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ओलिव रिडले की सैटेलाइट टैगिंग

Lokesh Pal January 10, 2026 03:20 29 0

संदर्भ

हाल ही में, चेन्नई के समुद्र तटों पर ऑलिव रिडले टर्टल की सैटेलाइट टैगिंग शुरू हुई है।

ऑलिव रिडले टर्टल की सैटेलाइट टैगिंग के बारे में

  • चेन्नई के समुद्र तटों पर पहली बार ऑलिव रिडले टर्टल की निगरानी के लिए रेडियो टेलीमेट्री का उपयोग करते हुए सैटेलाइट टैगिंग का प्रयोग किया जा रहा है।
    • सैटेलाइट टैगिंग वन्यजीव निगरानी की एक तकनीक है, जिसमें एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर किसी जीव से जोड़ा जाता है ताकि उपग्रहों के माध्यम से वास्तविक समय में उसकी गतिविधियों, व्यवहार और आवास के उपयोग पर नजर रखी जा सके।
  • संचालनकर्ता: वन्यजीव संस्थान (WII) और उन्नत वन्यजीव संरक्षण संस्थान (AIWC), वंडलूर द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वित।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • दो वर्ष के इस अध्ययन (2025-2027) में चेन्नई तट और कावेरी डेल्टा सहित संवेदनशील ‘नेस्टिंग’ स्थलों को शामिल किया गया है, ताकि ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं की निगरानी की जा सके।
    • प्रति वर्ष नवंबर से अप्रैल तक उनकी नेस्टिंग प्रक्रिया के मौसम के दौरान प्रति घंटे उपग्रह टेलीमेट्री का उपयोग करते हुए, 10 कछुओं की सैटेलाइट टैगिंग की जाएगी और 1,000 कछुओं के कवच पर टैग लगाए जाएंगे ताकि उनकी दीर्घकालिक निगरानी की जा सके।
  • टैगिंग का उद्देश्य
    • ‘ऑलिव रिडले टर्टल’ के प्रवासी मार्गों, चारागाहों और ‘नेस्टिंग’ व्यवहार का मानचित्रण करना।
    • कछुओं और मत्स्यन गतिविधियों के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन करना, जिससे आकस्मिक शिकार को कम करने में मदद मिल सके।
    • साक्ष्य आधारित संरक्षण नीतियों का समर्थन करना, ‘नेस्टिंग’ संबंधी समुद्र तटों की सुरक्षा में सुधार करना और भारत के समुद्री जैव विविधता संरक्षण प्रयासों को मजबूत करना।

ओलिव रिडले टर्टल (लेपिडोचेलिस ओलिवेसिया) के बारे में 

  • ऑलिव रिडले टर्टल सबसे छोटी और सबसे अधिक पाई जाने वाली समुद्री कछुआ प्रजाति है, जिसका नाम इसके जैतून-हरे रंग के कवच के नाम के कारण रखा गया है।
  • आवास: यह गर्म उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय समुद्री जल में निवास करता है और ‘नेस्टिंग’ के लिए मुहानों और खाड़ियों के पास तटीय क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है।
  • वितरण: ऑलिव रिडले टर्टल हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में पाए जाते हैं।
    • भारत में, मुख्य रूप से ओडिशा तट, अंडमान द्वीप समूह, तमिलनाडु और कर्नाटक (पश्चिमी तट पर एकमात्र प्रजनन स्थल) में ‘नेस्टिंग’ करते हैं।

  • आहार: ये सर्वाहारी होते हैं और शैवाल, जेलीफ़िश, केकड़े, लॉबस्टर, मोलस्क और ट्यूनिकेट्स खाते हैं।
  • ‘नेस्टिंग’ प्रक्रिया: इसकी एक अनूठी विशेषता अरिबाडा है, जो एक सामूहिक ‘नेस्टिंग’ की घटना है जिसमें हजारों मादाएँ एक ही समुद्र तट पर एक साथ अंडे देती हैं।
    • भारत में, अरिबाडा के प्रमुख स्थलों में गहिरमाथा, देवी नदी का मुहाना और ओडिशा में ऋषिकुल्या शामिल हैं।
    • प्रत्येक मादा लगभग 100-140 अंडे देती है।
  • संरक्षण स्थिति
    • IUCN की रेड लिस्ट: सुभेद्य (Vulnerable)
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची I
    • CITES: परिशिष्ट I
  • खतरे: प्रमुख खतरों में मछली पकड़ने के जालों में आकस्मिक शिकार, तटीय विकास, जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, अंडों का अवैध संग्रहण और आवारा जानवरों द्वारा शिकार शामिल हैं।

भारत में संरक्षण प्रयास

  • ओडिशा के तटीय इलाकों में ‘नेस्टिंग’ करने वाले कछुओं की सुरक्षा के लिए भारतीय तटरक्षक बल द्वारा ऑपरेशन ओलिविया (Operation Olivia) संचालित किया गया ।
  • मौसमी मत्स्यन पर प्रतिबंध और कछुआ नियंत्रण उपकरणों (TED) का उपयोग करके आकस्मिक शिकार से बचाव।
  • गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य जैसे संरक्षित घोंसला बनाने वाले समुद्र तट।
  • चेन्नई और ओडिशा में हैचरी सहित बाह्य संरक्षण कार्य।
    • स्टूडेंट्स सी टर्टल कंजर्वेशन नेटवर्क (SSTCN) जैसे गैर-सरकारी संगठन वन विभाग के साथ मिलकर हैचरी का प्रबंधन करते हैं।
  • भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा फ्लिपर टैगिंग एंड रेडियो टेलीमेट्री के माध्यम से वैज्ञानिक तरीके से निगरानी की जाती है।

निष्कर्ष 

सैटेलाइट टैगिंग भारत के समुद्री संरक्षण में एक बड़ी प्रगति है, क्योंकि यह ओलिव रिडले टर्टल के विज्ञान-आधारित संरक्षण को सक्षम बनाती है और आकस्मिक शिकार को कम करने और महत्वपूर्ण ‘नेस्टिंग’ आवासों की रक्षा के प्रयासों को मजबूत करती है।

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