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भारत में शहरी अपशिष्ट संकट

Lokesh Pal January 05, 2026 02:47 52 0

संदर्भ

COP30 (बेलेम, 2025) में आयोजित जलवायु वार्ता के केंद्र में अपशिष्ट और चक्रीयता को रखा गया था, जिसमें ‘नो ऑर्गेनिक वेस्ट (NOW)’ जैसी पहलों के माध्यम से मेथेन उत्सर्जन को कम करने पर जोर दिया गया था।

संबंधित तथ्य  

  • COP30 में शहरों के अपशिष्ट को संसाधन के रूप में मान्यता देते हुए चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी पहलों को गति देने का आह्वान किया गया।
  • COP26 में घोषित भारत का मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) सचेत उपभोग और सतत् जीवनशैली को बढ़ावा देता है और चक्रीय अर्थव्यवस्था के दर्शन पर दृढ़ता से आधारित है।

भारत में शहरी अपशिष्ट चुनौती

  • तीव्र शहरीकरण: भारत के शहरों के समक्ष स्वच्छ एवं रहने योग्य शहरी क्षेत्रों तथा अपशिष्ट से ग्रस्त वातावरण के बीच एक कठिन विकल्प उपस्थित है, और अनेक शहर वैश्विक पर्यावरणीय स्वास्थ्य मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं।
  • बढ़ता अपशिष्ट: अनुमान है कि वर्ष 2030 तक शहरी भारत में प्रतिवर्ष 165 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होगा, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 436 मिलियन टन हो जाएगा, क्योंकि शहरी आबादी 814 मिलियन तक पहुँच जाएगी।
  • जलवायु और स्वास्थ्य पर प्रभाव: अपशिष्ट से संबंधित उत्सर्जन 41 मिलियन टन से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर सकता है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, उत्पादकता और जलवायु लक्ष्यों के लिए जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
  • मेथेन का संबंध: लैंडफिल में जैविक अपशिष्ट के अपघटन से मेथेन गैस उत्सर्जित होती है, जो CO₂ की तुलना में अधिक वैश्विक तापन क्षमता वाली ग्रीनहाउस गैस है, इसलिए अपशिष्ट प्रबंधन जलवायु परिवर्तन को कम करने की एक प्रमुख रणनीति है।

रेखीय और चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल क्या हैं?

  • रैखिक अर्थव्यवस्था मॉडल
    • अवधारणा: रैखिक अर्थव्यवस्था मॉडल उपयोग करो, बनाओ और त्याग दो’ के दृष्टिकोण का अनुसरण करता है, जिसमें संसाधनों का दोहन किया जाता है, उन्हें उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है और उपयोग के बाद त्याग दिया जाता है।
    • संसाधन अक्षमता: इस मॉडल के परिणामस्वरूप संसाधनों का अत्यधिक दोहन, भारी मात्रा में अपशिष्ट और पर्यावरण का क्षरण होता है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल
    • अवधारणा: चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल अपशिष्ट को एक संसाधन के रूप में देखता है और इसका उद्देश्य सामग्रियों को यथासंभव लंबे समय तक उपयोग में रखना है।
    • यह अपशिष्ट के उत्पादन को कम करने और पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और ऊर्जा पुनर्प्राप्ति के माध्यम से संसाधनों की अधिकतम पुनर्प्राप्ति पर केंद्रित है।

    • स्थिरता लाभ: चक्रीयता हरित रोजगार सृजित करके, उत्सर्जन को कम करके और शहरी पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करके समावेशी विकास को बढ़ावा देती है।
      • उदाहरण: पुणे का SWaCH मॉडल घर-घर अपशिष्ट संग्रहण और पुनर्चक्रण हेतु गरीबोन्मुख साझेदारी के अंतर्गत अपशिष्ट बीनने वालों को औपचारिक रूप से एकीकृत करता है।

भारत में शहरी अपशिष्ट की प्रवृत्तियाँ और स्थिति

  • जैविक अपशिष्ट का प्रभुत्व: नगरपालिका अपशिष्ट का 50% से अधिक भाग जैविक होता है, जिसका प्रबंधन खाद बनाने और जैव-मीथेन के माध्यम से किया जा सकता है।
    • हरित ऊर्जा क्षमता: संपीडित बायोगैस (CBG) संयंत्र गीले अपशिष्ट को हरित ईंधन में परिवर्तित करने में सक्षम हैं, जबकि पूर्ण दहन से बिजली भी उत्पन्न की जा सकती है।
    • उदाहरण: इंदौर ने घर-घर जाकर अपशिष्ट के संग्रहण और पृथक्करण की 100% प्रक्रिया अपनाई है और गीले अपशिष्ट के प्रसंस्करण प्रणालियों को लागू किया है, जो दर्शाता है कि कैसे शासन और बुनियादी ढाँचा चक्रीयता को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • शुष्क अपशिष्ट चुनौती: शहरी अपशिष्ट का लगभग एक-तिहाई हिस्सा शुष्क अपशिष्ट होता है, जिसमें प्लास्टिक, धातु और कागज शामिल हैं। इसके लिए कुशल पृथक्करण और पुनर्चक्रण प्रणालियों की आवश्यकता है।
  • निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट: निर्माण और विध्वंस गतिविधियों से प्रतिवर्ष लगभग 12 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जो धूल प्रदूषण तथा भूमि क्षरण में योगदान देता है।
    • उदाहरण: ग्रेटर चेन्नई नगर निगम ने अवैध रूप से अपशिष्ट फेंकने वाले वाहनों पर जुर्माना लगाकर और उन्हें जब्त करके सख्त प्रवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो रोकथाम की आवश्यकता को दर्शाता है।

