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सर्वोच्च न्यायालय का मानव-केंद्रित से पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन

Lokesh Pal April 03, 2025 03:36 18 0

संदर्भ

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने पर्यावरण न्यायशास्त्र में पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने में भारत की अग्रणी भूमिका पर प्रकाश डाला है।

संबंधित तथ्य

  • उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत पहला देश है, जहाँ न्यायालय ने मानव-केंद्रित दृष्टिकोण से पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है। 
  • यह बदलाव भारत के सांस्कृतिक लोकाचार के अनुरूप है, जो प्रकृति को मानव शोषण के लिए संसाधन के बजाय एक जीवित इकाई मानता है।

सर्वोच्च न्यायालय का पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर झुकाव

  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने औपचारिक रूप से इस परिवर्तन को स्वीकार किया, जो जमीनी स्तर पर पर्यावरण संबंधी चिंताओं और प्रकृति का सम्मान करने वाले पारंपरिक भारतीय दर्शन से प्रेरित है।
  • इस दृष्टिकोण ने कानूनी निर्णयों को प्रभावित किया है, जिसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जिनमें न्यायालयों ने नदियों और जंगलों को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानूनी व्यक्तित्व के रूप में मान्यता प्रदान की है।

मानव-केंद्रित और पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण  की तुलना

पहलू

मानव-केंद्रित दृष्टिकोण (Anthropocentric Approach)

पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण  (Eco-Centric Approach)

दार्शनिक आधार मनुष्य को पृथ्वी पर केंद्रीय एवं सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई के रूप में देखता है। प्रकृति को आंतरिक रूप से मूल्यवान तथा मानवीय उपयोगिता से स्वतंत्र मानता है।
पर्यावरण संरक्षण पर्यावरण की रक्षा मुख्यतः मानव लाभ के लिए की जाती है (जैसे- संसाधनों का उपयोग, आर्थिक विकास)। संतुलन और स्थिरता सुनिश्चित करते हुए, पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा करना।
कानूनी ढाँचा  पर्यावरण कानून प्रदूषण को विनियमित करने और मानव कल्याण के लिए संसाधनों के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। कानून प्रकृति को कानूनी व्यक्तित्व प्रदान करते हैं तथा यह सुनिश्चित करते हैं कि उसके अधिकार अस्तित्त्व में रहें।
निर्णय लेना विकास परियोजनाएँ पारिस्थितिक चिंताओं की तुलना में आर्थिक और सामाजिक लाभों को प्राथमिकता देती हैं। पर्यावरणीय प्रभाव नीति-निर्माण और विकास में एक प्राथमिक कारक है।
नैतिक जिम्मेदारी मनुष्य प्रकृति के नियंत्रक और शोषक के रूप में कार्य करते हैं। मनुष्य पर्यावरण के रखवाले और संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं।

मानव-केंद्रित दृष्टिकोण की चुनौतियाँ

  • संसाधन दोहन: मानवीय लाभों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने से संसाधनों का असंवहनीय दोहन, वनों की कटाई और प्रदूषण हुआ है।
  • जलवायु परिवर्तन: मानवजनित गतिविधियों ने वैश्विक तापमान में वृद्धि की है, जिससे चरम मौसम की घटनाएँ और जैव विविधता का नुकसान हुआ है।
  • कानूनी सीमाएँ: पर्यावरण कानून अक्सर आर्थिक विकास को प्राथमिकता देते हैं, जिससे कठोर संरक्षण उपायों को लागू करना जटिल हो जाता है।
  • प्रकृति के प्रतिनिधित्व का अभाव: चूँकि प्रकृति का कोई प्रत्यक्ष कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं है, इसलिए नीतिगत निर्णयों में अक्सर इसके हितों की अनदेखी की जाती है।

पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थन करने वाले भारतीय संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-48-A: राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा करने का निर्देश देता है।
  • अनुच्छेद-51-A(G): नागरिकों पर वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा तथा सुधार करने का मौलिक कर्तव्य लागू करता है।
  • सार्वजनिक ट्रस्ट का सिद्धांत: राज्य प्राकृतिक संसाधनों को जनता के लिए एक ट्रस्टी के रूप में रखता है, यह सुनिश्चित करता है कि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित रहें।
  • न्यायिक सक्रियता: न्यायालयों ने अक्सर पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में निर्णय सुनाया है, प्रकृति के अधिकारों को मान्यता दी है और सतत् विकास सिद्धांतों को लागू किया है।

पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करने वाले न्यायालय के निर्णय

  •  टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ (वर्ष 2012): सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी वर्गीकरण से परे जाकर पारिस्थितिकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल करने के लिए ‘वन’ की परिभाषा का विस्तार किया।
    • इसने वनों की कटाई और अवैध गतिविधियों पर कठोर नियम बनाए, जिससे वनों का स्थायी संरक्षण सुनिश्चित हुआ।
  • एम. के. रंजीत सिंह बनाम भारत संघ (वर्ष 2024): इस निर्णय में जैव विविधता के आंतरिक मूल्य पर जोर दिया गया, जिससे लुप्तप्राय प्रजातियों और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
    • न्यायालय ने वाणिज्यिक हितों पर पर्यावरण अखंडता को प्राथमिकता देते हुए संरक्षण प्रयासों के लिए कानूनी सुरक्षा उपायों को बढ़ाने का निर्देश दिया।

पारिस्थितिक न्याय में वैश्विक प्रथाएँ

कई देशों ने प्रकृति के अधिकारों को मान्यता देने वाले कानूनी ढाँचे को अपनाया है तथा पारिस्थितिकी तंत्रों को शोषण से बचाने के लिए उन्हें कानूनी व्यक्तित्व के रूप में मान्यता प्रदान की है।

देश

पहल

प्रमुख कानूनी मान्यता

इक्वाडोर (Ecuador) प्रकृति के अधिकार संविधान (वर्ष 2008) पचमामा (मदर अर्थ) को प्राकृतिक चक्र बनाए रखने के लिए कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
बोलीविया (Bolivia) लॉ ऑफ मदर अर्थ (2012) यह विधेयक मदर अर्थ को एक कानूनी इकाई के रूप में मान्यता देता है, जिसके पास अस्तित्व और पुनर्जीवन का अधिकार है।
न्यूजीलैंड (New Zealand) ते उरेवेरा अधिनियम 

(Te Urewera Act) (2012)

उरेवेरा वन और वांगानुई नदी को कानूनी व्यक्तित्व के रूप में मान्यता प्रदान की गई, जिससे सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
भारत उच्च न्यायालय के निर्णय न्यायालयों ने गंगा और यमुना नदियों के संरक्षण के लिए उन्हें कानूनी व्यक्तित्व की मान्यता प्रदान की गई।
संयुक्त राज्य अमेरिका स्थानीय पर्यावरण कानून कुछ अमेरिकी नगर पालिकाओं ने प्रकृति के अधिकारों को मान्यता देते हुए, कॉरपोरेट शोषण को रोकने के लिए कानून बनाए हैं।

निष्कर्ष

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनाया गया पर्यावरण-केंद्रित कानूनी दृष्टिकोण मानवीय हितों से परे पर्यावरण संरक्षण की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान को दर्शाता है। प्रकृति के अंतर्निहित अधिकारों को मान्यता देकर, भारत और अन्य राष्ट्र जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव विविधता की रक्षा करने तथा सतत् विकास सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखते हैं। हालाँकि, आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को संतुलित करना एक चुनौती बनी हुई है, जिसके लिए निरंतर कानूनी और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है।

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