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वर्ष 2026–31 के लिए 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट

Lokesh Pal February 05, 2026 03:12 7 0

संदर्भ 

डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित 16वें वित्त आयोग ने वर्ष 2026–27 से 2030–31 की अवधि के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह रिपोर्ट 1 फरवरी, 2026 को केंद्रीय बजट के साथ संसद में प्रस्तुत की गई।

  • भारत सरकार ने केंद्रीय करों में राज्यों की 41% हिस्सेदारी बनाए रखने संबंधी इसकी मुख्य अनुशंसाओं को स्वीकार कर लिया है।

वित्त आयोग के बारे में 

  • संवैधानिक निकाय: वित्त आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद-280 के अंतर्गत एक संवैधानिक निकाय है।
  • नियुक्ति प्राधिकारी: भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकता अनुसार वित्त आयोग का गठन करते हैं।
  • संरचना: वित्त आयोग में एक अध्यक्ष तथा चार अन्य सदस्य होते हैं।
  • कार्यकाल: आयोग का कार्यकाल राष्ट्रपति के आदेश में निर्दिष्ट अवधि तक होता है। सामान्यतः आयोग का पुनर्गठन प्रत्येक पाँच वर्ष में किया जाता है और सिफारिशें तैयार करने में आमतौर पर लगभग दो वर्ष लगते हैं।
    • आयोग के सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र होते हैं।

  • योग्यताएँ: संविधान द्वारा संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह वित्त आयोग के सदस्यों की योग्यताएँ तथा उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित करे।
    • निर्देश: इन शक्तियों के आधार पर संसद ने सदस्यों की नियुक्ति के लिए निम्नलिखित प्रावधान किए हैं।
      • अध्यक्ष को सार्वजनिक मामलों का अनुभव होना अनिवार्य है। शेष चार सदस्यों का चयन निम्नलिखित मापदंडों के अंतर्गत किया जाना चाहिए:-
        • उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या ऐसा व्यक्ति जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए योग्य हो।
        • सरकारी वित्त एवं लेखा के क्षेत्र में विशेषज्ञ ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
        • वित्तीय मामलों एवं प्रशासन में अनुभव रखने वाला व्यक्ति।
        • अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
  • अधिकार: दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 के आधार पर भारत के वित्त आयोग को एक दीवानी न्यायालय के सभी अधिकार प्राप्त हैं।
    • साक्ष्य की माँग: आयोग को गवाहों को बुलाने और किसी भी कार्यालय या न्यायालय से सार्वजनिक दस्तावेज या अभिलेख प्रस्तुत करने का अनुरोध करने का अधिकार है।
  • अधिदेश
    • कर वितरण: कर से प्राप्त शुद्ध आय के हिस्से को संघ और राज्यों के बीच वितरित करना और उसके बाद राज्यों के बीच ऐसी आय के संबंधित हिस्सों का आवंटन करना।
      • हालाँकि, केंद्र सरकार वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं होती है।
    • अनुदान सहायता के नियम: भारत की संचित निधि से केंद्र द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान को नियंत्रित करने वाले नियम।
    • राज्य स्तर पर कर हस्तांतरण: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों और नगरपालिकाओं को संसाधन उपलब्ध कराने हेतु राज्य की संचित निधि को सुदृढ़ करना।
    • विविध विषय: सुदृढ़ वित्तीय हितों में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को संदर्भित किसी भी अन्य विषय पर विचार करना।
    • रिपोर्ट प्रस्तुत करना: आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखने का आग्रह करते हैं। इस रिपोर्ट के साथ उसकी सिफारिशों पर की गई कार्रवाई का व्याख्यात्मक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया जाता है।

वित्त आयोग द्वारा निधियों के वितरण के संबंध में

वित्त आयोग यह निर्धारित करता है कि केंद्र की शुद्ध कर आय का कितना हिस्सा, राज्यों को दिया जाएगा (ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण) तथा राज्यों के लिए निर्धारित इस हिस्से का विभिन्न राज्यों के बीच किस प्रकार वितरण होगा (क्षैतिज हस्तांतरण) 

