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अंतरिक्ष शासन

Lokesh Pal April 03, 2026 02:00 29 0

संदर्भ

स्पेसएक्स (SpaceX) जैसे निजी अंतरिक्ष अभिकर्ताओं के तेजी से उदय ने कक्षीय संकुलन (Orbital Congestion) को जन्म दिया है, जबकि कमजोर शासन, निगरानी की कमी और बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty) जैसे ढाँचों के तहत केवल प्रक्षेपण-पूर्व प्रतिबद्धताओं पर निर्भरता, अंतरिक्ष स्थिरता और जवाबदेही में मौजूद कमियों को उजागर करती है।

अंतरिक्ष शासन (Space Governance) के बारे में

  • अवधारणा: अंतरिक्ष शासन से तात्पर्य अंतरराष्ट्रीय संधियों, प्रथागत मानदंडों, संस्थागत तंत्रों और घरेलू नियमों के उस व्यापक ढाँचे से है, जो बाहरी अंतरिक्ष में मानवीय गतिविधियों को निर्देशित और विनियमित करते हैं।
    • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरिक्ष का उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों, सामूहिक लाभ और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए किया जाए। साथ ही, जैसा कि बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty) में संहिताबद्ध है, यह सरकारी और निजी दोनों अभिकर्ताओं के लिए संबंधित राष्ट्रों को उत्तरदायित्व सौंपता है।
  • दायरा: अंतरिक्ष शासन का दायरा अब केवल राज्य-केंद्रित अन्वेषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक बहु-अभिकर्ता और बहु-आयामी क्षेत्र बन गया है, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित विषय आते हैं:
    • वाणिज्यिक और निजी भागीदारी: SpaceX जैसी फर्मों के नेतृत्व में उपग्रह समूहों (Satellite constellations), प्रक्षेपण सेवाओं और अंतरिक्ष-आधारित उद्योगों का तीव्र विकास।
    • रणनीतिक और सुरक्षा आयाम: सैन्य, निगरानी और दोहरे उपयोग के लिए अंतरिक्ष का बढ़ता उपयोग, जिससे शस्त्रीकरण की चिंताएँ बढ़ रही हैं।
    • पर्यावरणीय स्थिरता: अंतरिक्ष मलबे का प्रबंधन, कक्षीय संकुलन (Orbital congestion) और टकराव के जोखिम, जिसमें कक्षीय स्थान को एक सीमित पारिस्थितिकी संसाधन माना जाता है।
    • संसाधन उपयोग और उभरते क्षेत्र: क्षुद्रग्रह खनन, चंद्र अन्वेषण और अंतरिक्ष के संसाधनों के निष्कर्षण का शासन।
    • संचार और डेटा शासन: कक्षीय स्लॉट (Orbital slots), रेडियो स्पेक्ट्रम और उपग्रह-आधारित वैश्विक सेवाओं का विनियमन।
      • इस प्रकार, अंतरिक्ष शासन कानूनी, तकनीकी, आर्थिक, पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक आयामों तक विस्तृत है।
  • मुख्य विशेषताएँ 
    • वैश्विक साझा संसाधन अभिविन्यास: बाह्य अंतरिक्ष को एक गैर-संप्रभु क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो किसी राष्ट्रीय विनियोग के अधीन नहीं है, जिससे सभी की साझा पहुँच सुनिश्चित होती है।
    • राज्य की जिम्मेदारी और प्राधिकरण: राष्ट्र अपनी सीमाओं के भीतर निजी संस्थाओं द्वारा की जाने वाली गतिविधियों सहित सभी राष्ट्रीय अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेह हैं।
    • दायित्व और जोखिम आवंटन ढाँचा: अंतरिक्ष वस्तुओं द्वारा होने वाले नुकसान के मामले में क्षतिपूर्ति तंत्र मौजूद हैं, जैसा किलायबिलिटी कन्वेंशन’ (Liability Convention) में विस्तृत रूप से बताया गया है।
    • पंजीकरण के माध्यम से पारदर्शिता: पता लगाने की क्षमता बढ़ाने के लिए रजिस्ट्रेशन कन्वेंशन’ (Registration Convention) के तहत अंतरिक्ष वस्तुओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत और सूचित किया जाना अनिवार्य है।

