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अंतरिक्ष-तकनीक अर्थव्यवस्था

Lokesh Pal January 27, 2026 02:56 22 0

संदर्भ:

भारत स्पेसटेक-2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के वर्ष 2030 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी स्पेस-टेक अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान है। इसका शीर्षक भारत की अंतरिक्ष यात्रा” (India’s Space Odyssey) है (और जिसे वेंचर कैपिटल फर्म आर्कम वेंचर्स द्वारा जारी किया गया)।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु 

  • मुख्य अनुमान
    • अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के वर्ष 2030 तक (13 अरब डॉलर से) बढ़कर 40 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
    • वैश्विक रैंकिंग: पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक परिवर्तन के कारण वर्ष 2030 तक भारत के वैश्विक स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी स्पेस-टेक अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान है।
    • वृद्धि दर: इस क्षेत्र के वैश्विक औसत वृद्धि दर से दोगुनी गति से बढ़ने का पूर्वानुमान है।
    • निवेश अनुमान: रिपोर्ट के अनुसार, अगले पाँच वर्षों में भारतीय स्पेसटेक स्टार्ट-अप्स में 3 से 3.5 अरब डॉलर का वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी निवेश आने का अनुमान है।
  • अंतरिक्ष तकनीक विकास के प्रमुख चालक
    • लागत-कुशल इंजीनियरिंग: भारत की मितव्ययी अभियांत्रिकी की परंपरा ने अंतरिक्ष अभियानों में कम लागत पर उच्च प्रभाव वाले समाधान संभव किए हैं।
    • मजबूत विनिर्माण क्षमताएँ: सशक्त घरेलू विनिर्माण आधार एंड-टू-एंड स्पेस-टेक विकास को समर्थन प्रदान करता है।
    • स्टार्ट-अप आधारित नवाचार: स्टार्ट-अप्स की नई पीढ़ी वैश्विक ग्राहकों के लिए उन्नत अंतरिक्ष तकनीकों का विकास कर रही है।
  • निवेशकों का बदलता ध्यान
    • लॉन्च हार्डवेयर से आगे बढ़ना: जैसे-जैसे सैटेलाइट डेटा व्यावसायिक रूप से अधिक व्यवहार्य होता जा रहा है, निवेशकों की रुचि पूँजी-गहन लॉन्च प्रणालियों से हटकर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो रही है।
    • विकास के क्षेत्र: स्पेस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर आधारित डेटा प्लेटफॉर्म, एनालिटिक्स, क्लाइमेट इंटेलिजेंस और एप्लिकेशन-लेयर समाधान पर ध्यान बढ़ रहा है।
    • रणनीतिक परिवर्तन: वित्तपोषण अब केवल लॉन्च वाहनों तक सीमित न रहकर, एप्लिकेशन और इंटेलिजेंस लेयर्स के अधिक निकट जा रहा है।
  • स्टार्ट-अप इकोसिस्टम
    • स्टार्ट-अप्स का पैमाना: विगत पाँच वर्षों में 300 से अधिक स्पेस-टेक स्टार्ट-अप्स उभरकर सामने आए हैं।
    • प्रमुख क्षेत्र: ये स्टार्ट-अप्स सैटेलाइट निर्माण, पृथ्वी अवलोकन, लॉन्च वाहन और इन-स्पेस समाधान जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
    • नीति प्रेरक तत्त्व: भारत की अंतरिक्ष नीति के निर्माण के बाद, भारतीय स्पेस-टेक क्षेत्र में आने वाला दो-तिहाई से अधिक पूँजी प्रवाह विगत पाँच वर्षों में हुआ है।
  • भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता
    • शीर्ष वैश्विक अभिकर्ता : रिपोर्ट के अनुसार, स्पेस-टेक मूल्य शृंखला में विश्व की शीर्ष 10 कंपनियों में पाँच भारतीय कंपनियों के शामिल होने का अनुमान है।
    • नेतृत्व के क्षेत्र: इनमें प्रक्षेपण यान, अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता, पृथ्वी अवलोकन उपग्रह  निर्माण और अंतरिक्ष मलबा प्रबंधन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • संचालन संबंधी पूर्वानुमान
    • प्रक्षेपण सेवाएँ: भारतीय निजी अभिकर्ता वैश्विक ग्राहकों के लिए वार्षिक रूप से 40–45 प्रक्षेपण करने की संभावना रखते हैं।
    • सैटेलाइट विनिर्माण: भारत विश्व के पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के एक-तिहाई का निर्माण कर सकता है।
    • निर्यात: भारतीय कंपनियाँ वैमानिकी, वैश्विक नौवहन उपग्रह प्रणाली (GNSS), उपग्रह संचार और ग्राउंड रेडियो फ्रिक्वेंसी सिस्टम्स के प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरने की संभावना रखती हैं।

अंतरिक्ष-तकनीक अर्थव्यवस्था

स्पेस-टेक अर्थव्यवस्था उस आर्थिक गतिविधियों, उद्योगों और सेवाओं को संदर्भित करती है, जो अंतरिक्ष तकनीकों और अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों जैसे उपग्रह, प्रक्षेपण यान, ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन से उत्पन्न होती हैं।