भारत में नियामक ढाँचे

  • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी): स्वच्छ भारत मिशन शहरी स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता के लिए एक व्यापक नीतिगत ढाँचा प्रदान करता है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016: ये नियम नगरपालिका अपशिष्ट के स्रोत पर पृथक्करण, घर-घर जाकर संग्रहण, वैज्ञानिक प्रसंस्करण और सुरक्षित निपटान को अनिवार्य बनाते हैं।
    • उदाहरण: बिधाननगर नगर निगम (कोलकाता) ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों से जुड़े संरचित उपयोगकर्ता शुल्क और जुर्माने लागू किए, जो अनुपालन-आधारित शहरी अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016: ये नियम बड़े पैमाने पर अपशिष्ट उत्पन्न करने वालों हेतु उत्तरदायित्व निर्धारित करते हैं और स्थानीय निकायों को पुनर्चक्रण तथा प्रसंस्करण सुविधाएँ स्थापित करने के लिए बाध्य करते हैं।
  • पर्यावरण (निर्माण एवं विध्वंस) अपशिष्ट नियम, 2025: 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी इन नियमों का उद्देश्य निर्माण अपशिष्ट प्रबंधन में अनुपालन को मजबूत करना और जवाबदेही में सुधार करना है।
  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व: इसका उद्देश्य उत्पादकों को प्लास्टिक और अन्य शुष्क अपशिष्ट के संग्रहण, पुनर्चक्रण और निपटान के लिए जवाबदेह बनाना है।
  • अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग संबंधी ढाँचा: अमृत और स्वच्छ भारत मिशन जैसे शहरी अभियान शहरी जल सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
    • उदाहरण: सूरत नगर निगम ने अपशिष्ट जल को पुन: उपयोग योग्य आर्थिक संसाधन में परिवर्तित करने के लिए तृतीयक उपचार क्षमता स्थापित की है, जो चक्रीय जल प्रबंधन का समर्थन करती है।
    • नागपुर की पुनर्चक्रित जल पुन: उपयोग परियोजना कोराडी थर्मल पॉवर प्लांट में शीतलन के लिए उपचारित नगरपालिका अपशिष्ट जल की आपूर्ति करती है और इसे विश्व बैंक में एक सफल जल संबंधी मामले के रूप में प्रलेखित किया गया है।

चक्रीयता प्राप्त करने में चुनौतियाँ

  • स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण की कमी: सीमित जागरूकता और नागरिकों की अनियमित भागीदारी के कारण स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण संबंधी सेवाएँ अभी भी खराब स्थिति में हैं।
  • नगरपालिका क्षमता संबंधी बाधाएँ: शहरी स्थानीय निकायों को चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू करने में वित्तीय, तकनीकी और मानव संसाधन की कमी का सामना करना पड़ता है।
  • बुनियादी ढाँचे की कमियाँ: अपर्याप्त सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएँ, पुनर्चक्रण संयंत्र और अपशिष्ट-से-ऊर्जा बुनियादी ढाँचा प्रभावी अपशिष्ट प्रसंस्करण में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • बाजार व्यवहार्यता संबंधी मुद्दे: पुनर्चक्रित उत्पादों को गुणवत्ता संबंधी चिंताओं, सीमित उपभोक्ता विश्वास और कमजोर बाजार संबंधों का सामना करना पड़ता है।
  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) कार्यान्वयन में कमियाँ: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व को शुष्क अपशिष्ट की सभी श्रेणियों में समान रूप से लागू नहीं किया गया है।
  • निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट का पता लगाने की क्षमता: निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन कमजोर पहचान, निगरानी तथा भवन विनियमों के साथ एकीकरण से ग्रस्त है।
  • संस्थागत विखंडन: नगर निकायों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और शहरी नियोजन प्राधिकरणों के बीच खराब समन्वय नीति कार्यान्वयन को कमजोर करता है।
  • व्यवहार संबंधी बाधाएँ: बढ़ता उपभोक्तावाद और उत्पादों का तेजी से अप्रचलित होना, सामग्रियों को कम करने और उनका पुन: उपयोग करने के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
  • निगरानी संबंधी कमियाँ: मजबूत परीक्षण, निगरानी और डेटा प्रणालियों की कमी, चक्रीय अर्थव्यवस्था की पहलों की विश्वसनीयता और विस्तारशीलता को प्रभावित करती है।

केस स्टडी: छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर में ठोस और तरल संसाधन प्रबंधन

  • अंबिकापुर में घर-घर जाकर अपशिष्ट संग्रहण और वैज्ञानिक निपटान के साथ एक प्रभावी SLRM मॉडल लागू किया गया, जिसका नेतृत्व स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने किया।
  • शहर ने 16 एकड़ के अपशिष्ट स्थल को स्वच्छता जागरूकता पार्क में परिवर्तित कर दिया और अपशिष्ट-मुक्त शहर बन गया।
  • इस पहल से हरित रोजगार सृजित हुए, भूमि अधिग्रहण की लागत में कमी आई ।

अभ्यास प्रश्न 

स्वच्छता मिशन की उपलब्धियों ने भारत के समक्ष अगली महत्त्वपूर्ण चुनौती के रूप में मल-अपशिष्ट प्रबंधन को प्रस्तुत किया है। इस संदर्भ में, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) चरण-II के अंतर्गत मल-अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख संरचनात्मक, संस्थागत एवं व्यवहारगत चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। साथ ही, सतत स्वच्छता परिणामों की प्राप्ति में शहरी-ग्रामीण सहभागिता की प्रभावशीलता तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) की भूमिका पर चर्चा कीजिए। 

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