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सैटेलाइट इंटरनेट: भू-राजनीति और डिजिटल विभाजन

Lokesh Pal April 05, 2025 02:57 8 0

संदर्भ

देश भर में स्टारलिंक सेवाओं का विस्तार करने के लिए एयरटेल और जियो के साथ स्पेसएक्स की हालिया साझेदारी को डिजिटल युग में कनेक्टिविटी, राष्ट्रीय संप्रभुता और आर्थिक शक्ति की अवधारणाओं में एक मौलिक परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है।

सैटेलाइट इंटरनेट के बारे में

  • यह एक प्रकार का इंटरनेट कनेक्शन है, जो पृथ्वी पर उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट एक्सेस प्रदान करने के लिए अंतरिक्ष में उपग्रहों का उपयोग करता है।
  • इसका उपयोग मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में किया जाता है, जहाँ पारंपरिक ब्रॉडबैंड इंटरनेट अवसंरचना, जैसे कि फाइबर ऑप्टिक्स या कॉपर केबल, अनुपलब्ध है या उन्हें तैनात करना मुश्किल है, जैसे कि ग्रामीण, दूरस्थ अथवा कम सेवा वाले क्षेत्र।

सैटेलाइट इंटरनेट की मुख्य विशेषताएँ

  • यह कैसे कार्य करता है: इसमें तीन मुख्य घटक शामिल हैं:-
    • उपयोगकर्ता टर्मिनल (सैटेलाइट डिश): उपयोगकर्ताओं को अपने स्थान पर एक सैटेलाइट डिश की आवश्यकता होती है, जो सैटेलाइट को डेटा अनुरोध प्रेषित करता है और बदले में डेटा प्राप्त करता है।
    • ऑर्बिट में सैटेलाइट: सैटेलाइट रिले पॉइंट के रूप में कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, स्टारलिंक जैसे प्रदाताओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (LEO) में सैटेलाइट, पृथ्वी से लगभग 500-2,000 किमी. ऊपर परिक्रमा करते हैं, जो लगभग 35,786 किमी दूर स्थित पारंपरिक जियोस्टेशनरी (GEO) सैटेलाइट की तुलना में विलंबता में कमी प्रदान करते हैं।
    • ग्राउंड स्टेशन (गेटवे): ग्राउंड स्टेशन सैटेलाइट को वैश्विक इंटरनेट से जोड़ते हैं। उपयोगकर्ता डेटा सैटेलाइट से इन ग्राउंड स्टेशनों तक जाता है, जो फिर डेटा को स्थलीय नेटवर्क के माध्यम से लक्षित गंतव्य तक पहुँचाते हैं।
  • उपग्रह कक्षाओं के प्रकार
    • भूस्थिर कक्षा (GEO): उपग्रह पृथ्वी से लगभग 35,786 किलोमीटर ऊपर स्थित होते हैं, जो पृथ्वी के समान घूर्णन करते हैं।
      • ये उपग्रह व्यापक कवरेज प्रदान करते हैं, लेकिन लंबी दूरी के कारण इनमें विलंब (देरी) अधिक होता है।
    • लो अर्थ ऑर्बिट (LEO): उपग्रह पृथ्वी के करीब स्थित होते हैं, आमतौर पर 500-2,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर।
      • LEO उपग्रह कम विलंब और तेज गति प्रदान करते हैं, लेकिन वैश्विक कवरेज प्रदान करने के लिए बड़े समूहों की आवश्यकता होती है।
  • प्रमुख प्रदाता
    • स्पेसएक्स का स्टारलिंक: LEO उपग्रहों के एक बड़े नेटवर्क का उपयोग करके कम विलंबता वाला ब्रॉडबैंड इंटरनेट प्रदान करता है।
    • वनवेब: LEO उपग्रह इंटरनेट में एक और प्रमुख हितधारक, जिसका उद्देश्य वैश्विक कवरेज प्रदान करना है।
    • अमेजन का प्रोजेक्ट कुइपर: LEO उपग्रहों का उपयोग करके ब्रॉडबैंड इंटरनेट प्रदान करने के लिए एक नियोजित समूह है।

