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ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026

Lokesh Pal January 30, 2026 02:10 13 0

संदर्भ

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जो ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का स्थान लेंगे।

संबंधित तथ्य

  •  ये नियम पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित किए गए हैं।
  • ये 1 अप्रैल, 2026 से पूर्ण रूप से प्रभावी होंगे।

ठोस अपशिष्ट

  • ठोस अपशिष्ट से आशय उन सभी अवांछित एवं परित्यक्त ठोस अथवा अर्द्ध-ठोस पदार्थों से है, जो घरेलू इकाइयों, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, संस्थानों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों एवं कृषि से उत्पन्न होते हैं।
  • ठोस अपशिष्ट में रसोई अपशिष्ट, प्लास्टिक, कागज, धातु, काँच, कचरा, निर्माण अपशिष्ट तथा औद्योगिक अवशेष सम्मिलित हैं।
  • ठोस अपशिष्ट में गैसें सम्मिलित नहीं होतीं तथा सामान्यतः द्रव अपशिष्ट को भी इसमें शामिल नहीं किया जाता है।

भारत में ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण की वर्तमान स्थिति

  • अपशिष्ट उत्पादन: 1.85 लाख टन प्रतिदिन
  • संग्रहण: 1.79 लाख टन प्रतिदिन
  • उपचार: 1.14 लाख टन प्रतिदिन
  • लैंडफिल: लगभग 40,000 टन प्रतिदिन अब भी लैंडफिल में जाता है (CPCB 2023–24)।
  • भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 0.45 किलोग्राम नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जो कठोर पृथक्करण एवं प्रसंस्करण की आवश्यकता को दर्शाता है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के चरण

  • अपशिष्ट उत्पादन एवं न्यूनकरण: अपशिष्ट उत्पादन मानव गतिविधियों का परिणाम है, जबकि न्यूनकरण का उद्देश्य सतत् उपभोग एवं उत्पादन पद्धतियों को प्रोत्साहित कर स्रोत पर ही अपशिष्ट को कम करना है।
  • स्रोत पर पृथक्करण: स्रोत पर पृथक्करण का अर्थ है उत्पत्ति स्थल पर ही अपशिष्ट को जैव-अपघटनीय, पुनर्चक्रणीय एवं खतरनाक श्रेणियों में विभाजित करना, जिससे पुनर्चक्रण की दक्षता बढ़ती है और उपचार लागत कम होती है।
  • संग्रहण एवं भंडारण: ठोस अपशिष्ट का संग्रहण घर-घर जाकर संग्रहण तथा सामुदायिक डिब्बों के माध्यम से किया जाता है, जबकि उचित भंडारण से स्वच्छता बनी रहती है और दुर्गंध व रोगवाहक जीवों का प्रसार बाधित होता है।
  • परिवहन: कूड़ा फैलने एवं रिसाव को रोकने हेतु ढके हुए एवं यंत्रीकृत वाहनों द्वारा किया जाता है।
  • प्रसंस्करण / उपचार
    • गीले अपशिष्ट के लिए कंपोस्टिंग / वर्मी-कंपोस्टिंग
    • जैविक अपशिष्ट के लिए बायोमेथेनेशन (बायोगैस)
    • सूखे अपशिष्ट की छँटाई एवं पुनर्चक्रण हेतु सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा (MRF)
    • उच्च ऊष्मीय मान वाले सूखे अपशिष्ट के लिए रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (RDF)
    • उपयुक्त गैर-पुनर्चक्रणीय, उच्च ऊष्मीय अपशिष्ट के लिए अपशिष्ट-से-ऊर्जा (दहन), जिसमें सख्त उत्सर्जन नियंत्रण आवश्यक है।
  • अंतिम निपटान: निष्क्रिय एवं अवशिष्ट अपशिष्ट के लिए केवल लैंडफिल का उपयोग, अर्थात् वही अपशिष्ट जिसका किसी भी प्रकार से प्रसंस्करण संभव नहीं है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ

  • चक्रीय अर्थव्यवस्था: नियम संसाधन दक्षता एवं अपशिष्ट न्यूनीकरण को बढ़ावा देने हेतु चक्रीय अर्थव्यवस्था एवं विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के सिद्धांतों को एकीकृत करते हैं।
  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: पंजीकरण के बिना संचालन, गलत रिपोर्टिंग, जाली दस्तावेजों एवं अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन जैसे गैर-अनुपालन पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जाएगी।
  • संस्थागत भूमिकाएँ: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) दिशा-निर्देश बनाएगा, जबकि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) एवं प्रदूषण नियंत्रण समितियाँ (PCC) पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति आरोपित करेंगी।
  • स्रोत पर अनिवार्य पृथक्करण: स्रोत पर चार अपशिष्ट स्तरों में अनिवार्य पृथक्करण अधिसूचित किया गया है।
    • गीला अपशिष्ट: रसोई अपशिष्ट एवं जैव-अपघटनीय पदार्थ, जिन्हें कंपोस्टिंग अथवा बायोमेथेनेशन द्वारा संसाधित किया जाएगा।
    • सूखा अपशिष्ट: कागज, प्लास्टिक, धातु एवं काँच, जिन्हें सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा (MRF) जैसे अधिकृत केंद्रों के माध्यम से पुनर्चक्रित किया जाएगा।
    • स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट: सैनिटरी नैपकिन, डायपर आदि, जिन्हें सुरक्षित रूप से लपेटकर पृथक रूप से सँभाला जाएगा।
    • विशेष देखभाल अपशिष्ट: ट्यूबलाइट, बैटरियाँ एवं खतरनाक घरेलू वस्तुएँ, जिनके लिए विशेष प्रबंधन आवश्यक है।

