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बाल श्रम के मामलों की कम रिपोर्टिंग

Lokesh Pal March 31, 2025 03:08 36 0

संदर्भ 

रिपोर्ट ‘कानून कार्यान्वयन पर अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए ई-कोर्ट्स डेटा की संभावनाएँ’ (The Possibilities of eCourts Data for Advancing Research on Law Implementation) से पता चलता है कि छह राज्यों यानी महाराष्ट्र, असम, बिहार, झारखंड, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में बाल श्रम के मामले NCRB के रिकॉर्ड से लगभग आठ गुना अधिक हैं।

सतत् विकास लक्ष्य (SDG और बाल श्रम)

  • लक्ष्य 8.7: इसका उद्देश्य जबरन श्रम का उन्मूलन करना, आधुनिक दासता और मानव तस्करी को समाप्त करना, बाल सैनिकों की भर्ती एवं उपयोग सहित बाल श्रम के सबसे वीभत्स रूपों का निषेध और उन्मूलन सुनिश्चित करना तथा वर्ष 2025 तक सभी रूपों में बाल श्रम को समाप्त करना है।

 

बाल श्रम के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, ‘बाल श्रम’ शब्द को अक्सर ऐसे कार्य के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनकी गरिमा से वंचित करता है और जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए हानिकारक है।

बाल श्रम से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-23: मानव तस्करी पर रोक लगाता है, जिसमें जबरन श्रम, गुलामी या शोषण के उद्देश्य से की जाने वाली तस्करी भी शामिल है।
  • अनुच्छेद-24: 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक व्यवसायों या प्रक्रियाओं में कार्य पर रखने पर रोक लगाता है।

बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 (CALPRA)

  • सभी व्यवसायों में बच्चों (14 वर्ष से कम) को कार्य पर रखने पर रोक लगाता है।
  • हानिकारक व्यवसायों में किशोरों (14-18 वर्ष) के लिए कार्य करने की स्थितियों को विनियमित करता है।
  • अपवाद
    • एक बच्चा स्कूल के बाद या छुट्टियों के दौरान अपने पारिवारिक व्यवसाय में मदद कर सकता है (अगर यह व्यवसाय खतरनाक नहीं है)।
    • एक बच्चा सर्कस को छोड़कर विज्ञापनों, फिल्मों, TV शो या खेलों में कार्य कर सकता है, बशर्ते कि इससे उसकी शिक्षा प्रभावित न हो और सुरक्षा नियमों का पालन हो।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • NCRB द्वारा बाल श्रम के मामलों की कम रिपोर्टिंग: महाराष्ट्र, असम, बिहार, झारखंड, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में NCRB द्वारा दर्ज मामलों की तुलना में लगभग आठ गुना अधिक बाल श्रम के मामले पाए गए। 
    • NCRB ने वर्ष 2015 से वर्ष 2022 के बीच बाल और किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (CALPRA) के तहत 1,329 मामलों की रिपोर्ट की, जबकि ई-कोर्ट के आँकड़ों के अनुसार, इसी अवधि में 9,193 मुकदमे दर्ज किए गए।
    • ई-कोर्ट्स डेटा व्यापक तस्वीर प्रदान करता है: अध्ययन ने ई-कोर्ट्स प्लेटफॉर्म से 10,800 बाल श्रम मामलों के डेटासेट का विश्लेषण किया।
    • ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट एक अखिल भारतीय परियोजना है, जिसकी निगरानी और वित्तपोषण देश भर के जिला न्यायालयों के लिए न्याय विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
      • यह एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है, जहाँ मामले का विवरण, जैसे लंबित मामले, सुनवाई की अगली तारीख एवं चरण की जानकारी जुटाई जा सकती है।
  • NCRB के ‘प्रमुख अपराध नियम’ के कारण कम रिपोर्टिंग होती है: NCRB ‘प्रमुख अपराध नियम’ का पालन करता है।
    • इस तंत्र के अनुसार, एक ही FIR मामले में दर्ज कई अपराधों में से केवल सबसे जघन्य अपराध (अधिकतम सजा) को ही गिनती की इकाई माना जाता है।
    • यदि बाल श्रम अपराधों को FIR में अधिक गंभीर अपराधों के साथ जोड़ दिया जाए, तो वे NCRB के आँकड़ों में नहीं दिखाई देते, जिससे काफी हद तक कम रिपोर्टिंग होती है।
  • बच्चों के खिलाफ अपराध काफी अधिक हैं: रिपोर्ट से पता चला है कि बच्चों के खिलाफ अपराध किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की तुलना में तीन गुना अधिक हैं।
    • अपराध के रुझान को समझने, नीतियों को आकार देने और न्याय प्रदान करने में सुधार के लिए सटीक डेटा संग्रह आवश्यक है।

बाल श्रम के मामलों की कम रिपोर्टिंग के निहितार्थ

  • नीतिगत कमजोरियाँ: गलत डेटा नीति को गुमराह करता है और हस्तक्षेप रणनीतियों को कमजोर करता है।
  • कमजोर कानून प्रवर्तन: NCRB का “प्रमुख अपराध नियम” गंभीर अपराधों के साथ छोटे अपराधों को शामिल नहीं करता है, जिससे बाल श्रम के मामलों की दृश्यता कम हो जाती है और कानून प्रवर्तन प्रयास कमजोर हो जाते हैं।
  • न्यायिक बोझ: मामलों के बड़े पैमाने पर लंबित होने के कारण, कम रिपोर्टिंग समस्या के पैमाने की स्पष्ट समझ को रोकती है, जिससे न्यायिक क्षमता निर्माण के प्रयास सीमित हो जाते हैं।
    • कम रिपोर्टिंग से प्रसार कम होने की झूठी धारणा बनती है, जिससे कार्रवाई में देरी होती है।

बाल श्रम पर प्रमुख न्यायिक मामले

  • एम. सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996): खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम को धीरे-धीरे समाप्त करने, प्रति बच्चे 20,000 रुपये मुआवजा देने और अनिवार्य शिक्षा का आदेश दिया गया।
  • PUDR  बनाम भारत संघ (1982): मजदूरी का भुगतान न करने को जबरन मजदूरी (अनुच्छेद-23) घोषित किया गया और खतरनाक परिस्थितियों में बाल मजदूरी को असंवैधानिक करार दिया गया।
  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984): बंधुआ बाल मजदूरी को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना गया (अनुच्छेद-21, 23, 24) और पुनर्वास का आदेश दिया गया।
  • बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2016): बचाए गए बाल मजदूरों की तलाश और पुनर्वास तथा कानूनों के कठोरता से लागू करने का निर्देश दिया गया।

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