सैटेलाइट इंटरनेट के लाभ

  • दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी: सैटेलाइट इंटरनेट फाइबर केबल जैसे स्थलीय बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता को दरकिनार कर देता है।
    • भारत के महापंजीयक के आँकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2024 तक 18,000 से अधिक गाँवों में अभी भी मोबाइल कनेक्टिविटी की कमी है; सैटेलाइट इंटरनेट इस कमी को पूरा कर सकता है।
  • आपदा-प्रतिरोधी संचार: प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, मूलभूत बुनियादी ढाँचा अक्सर विफल हो जाता है; सैटेलाइट निर्बाध संचार प्रदान करते हैं।
    • स्टारलिंक का उपयोग यू.एस.ए (2022) में हरिकेन इयान (ION) के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में संचार पुनर्स्थापित करने के लिए भी किया गया था।
  • तीव्र तैनाती: बुनियादी ढाँचे की कमी वाले क्षेत्रों में इसे जल्दी से शुरू किया जा सकता है, जबकि फाइबर ऑप्टिक केबल बिछाने में समय लगता है और यह महंगा भी है।
    • दुर्गम इलाकों में 1 किमी. फाइबर केबल बिछाने में ₹10-15 लाख का खर्च आ सकता है, जबकि सैटेलाइट डिश को कुछ ही दिनों में लगाया जा सकता है।
  • सामरिक और सैन्य उपयोगिता: सैटेलाइट इंटरनेट सीमा या समुद्री क्षेत्रों में सशस्त्र बलों के लिए सुरक्षित संचार सुनिश्चित करता है।
    • वर्ष 2022 के युद्ध के दौरान यूक्रेन ने फाइबर और सेलुलर नेटवर्क नष्ट होने के बाद युद्ध के मैदान में संचार बनाए रखने के लिए स्टारलिंक का उपयोग किया।
  • दूरस्थ शिक्षा और टेलीमेडिसिन का समर्थन करता है: पिछड़े क्षेत्रों में ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल कक्षाओं और आभासी स्वास्थ्य परामर्श तक पहुँच को सक्षम बनाता है।
    • IN-SPACe ने वनवेब इंडिया को प्राधिकरण प्रदान किया, ग्रामीण भारत में 24×7 इंटरनेट के लिए पहला कदम उठाया गया।
  • अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था और नवाचार को बढ़ावा: सैटेलाइट इंटरनेट में वृद्धि अंतरिक्ष तकनीक, स्टार्ट-अप और विनिर्माण में निवेश को बढ़ावा देती है।
    • वैश्विक सैटेलाइट इंटरनेट बाजार वर्ष 2030 तक $18.59 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान (एलाइड मार्केट रिसर्च) है।

सैटेलाइट इंटरनेट की सीमाएँ

  • एक्सेस की उच्च लागत: उपकरण और सदस्यता लागत स्थलीय विकल्पों की तुलना में बहुत अधिक है। सब्सिडी न मिलने पर डिजिटल विभाजन और भी बदतर हो सकता है।
    • स्टारलिंक की एक बार की हार्डवेयर लागत ₹25,000-₹35,000 है, और मासिक शुल्क ₹7,000 से अधिक है, जो अधिकांश ग्रामीण भारतीयों के लिए वहनीय नहीं है।
  • मौसम पर निर्भरता: वर्षा, तूफान या घने बादल से उपग्रह संकेत बाधित हो सकते हैं, जिससे विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
    • इसे ‘रेन फेड’ के रूप में जाना जाता है, विशेष रूप से हाई-स्पीड इंटरनेट में उपयोग किए जाने वाले Ku-बैंड और Ka-बैंड उपग्रहों पर इसका प्रभाव पड़ता है।
  • प्रसुप्ति काल और बैंडविड्थ संबंधी मुद्दे: भूस्थिर उपग्रहों (पृथ्वी से 35,786 किमी. ऊपर) में उच्च प्रसुप्ति काल (~600ms) होता है, जो उन्हें गेमिंग या वीडियो कॉल जैसे रीयल-टाइम ऐप के लिए अनुपयुक्त बनाती है।
    • स्टारलिंक जैसी LEO प्रणालियों के साथ भी, प्रसुप्ति काल बेहतर है (~20-40ms) लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव हो सकता है।
  • अंतरिक्ष मलबा और कक्षीय घनत्व: लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में हजारों उपग्रह टकराव के जोखिम को बढ़ाते हैं और बाहरी अंतरिक्ष की स्थिरता को खतरे में डालते हैं।
    • वर्ष 2024 तक, स्टारलिंक ने 7,000 से अधिक उपग्रह लॉन्च किए हैं; वनवेब, अमेजन कुइपर और अन्य और भी जोड़ रहे हैं।
    • नासा ने ‘केसलर सिंड्रोम’ परिदृश्य की चेतावनी देते हुए कहा कि अंतरिक्ष में चेन-रिएक्शन टकराव की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
  • साइबर सुरक्षा और संप्रभुता जोखिम: अंतरिक्ष से प्रेषित सिग्नल साइबर हमलों और निगरानी के लिए असुरक्षित हैं।
    • भारत में अमेरिकी आधारित स्टारलिंक के उपयोग को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हो गईं, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे महत्त्वपूर्ण संचार अवसंरचना पर विदेशी नियंत्रण हो जाएगा।
    • वर्ष 2022 में, रूस ने यूक्रेन में उपयोग की जाने वाली स्टारलिंक सेवाओं को बाधित करने का प्रयास किया।
  • विनियामक और कानूनी जटिलताएँ: क्रॉस-बॉर्डर सैटेलाइट सिग्नल स्पेक्ट्रम विनियमन, लाइसेंसिंग और डेटा गवर्नेंस में चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं।
    • भारत में विदेशी सैटेलाइट सेवाओं पर कड़े नियम हैं, इसके लिए DoT, ISRO और केंद्रीय गृह मंत्रालय से मंजूरी की जरूरत होती है।
    • वैश्विक समन्वय की कमी से स्पेक्ट्रम में हस्तक्षेप और विवाद हो सकते हैं।

