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सर्वोच्च न्यायालय की ‘कार्यवाहक’ डीजीपी नियुक्त करने की प्रथा पर आपत्ति

Lokesh Pal February 10, 2026 05:19 5 0

संदर्भ 

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों द्वारा लगातार ‘कार्यवाहक’ DGP पर निर्भरता पर चिंता जताई और प्रकाश सिंह (2006) वाद से संबंधी पुलिस सुधार निर्णय के अनिवार्य अनुपालन को दोहराया।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चिह्नित प्रमुख मुद्दे

  • राज्य जानबूझकर UPSC को प्रस्ताव भेजने में देरी कर रहे हैं, ताकि निश्चित कार्यकाल वाले नियमित DGP की नियुक्ति से बचा जा सके।
    • तेलंगाना में अंतिम नियमित DGP की नियुक्ति नवंबर 2015 में हुई थी और अधिकारी नवंबर 2017 में सेवानिवृत्त हुए।
  • कार्यवाहक” DGP की नियुक्ति की प्रथा पुलिस की स्वतंत्रता को कमजोर करती है और बाध्यकारी न्यायिक निर्देशों का उल्लंघन करती है।
  • मनमाने और विलंबित नियुक्तियों के कारण योग्य वरिष्ठ IPS अधिकारियों को कॅरियर के अवसरों से वंचित होना पड़ता है।
  • पुलिस नेतृत्व में राजनीतिक हस्तक्षेप कानून के शासन और आंतरिक सुरक्षा प्रशासन को कमजोर करता है।

DGP नियुक्तियों पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेश

  • प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006): सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने और जवाबदेही बढ़ाने हेतु पुलिस सुधारों के लिए सात अनिवार्य निर्देश जारी किए।
    • राज्य सुरक्षा आयोग: सरकार द्वारा अनुचित प्रभाव से बचाव सुनिश्चित करने हेतु आयोग का गठन।
    • न्यूनतम कार्यकाल: DGP का चयन योग्यता-आधारित, पारदर्शी प्रक्रिया से, न्यूनतम कार्यकाल के साथ।
    • निश्चित कार्यकाल: परिचालन दायित्वों पर तैनात पुलिस अधिकारियों को न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल।
    • कार्यात्मक पृथक्करण: जाँच और कानून-व्यवस्था कार्यों का पृथक्करण।
    • स्थापना बोर्ड: स्थानांतरण, पदस्थापन और पदोन्नति के लिए पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन।
    • शिकायत प्राधिकरण: दुराचार के मामलों के लिए राज्य एवं जिला पुलिस शिकायत प्राधिकरण की स्थापना।
    • राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (NSC): केंद्रीय पुलिस बलों के प्रमुखों के चयन हेतु आयोग का गठन।
  • SC आदेश (2018 एवं 2019): सर्वोच्च न्यायालय ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए UPSC के नेतृत्व में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पैनल गठन हेतु स्पष्ट समय-सीमा, पात्रता मानदंड और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय निर्धारित किए।
  • अनुच्छेद-142 की शक्तियाँ: न्यायालय द्वारा पुलिस सुधारों को लागू करने तथा नियुक्तियों और स्थानांतरणों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए अनुच्छेद-142 का प्रयोग किया गया है।
  • हालिया आदेश (2026): सर्वोच्च न्यायालय ने UPSC की भूमिका को सशक्त करते हुए उसे यह अधिकार दिया कि वह राज्यों द्वारा पैनल प्रस्तावों में देरी या रोक लगाए जाने की स्थिति में स्पष्टीकरण माँग सके और अनुपालन न होने के कारणों के बारे में जान सके।

पुलिस महानिदेशक (DGP) के बारे में

  • पुलिस महानिदेशक (DGP) राज्य का सर्वोच्च रैंक वाला पुलिस अधिकारी होता है, जो राज्य पुलिस बल के समग्र प्रशासन, पर्यवेक्षण और परिचालन नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होता है।
  • पात्रता एवं अनुभव
    • कानून-व्यवस्था, अपराध जाँच, खुफिया, या आर्थिक अपराधों में व्यापक अनुभव वाला वरिष्ठ IPS अधिकारी होना आवश्यक है।
    • UPSC दिशा-निर्देशों के अनुसार, कार्यकाल की स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु न्यूनतम शेष सेवा अवधि आवश्यक है।
  • नियुक्ति प्रक्रिया
    • राज्य सरकार, वर्तमान DGP की सेवानिवृत्ति से तीन महीने पूर्व UPSC को प्रस्ताव भेजती है।
    • UPSC तीन सबसे वरिष्ठ और योग्य अधिकारियों का पैनल तैयार करता है।
    • राज्य सरकार पैनल में से एक अधिकारी को नियमित DGP के रूप में नियुक्त करती है।
  • भूमिका एवं कार्य
    • सार्वजनिक व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना।
    • पुलिसिंग मानकों, जाँच और बल अनुशासन का पर्यवेक्षण।
    • राजनीतिक कार्यपालिका और पुलिस प्रशासन के बीच प्रमुख सेतु के रूप में कार्य करना।
  • राज्यों की शक्तियाँ
    • पुलिस राज्य सूची (सूची II, सातवीं अनुसूची) का विषय है।
    • पुलिस का अधीक्षण पुलिस अधिनियम, 1861 के तहत राज्य सरकार में निहित है, किंतु यह संवैधानिक और न्यायिक सीमाओं के अधीन है।

निष्कर्ष

पुलिस सुधार निर्देशों का लगातार अनुपालन न होना संस्थागत स्वायत्तता को कमजोर करता है; पेशेवर पुलिसिंग, लोकतांत्रिक जवाबदेही और विधि के शासन के लिए नियमित DGP की नियुक्ति सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

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