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शहरी सहकारी बैंक (UCBs)

Lokesh Pal January 16, 2026 04:08 7 0

संदर्भ

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नए शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिए लाइसेंसिंग विंडो को पुनः खोलने का प्रस्ताव रखा है।

संबंधित तथ्य

  • RBI ने लगभग वर्ष 2004 के बाद नए UCB लाइसेंस जारी करना बंद कर दिया था, क्योंकि यह पाया गया था कि हाल ही में लाइसेंस प्राप्त कई UCB अल्प अवधि में ही वित्तीय रूप से अस्थिर हो गए थे।

पूँजी से जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात (CRAR) किसी बैंक की पूँजी पर्याप्तता को उसकी पूँजी निधि को जोखिम-भारित परिसंपत्तियों के प्रतिशत के रूप में व्यक्त करके मापता है।

RBI के विवरण पत्र (Discussion Paper) के प्रमुख प्रस्ताव

  • UCB लाइसेंसिंग: RBI का प्रस्ताव केवल बड़े सहकारी ऋण समितियों के लिए है, जिनका न्यूनतम 10 वर्षों का सक्रिय संचालन हो तथा कम-से-कम 5 वर्षों का सुदृढ़ वित्तीय ट्रैक रिकॉर्ड हो।
  • पात्रता मानदंड
    • पूँजी पर्याप्तता: पूँजी से जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात (CRAR) कम-से-कम 12% होना चाहिए।
    • NPA अनुपात: लाइसेंस के लिए आवेदन के समय शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NNPA) अनुपात 3% से अधिक नहीं होना चाहिए।

सहकारी ऋण समितियाँ

  • सहकारी ऋण समितियाँ सदस्य-स्वामित्व वाली वित्तीय सहकारी संस्थाएँ हैं, जिनका गठन अपने सदस्यों को वहनीय ब्याज दरों पर अल्पकालिक और मध्यम अवधि का ऋण प्रदान करने के लिए किया जाता है।
  • आधारभूत सिद्धांत: ये समितियाँ पारस्परिक सहायता, लोकतांत्रिक नियंत्रण और लाभ से पहले सेवा के सिद्धांतों पर कार्य करती हैं।
  • कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा
    • इनका विनियमन सहकारी समितियों के पंजीयक द्वारा किया जाता है, न कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा, और ये पूर्ण बैंकिंग सेवाओं के बिना केवल सदस्यों के साथ ही लेन-देन कर सकती हैं।
  • उद्देश्य
    • ऋण तक पहुँच: मुख्य उद्देश्य उन सदस्यों को समय पर और किफायती ऋण उपलब्ध कराना है, जिनकी औपचारिक बैंकिंग तक पहुँच नहीं है।
    • शोषण की रोकथाम: सहकारी ऋण समितियों का उद्देश्य साहूकारों पर निर्भरता कम करना और शोषणकारी ब्याज दरों पर अंकुश लगाना है।
    • बचत को बढ़ावा देना: ये सदस्यों में मितव्ययिता और बचत की आदत को प्रोत्साहित करती हैं।
    • सामाजिक-आर्थिक विकास: ये समितियाँ विशेष रूप से ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थानीय आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन को समर्थन देती हैं।

UCB लाइसेंस प्रदान करने में चुनौतियाँ

  • शासन संबंधी जोखिम: भारतीय रिजर्व बैंक ने पूँजी जुटाने में कठिनाइयों और UCBs शेयरों की विशेषताओं के कारण पूँजी संरचना में अस्थिरता जैसी चिंताओं को रेखांकित किया है, जो हानि अवशोषक के रूप में इसकी क्षमता को कमजोर बनाती हैं।

  • निवेश प्रोत्साहन का अभाव: “एक सदस्य, एक वोट” के सिद्धांत के कारण विकास हेतु पूँजी आकर्षित करना कठिन हो जाता है, जिससे कमजोर बैंकों के समाधान में बाधा आती है।
  • छोटे UCB में कमजोर शासन: छोटे UCBs को प्रायः प्रबंधन संबंधी धोखाधड़ी, कमजोर प्रशासन और निदेशक मंडल तथा वरिष्ठ प्रबंधन में क्षेत्रीय ज्ञान की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • नियामक और कानूनी बाधाएँ: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधनों के बावजूद, कानूनी चुनौतियों और न्यायालयी हस्तक्षेपों ने UCBs में शासन करने की प्रक्रिया को धीमा कर दिया है।