सैटेलाइट इंटरनेट के भू-राजनीतिक निहितार्थ

  • डिजिटल संप्रभुता बनाम तकनीक निर्भरता: विदेशी उपग्रह प्रणालियों पर निर्भर रहने से देश डेटा और संचार अवसंरचना पर नियंत्रण खोने का जोखिम उठाते हैं।
    • भारत द्वारा स्टारलिंक (अमेरिका-आधारित) के साथ साझेदारी करने से राष्ट्रीय नेटवर्क पर विदेशी प्रभाव के बारे में चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
  • राष्ट्र-राज्य शक्ति वाले निजी हितधारक: स्पेसएक्स जैसी कंपनियाँ अब पारंपरिक रूप से राज्यों द्वारा प्रबंधित अवसंरचना को नियंत्रित करती हैं। निगम भू-राजनीतिक अभिकर्ता बन सकते हैं।
    • एलन मस्क की स्टारलिंक ने एक सैन्य अभियान (2022) के दौरान यूक्रेन की पहुँच को प्रतिबंधित कर दिया, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा निर्णयों पर निजी वीटो का प्रदर्शन हुआ।
  • वैश्विक प्रभाव की नई धुरी: उपग्रह समूह, सॉफ्ट पॉवर और वैश्विक प्रभुत्व के उपकरण बन रहे हैं।
    • यू.एस.ए (स्टारलिंक (स्पेसएक्स), अमेजन कुइपर); चीन (गुओवांग समूह); यूरोपीय संघ (IRIS² पहल), ये नेटवर्क साइबरस्पेस और बाहरी अंतरिक्ष डोमेन में प्रभाव डालते हैं।
  • रणनीतिक डोमेन के रूप में अंतरिक्ष: LEO उपग्रह नेटवर्क का अनुप्रयोग दोहरे उद्देश्यों (नागरिक + सैन्य) के लिए किया जा सकता है।
    • देश अब अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट को अपने रणनीतिक बुनियादी ढाँचे के हिस्से के रूप में देखते हैं।
  • बहुध्रुवीय तकनीकी गठबंधन: देश तकनीकी बुनियादी ढाँचे को राजनीतिक गुटों के साथ जोड़ रहे हैं।
    • उदाहरण: भारत चीन के गुओवांग के बजाय अमेरिका (स्टारलिंक, वनवेब) के साथ जुड़ रहा है, जो इंडो-पैसिफिक में एक लोकतांत्रिक तकनीकी गठबंधन को दर्शाता है।
  • वैश्विक नियामक रिक्तता: कोई भी मजबूत अंतरराष्ट्रीय संधि उपग्रह इंटरनेट परिचालन, स्पेक्ट्रम उपयोग या अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन को नियंत्रित नहीं करती है।
    • कक्षीय संघर्ष और साइबर हस्तक्षेप का खतरा बढ़ रहा है।
  • डिजिटल उपनिवेशवाद बहस: आलोचकों का तर्क है कि उपग्रह इंटरनेट डिजिटल साम्राज्यवाद का एक रूप बन सकता है, जहाँ डेटा और नेटवर्क का नियंत्रण शक्तिशाली विदेशी फर्मों के पास होता है।
    • इसे कम करने के लिए डेटा स्थानीयकरण नीतियों, तकनीकी हस्तांतरण और स्थानीय हितधारक भागीदारी की आवश्यकता होती है।