    • सॉफ्ट लॉ (Soft Law) की प्रधानता: समकालीन शासन का एक खंड (विशेष रूप से अंतरिक्ष मलबे के शमन और स्थिरता पर) गैर-बाध्यकारी दिशानिर्देशों और स्वैच्छिक अनुपालन पर निर्भर करता है।
    • खंडित और विकेंद्रीकृत संरचना: शासन संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति (UNCOPUOS) जैसे कई निकायों में बिखरा हुआ है, जिसमें कोई केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण नहीं है, जिससे नियामक कमियाँ उत्पन्न होती हैं।

अंतरिक्ष शासन का ढाँचा

अंतरिक्ष शासन का ढाँचा कानूनी मानदंडों, संस्थागत तंत्रों, नियामक प्रणालियों और उभरते शासन उपकरणों की एक बहुस्तरीय वास्तुकला से बना है, जो राज्य-केंद्रित संधि व्यवस्था से एक खंडित, बहु-हितधारक प्रणाली में विकसित हो रहा है।

  • कानूनी आधार (संधि-आधारित ढाँचा): अंतरिक्ष शासन का कानूनी कोर संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाली संधियों पर आधारित है, जो बाहरी अंतरिक्ष गतिविधियों को संचालित करने वाले मौलिक सिद्धांतों को स्थापित करती हैं:
    • बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967): यह बाहरी अंतरिक्ष को एक गैर-विनियोज्य वैश्विक साझा संसाधन’ (Non-appropriable global commons) के रूप में परिभाषित करती है, जो शांतिपूर्ण उपयोग, अन्वेषण की स्वतंत्रता और सरकारी एवं गैर-सरकारी दोनों गतिविधियों के लिए राज्य की जिम्मेदारी अनिवार्य करती है।
    • लायबिलिटी कन्वेंशन’ (Liability Convention) (1972): यह एक दोहरे दायित्व शासन की स्थापना करता है, जो अंतरिक्ष वस्तुओं द्वारा होने वाले नुकसान के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
    • रजिस्ट्रेशन कन्वेंशन: यह अंतरिक्ष वस्तुओं के अनिवार्य पंजीकरण के माध्यम से पारदर्शिता और पता लगाने की क्षमता सुनिश्चित करता है।
      • हालाँकि, ये संधियाँ व्यापक, राज्य-केंद्रित और कमजोर रूप से लागू होने वाली बनी हुई हैं, जो तेजी से विकसित हो रहे अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं।
  • बाहरी अंतरिक्ष की कानूनी स्थिति: अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बाहरी अंतरिक्ष को एक वैश्विक साझा संसाधन के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिसकी विशेषताएँ हैं:
    • गैर-विनियोग सिद्धांत: संप्रभुता का कोई दावा नहीं किया जा सकता।
    • समस्त मानवता के लाभ के लिए उपयोग।
    • अन्वेषण और पहुँच की स्वतंत्रता।
      यह मानक आधार समानता सुनिश्चित करता है, लेकिन व्यवसायीकरण और रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा से चुनौतियों का सामना कर रहा है।
  • संस्थागत और बहुपक्षीय संरचना: अंतरिक्ष शासन अंतरराष्ट्रीय संगठनों और समन्वय तंत्रों के माध्यम से संचालित होता है:
    • संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति (UNCOPUOS): यह प्राथमिक मानक-निर्धारण निकाय के रूप में कार्य करती है, जो LTS (दीर्घकालिक स्थिरता) ढाँचे जैसे सर्वसम्मति-आधारित दिशा-निर्देश विकसित करती है।
    • संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष मामलों का कार्यालय (UNOOSA): यह संधि कार्यान्वयन, क्षमता निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करता है।
    • अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU): यह रेडियो स्पेक्ट्रम और कक्षीय स्लॉट आवंटन को नियंत्रित करता है, जो उपग्रह संचालन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
      • यह संरचना खंडित और सर्वसम्मति-संचालित बनी हुई है, जिसमें कोई केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण नहीं है।
  • सॉफ्ट लॉ और मानदंड-आधारित शासन: अंतरिक्ष शासन का एक बड़ा हिस्सा गैर-बाध्यकारी उपकरणों और स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों के माध्यम से संचालित होता है:
    • यूएन अंतरिक्ष मलबा शमन दिशा-निर्देश और दीर्घकालिक स्थिरता दिशा-निर्देश जैसे उपकरण परिचालन संबंधी सर्वोत्तम अभ्यास प्रदान करते हैं।
    • इनमें मलबे को कम करने, टकराव से बचने और डेटा साझाकरण पर मानदंड शामिल हैं।
      • इनकी स्वैच्छिक प्रकृति के कारण अनुपालन असमान होता है, जिससे जवाबदेही और प्रवर्तन में कमियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • राष्ट्रीय नियामक और लाइसेंसिंग ढाँचे: राष्ट्र अपने आंतरिक कानूनी तंत्र के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को लागू करते हैं, जो:
    • प्रक्षेपण और उपग्रह संचालन को अधिकृत और पर्यवेक्षित करते हैं।
    • तकनीकी, सुरक्षा और जीवन-अंत निपटान (End-of-life disposal) मानदंड लागू करते हैं।
    • राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र के तहत निजी क्षेत्र की भागीदारी को विनियमित करते हैं।
      • राष्ट्रीय नियमों में भिन्नता के कारण विनियामक विखंडन और ‘फोरम शॉपिंग’ की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे वैश्विक एकरूपता कमजोर पड़ती है।
  • बहु-अभिकर्ता शासन प्रणाली की ओर संक्रमण: अंतरिक्ष शासन अब एक बहु-हितधारक क्षेत्र में विकसित हो गया है, जिसमें शामिल हैं:-
    • निजी निगम।
    • वाणिज्यिक प्रक्षेपण प्रदाता।
    • उभरते हुए अंतरिक्ष यात्री राष्ट्र।
      • यह परिवर्तन जटिलता, नियामक अंतराल और समन्वित शासन तंत्र की आवश्यकता में बढोतरी करता है।
  • उभरते शासन तंत्र: समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए नए शासन उपकरण विकसित हो रहे हैं:-
    • अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM): संकुलन वाली कक्षाओं में वास्तविक समय में समन्वय और टकराव से बचने के लिए प्रणालियों का विकास।
    • अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA): कक्षीय वस्तुओं के लिए ट्रैकिंग, निगरानी और डेटा साझाकरण को बढ़ाना।
    • पर्यावरणीय और नैतिक ढाँचा: शासन मानदंडों में स्थिरता, एहतियात और अंतर-पीढ़ीगत समता (Intergenerational Equity) के सिद्धांतों को शामिल करना।

