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यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची

Lokesh Pal January 30, 2026 02:19 28 0

संदर्भ

यूनेस्को ने ओडिशा के रत्नागिरी, उदयगिरी और ललितगिरी बौद्ध स्थलों के ‘डायमंड ट्रायंगल’ को भारत की विश्व धरोहर स्थल की अस्थायी सूची में शामिल किया है।

‘डायमंड ट्रायंगल’ के बारे में

  • संघटक स्थल: बौद्ध डायमंड ट्रायंगल ओडिशा में स्थित तीन प्रमुख बौद्ध मठ–स्तूप परिसरों—ललितगिरी, उदयगिरी और रत्नागिरी—के एक क्रमिक सांस्कृतिक समूह को संदर्भित करता है।
  • स्थान: ये तीनों स्थल ओडिशा के जाजपुर और कटक जिलों में स्थित हैं।
  • धार्मिक महत्त्व: ऐसा माना जाता है कि इन स्थलों पर बौद्ध धर्म की तीनों प्रमुख शाखाओं—हीनयान, महायान और वज्रयान—का प्रसार हुआ।
  • नाम की उत्पत्ति: ‘डायमंड ट्रायंगल’ शब्द वज्रयान (तंत्रयान) बौद्ध धर्म से जुड़ा है, जहाँ ‘वज्र’ का अर्थ वज्रपात या हीरा होता है।

डायमंड ट्रायंगल के प्रमुख स्थल

रत्नागिरी

  • अर्थ और स्थान: रत्नागिरी का शाब्दिक अर्थ “रत्नों की पहाड़ी” है। यह भुवनेश्वर से लगभग 100 किमी. उत्तर-पूर्व में, बिरूपा और ब्राह्मणी नदियों के बीच एक पहाड़ी पर स्थित है।
  • पुरातात्त्विक महत्त्व: रत्नागिरी ओडिशा का सबसे प्रसिद्ध और सबसे व्यापक रूप से उत्खनित बौद्ध स्थल है।
  • वज्रयान बौद्ध धर्म का केंद्र: यह 4वीं से 12वीं शताब्दी ईसवी के बीच, विशेष रूप से भौमकर वंश के अधीन, वज्रयान का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।
  • पुरातात्त्विक समृद्धि
    • उत्खननों में एक विशाल परिसर का उद्घाटन हुआ, जिसमें महास्तूप, चैत्यगृह, मठ, मंदिर तथा विशाल ‘उष्णीष’ (ज्ञान के प्रतीक) शामिल हैं।
    • “श्री रत्नागिरी महाविहारिया” नामांकित मुहरें इसे एक प्रमुख मठीय विश्वविद्यालय के रूप में पुष्टि करती हैं।
  • मठीय पैमाना: अपने उत्कर्ष काल में, इस मठ में लगभग 500 भिक्षुओं के निवास का अनुमान है, जो मुख्यतः तंत्रयान परंपरा का अनुसरण करते थे।
  • विशिष्ट स्थापत्य विशेषता: रत्नागिरी मठ भारत का एकमात्र बौद्ध मठ है, जिसकी छत वक्ररेखीय है।
  • ह्वेनसांग: अध्ययनों से संकेत मिलता है कि 638–639 ईसवी के दौरान ओडिशा की यात्रा करने वाले ह्वेनसांग संभवतः रत्नागिरी आए होंगे।

रत्नागिरी में हाल की पुरातात्त्विक खोजें

  • मुख्य निष्कर्ष: 5वीं–13वीं शताब्दी के बौद्ध परिसर में किए गए उत्खननों से निम्नलिखित प्राप्त हुए हैं::
    • एक विशाल ‘उष्णीष’ (ज्ञान का प्रतीक)
    • एक विशाल हथेली
    • एक प्राचीन दीवार
    • अभिलेखित बौद्ध अवशेष
  • काल-निर्धारण: इन खोजों को 8वीं–9वीं शताब्दी ईसवी का माना जाता है।

ललितगिरी

  • वैकल्पिक नाम: स्थानीय रूप से नल्टिगिरी के नाम से जाना जाता है।
  • प्राचीनता: नंदपहाड़ पहाड़ी पर स्थित ललितगिरी त्रिकोण का सबसे प्राचीन बौद्ध केंद्र है, जो दूसरी–तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 13वीं शताब्दी ईसवी तक निरंतर आवासीय केंद्र रहा, जिससे यह भारत के सबसे दीर्घकालिक बौद्ध स्थलों में से एक बनता है।
  • पुरातात्त्विक खोजें
    • उत्कल विश्वविद्यालय और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए उत्खननों में एक चैत्यगृह, चार मठ और एक विशाल थेरवाद स्तूप प्राप्त हुआ, जिसमें पत्थर, चाँदी और सोने की परतदार अवशेष पेटिकाएँ थीं।
    • “श्री चंद्रादित्य विहार” का उल्लेख करने वाली अभिलेखित मुहर की खोज ललितगिरी को एक संगठित मठीय संस्था के रूप में पुष्टि करती है।
  • मुख्य पुरातात्त्विक खोज: खोंडालाइट, स्टीएटाइट, चाँदी और सोने से निर्मित चार पात्रों वाली एक अवशेष पेटिका, जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेष होने की मान्यता है।
  • सैद्धांतिक विकास: बुद्ध, अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा और जंभल की मूर्तियाँ थेरवाद, महायान और वज्रयान के माध्यम से ललितगिरी के विकास को दर्शाती हैं, जो प्रारंभिक सैद्धांतिक समन्वय और कलात्मक प्रयोग का प्रमाण हैं।