आर्थिक मूल्य बनाम भू-राजनीतिक नियंत्रण ढाँचा

  • डिजिटल संप्रभुता (उच्च आर्थिक + उच्च भू-राजनीतिक नियंत्रण): चीन के गुओवांग का लक्ष्य राज्य नियंत्रित प्रभुत्व है।
  • बाजार प्रभुत्व (उच्च आर्थिक + निम्न भू-राजनीतिक नियंत्रण): भारत घरेलू भागीदारी के माध्यम से जोखिम कम करता है।
  • रणनीतिक परिसंपत्ति (निम्न आर्थिक + उच्च भू-राजनीतिक नियंत्रण): भारत के स्वदेशी उपग्रह प्रयास (ISRO) आर्थिक रूप से कमतर हैं, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • सीमांत उपस्थिति (निम्न आर्थिक + निम्न भू-राजनीतिक नियंत्रण): अमेजन के कुइपर जैसे उभरते हुए हितधारक।

डिजिटल संप्रभुता की ओर भारत का मार्ग

  • डिजिटल संप्रभुता: किसी देश की अपनी सीमाओं (रणनीतिक स्वायत्तता, गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना) के भीतर डिजिटल बुनियादी ढाँचे, डेटा, प्लेटफॉर्म और प्रौद्योगिकियों पर नियंत्रण रखने की क्षमता।
  • भारत के लिए डिजिटल संप्रभुता क्यों मायने रखती है?
    • रणनीतिक स्वायत्तता: विदेशी प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता से बचना।
    • डेटा सुरक्षा: नागरिक डेटा और राष्ट्रीय डेटाबेस की सुरक्षा करना।
    • साइबर सुरक्षा: विदेशी निगरानी या साइबर युद्ध से होने वाले खतरों को कम करना।
    • डिजिटल अर्थव्यवस्था: भारतीय सीमाओं के भीतर मूल्य सृजन को बनाए रखना।

डिजिटल संप्रभुता की ओर भारत के कदम

  • विधायी और नीतिगत पहल
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: डेटा स्थानीयकरण और उपयोगकर्ता सहमति ढाँचे को प्रस्तुत करता है।
    • राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति (संशोधन के अधीन): महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा के लिए लक्ष्य निर्धारित करता है।
    • मसौदा भारतीय दूरसंचार विधेयक, 2023: डिजिटल और उपग्रह नेटवर्क को विनियमित करता है।
    • राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति, 2018: स्वदेशी डिजिटल बुनियादी ढाँचे का समर्थन करती है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) 
    • इंडिया स्टैक: आधार, UPI, डिजीलॉकर, कोविन (CoWIN)- सार्वजनिक स्वामित्व वाली डिजिटल अवसंरचना।
    • सार्वजनिक कल्याण के लिए तकनीक को बढ़ावा देता है, विदेशी बड़ी टेक पर निर्भरता कम करता है।
  • टेक में आत्मनिर्भर भारत: सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा (ISMC, माइक्रोन, वेदांता-फॉक्सकॉन)।
    • GSAT, नाविक (IRNSS) जैसी स्वदेशी उपग्रह प्रणालियों और मत्स्य 6000 जैसी परियोजनाओं को बढ़ावा देना।
    • भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सॉल्यूशंस (Bharat Operating System Solutions- BOSS) का विकास- एक लाइनेक्स-आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम।
    • सरकारी दूरसंचार ऑपरेटर BSNL ने भी अपनी डायरेक्ट-टू-डिवाइस सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू की है।
  • अंतरिक्ष एवं उपग्रह इंटरनेट रणनीति: निजी अंतरिक्ष गतिविधियों को विनियमित करने के लिए IN-SPACe को सशक्त बनाना।
    • ISRO के नेतृत्व में वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करते हुए निजी क्षेत्र के सैटेलाइट ब्रॉडबैंड को प्रोत्साहित करना।
    • स्टारलिंक के अप्रतिबंधित प्रवेश को अस्वीकार करना सतर्क कूटनीति को दर्शाता है।
  • डेटा स्थानीयकरण और सॉवरेन क्लाउड: RBI ने भुगतान डेटा के स्थानीय भंडारण को अनिवार्य कर दिया है।
    • सरकार ई-गवर्नेंस सेवाओं के लिए मेघराज क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दे रही है।

वैश्विक इंटरनेट शासन

  • इसमें यह शामिल है कि वैश्विक स्तर पर इंटरनेट का प्रबंधन किस प्रकार किया जाता है – जिसमें मानक, सुरक्षा, पहुँच और उपयोग शामिल हैं तथा इसमें सरकारें, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, शिक्षा जगत एवं तकनीकी समुदाय शामिल हैं।

