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भारत में प्रदूषण की भयावह स्थिति

Lokesh Pal April 03, 2025 03:41 16 0

संदर्भ

भारत में वायु प्रदूषण कोई मौसमी समस्या नहीं है, बल्कि यह वर्ष भर चलने वाला स्वास्थ्य संकट है, जिसके कारण श्वसन संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं और शहरी क्षेत्रो में दृश्यता कम हो रही है।

वायु प्रदूषण की स्थिति

  • वैश्विक प्रदूषण रैंकिंग: भारतीय शहर अक्सर विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो रहे हैं, जहाँ PM-2.5 और PM-10 प्रदूषकों का स्तर खतरनाक होता है।
    • IQ-Air की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत विश्व का पाँचवाँ सबसे प्रदूषित देश है, जबकि मेघालय का बर्नीहाट वैश्विक स्तर पर सबसे प्रदूषित महानगरीय क्षेत्र है।
  • सीमित जागरूकता और कार्रवाई: गंभीर प्रभाव के बावजूद, वायु प्रदूषण को अक्सर संरचनात्मक और प्रशासनिक मुद्दे के बजाय एक अलग समस्या के रूप में देखा जाता है।

वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी पहल और हस्तक्षेप

  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP): इसका लक्ष्य वर्ष 2026 तक PM2.5 के स्तर को 40% तक कम करना है, जिसमें शहर-विशिष्ट वायु गुणवत्ता सुधार योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
  • भारत VI उत्सर्जन मानक: ऑटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए कठोर वाहन उत्सर्जन मानदंड प्रस्तुत किए गए।
  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY): घरों में बायोमास दहन को कम करने के लिए स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन (LPG) को बढ़ावा देती है।
  • अन्य कार्यक्रम और वित्तपोषण: इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाना और उनका निर्माण करना (FAME II) और स्वच्छ भारत मिशन जैसी पहल अप्रत्यक्ष रूप से वायु गुणवत्ता में सुधार में योगदान करती हैं।

प्रदूषण नियंत्रण का चीनी मॉडल और इसकी प्रभावशीलता

  • भारी वित्तीय निवेश: चीन ने शहरी प्रदूषण नियंत्रण में पाँच वर्षों में 22 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया, जो भारत के बजट से काफी अधिक है।
  • लक्षित औद्योगिक बंदीकरण: चीन ने आक्रामक तरीके से कोयला संयंत्रों को बंद किया और प्रदूषणकारी उद्योगों को शहरी क्षेत्रों से दूर स्थानांतरित किया।
  • सख्त नीति प्रवर्तन: भारी जुर्माने और नियामक ढाँचे ने अनुपालन सुनिश्चित किया, जबकि भारत में प्रवर्तन तंत्र लचीला था।
  • वायु गुणवत्ता में तीव्र सुधार: प्रमुख चीनी शहरों में कुछ वर्षों के भीतर ही वायु गुणवत्ता में महत्त्वपूर्ण सुधार देखा गया, जो अच्छी तरह से वित्तपोषित और केंद्रीकृत दृष्टिकोण की प्रभावशीलता को दर्शाता है।

प्रदूषण के प्रति भारत के दृष्टिकोण की चुनौतियाँ

  • विखंडित और धीमा कार्यान्वयन: कई कार्यक्रमों के बावजूद, एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी प्रभावी कार्रवाई में बाधा उत्पन्न करती है।
  • अपर्याप्त निधि और संसाधन आवंटन: NCAP का बजट आवश्यकता से काफी कम है और वर्ष 2019 से वर्ष 2023 के बीच आवंटित निधि का केवल 60% उपयोग किया गया था।
  • हाई-टेक समाधानों पर अत्यधिक निर्भरता: बायोमास दहन को कम करने जैसे मौलिक प्रदूषण नियंत्रण उपायों की तुलना में स्मॉग टॉवर, AI डैशबोर्ड और उन्नत सेंसर को प्राथमिकता दी जाती है।
  • सीमित स्थानीय सरकारी क्षमता: नगर निकाय प्राचीन बुनियादी ढाँचे और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को लागू करने के लिए अपर्याप्त अधिकार के साथ कार्य करते हैं।
  • अभिजात वर्ग पर अधिकार और शहर-केंद्रित नीतियाँ: हाई-टेक समाधान महानगरीय क्षेत्रों को लाभ पहुँचाते हैं, जबकि ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्र अनदेखा कर दिए जाते हैं।

आगे की राह

  • स्थानीय शासन को मजबूत करना: प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण के लिए नगर निकायों को पर्याप्त संसाधन और अधिकार प्रदान करना।
  • डेटा-संचालित लक्षित कार्यवाहियाँ: व्यापक प्रदूषण निगरानी से हटकर विशिष्ट प्रदूषण स्रोतों की पहचान करना और उनका समाधान करना।
  • समान नीति कार्यान्वयन: यह सुनिश्चित करना कि प्रदूषण नियंत्रण उपाय केवल शहरी अभिजात वर्ग तक ही सीमित न होकर ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्रों तक पहुँचें।
  • अनुसंधान और कार्रवाई में संतुलन: प्रगति में तेजी लाने के लिए अनुसंधान और तत्काल, जमीनी हस्तक्षेप के लिए अलग-अलग निधि स्थापित करना।

भारत का स्वच्छ वायु का भविष्य प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता या खंडित प्रयासों के बजाय लोगों, साझेदारियों तथा उद्देश्यपूर्ण कार्रवाई पर निर्भर करता है।

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