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अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की आवश्यकता

Lokesh Pal April 01, 2025 02:16 39 0

संदर्भ 

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी की बरामदगी न्यायपालिका में पारदर्शिता, योग्यता आधारित भर्ती और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (All India Judicial Service-AIJS) की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

हालिया न्यायिक विवाद

  • आधे जले हुए नोटों का मामला: दिल्ली फायर ब्रिगेड को एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आधिकारिक आवास पर आधे जले हुए नोट मिले।
  • लोकपाल बनाम न्यायपालिका: उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायत पर लोकपाल द्वारा संज्ञान लेने पर आपत्ति जताई, तथा न्यायपालिका की जवाबदेही तंत्र पर सवाल उठाया।
  • असंवेदनशील न्यायिक निर्णय: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि नाबालिग लड़की के शरीर के अंगों को छूना बलात्कार का प्रयास नहीं माना जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने संवेदनशीलता की कमी का हवाला देते हुए आदेश पर रोक लगा दी।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (All India Judicial Service-AIJS) के बारे में

  • AIJS, IAS और IPS के समान अखिल भारतीय परीक्षा के माध्यम से जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित केंद्रीकृत भर्ती प्रणाली है।
  • इसका उद्देश्य पारदर्शी, कुशल चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करना और मौजूदा राज्य स्तरीय नियुक्ति प्रणाली की जगह शीर्ष कानूनी प्रतिभाओं को आकर्षित करना है।
  • वर्तमान में, जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) पर संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

  • AIJS से संबंधित संवैधानिक प्रावधान: 42वें संविधान संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 312(1) में संशोधन करके संसद को अन्य अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS, IFoS) के समान अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की स्थापना करने का अधिकार दिया।
    • अनुच्छेद 312(1) के तहत, राज्य सभा को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होगा। 
  • AIJS पदों पर सीमाएँ: अनुच्छेद 312(2) के अनुसार, AIJS में जिला न्यायाधीश (जैसा कि अनुच्छेद 236 में परिभाषित किया गया है) से कम कोई पद शामिल नहीं हो सकता।
    • अनुच्छेद 236 के अंतर्गत परिभाषाएँ
      • जिला न्यायाधीश: इसमें शहर के सिविल न्यायालयों के न्यायाधीश, अतिरिक्त/संयुक्त/सहायक जिला न्यायाधीश, लघु वाद न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त/सहायक सत्र न्यायाधीश आदि शामिल हैं।
      • न्यायिक सेवा: इसमें जिला न्यायाधीश और अधीनस्थ सिविल न्यायिक पदों पर नियुक्ति के लिए अभिप्रेत व्यक्ति शामिल हैं।

वर्तमान चयन प्रणाली के साथ तुलना

  • वर्तमान प्रणाली (राज्य-नियंत्रित चयन)
    • संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 द्वारा शासित होता है।
    • राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय जिला न्यायाधीशों और निचली न्यायपालिका की नियुक्ति की देखरेख करते हैं।
    • चयन राज्य न्यायिक सेवा परीक्षाओं के माध्यम से किया जाता है, जिसका प्रबंधन निम्नलिखित द्वारा किया जाता है:
      • राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commissions-PSC)
      • संबंधित उच्च न्यायालय (जिनका अधीनस्थ न्यायालयों पर अधिकार क्षेत्र है)।
    • परीक्षा के बाद, उच्च न्यायालय का पैनल अंतिम चयन से पहले अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लेता है।
  • AIJS (प्रस्तावित प्रणाली-केंद्रीकृत चयन)
    • AIJS जिला न्यायाधीशों के लिए राष्ट्रीय स्तर की भर्ती प्रणाली शुरू करेगा। 
    • संसद और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) भर्ती की देखरेख करेंगे, जिससे राज्य स्तर पर विवेकाधिकार कम होगा। 
    • इसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों की एकरूपता, योग्यता आधारित चयन और अंतर-राज्यीय गतिशीलता सुनिश्चित करना है।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के गठन की आवश्यकता 