प्रमुख वैश्विक संस्थाएँ

संस्था

भूमिका

‘इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स’ (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers- ICANN ) IP ​एड्रेस और डोमेन नाम प्रबंधित करता है। अमेरिका में स्थित है।
अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) संयुक्त राष्ट्र एजेंसी जो वैश्विक दूरसंचार मानकों और समन्वय से संबंधित है।
इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (IGF) इंटरनेट शासन पर संवाद के लिए संयुक्त राष्ट्र समर्थित बहु-हितधारक मंच है।
वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम (W3C) HTML, HTTP आदि जैसे वेब मानक निर्धारित करता है।
इंटरनेट इंजीनियरिंग टास्क फोर्स (IETF) इंटरनेट आर्किटेक्चर के लिए तकनीकी प्रोटोकॉल विकसित करता है।

शासन के मॉडल

मॉडल

विशेषताएँ

समर्थित

बहु-हितधारक मॉडल समावेशी – सरकार, निजी, नागरिक समाज भाग लेते हैं। सयुंक्त राज्य अमेरिका, यूरोपियन संघ, भारत।
बहुपक्षीय मॉडल सरकार-नेतृत्व, संप्रभुता-केंद्रित। चीन, रूस, कुछ विकासशील देश
हाइब्रिड मॉडल राज्य की निगरानी को निजी कार्यान्वयन के साथ संयोजन। कई उभरते लोकतांत्रिक देश।

आगे की राह 

  • संतुलित नीति दृष्टिकोण: भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को वैश्विक नवाचार पहलों के साथ संतुलित करना चाहिए।
    • रणनीतिक साझेदारी (जैसे- स्टारलिंक, वनवेब के साथ) को स्पष्ट विनियामक सुरक्षा उपायों और तकनीक हस्तांतरण समझौतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
  • स्वदेशी क्षमता में तेजी लाना: LEO उपग्रह तारामंडल विकसित करने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से ISRO और निजी हितधारकों को मजबूत करना।
    • स्पेस-टेक स्टार्ट-अप (जैसे- पिक्सल, एस्ट्रोम) के लिए फंडिंग बढ़ाना और एक राष्ट्रीय उपग्रह ब्रॉडबैंड रोडमैप विकसित करना।
  • एकीकृत और पारदर्शी विनियामक ढाँचा: IN-SPACe के माध्यम से सैटेलाइट इंटरनेट लाइसेंसिंग के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम बनाना।
    • अंतरिक्ष गतिविधि विधेयक को अंतिम रूप देना और कानूनी स्पष्टता प्रदान करने के लिए उपग्रह संचार नीति को अपडेट करना।
  • डेटा संप्रभुता और साइबर सुरक्षा को मजबूत करना: विदेशी उपग्रह ऑपरेटरों के लिए डेटा स्थानीयकरण मानदंड, एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन और अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट लागू करना।
    • महत्त्वपूर्ण और रक्षा क्षेत्रों के लिए संप्रभु उपग्रह संचार बुनियादी ढाँचे का विकास करना। 
  • डिजिटल डिवाइड को सक्रिय रूप से पाटना: दूरस्थ क्षेत्रों में पहुँच को सब्सिडी देने के लिए भारत हेतु सैटेलाइट इंटरनेट योजना शुरू करना।
    • असंबद्ध गाँवों में ग्राउंड टर्मिनलों को निधि देने के लिए यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) का लाभ उठाना।
  • वैश्विक शासन और मानदंडों के लिए प्रयास करना: स्पेक्ट्रम साझाकरण, सैटेलाइट ट्रैफ़िक और साइबर सुरक्षा पर बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय मानदंड विकसित करने के लिए ITU और IGF में पहल का नेतृत्व करना।
    • भारत के लोकतांत्रिक और विकासात्मक मूल्यों के साथ संरेखित स्पेस इंटरनेट के लिए वैश्विक आचार संहिता के निर्माण को बढ़ावा देना।
  • डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) के साथ सैटेलाइट इंटरनेट को एकीकृत करना: ग्रामीण CoWIN, DigiLocker, e-Sanjeevani, PM-WANI आदि को सशक्त बनाने के लिए सैटेलाइट ब्रॉडबैंड का उपयोग करना।
    • सैटेलाइट इंटरनेट को समावेशी डिजिटल इंडिया 2.0 का प्रवर्तक बनाना।

निष्कर्ष 

सैटेलाइट इंटरनेट या तो डिजिटल विभाजन को पाट सकता है अथवा असमानताओं को मजबूत कर सकता है। भारत को कनेक्टिविटी लाभों को रणनीतिक स्वायत्तता के साथ संतुलित करना चाहिए।

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