उदयगिरी

  • अवस्थिति
    • “सूर्योदय पहाड़ी” के नाम से प्रसिद्ध उदयगिरी त्रिकोण का सबसे बड़ा परिसर है, जो बिरूपा नदी के किनारे अर्द्धचंद्राकार पहाड़ी पर स्थित है।
    • यह 1वीं से 13वीं शताब्दी ईसवी तक बौद्ध शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र रहा।
  • प्रमुख मठीय प्रतिष्ठान: ASI के उत्खननों में माधवपुर महाविहार और सिंहप्रस्थ महाविहार का अनावरण हुआ, जिनमें बड़े ईंट-निर्मित मठ, दो-मंजिला संरचना, प्रदक्षिणापथ, गुंबददार खिड़कियाँ और ऊपरी मंदिर कक्ष शामिल हैं, जो भारतीय बौद्ध स्थापत्य में दुर्लभ विशेषताएँ हैं।
  • कलात्मक और आनुष्ठानिक महत्त्व
    • इस स्थल पर एक विशाल चैत्यगृह है, जो वृत्ताकार और आयताकार रूपों में स्थापत्य विकास को दर्शाता है, जिसमें पंच ध्यान बुद्ध प्रतिष्ठित हैं। तारा, मंजुश्री, अवलोकितेश्वर, मैत्रेय और वज्रयान देवताओं की अनेक मूर्तियाँ महायान और वज्रयान परंपराओं के बीच सेतु के रूप में उदयगिरी की भूमिका को रेखांकित करती हैं।

पुष्पगिरी महाविहार

  • पुरातत्त्वविदों का मानना है कि लंगुड़ी, रत्नागिरी, उदयगिरी और ललितगिरी मिलकर प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय पुष्पगिरी का निर्माण करते थे, जो नालंदा और तक्षशिला के समतुल्य था।
  • इस विश्वविद्यालय का उल्लेख 7वीं शताब्दी ईसवी में चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा किया गया है।

विश्व धरोहर स्थल (WHS)

  • विश्व धरोहर स्थल वे स्थान हैं, जिनका उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य होता है, जिन्हें उनकी सांस्कृतिक, प्राकृतिक या मिश्रित महत्ता के लिए मान्यता दी जाती है और वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लाभ हेतु संरक्षित किया जाता है।
  • कानूनी ढाँचा: इन स्थलों को वर्ष 1972 के यूनेस्को विश्व धरोहर अभिसमय के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है, जिसे वैश्विक विरासत संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु अपनाया गया।
  • शासी निकाय: यूनेस्को विश्व धरोहर समिति विश्व धरोहर कार्यक्रम के माध्यम से विश्व धरोहर सूची का संधारण और अद्यतन करती है।
  • भारत और अभिसमय
    • भारत ने वर्ष 1977 में विश्व धरोहर अभिसमय की पुष्टि की, जिसके तहत विरासत स्थलों की पहचान, संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति प्रतिबद्धता जताई।
    • सितंबर 2025 तक, भारत में 44 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं, जिनमें भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य सबसे नवीन (44वें) रूप में अंकित हैं।

अस्थायी सूची

  • परिभाषा: अस्थायी सूची सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों की एक आधिकारिक सूची है, जिन्हें कोई राज्य पक्षकार, भविष्य में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में नामांकन हेतु विचार करता है।
  • भूमिका: अस्थायी सूची में सम्मिलित होना विश्व धरोहर अभिलेखन की पहली अनिवार्य प्रक्रिया है।
    • केवल वही स्थल औपचारिक रूप से नामांकित किए जा सकते हैं, जो इस सूची में सम्मिलित हों।
  • प्रक्रिया: किसी स्थल को अस्थायी सूची में शामिल किए जाने के बाद, राज्य पक्ष एक विस्तृत नामांकन डोजियर तैयार करता है, जिसकी जाँच और निर्णय यूनेस्को विश्व धरोहर समिति द्वारा किया जाता है।
  • भारत की अस्थायी सूची की स्थिति
    • कुल स्थल: भारत के पास वर्तमान में यूनेस्को की अस्थायी सूची में 70 स्थल हैं।
    • आवृत श्रेणियाँ: ये स्थल सांस्कृतिक, प्राकृतिक और मिश्रित श्रेणियों में आते हैं।
    • ओडिशा के स्थल (अस्थायी सूची में): इसमें भुवनेश्वर का एकाम्र क्षेत्र और गंजाम जिले की चिल्का झील शामिल हैं।
    • हाल ही में जोड़े गए स्थल: चौसठ योगिनी मंदिरों का समूह, जिसमें ओडिशा के स्थल भी शामिल हैं, पिछले वर्ष जोड़ा गया।
      • ओडिशा में दो चौसठ योगिनी मंदिर हैं—एक भुवनेश्वर के निकट और दूसरा बलांगीर में।

ओडिशा – प्रमुख बौद्ध केंद्र

  • वंशीय संरक्षण: ओडिशा में बौद्ध धर्म का उत्कर्ष भौमकर वंश (8वीं–10वीं शताब्दी ईसवी) के अधीन हुआ।
  • शिष्य: भगवान बुद्ध के प्रथम शिष्य तपस्सु और भल्लिक को उत्कल (प्राचीन ओडिशा) का निवासी माना जाता है।
  • अशोक की विरासत: कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के पश्चात् सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अंगीकार किया और इसके प्रसार में भारत, श्रीलंका, मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया तक योगदान दिया।
  • समुद्री व्यापार संबंध: ओडिशा के दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ सुदृढ़ व्यापारिक संबंध थे, जिनके अंतर्गत काली मिर्च, दालचीनी, रेशम, कपूर, सोना और आभूषणों का व्यापार होता था।
  • सांस्कृतिक स्मृति: वार्षिक बलियात्रा उत्सव कलिंग और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच 2,000 वर्ष पुराने समुद्री संबंधों की स्मृति का प्रतीक है।

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