  • हाल के न्यायिक विवादों में सामान्य कारक: सभी न्यायाधीश वर्तमान में कॉलेजियम प्रक्रिया के माध्यम से प्रणाली में प्रवेश करते हैं।
  • अपारदर्शी चयन प्रक्रिया: कॉलेजियम ‘बैक डोर’ कार्यप्रणाली की तरह कार्य करता है, न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव है।
  • न्यायिक वंशवाद: कुछ प्रभावशाली परिवार उच्च न्यायपालिका पर प्रभावी हैं, जिससे बाहरी लोगों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं।
  • मध्यमता का जोखिम: वर्तमान प्रणाली हमेशा योग्यता-आधारित चयन सुनिश्चित नहीं करती है, जिससे कभी-कभी अक्षम न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है।
  • न्यायपालिका में करियर विकास को बढ़ावा देना: वर्तमान में, 25% से भी कम न्यायिक अधिकारी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर आगे बढ़ते हैं, जिनमें से अधिकांश जिला न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त होते हैं।
    • शेष 75% उच्च न्यायालयों में नियुक्तियाँ बार एसोसिएशन से होती हैं। AIJS उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक बड़ा, युवा प्रतिभा समूह तैयार करेगा।
  • न्यायिक रिक्तियों और देरी को संबोधित करना: AIJS भर्ती को सुव्यवस्थित कर समय पर नियुक्तियाँ सुनिश्चित कर सकता है और देरी को कम कर सकता है।
    • उदाहरण: भारत में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामले हैं, जिनमें निचली अदालतों में लगभग 4,000 न्यायिक रिक्तियाँ हैं (वर्ष 2023 तक)।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) का महत्त्व

  • न्यायिक दक्षता में वृद्धि: एक मानकीकृत भर्ती प्रणाली से सभी राज्यों में एक समान वेतन, संरचित प्रशिक्षण और तेजी से नियुक्तियाँ सुनिश्चित होंगी। इससे लंबित मामलों को कम करने और समग्र न्यायिक प्रभावशीलता में सुधार करने में मदद मिलेगी।
  • व्यवसाय संबंधी कानूनी ढांचे को मजबूत करना: कुशल न्यायालय विवाद समाधान में तेजी लाएंगे, जिससे भारत की व्यवसाय सुगमता रैंकिंग में सुधार होगा। एक मजबूत न्यायपालिका निवेशकों का विश्वास बढ़ाएगी और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी।
  • न्यायाधीश-जनसंख्या के बीच अंतराल को कम करना: भारत का न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात वैश्विक मानकों से बहुत नीचे है; AIJS इस अंतराल को कम करने में मदद कर सकता है।
  • न्यायपालिका में सामाजिक समावेश को बढ़ावा देना: राष्ट्रीय स्तर की चयन प्रक्रिया हाशिए पर स्थित और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगी।
    • योग्यता आधारित चयन प्रणाली कुशल विधि स्नातकों को न्यायपालिका में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करेगी। इससे उच्च न्यायालयों में भविष्य की नियुक्तियों के लिए प्रतिभाओं का एक समूह तैयार होगा।
  • पारदर्शिता और निष्पक्ष नियुक्तियाँ सुनिश्चित करना: एक संरचित भर्ती दृष्टिकोण न्यायिक चयन प्रक्रिया में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को कम करेगा।
    • कानून की विभिन्न शाखाओं में व्यापक प्रशिक्षण और सर्वोच्च न्यायालय के नेतृत्व वाली निगरानी प्रणाली से निष्ठा बनाए रखने और आवश्यकता पड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ 