शासन के लिए स्थान की आवश्यकता

  • कक्षीय मलबा संकट और टकराव के जोखिम: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) अंतरिक्ष पर्यावरण रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 40,000 से अधिक वस्तुओं को सक्रिय रूप से ट्रैक किया जा रहा है, जबकि अनुमानित 130 मिलियन मलबे के टुकड़े कक्षा में मौजूद हैं, इनमें से कई इतने छोटे हैं कि उनकी निगरानी नहीं की जा सकती, लेकिन वे विनाशकारी क्षति पहुँचाने में सक्षम हैं।
    • लगातार होने वाले टकरावों का प्रभाव (केसलर सिंड्रोम) महत्त्वपूर्ण कक्षाओं को अनुपयोगी बना सकता है।
  • पर्यावरणीय स्थिरता और उभरती बाहरी चुनौतियाँ: उपग्रह समूहों (Constellations) में आए उछाल ने प्रकाश प्रदूषण उत्पन्न किया है, जो 40-96% तक टेलीस्कोप अवलोकनों को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही हालिया नासा (NASA) के नेतृत्व वाले अध्ययनों में पुनः प्रवेश और रॉकेट उत्सर्जन से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण पर भी चिंता जताई गई है।
    • यह अंतरिक्ष को एक सीमित पारिस्थितिकी संसाधन के रूप में मानने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • बढ़ता संकुलन और अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) की आवश्यकता: रिकॉर्ड प्रक्षेपण दरों (जैसे- वर्ष 2025 में प्रत्येक ~2 दिनों में होने वाले प्रक्षेपण, जो मुख्य रूप से निजी कंपनियों द्वारा संचालित हैं) के साथ, कक्षीय क्षेत्र [विशेष रूप से निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO)] तेजी से संकुल वाले होते जा रहे हैं।
    • इसके लिए मजबूत अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) ढाँचे की आवश्यकता है।
  • सुरक्षा, सैन्यीकरण और रणनीतिक स्थिरता: दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों के प्रसार और एंटी-सैटेलाइट (ASAT) परीक्षणों (जैसे- रूस का नुडोल परीक्षण) से मलबा बढ़ता है और रणनीतिक विश्वास कम होता है, जिससे बाहरी अंतरिक्ष में संघर्ष फैलने का जोखिम बढ़ जाता है।
  • समान पहुँच और वैश्विक साझा संसाधन की चिंताएँ: सीमित कक्षीय स्लॉट और रेडियो स्पेक्ट्रम, जो अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) द्वारा समन्वित किए जाते हैं, पर कुछ उन्नत देशों और निगमों के प्रभुत्व का जोखिम है। यह संभावित रूप से ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) और नए प्रवेशकों को हाशिए पर धकेल सकता है।
  • जवाबदेही, दायित्व और शासन की कमी: मौजूदा ढाँचों में प्रक्षेपण के बाद निगरानी और सत्यापन तंत्र का अभाव है। नियामक अक्सर ऑपरेटरों द्वारा स्व-घोषित अनुपालन पर निर्भर रहते हैं, जिससे दायित्व निर्धारण और प्रवर्तन में कमियाँ रह जाती हैं।
  • अंतरिक्ष के तीव्र व्यावसायीकरण का प्रबंधन: SpaceX जैसे निजी अभिकर्ताओं और मेगा-कॉन्स्टेलेशन (विशाल उपग्रह समूहों) के विस्तार ने अंतरिक्ष को एक उच्च-मूल्य वाले आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया है। इसके लिए नवाचार, प्रतिस्पर्द्धा और दीर्घकालिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने वाले शासन की आवश्यकता है।