  • मुख्य घटक
    • अपस्ट्रीम सेगमेंट
      • उपग्रह  विनिर्माण
      • प्रक्षेपण सेवाएँ (रॉकेट, स्पेसपोर्ट)
      • अंतरिक्ष यान के घटक और प्रणोदन
    • मिडस्ट्रीम सेगमेंट
      • ग्राउंड स्टेशन
      • सैटेलाइट नियंत्रण, डेटा रिले, अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता
    • डाउनस्ट्रीम सेगमेंट: सैटेलाइट आधारित सेवाएँ जैसे:
      • संचार (टीवी, इंटरनेट, 5G बैकहॉल)
      • नेविगेशन (GPS, NavIC)
      • पृथ्वी अवलोकन (कृषि, आपदा प्रबंधन, जलवायु निगरानी)
      • रक्षा एवं सुरक्षा अनुप्रयोग।

प्रमुख भारतीय अंतरिक्ष-तकनीक स्टार्ट-अप और नवाचार

  • स्काइरूट एयरोस्पेस: यह पहली निजी भारतीय कंपनी बनी, जिसने वर्ष 2022 में विक्रम-एस रॉकेट लॉन्च किया; वर्तमान में यह विक्रम-आई विकसित कर रही है, जो कार्बन-कंपोजिट चरण और त्वरित निर्माण तकनीक का उपयोग करने वाला एक व्यावसायिक कक्षीय प्रक्षेपक होगा।
  • अग्निकुल कॉस्मॉस: इन्होंने अग्निबाण विकसित किया, जो विश्व के पहले पूरी तरह 3D-प्रिंटेड सिंगल-पीस रॉकेट इंजन द्वारा संचालित है, जिसे चेन्नई में बनाया गया; यह श्रीहरिकोटा में भारत का पहला निजी लॉन्चपैड भी संचालित करती है।
  • पिक्सल (Pixel): यह विश्व की पहली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट कंसटेलेशन में से एक का निर्माण कर रहा है, जो कृषि, जलवायु मॉडलिंग, ESG निगरानी और प्रदूषण ट्रैकिंग में सहायता करता है; तथा इसने NASA के साथ होस्टेड पेलोड मिशन्स के लिए साझेदारी भी की है।
  • ध्रुव स्पेस (Dhruva Space): यह सैटेलाइट हार्डवेयर, मिशन इंटीग्रेशन, मॉड्यूलर सैटेलाइट बस, डिप्लॉयर और ऑनबोर्ड कंप्यूटर पर केंद्रित है तथा कक्षा में डेमोंस्ट्रेशन मिशन का समर्थन करता है।

भारत में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदम

  • भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: यह नीति ISRO, IN-SPACe और निजी अभिकर्ताओं की भूमिकाएँ निर्धारित करती है, वाणिज्यीकरण तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर जोर देती है, जबकि ISRO रणनीतिक मिशनों पर केंद्रित रहेगा।
    • अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का उदारीकरण
      • सैटेलाइट कंपोनेंट्स, उप-प्रणालियाँ (Subsystems), ग्राउंड सेगमेंट और उपयोगकर्ता खंड के निर्माण हेतु स्वचालित मार्ग से 100% FDI अनुमत है।
      • पूर्ण सैटेलाइट के निर्माण और संचालन के लिए स्वचालित मार्ग से 74% तक FDI की अनुमति है; इस सीमा से अधिक निवेश हेतु सरकारी मंजूरी आवश्यक होगी।
  • IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रचार और प्राधिकरण केंद्र): IN-SPACe भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए एकल-खिड़की नियामक और सुविधा प्रदान करने वाला निकाय है, जो नीति स्पष्टता, अनुमतियाँ और मार्गदर्शन सहायता प्रदान करता है।
  • न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL): यह ISRO की वाणिज्यिक शाखा के रूप में कार्य करती है और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों, सैटेलाइट लॉन्च तथा सेवाओं का व्यावसायीकरण करने की जिम्मेदारी निभाती है, जिससे भारत की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में उपस्थिति का विस्तार होता है।
  • बजट समर्थन: केंद्रीय बजट 2025–26 में, सरकार ने अंतरिक्ष विभाग के लिए लगभग ₹13,416 करोड़ का आवंटन किया, जो अंतरिक्ष अवसंरचना, अनुसंधान और रणनीतिक मिशनों में निरंतर सार्वजनिक निवेश को दर्शाता है।
  • रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) और DSRO: भारत ने वर्ष 2019 में रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) और रक्षा अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (DSRO) की स्थापना की, ताकि अंतरिक्ष संसाधनों के सैन्य उपयोग का समन्वय किया जा सके और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए नागरिक अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का एकीकरण सुनिश्चित हो।

  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी परिदृश्य
    • स्पेसएक्स प्रभुत्व: स्पेसएक्स ने वर्ष 2024 में 134 और वर्ष 2025 में 165 कक्षीय प्रक्षेपण किए, जिनमें अधिकांश स्टारलिंक कंसटेलेशन को तैनात किए गए।
    • रॉकेट लैब: अमेरिका स्थित रॉकेट लैब ने वर्ष 2025 में 21 कक्षीय प्रक्षेपण किए, जो इसका वार्षिक  उच्चतम रिकॉर्ड है।
  • भारत में स्थिति
    • वर्तमान प्रक्षेपण क्षमता: भारत वर्तमान में प्रति वर्ष केवल 5–6 प्रमुख प्रक्षेपण करता है, जिनका नेतृत्व मुख्यतः ISRO द्वारा किया जाता है।

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