थोक अपशिष्ट उत्पादकों की परिभाषा एवं दायरा

  • पात्रता मानदंड: निम्नलिखित में से किसी एक को पूरा करने पर इकाइयाँ थोक अपशिष्ट उत्पादक मानी जाएँगी।
    • 20,000 वर्ग मीटर या अधिक का क्षेत्रफल
    • 40,000 लीटर प्रतिदिन या अधिक जल उपभोग
    • 100 किलोग्राम प्रतिदिन या अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पादन
  • आवृत इकाइयाँ: इसमें केंद्र एवं राज्य सरकार के विभाग, स्थानीय निकाय, आवासीय समितियाँ, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान, विश्वविद्यालय, छात्रावास एवं संस्थान शामिल हैं।
  • अपशिष्ट में हिस्सेदारी: थोक अपशिष्ट उत्पादक भारत में कुल ठोस अपशिष्ट का लगभग 30 प्रतिशत उत्पन्न करते हैं।
  • विस्तारित थोक अपशिष्ट उत्पादक उत्तरदायित्व (EBWGR)
    • स्रोत-स्तरीय उत्तरदायित्व: थोक अपशिष्ट उत्पादकों को पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित संग्रहण, परिवहन एवं प्रसंस्करण सुनिश्चित करना होगा।
    • स्थल पर अपशिष्ट प्रसंस्करण: जहाँ संभव हो, गीले अपशिष्ट का प्रसंस्करण स्थल पर ही किया जाना अनिवार्य है।
    • प्रमाणन: जहाँ स्थल पर प्रसंस्करण संभव न हो, वहाँ EBWGR प्रमाण-पत्र प्राप्त करना होगा।
  • भूमि आवंटन एवं बफर क्षेत्र
    • त्वरित भूमि आवंटन: नियम अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं निपटान सुविधाओं के आसपास श्रेणीबद्ध विकास मानदंड प्रस्तुत करते हैं।
    • बफर क्षेत्र की अनिवार्यता: प्रतिदिन 5 टन से अधिक क्षमता वाली सुविधाओं के लिए आवंटित भूमि के भीतर बफर क्षेत्र बनाए रखना आवश्यक होगा।
    • CPCB दिशा-निर्देश: बफर क्षेत्र का आकार एवं अनुमेय गतिविधियाँ क्षमता एवं प्रदूषण भार के आधार पर CPCB द्वारा निर्धारित की जाएँगी।

केंद्रीकृत ऑनलाइन निगरानी प्रणाली

  • ऑनलाइन पोर्टल: एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल अपशिष्ट उत्पादन, संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण, निपटान तथा विरासत डंपसाइट्स के बायोमाइनिंग एवं बायोरिमेडिएशन को ट्रैक करेगा।
  • डिजिटल पंजीकरण एवं रिपोर्टिंग: अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं का पंजीकरण, प्राधिकरण एवं रिपोर्ट प्रस्तुतिकरण पूर्णतः ऑनलाइन होगा।
  • अनिवार्य ऑडिट: सभी अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं को ऑडिट कराना होगा और रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करनी होगी।

पर्वतीय एवं द्वीपीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान

  • पर्यटक उपयोग शुल्क: स्थानीय प्राधिकरणों को पर्यटकों से अपशिष्ट प्रबंधन शुल्क वसूलने का अधिकार होगा।
  • आगंतुक विनियमन: स्थानीय अपशिष्ट प्रबंधन क्षमता के आधार पर आगंतुकों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकेगा।
  • विकेन्द्रित प्रसंस्करण: होटल एवं रेस्तराँ को SPCB/PCC मानकों के अनुसार स्थल पर गीले अपशिष्ट का प्रसंस्करण करना होगा।

मुख्य सिद्धांत के रूप में अपशिष्ट पदानुक्रम

  • प्राथमिकता-आधारित दृष्टिकोण: नियम अपशिष्ट पदानुक्रम को अपनाते हैं, जिसमें रोकथाम एवं न्यूनीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है, इसके बाद पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण, पुनर्प्राप्ति एवं निपटान आता है।
  • रोकथाम को वरीयता: अपशिष्ट रोकथाम को शीर्ष स्थान दिया गया है, जो वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप है।