अंतरिक्ष शासन में भारत की पहल और कार्य

  • संस्थागत तंत्र
    • मिशन-उन्मुख से शासन दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन: भारत धीरे-धीरे पूरी तरह से वैज्ञानिक और मिशन-उन्मुख अंतरिक्ष कार्यक्रम से हटकर अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) पर केंद्रित एक शासन-संचालित दृष्टिकोण की ओर बढ़ा है। यह अंतरिक्ष गतिविधियों की निरंतर निगरानी की आवश्यकता को दर्शाता है।
    • IS4OM: नोडल SSA केंद्र के रूप में: इस दिशा में, वर्ष 2022 में स्थापित IS4OM (सुरक्षित और टिकाऊ अंतरिक्ष संचालन प्रबंधन के लिए इसरो प्रणाली), कक्षीय मलबे की ट्रैकिंग, टक्कर निवारण प्रणाली (Collision Avoidance Analysis-COLA) और भारतीय अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा के लिए वैश्विक एजेंसियों के साथ समन्वय करने हेतु नोडल केंद्र के रूप में कार्य करता है।
    • स्वदेशी ट्रैकिंग क्षमता के लिए ‘प्रोजेक्ट नेत्रा’ (Project NETRA): इसी के पूरक के रूप में, प्रोजेक्ट नेत्रा (Network for Space Object Tracking and Analysis) को रडार और टेलीस्कोप का उपयोग करके एक स्वदेशी पूर्व-चेतावनी प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य संयुक्त राज्य अमेरिका के स्पेस कमांड जैसे विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता को कम करना है।
  • नीति एवं नियामक पहल
    • वैश्विक मानदंडों के साथ संरेखण और रणनीतिक स्वायत्तता: भारत एक सक्रिय शासन दृष्टिकोण का संकेत देते हुए, अपनी रणनीतिक और नियामक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अपने घरेलू ढाँचे को उभरते वैश्विक मानकों के साथ संरेखित कर रहा है।
    • मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM) 2030: मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM) 2030 भविष्य के सभी सार्वजनिक और निजी मिशनों में ‘शून्य-मलबा उत्पादन’ (Zero-debris generation) प्राप्त करने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
    • IN-SPACe के माध्यम से दिशा-निर्देश और नियामक निरीक्षण: राष्ट्रीय अंतरिक्ष मलबा शमन दिशा-निर्देश, जो संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति (UNCOPUOS) और इंटर-एजेंसी स्पेस डेब्रिस कोऑर्डिनेशन कमेटी (IADC) के मानकों पर आधारित हैं, उनमें मिशन-उपरांत निपटान’ (Post-Mission Disposal – PMD) मानदंडों को शामिल किया गया है।
      • इसके अतिरिक्त, IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन और प्राधिकरण केंद्र) एक सिंगल-विंडो नियामक के रूप में कार्य करता है, जो लाइसेंसिंग, स्थिरता और अनुपालन आवश्यकताओं को एकीकृत करता है।
  • मलबे को कम करने और सतत संचालन के लिए तकनीकी नवाचार
    • सक्रिय मलबा शमन प्रौद्योगिकियों की ओर परिवर्तन: भारत दीर्घकालिक कक्षीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए केवल निष्क्रिय निगरानी से आगे बढ़कर सक्रिय तकनीकी समाधानों की ओर बढ़ रहा है।
    • SpaDeX और भविष्य का सक्रिय मलबा हटाना (ADR): SpaDeX (स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट) स्वायत्त मिलन स्थल और डॉकिंग क्षमताओं का प्रदर्शन करता है, जो सक्रिय मलबा हटाने (ADR) और ऑन-ऑर्बिट सर्विसिंग के लिए तकनीकी आधार तैयार करता है।
    • PS4 ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM) नवाचार: POEM एक अभिनव दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है, जिसमें PSLV के इस्तेमाल किए जा चुके चौथे चरण को एक कार्यात्मक कक्षीय मंच के रूप में पुनः उपयोग में लाया जाता है। इससे मलबे में कमी आती है और संसाधन दक्षता बढ़ती है।
  • क्षमता निर्माण और स्वदेशी क्षमता विकास
    • स्वदेशी SSA क्षमताओं को मजबूत करना: भारत घरेलू ट्रैकिंग बुनियादी ढाँचे, SSA प्रणालियों और वास्तविक समय के कक्षीय विश्लेषण में निवेश कर रहा है, जिससे इसकी स्वतंत्र निगरानी क्षमता मजबूत हो रही है।
    • विनियमन के साथ निजी भागीदारी का संतुलन: इसके साथ ही, भारत नियामक निरीक्षण के तहत निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वाणिज्यिक विस्तार सुरक्षा, जवाबदेही और स्थिरता के मानकों के अनुरूप हो।
  • वैश्विक नेतृत्व और मानक उद्यमिता
    • बहुपक्षीय शासन मंचों में सक्रिय भूमिका: भारत एक ‘मानक उद्यमी’ के रूप में उभर रहा है, जो संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति (UNCOPUOS) जैसे मंचों में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है और दीर्घकालिक स्थिरता (LTS) दिशा-निर्देशों जैसे ढाँचों में योगदान दे रहा है।
    • समावेशी और भविष्योन्मुखी मानदंडों को आकार देना: भारत का दृष्टिकोण केवल अनुपालन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक मानदंडों को इस तरह आकार देना चाहता है जो संतुलित, समावेशी और भविष्योन्मुखी हों।
  • ग्लोबल साउथ परिप्रेक्ष्य और समानता-आधारित वकालत
    • अंतरिक्ष शासन में समानता की वकालत: भारत निरंतर न्यायसंगत और समावेशी शासन पर जोर देता है, विशेष रूप से विकासशील और उभरते हुए अंतरिक्ष यात्री राष्ट्रों के लिए।
    • साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (CBDR) दृष्टिकोण: भारत का तर्क है कि ऐतिहासिक रूप से प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों को मलबा शमन के लिए अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए, जो निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों को दर्शाता है।
    • पहुँच, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी साझाकरण को बढ़ावा देना: भारत कक्षीय संसाधनों तक उचित पहुँच, क्षमता निर्माण सहायता और प्रौद्योगिकी साझाकरण तंत्र की वकालत करता है, ताकि अंतरिक्ष के लाभ व्यापक रूप से वितरित किए जा सकें।