  • क्षैतिज हस्तांतरण: राज्यों के बीच धन का यह हस्तांतरण सामान्यतः वित्त आयोग द्वारा निर्धारित एक सूत्र के आधार पर किया जाता है, जिसमें किसी राज्य की जनसंख्या, प्रजनन दर, आय स्तर, भौगोलिक स्थिति आदि कारकों को शामिल किया जाता है।
  • ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण: इसके विपरीत, केंद्र और राज्यों के बीच धन का यह हस्तांतरण किसी निश्चित या वस्तुनिष्ठ सूत्र पर आधारित नहीं होता है।
    • फिर भी, पिछले कुछ वित्त आयोगों ने कर राजस्व के ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण में वृद्धि, अर्थात् केंद्र से राज्यों को अधिक हिस्सा देने की सिफारिश की है।
  • अतिरिक्त सहायता: केंद्र सरकार कुछ विशेष योजनाओं के लिए राज्यों को अतिरिक्त अनुदान भी प्रदान कर सकती है, जिनका वित्तपोषण केंद्र और राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।
  • स्थानीय निकायों के लिए: 16वें वित्त आयोग से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह पंचायतों और नगरपालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों की आय बढ़ाने के उपायों की सिफारिश करे।
    • वर्ष 2015 तक, भारत में सार्वजनिक व्यय का केवल लगभग 3% ही स्थानीय निकाय स्तर पर होता था, जबकि चीन जैसे अन्य देशों में आधे से अधिक सार्वजनिक व्यय स्थानीय निकायों के स्तर पर होता था।

मुख्य बिंदु 

  • सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP): GSDP किसी राज्य में एक वर्ष के दौरान उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को मापता है। यह राज्य के आर्थिक आकार और राजकोषीय क्षमता को दर्शाता है तथा कर हस्तांतरण  के सूत्रों और राजकोषीय घाटे की सीमाएँ तय करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण मानक है।
  • बजटेतर उधार (Off-Budget Borrowings): बजट से बाहर के उधार वे देनदारियाँ हैं जो सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं या विशेष माध्यमों से जुटाती हैं और जो आधिकारिक बजट में शामिल नहीं होतीं हैं, जिससे घोषित राजकोषीय घाटे को बढ़ाए बिना व्यय करना संभव हो जाता है। ये उधार वास्तविक ऋण स्तरों को छिपाते हैं, पारदर्शिता को कमजोर करते हैं और दीर्घकालिक राजकोषीय जोखिम उत्पन्न करते हैं।

16वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें

  • अवलोकन एवं केंद्रीय करों में हिस्सेदारी: आयोग ने सिफारिश की कि केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 41% ही बनी रहनी चाहिए, जो कि पिछले वित्त आयोग के समान है।
    • विभाज्य पूल की गणना सकल कर राजस्व से कर संग्रह की लागत, उपकर और अधिभार को घटाकर की जाती है।
  • हस्तांतरण के मानदंड: आयोग ने विभिन्न मापदंडों को भारित करके प्रत्येक राज्य के करों के व्यक्तिगत हिस्से को निर्धारित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले सूत्र को अद्यतन किया:
    • आय अंतराल (42.5%): यह किसी राज्य के प्रति व्यक्ति GSDP और शीर्ष तीन बड़े राज्यों के औसत के बीच के अंतर को मापता है।
    • जनसंख्या (17.5%): यह वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राष्ट्रीय जनसंख्या में राज्य की हिस्सेदारी पर आधारित होता है।
    • GDP में योगदान (10%): यह एक नया मानदंड है, जिसने कर एवं राजकोषीय प्रयास’ को प्रतिस्थापित किया है। इसकी गणना राज्य के GSDP के वर्गमूल के आधार पर की जाती है।
    • जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (10%): इसे वर्ष 1971 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रखते हुए पुनः परिभाषित किया गया है।
    • क्षेत्रफल (10%) एवं वन ( 10%): ये भार राज्यों को उनके भौगोलिक आकार तथा कुल वन क्षेत्र में हिस्सेदारी और वन क्षेत्र में वृद्धि के आधार पर प्रोत्साहित करते हैं।
  • अनुदान सहायता: पाँच वर्षीय अवधि के लिए अनुशंसित कुल अनुदान सहायता की राशि ₹9.47 लाख करोड़ है:-
    • स्थानीय सरकार अनुदान: ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए कुल ₹7.91 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं।
    • प्रवेश-स्तरीय शर्तें: निधि प्राप्त करने के लिए स्थानीय निकायों को लेखा-परीक्षित खाते, संवैधानिक गठन, तथा राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन जैसी शर्तें पूरी करनी होंगी।
    • अनुदान संरचना: अनुदानों को मूल अनुदान (80%) और प्रदर्शन-आधारित अनुदान में विभाजित किया गया है।
    • आपदा प्रबंधन: राहत एवं आपदा प्रबंधन कोष के लिए ₹1,55,916 करोड़ (केंद्र का हिस्सा) का कोष अनुशंसित किया गया है।
    • समाप्त किए गए अनुदान: 16वें वित्त आयोग ने राजस्व घाटा अनुदान, क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान, तथा राज्य-विशिष्ट अनुदान को समाप्त कर दिया है।
  • राजकोषीय रोडमैप एवं क्षेत्रीय सुधार 
    • राजकोषीय घाटा लक्ष्य: आयोग ने सिफारिश की है कि केंद्र सरकार अपने राजकोषीय घाटे को वर्ष 2030–31 तक GDP के 3.5% पर लाए, जबकि राज्यों को अपना घाटा GSDP के 3% की सीमा में बनाए रखना चाहिए।
    • ऋण पथ: केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त ऋण वर्ष 2026–27 में GDP के 77.3% से घटकर वर्ष 2030–31 तक 73.1% रहने का अनुमान है।
    • बजटेतर उधार (Off-Budget Borrowings): रिपोर्ट में बजटेतर उधार को सख्ती से समाप्त करने की माँग की गई है तथा सभी ऐसे ऋणों को आधिकारिक बजट में शामिल करने की सिफारिश की गई है।
    • सब्सिडी का युक्तिकरण: राज्यों को बिना शर्त नकद अंतरण की समीक्षा करनी चाहिए और स्पष्ट बहिष्करण मानदंड लागू करने चाहिए, ताकि लक्षित लाभार्थियों तक प्रभावी रूप से सहायता पहुँच सके।
    • सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम: आयोग ने 308 निष्क्रिय राज्य सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (SPSEs) को बंद करने तथा एक विनिवेश नीति तैयार करने की सिफारिश की है।
    • विद्युत क्षेत्र: दक्षता में सुधार के लिए राज्यों को विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) के निजीकरण के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
      • डिस्कॉम सुधार की सशर्तता: राज्यों को पूँजी निवेश हेतु विशेष सहायता का उपयोग केवल डिस्कॉम के निजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही करने की अनुमति होगी, जिससे राजकोषीय सहायता को सुधारों से सख्ती से जोड़ा गया है।