शहरी सहकारी बैंक (UCBs) के बारे में 

  • UCBs सहकारी समितियाँ हैं, जो या तो राज्य सहकारी समितियाँ अधिनियम या बहु-राज्य सहकारी समितियाँ अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत होती हैं।
  • इन्हें बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत बैंकिंग लाइसेंस प्रदान किया जाता है और ये प्राथमिक सहकारी बैंकों के रूप में कार्य करती हैं।
  • भारत में UCBs की वर्तमान स्थिति
    • 31 मार्च 2025 तक, भारत में 1,457 शहरी सहकारी बैंक हैं।
    • परिसंपत्ति गुणवत्ता
      • सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात: 6.2%
      • शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात: 0.7%
      • प्रावधान कवरेज अनुपात: 90.1%।
    • परिसंपत्ति और जमा वृद्धि
      • UCBs की कुल परिसंपत्तियाँ 7.38 लाख करोड़ रुपये रहीं।
      • कुल जमा 5.84 लाख करोड़ रुपये रही, जो वर्ष 2015 की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण वृद्धि है।
  • नियामक ढाँचा और द्वैध नियंत्रण
    • भारतीय रिजर्व बैंक: वर्ष 1966 से भारतीय रिजर्व बैंक UCBs का विनियमन कर रहा है, जिसमें लाइसेंसिंग, पूँजी पर्याप्तता, ऋण नीतियाँ, सावधानीपूर्ण मानदंड और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है।
    • सहकारी समितियों के पंजीयक: UCBs के प्रशासनिक और प्रबंधन संबंधी पहलुओं का विनियमन सहकारी समितियों के पंजीयक द्वारा किया जाता है, जो राज्य या केंद्र सरकार के अधीन कार्य करता है।

स्तरीकृत नियामक संरचना

  • भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा UCBs को उनकी जमा राशि के आकार के आधार पर चार स्तरों में वर्गीकृत किया गया है, ताकि आनुपातिक विनियमन और पर्यवेक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
    • टियर 1 UCBs: 100 करोड़ रुपये तक।
    • टियर 2 UCBs: 100 करोड़ रुपये से अधिक और 1,000 करोड़ रुपये तक।
    • टियर 3 UCBs: 1,000 करोड़ रुपये से अधिक और 10,000 करोड़ रुपये तक।
    • टियर 4 UCBs: 10,000 करोड़ रुपये से अधिक।

UCBs और वाणिज्यिक बैंकों के बीच अंतर

पहलू शहरी सहकारी बैंक (UCBs) वाणिज्यिक बैंक
स्वामित्व शहरी सहकारी बैंक अपने सदस्यों के स्वामित्व में होते हैं, जो सहकारी सिद्धांत के अंतर्गत जमाकर्ता और उधारकर्ता दोनों होते हैं। वाणिज्यिक बैंक शेयरधारकों के स्वामित्व में होते हैं, जिनमें सरकार, संस्थान या निजी निवेशक शामिल हो सकते हैं।
विनियमन इन पर द्वैध विनियमन लागू होता है, जिसमें बैंकिंग परिचालन का विनियमन भारतीय रिजर्व बैंक करता है, जबकि प्रबंधन और पंजीकरण का विनियमन राज्य सरकार या केंद्र सरकार करती है। इनका विनियमन केवल भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत किया जाता है।
ऋण देने का फोकस ये मुख्यतः छोटे व्यापारियों, वेतनभोगी व्यक्तियों, स्वरोजगार में संलग्न शहरी एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को ऋण प्रदान करते हैं। इनका ऋण पोर्टफोलियो विविध होता है, जिसमें बड़े उद्योग, अवसंरचना, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, कृषि, खुदरा और सेवा क्षेत्र शामिल हैं।
मतदान का अधिकार “एक सदस्य, एक वोट” के सिद्धांत का पालन किया जाता है, चाहे कितने ही शेयर क्यों न हों। “एक शेयर, एक वोट” के सिद्धांत का पालन किया जाता है, जिसमें मतदान अधिकार शेयरधारण के अनुपात में होते हैं।

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