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करेगी।
  • अनुच्छेद-95: अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष उसके कर्तव्यों का निर्वहन करता है।

अध्यक्ष का चुनाव और कार्यकाल

  • पात्रता: कोई विशेष योग्यता नहीं, केवल यह आवश्यक है कि व्यक्ति लोकसभा का सदस्य हो।
  • चुनाव प्रक्रिया: अध्यक्ष का चुनाव उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से होता है।
  • राष्ट्रपति चुनाव की तिथि निर्धारित करते हैं, जो नई लोकसभा की पहली बैठक के तुरंत बाद होती है।
  • परंपरा
    • आमतौर पर सत्तारूढ़ दल से अनौपचारिक रूप से विपक्ष से परामर्श के बाद अध्यक्ष चुना जाता है।
    • यह परंपरा निष्पक्षता और सर्वदलीय स्वीकार्यता सुनिश्चित करने में सहायक होती है।
  • कार्यकाल
    • अवधि: अध्यक्ष सामान्यतः लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक पद पर रहते हैं।
    • लोकसभा का विघटन: विघटन के बाद भी अध्यक्ष नई लोकसभा की पहली बैठक तक पद पर बने रहते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया

ऐतिहासिक परंपरा:

  • अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को सफल प्रस्ताव द्वारा हटाया नहीं गया है।
  • डॉ. नीलम संजीव रेड्डी एकमात्र अध्यक्ष थे, जिन्होंने त्याग-पत्र दिया और बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।

  • हटाने के आधार
    • लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो जाना।
    • उपाध्यक्ष को लिखित रूप में त्याग-पत्र देना।
    • लोकसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से हटाया जाना।
  • प्रक्रिया
    • अध्यक्ष को प्रभावी बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव से हटाया जा सकता है।
    • हटाने के प्रस्ताव के लिए 14 दिन का अग्रिम नोटिस और कम-से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
    • अनुच्छेद 96: हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान अध्यक्ष पीठासीन नहीं होंगे, लेकिन भाग ले सकते हैं और मतदान कर सकते हैं (समान मत होने की स्थिति को छोड़कर)।

हटाने के प्रस्ताव के ऐतिहासिक उदाहरण

  • पहला उदाहरण: जी.वी. मावलंकर (1954), प्रथम लोकसभा में।
    • प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ क्योंकि सत्तारूढ़ दल के पास आवश्यक बहुमत था।
  • दूसरा उदाहरण: बलराम जाखड़ (1987), आठवीं लोकसभा में।
    • यह प्रस्ताव बोफोर्स घोटाले के दौरान लाया गया था।
    • सरकार के एकदलीय बहुमत के कारण प्रस्ताव विफल रहा।

तुलना: भारतीय अध्यक्ष बनाम ब्रिटिश अध्यक्ष

मापदंड भारतीय अध्यक्ष ब्रिटिश अध्यक्ष
चुनाव नई लोकसभा के गठन के बाद सदस्यों में से चुना जाता है हाउस ऑफ कॉमन्स से चुना जाता है और बाद में प्रायः निर्विरोध पुनः चुना जाता है
राजनीतिक पक्षधरता निष्पक्ष रहने की अपेक्षा, परंतु पार्टी सदस्य बने रहते हैं पूर्णतः तटस्थ, चुनाव के बाद पार्टी से त्याग-पत्र
कार्यकाल लोकसभा भंग होने के बाद भी नए अध्यक्ष के चयन तक पद पर त्याग-पत्र या सेवानिवृत्ति तक पद पर
कार्यकालोत्तर स्थिति सक्रिय राजनीति में लौट सकते हैं प्रायः हाउस ऑफ लॉर्ड्स में नियुक्त
निर्वाचन परंपरा कोई विशेष परंपरा नहीं निर्वाचन क्षेत्र प्रायः निर्विरोध छोड़ा जाता है

ऐसे प्रस्तावों का राजनीतिक महत्त्व 

  • प्रतीकात्मक प्रकृति: ये प्रस्ताव मुख्यतः एक राजनीतिक वक्तव्य के रूप में कार्य करते हैं, न कि वास्तव में हटाने के यथार्थ प्रयास के रूप में।
  • विपक्ष की रणनीति: ये विपक्ष को कथित संस्थागत पक्षपात को उजागर करने और संसदीय राजनीति में ‘अपनी संख्या से अधिक प्रभाव’ (Punch above its numbers) दिखाने का अवसर देते हैं।
  • लोकतांत्रिक भूमिका: ऐसे साधन लोकतांत्रिक राजनीति की बहुस्तरीय प्रकृति को रेखांकित करते हैं, जहाँ संख्यात्मक शक्ति न होने पर भी प्रक्रियात्मक उपकरणों के माध्यम से असहमति दर्ज की जाती है।

अध्यक्ष की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

  • किहोतो होलोहान बनाम जाचिल्हु (1992): 
    • अध्यक्ष के निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा: अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत एक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करता है और उसके निर्णय दुर्भावना, विकृतता तथा संवैधानिक आदेशों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं।
  • रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): 
    • अध्यक्ष की निष्पक्षता और तटस्थता: न्यायालय ने जोर दिया कि अध्यक्ष को दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत अपने कर्तव्यों का निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रूप से निर्वहन करना चाहिए तथा संस्थागत तटस्थता बनाए रखनी चाहिए।
  • राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007)
    • देरी को संवैधानिक अनुचितता माना गया: अयोग्यता याचिकाओं पर जानबूझकर निष्क्रियता या निर्णय में विफलता दलबदल कानून के उद्देश्य को विफल करती है और इसे दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद-6 के अंतर्गत संरक्षण नहीं मिल सकता।
  • केइशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा (2020)
    • समयबद्ध निर्णय और संस्थागत पक्षपात: अध्यक्ष को अयोग्यता याचिकाओं पर उचित समय के भीतर (अधिमानतः तीन माह में) निर्णय करना चाहिए और लगातार देरी स्वतंत्र निर्णयकारी तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
  • पाड़ी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य (2026)
    • संवैधानिक प्रतिरक्षा का अभाव और सक्रिय न्यायिक निगरानी: पैरा 6 के अंतर्गत निर्णय देते समय अध्यक्ष को अनुच्छेद-122 और 212 के अंतर्गत पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है और त्वरित निपटारे को सुनिश्चित करने हेतु न्यायालय अंतिम निर्णय से पूर्व भी हस्तक्षेप कर सकते हैं।

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