क्षैतिज हस्तांतरण के मानदंड

मानदंड  15वाँ वित्त आयोग (2021-26) 16वाँ वित्त आयोग (2026-31)
आय अंतराल 45% 42.5%
जनसंख्या (2011) 15% 17.5%
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन 12.5% 10%
क्षेत्रफल  15% 10%
वन क्षेत्र  10% 10%
GDP में योगदान 10%
कर एवं राजकोषीय प्रयास 2.5%

अंतर-राज्यीय प्रभाव विश्लेषण

  • सापेक्ष लाभार्थी राज्य: कर्नाटक (हिस्सेदारी 3.65% से बढ़कर 4.13%), केरल (1.93% से 2.38%) और गुजरात (3.48% से 3.76%) जैसे उच्च-प्रदर्शन वाले राज्यों की कर हिस्सेदारी में सापेक्ष वृद्धि हुई है।
  • प्रदर्शन प्रोत्साहन: यह वृद्धि मुख्यतः GDP में योगदान (10%) के रूप में जोड़े गए नए भारांक के कारण है, जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में राज्यों की हिस्सेदारी के लिए उन्हें पुरस्कृत करता है।
  • सापेक्ष गिरावट: इसके विपरीत, कुछ उत्तरी एवं कम-आय वाले राज्यों की प्रतिशत हिस्सेदारी में कम सापेक्ष गिरावट देखी गई है, जैसे बिहार (10.06% से घटकर 9.95%) और उत्तर प्रदेश (17.94% से घटकर 17.62%)।
  • समानता संतुलन: इन परिवर्तनों के बावजूद, आय अंतराल मानदंड को सबसे अधिक भारांक (42.5%) दिया गया है, ताकि कम-आय वाले राज्यों की राजकोषीय आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से समर्थन मिलता रहे।