जिन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है

  • कमजोर प्रवर्तन और सत्यापन की कमी: कक्षीय ऑडिट करने या अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कोई केंद्रीय वैश्विक प्राधिकरण नहीं है, जिसके कारण उपग्रह संचालकों को स्व-प्रमाणीकरण पर निर्भर रहना पड़ता है।
    • बाह्य अंतरिक्ष संधि जैसे मौजूदा ढाँचों में बाध्यकारी प्रवर्तन और निगरानी तंत्रों का अभाव है, जिससे शासन में एक महत्त्वपूर्ण खामी उत्पन्न होती है।
  • कक्षीय संकुलन, अंतरिक्ष मलबा और कक्षीय भिन्नता: उपग्रह प्रक्षेपणों में वृद्धि (विशेष रूप से मेगा-कॉन्स्टेलेशन) ने टकराव के जोखिम और मलबे के संचय को बढ़ा दिया है।
    • क्रमिक टकराव की स्थिति, जिसे ‘केसलर सिंड्रोम’ के नाम से जाना जाता है, कक्षाओं की स्थिरता के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
    • अलग-अलग कक्षाओं में चुनौतियाँ भी अलग-अलग होती हैं- ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (LEO) में भारी भीड़भाड़ की समस्या है (जैसे- स्टारलिंक समूह), जबकि ‘जियोस्टेशनरी ऑर्बिट’ (GEO) में कक्षाओं के लिए सीमित जगह और स्पेक्ट्रम की कमी जैसी बाधाएँ हैं।
  • वैश्विक अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) का अभाव और डेटा विषमता: वास्तविक समय समन्वय और टकराव से बचाव के लिए कोई सर्वमान्य अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) ढाँचा मौजूद नहीं है।
    • इसके अलावा, व्यावसायिक गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) डेटा तक पहुँच अक्सर प्रतिबंधित रहती है, जिससे सूचना विषमता और उच्च जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • खंडित विनियम और विनियामक मध्यस्थता: विभिन्न राष्ट्रीय लाइसेंसिंग व्यवस्थाएँ ऑपरेटरों को “फोरम शॉपिंग” में संलग्न होने की अनुमति देती हैं, जिससे वे कठोर स्थिरता मानदंडों को दरकिनार करने के लिए उदार विनियामक मानकों वाले क्षेत्राधिकारों में पंजीकरण करते हैं और इस प्रकार वैश्विक शासन सामंजस्य को कमजोर करते हैं।
  • दायित्व, जवाबदेही और श्रेय निर्धारण से जुड़ी चुनौतियाँ: मलबे के स्रोत की पहचान करना और किसी की गलती साबित करना अब भी मुश्किल बना हुआ है, विशेष तौर पर छोटे या जिन टुकड़ों पर नजर नहीं रखी गई है, उनके मामले में, जिससे ‘लायबिलिटी कन्वेंशन’ (Liability Convention) जैसे दायित्व-निर्धारण के ढाँचों की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
  • सैन्यीकरण और अनियंत्रित व्यावसायीकरण: दोहरे उपयोग वाली तकनीकों और एंटी-सैटेलाइट (ASAT) परीक्षणों [जैसे- रूस का वर्ष 2021 का नुडोल (Nudol) परीक्षण] के बढ़ने से अंतरिक्ष में मलबा और रणनीतिक तनाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही, SpaceX जैसी निजी संस्थाओं के तेजी से विस्तार के कारण, पर्याप्त वैश्विक निगरानी के अभाव में, कक्षाओं में संकुलन, बाजार का कुछ हितधारकों में संकेंद्रण और स्थिरता से जुड़ी चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं।