लैंडफिल पर प्रतिबंध

  • सीमित उपयोग: लैंडफिल का उपयोग केवल गैर-पुनर्चक्रणीय, गैर-ऊर्जा-उपयोगी अपशिष्ट एवं निष्क्रिय पदार्थों के लिए किया जाएगा।
  • भिन्न लैंडफिल शुल्क: असंवर्गीकृत अपशिष्ट के लिए अधिक लैंडफिल शुल्क लगाया जाएगा।
  • निगरानी एवं पर्यवेक्षण: SPCB द्वारा वार्षिक लैंडफिल ऑडिट किया जाएगा, जिसकी निगरानी जिला कलेक्टर करेंगे।
  • विरासत अपशिष्ट उपचार: डंपसाइट्स का अनिवार्य मानचित्रण, मूल्यांकन तथा समयबद्ध बायोमाइनिंग एवं बायोरिमेडिएशन किया जाएगा, जिसमें त्रैमासिक रिपोर्टिंग आवश्यक होगी।

रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (RDF) का उपयोग

  • परिभाषा: RDF उच्च ऊष्मीय मान वाले गैर-पुनर्चक्रणीय सूखे अपशिष्ट जैसे प्लास्टिक, कागज एवं वस्त्र से निर्मित ईंधन है।
  • अनिवार्य औद्योगिक उपयोग: सीमेंट संयंत्रों एवं अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों को ठोस ईंधन के स्थान पर क्रमिक रूप से RDF का उपयोग करना होगा।
  • ईंधन प्रतिस्थापन लक्ष्य: RDF का उपयोग छह वर्षों में 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया जाएगा।

स्थानीय निकायों एवं MRF की जिम्मेदारियाँ

  • स्थानीय निकायों की भूमिका: ठोस अपशिष्ट का संग्रहण, पृथक्करण एवं परिवहन स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होगी।
  • MRF की भूमिका: सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं को औपचारिक मान्यता दी गई है तथा वे ई-अपशिष्ट, स्वच्छता अपशिष्ट एवं विशेष देखभाल अपशिष्ट के संग्रहण केंद्र के रूप में भी कार्य कर सकती हैं।
  • कार्बन क्रेडिट: बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से स्थानीय निकायों को कार्बन क्रेडिट सृजन के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
  • पेरी-अर्बन फोकस: शहरी-ग्रामीण सीमांत क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का प्रावधान किया गया है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन हेतु सरकारी पहलें

  • अपशिष्ट का विधिक वर्गीकरण: भारत में ठोस अपशिष्ट को विधिक रूप से छह श्रेणियों—नगरपालिका अपशिष्ट, खतरनाक अपशिष्ट, इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट, प्लास्टिक अपशिष्ट तथा निर्माण एवं विध्वंस संबंधी अपशिष्ट—में वर्गीकृत किया गया है, जिनके लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पृथक नियम लागू हैं।
  • स्मार्ट सिटी मिशन: 60 से अधिक शहरों ने प्रौद्योगिकी-आधारित अपशिष्ट प्रबंधन समाधान अपनाए हैं, जिससे संग्रहण दक्षता, मार्ग अनुकूलन एवं दैनिक निगरानी में सुधार हुआ है।
  • स्वच्छ भारत मिशन (2014): इस मिशन का उद्देश्य नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन है, जबकि SBM-U 2.0 का लक्ष्य 2026 तक “कचरा मुक्त शहर” बनाना है।
  • अपशिष्ट-से-ऊर्जा कार्यक्रम: यह कार्यक्रम नगरपालिका एवं औद्योगिक ठोस अपशिष्ट को बिजली अथवा ऊष्मा में परिवर्तित करने को प्रोत्साहित करता है, जिससे लैंडफिल पर निर्भरता घटती है और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
    • स्रोत पर पृथक्करण: नियमों ने स्रोत पर पृथक्करण को अनिवार्य बनाया, जिसमें अपशिष्ट को जैव-अपघटनीय, गैर-जैव-अपघटनीय एवं घरेलू खतरनाक अपशिष्ट में वर्गीकृत किया गया।
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): इस ढाँचे के अंतर्गत उत्पादकों एवं ब्रांड स्वामियों को उत्तरदायी बनाया गया।
    • शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका: नगरपालिका प्राधिकरणों को 100 प्रतिशत संग्रहण, सुरक्षित परिवहन एवं वैज्ञानिक उपचार सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया।
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
    • इन नियमों में प्लास्टिक अपशिष्ट का स्रोत पर पृथक्करण, प्लास्टिक उपयोग में कमी तथा कचरे की रोकथाम का प्रावधान है।
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादकों, आयातकों एवं ब्रांड स्वामियों को प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रहण एवं पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित निपटान के लिए उत्तरदायी बनाया गया है।

वैश्विक पहलें

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण प्रौद्योगिकी केंद्र (IETC), जापान, विकासशील देशों को ई-अपशिष्ट, प्लास्टिक एवं कृषि जैव-अपशिष्ट सहित विशेष अपशिष्टों के पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित प्रबंधन में सहयोग प्रदान करता है।

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