अनुशंसाओं का महत्त्व

  • आर्थिक दक्षता को प्रोत्साहन: GDP में योगदान (10%) को शामिल करने और ‘’कर प्रयास” को हटाने के माध्यम से आयोग ने राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले राज्यों को पुरस्कृत करने की दिशा में परिवर्तन का संकेत दिया है।
    • इससे विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों को लाभ होता है।
  • शहरी-केंद्रित वृद्धि : शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के लिए अनुदानों में 230% की भारी वृद्धि, जो बढ़कर ₹3.56 लाख करोड़ हो गई है, इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारत की भविष्य की आर्थिक वृद्धि उसकी शहरों में निहित है।
  • जनसांख्यिकीय न्याय: जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के पुनर्परिभाषित मानदंड (वर्ष 1971–2011 की जनसंख्या वृद्धि के आधार पर) से दक्षिणी राज्यों की लंबे समय से चली आ रही शिकायत का समाधान होता है।
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन में सफलता के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा रहा है।
  • पर्यावरणीय संरक्षण: सामान्य वनों को शामिल करने और वन क्षेत्र में वृद्धि को प्रोत्साहित करने से यह रिपोर्ट राज्यों को भारत के नेट-जीरो और जलवायु लक्ष्यों में सक्रिय भागीदारी हेतु प्रेरित करती है।
    • वन-आधारित हस्तांतरण पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत की अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को भी सुदृढ़ करता है, क्योंकि यह पारिस्थितिकी लागतों को राज्य स्तर पर समाहित करता है।
  • राजकोषीय पारदर्शिता: बजटेतर उधार (जैसे राज्य-स्वामित्व वाली संस्थाओं के माध्यम से लिए गए ऋण) को आधिकारिक बजट में शामिल करने का निर्देश राजकोषीय विवेक और ऋण स्थिरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • सहकारी संघवाद का पुनर्संतुलन: ये सिफारिशें पुनर्वितरण (समानता) और वृद्धि प्रोत्साहन (दक्षता) के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में परिवर्तन को दर्शाती हैं।
  • शहरीकरण प्रीमियम एवं रणनीतिक विस्तार: ₹10,000 करोड़ का शहरीकरण प्रीमियम योजनाबद्ध शहरी विस्तार को बढ़ावा देने का संकेत देता है, जो ग्रामीण-से-शहरी संक्रमण नीति के माध्यम से शहर–ग्रामीण सीमा क्षेत्रों में प्रशासन तथा अवसंरचना पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का समाधान करने का प्रयास करता है।
  • अनुदानों में कार्यात्मक प्राथमिकता: आयोग ने स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जल आपूर्ति और अपशिष्ट-जल उपचार को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दी है तथा स्थानीय निकायों के मूल अनुदानों के 50% को शहरी स्थिरता और SDG लक्ष्यों के अनुरूप संरेखित किया है।

16वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं से उत्पन्न राजकोषीय चुनौतियाँ

  • उपकर और अधिभार का अंतर: एक प्रमुख चुनौती यह बनी हुई है कि वास्तविक विभाज्य कोष संकुचित हो गया है।
    • यद्यपि नाममात्र हिस्सेदारी 41% है, लेकिन उपकर और अधिभार राज्यों के साथ साझा न किए जाने के कारण राज्यों को वास्तविक रूप से प्राप्त हिस्सा लगभग 32% के आस-पास रह जाता है।
  • ऊर्ध्वाधर असंतुलन: कई राज्यों ने केंद्रीय करों में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी की माँग की थी, क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के तहत उनकी स्वतंत्र राजस्व जुटाने की शक्तियाँ सीमित हो गई हैं और सामाजिक कल्याण पर व्यय लगातार बढ़ रहा है।
  • बढ़ता राजस्व घाटा: 41 प्रतिशत कर हस्तांतरण के बावजूद अनेक राज्यों की राजस्व स्थिति असंतुलित होती जा रही है, जिससे वे पूँजीगत परिसंपत्तियों के बजाय दैनिक खर्चों के लिए बाजार से उधार लेने पर निर्भर हो गए हैं।
  • लोकलुभावनवाद बनाम विकास: तथाकथित नि:शुल्क सुविधाओं की संस्कृति अथवा अयोग्य सब्सिडी (बिना शर्त नकद अंतरण) दीर्घकालिक राजकोषीय स्वास्थ्य के लिए जोखिम उत्पन्न करती है।
    • आयोग ने राज्यों के बीच इन अंतरणों के लिए मानकीकृत लेखांकन की कमी को रेखांकित किया है।
  • अंतर-राज्यीय असमानताएँ: यद्यपि सूत्र समानता और दक्षता के बीच संतुलन साधने का प्रयास करता है, फिर भी यह जोखिम बना रहता है कि बिहार जैसे कम-आय वाले राज्यों की सापेक्ष हिस्सेदारी, उच्च-वृद्धि वाले राज्यों की तुलना में घट सकती है।
  • वस्तु एवं सेवा कर का संदर्भ: इस कर व्यवस्था के बाद राज्यों की स्वतंत्र राजस्व-संग्रह क्षमता कमजोर हुई है, जिससे पूर्वानुमेय कर हस्तांतरण और 41 प्रतिशत हिस्सेदारी उनकी राजकोषीय स्वायत्तता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है।
  • राजस्व घाटा अनुदानों की समाप्ति: इन अनुदानों को स्पष्ट रूप से समाप्त किया जाना अल्पकालिक घाटा-सहायता के बजाय सुधार-आधारित राजकोषीय अनुशासन की ओर बदलाव को दर्शाता है, जिससे राजकोषीय रूप से कमजोर राज्यों पर व्यय और सब्सिडी सुधार करने का दबाव बढ़ सकता है।
  • सब्सिडी लेखांकन का मानकीकरण: आयोग ने सब्सिडी की एकरूप परिभाषा और लेखांकन मानकों के अभाव को चिह्नित किया है तथा उल्लेख किया है कि कई राज्य इन्हें सहायता या अनुदान के रूप में वर्गीकृत कर देते हैं, जिससे वास्तविक राजकोषीय देयताएँ अस्पष्ट हो जाती हैं।