आगे की राह

  • एक बाध्यकारी वैश्विक शासन ढाँचा स्थापित करना: संयुक्त राष्ट्र की बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर समिति’ जैसे मंचों के तहत, स्वैच्छिक मानदंडों से आगे बढ़कर कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय नियम विकसित किए जाने चाहिए; इनमें मलबे को कम करने के लिए मानकीकृत सीमाएँ, अनुपालन की बाध्यताएँ और उल्लंघन करने पर प्रतिबंध शामिल होने चाहिए।
  • वैश्विक सत्यापन और निगरानी तंत्र बनाना: ऑन-ऑर्बिट ऑडिट और अनुपालन सत्यापन के लिए एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय प्रणाली स्थापित करना। इसमें अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) नेटवर्क का उपयोग करके ‘मिशन-अंत निपटान’ (End-of-life disposal) और टकराव बचाव जैसी प्रतिबद्धताओं की निगरानी की जानी चाहिए।
  • व्यापक अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) शासन विकसित करना: बढ़ते कक्षीय संकुलन को प्रबंधित करने के लिए वास्तविक समय डेटा साझाकरण, टकराव बचाव प्रोटोकॉल और अनिवार्य समन्वय तंत्र के साथ एक वैश्विक स्तर पर समन्वित अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (STM) ढाँचा स्थापित करना।
  • राष्ट्रीय नियमों में सामंजस्य स्थापित करें और विनियामक मनमानी को रोकना: विभिन्न देशों में लाइसेंसिंग मानदंडों, दायित्व प्रावधानों और स्थिरता संबंधी आवश्यकताओं को मानकीकृत करना, ताकि ‘फोरम शॉपिंग’ (सुविधाजनक मंच की तलाश) को रोका जा सके और सभी संचालकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित किए जा सकें।
  • दायित्व और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना: लायबिलिटी कन्वेंशन (Liability Convention) जैसे मौजूदा ढांचों को अद्यतन करना ताकि संचयी नुकसान, छोटे मलबे के स्रोत का निर्धारण और साझा जिम्मेदारी जैसे मुद्दों को संबोधित किया जा सके। इसके लिए बीमा मॉडल और प्रदूषक भुगतान करे” (Polluter Pays) जैसे सिद्धांतों को अपनाया जा सकता है।
  • पारदर्शिता और ओपन डेटा साझाकरण को बढ़ावा देना: राष्ट्रों और निजी अभिकर्ताओं के मध्य SSA डेटा के अनिवार्य साझाकरण को प्रोत्साहित करना। सुरक्षा चिंताओं को संतुलित करते हुए सूचना की विषमता को कम करना और टकराव बचाव क्षमताओं को बढ़ाना।
  • पर्यावरणीय और नैतिक सिद्धांतों को एकीकृत करना: अंतरिक्ष शासन में सावधानी, निरंतरता और अंतर-पीढ़ीगत समानता जैसे सिद्धांतों को शामिल करना और कक्षीय अंतरिक्ष को एक सीमित पारिस्थितिक संसाधन के रूप में देखना जिसकी उचित देखभाल और प्रबंधन की आवश्यकता है।
  • वाणिज्यिक विस्तार और ‘मेगा-कॉन्स्टेलेशन’ का विनियमन: SpaceX जैसी कंपनियों के बड़े उपग्रह समूहों के लिए कैप (सीमा), जोनिंग तंत्र और कठोर अनुमोदन मानदंड लागू करना ताकि अत्यधिक संकुलन को रोका जा सके और समान पहुँच सुनिश्चित की जा सके।
  • भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत करना: जैसे-जैसे भारत अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं का विस्तार कर रहा है, उसे मजबूत घरेलू कानून विकसित करने चाहिए, जिम्मेदार लाइसेंसिंग प्रथाओं को बढ़ावा देना चाहिए और न्यायसंगत एवं टिकाऊ अंतरिक्ष शासन के लिए ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की वकालत का नेतृत्व करना चाहिए।

निष्कर्ष

पृथ्वी की कक्षाओं में बढ़ता संकुलन तीव्र तकनीकी प्रगति और संस्थागत अनुकूलन की धीमी गति के बीच असंतुलन का प्रत्यक्ष परिणाम है। पूर्वानुमानित और लागू करने योग्य शासन की दिशा में एक प्रतिमान परिवर्तन आवश्यक है। अंतरिक्ष की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय केवल मौखिक प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़कर ठोस, जवाबदेह कार्रवाई करे जो भावी पीढ़ियों के लिए कक्षीय पर्यावरण को संरक्षित रखे।

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