  • न्यायिक स्वतंत्रता को खतरा: वर्तमान में, उच्च न्यायालय जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और निष्कासन की देखरेख करते हैं, जिससे राज्य सरकारों से उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।
    • AIJS राष्ट्रीय न्यायिक सेवा आयोग में शक्ति को केंद्रीकृत कर सकता है, जिससे अत्यधिक नियंत्रण के बारे में चिंताएँ बढ़ रही हैं।
  • राज्य सरकारों का विरोध: अनुच्छेद 233 के अनुसार, अधीनस्थ न्यायपालिका में भर्ती राज्य का विशेषाधिकार है।
    • कई राज्य AIJS का विरोध करते हैं, उन्हें डर है कि यह संघवाद के खिलाफ जाएगा, न्यायिक नियुक्तियों में उनकी स्वायत्तता खत्म हो जाएगी और निचली न्यायपालिका पर उनका प्रभाव कम हो जाएगा।
  • हाशिए पर पड़े समुदायों के प्रतिनिधित्व पर प्रभाव: राज्य कोटे से लाभान्वित होने वाले कई समुदाय AIJS का विरोध कर सकते हैं, क्योंकि राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त OBC केंद्रीय वर्गीकरण के साथ संरेखित नहीं हो सकते हैं।
    • हालाँकि AIJS का उद्देश्य प्रतिनिधित्व में सुधार करना है, कई राज्य पहले से ही हाशिए पर स्थित समूहों और महिलाओं के लिए न्यायिक पद आरक्षित करते हैं।
  • न्यायिक कार्यवाही में भाषा संबंधी बाधा: केंद्रीय स्तर पर नियुक्त न्यायाधीशों को स्थानीय भाषाओं से जूझना पड़ सकता है, जिससे उनकी सुनवाई करने और प्रभावी ढंग से निर्णय देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
    • चूंकि सिविल और आपराधिक अदालतों की कार्यवाही संबंधित राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित भाषा में की जानी है, इसलिए इससे न्यायिक दक्षता में बाधा आ सकती है।
  • न्यायपालिका का नौकरशाहीकरण: केंद्रीय स्तर पर नियंत्रित AIJS एक कठोर, नौकरशाही संरचना को जन्म दे सकता है, जिससे राज्य-विशिष्ट न्यायिक चिंताओं को संबोधित करने के लिए आवश्यक लचीलापन कम हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय  न्यायिक प्रणाली से भारत के लिए सबक

  • सिंगापुर: एकीकृत केस प्रबंधन प्रणाली (ICMS) ई-फाइलिंग, AI-आधारित केस ट्रैकिंग और स्वचालित शेड्यूलिंग की अनुमति देती है, जिससे लंबित मामलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आती है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: सिविल मामलों में अनिवार्य वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) ने न्यायिक व्यस्ततता को कम किया है।
  • यू.के.: न्यायिक नियुक्ति आयोग इंग्लैंड और वेल्स में न्यायिक कार्यालय के लिए उम्मीदवारों का चयन करता है।

आगे की राह

  • हितधारकों के बीच आम सहमति बनाना: केंद्र को चिंताओं को दूर करने के लिए उच्च न्यायालयों, राज्य सरकारों और सर्वोच्च न्यायालय के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए।
  • पारदर्शिता: सार्वजनिक रूप से सुलभ भर्ती विवरणों के साथ योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया को अपारदर्शी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेनी चाहिए।
  • निगरानी: न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने और नौकरशाही में ठहराव को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के नेतृत्व में एक निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।
  • भर्ती के लिए हाइब्रिड मॉडल: एक ऐसी प्रणाली जिसमें भर्ती प्रक्रिया केंद्रीकृत हो, लेकिन पोस्टिंग और पदोन्नति में राज्यों की भूमिका हो, संघवाद संबंधी चिंताओं को दूर करने में मदद कर सकती है।

निष्कर्ष 

AIJS न्यायिक दक्षता, पारदर्शिता और योग्यता आधारित नियुक्तियों को बढ़ा सकता है, लेकिन जब तक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के समर्थन में व्यापक सहमति नहीं बन जाती, तब तक भारतीय न्यायपालिका के सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान के लिए अधिक प्रत्यक्ष समाधानों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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