आगे की राह 

  • विभाज्य कोष में सुधार: उपकर और अधिभार पर सीमा निर्धारित करने अथवा उन्हें विभाज्य कोष में सम्मिलित करने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, ताकि सहकारी संघवाद की भावना को पुनः सुदृढ़ किया जा सके।
  • संरचनात्मक सब्सिडी सुधार: राज्यों को सब्सिडी योजनाओं में समाप्ति उपबंध लागू करने चाहिए तथा आयोग द्वारा सुझाए गए बहिष्करण मानदंडों को अपनाना चाहिए, ताकि कल्याणकारी लाभ केवल वास्तविक एवं लक्षित लाभार्थियों तक ही पहुँच सके।
    • समाप्ति उपबंध ऐसे प्रावधान होते हैं, जिनके अंतर्गत किसी कानून, योजना, नियम या राजकोषीय प्रोत्साहन के लिए स्वतः समाप्ति की तिथि निर्धारित कर दी जाती है, जब तक कि उसकी स्पष्ट रूप से समीक्षा कर पुनः विस्तार न किया जाए।
      • इनका उपयोग नीतिगत जड़ता को रोकने, जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा बदलती आर्थिक और शासन संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप हस्तक्षेपों को समायोजित करने के लिए किया जाता है।
  • तीसरे चरण (स्थानीय निकाय) को सशक्त बनाना: राज्यों को स्थानीय निकायों को केवल योजनाओं का क्रियान्वयन करने वाली संस्थाएँ मानने से आगे बढ़ना चाहिए और पंचायतों तथा नगरपालिकाओं को वास्तविक कराधान अधिकार सौंपने चाहिए, ताकि उनकी केंद्र सरकार के अनुदानों पर निर्भरता कम हो सके।
  • विद्युत क्षेत्र में सुधार: विद्युत वितरण कंपनियों के निजीकरण को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
    • पुराने ऋणों को समाहित करने के लिए विशेष प्रयोजन संस्थाओं का गठन करने से निजी निवेश के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
  • राजकोषीय समेकन: केंद्र (लक्ष्य 3.5%) और राज्य (लक्ष्य 3.0%),  दोनों को राजकोषीय घाटे के निर्धारित मार्ग का सख्ती से पालन करना होगा, ताकि भारत का संयुक्त ऋण–GDP अनुपात अनुमान के अनुसार घट सके।
  • राज्य वित्त आयोगों को सशक्त बनाना: केंद्रीय अंतरणों के अतिरिक्त, प्रभावी राजकोषीय विकेंद्रीकरण सुनिश्चित करने के लिए राज्य वित्त आयोगों (SFCs) को कठोर समय-सीमाओं और डेटा समर्थन के माध्यम से मजबूत करना आवश्यक है।
  • सब्सिडी एवं सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम सुधार: राज्यों को अंतरणों के लिए एकरूप लेखांकन व्यवस्था अपनानी चाहिए तथा निष्क्रिय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSEs) के लिए विनिवेश नीति लागू करनी चाहिए, ताकि पूँजी सृजन हेतु राजकोषीय स्थान मुक्त किया जा सके।

निष्कर्ष

16वाँ वित्त आयोग आर्थिक दक्षता और समानता के बीच संतुलन स्थापित करता है, एक ओर आर्थिक वृद्धि में योगदान देने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करता है, वहीं दूसरी ओर कमजोर एवं वंचित राज्यों को समर्थन प्रदान करता है। राजकोषीय पारदर्शिता और संरचनात्मक सुधारों को अनिवार्य बनाकर, यह भारत के लिए दीर्घकालिक ऋण स्थिरता तथा सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करने का एक रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत करता है।

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